Sunday, 31 December 2017

"मुझे कुछ आता नहीं है " (MUJHE KUCH AATA NHI HAI)



मैं हूँ सिफ़र मुझे कुछ आता नहीं है ,
पर हूँ बेफ़िक्र के मुझे कुछ आता नहीं !!

झूठ घमंड कोसों दूर हो जाते है मुझसे  ,
जब बैठ के सोचता हूँ के मुझे कुछ आता नहीं !!

आता नहीं है मुझे रिश्तों में फरेब करना ,
खुश हूँ अकेला ये ज़माना मुझे भाता नहीं है !!

मतलब की दुनिया है लोगो कों सच से परहेज़ है ,
जो दूर है वो दूर रहे ,झूठे लोगों से रिश्ते "चौहान" बनता नहीं है !!

किसको क्या पता क्या खेल है खुदा का ,
जिसको बनाना खुदा चाहता है उसको मिटा कोई पता नहीं है !!

थोड़ी अदब-तहज़ीब सीख ले "चौहान " अब तो ,
भ्रम बनाये रख के सच है  तुझे कुछ आता नहीं है !!

शुभम सिंह चौहान 
मेरी कलम -  दिल की जुबां 

Thursday, 28 December 2017

"तज़ुर्बा-ए-ज़िंदगी" (TAZURBA-E-ZINDAGI)


ख़ामोशी को लबों पर सजा के रखले ,
मीठा  ज़हर है ज़ुबाँ लोगों की , खुद को बचा के रखले !!

नक़ाबपोश है यहाँ हर कोई ,इस दुनिया के बाजार में ,
दुश्मन अपने बन कर बैठे है , चेहरा तू भी छुपा कर रखले !!

वक़्त आएगा तो साहिल नसीब होंगे तेरी भी कश्ती को ,
बस तूफानों से लड़ कर लहरों की मौज में बहना सिखले !!

विश्वास ना कर यूँ राह में हर किसी मुसाफिर पे ,
रास्ते बहुत मिल जायेंगे बस तू अकेले चलना सीख ले !!

कौन छोटा है यहाँ कौन बड़ा ,ये तो वक़्त बतलायेगा ,
थोड़ा हद्दों में रहना तो "चौहान " अब तू भी सिखले !!

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Friday, 22 December 2017

" ABOUT ME "


रिश्ते  बनता नहीं वो,
जिनको निभाता नहीं ,
यारी में जान कुर्बान पर,
उम्मीद  किसी से मेरी अब ज़्यादा नहीं !!

स्वार्थी लोगों से रखने  लगा  हूँ दुरी  ,
ये ज़िंदगी एक शतरंज  ,
हारु या जीतूं  कोई गम नहीं ,
बनना हैं राजा  मुझे,
इस खेल का पियादा  नहीं !!

जंग है मेरी खुद से ,
रुकना मुझे आता नहीं,
पाना है  मंज़िल को ,
चाहे वो आज मिले या फिर कल,
कठिनाइयों से भागने  का मेरा कोई इरादा नहीं!!

ख़ामोशी का चोला हूँ ओढ़  के बैठा ,
जुबानों से ठगना , ठगना मुझे आता नहीं ,
"नाथ" तेरी लगन  मे मगन  हो गया ,
"चौहान" बुरा  किसी चाहता नहीं !!

अब तुझपर  है विश्वास  कर लिया,
घमंड  मुझे तेरे साथ का है,
और मुझे कुछ आता नहीं  !!

By : shubham singh Chauhan
Meri kalam - dil ki zubaa'n

Monday, 18 December 2017

"तेरा इंतजार" (TERA INTZAAR)


जब तलक साँसें है ,तेरे इश्क़ का मुझ पर ख़ुमार रहेगा,
तुम मिलो ना मिलो बात अलग है, मुझे मरने तक तेरा इंतज़ार रहेगा!!

क्या है बेबसी क्या है ये आलम तन्हाई का तुम क्या जानो,
तेरी यादों में अब तो दिन रात युहीं जीना दुश्वार रहेगा !!

कौन करेगा तुमसे मुहोबत मेरे जितनी मेरे बाद ,
मेरे मरने तलक तुमसे ये प्यार युहीं बेशुमार रहेगा!!

दुनिया पढ़ लेती है हाव-भाव चहरे के एक वक़्त के बाद ,
तेरी खामोशियों को पढ़ने का ये सिलसिला युहीं बरक़रार रहेगा!!

कहाँ होगी फिर वो जज़्बात मेरे दिल से निकले उन अल्फ़ाज़ों में,
कहाँ फिर "चौहान" जज़्बात-ए-इश्क़ से कोई इख़्तियार  रहेगा !!

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Sunday, 10 December 2017

"दिल की किताब" (DIL KI KITAB)


खोल किताब तेरे दिल की देख और पलट के देख कुछ पन्नो को,
धुंधलाया हुआ एक पन्ना मेरे नाम का भी होगा !!

मिटे हुए उन अक्ष्रों में कहीं कुछ बचा हुआ ,
एक अधूरा सा अक्षर मेरे नाम का भी होगा !!

खामोश लबों पर आ के ठहरा हुआ वो ,
आँखों से बहता आसूं मेरे नाम का भी होगा !!

तेरी हिफाज़त में चलता हुआ तेरे साथ ,
तेरे साए में छुपा हुआ अक्ष मेरा भी होगा !!

काली घनी रात में तेरे जहन में बसा हुआ,
एक छोटा सा ख़्याल मेरा भी होगा !!

माना के आज दूर सही हम पर पढ़ते हुए" मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ" ,
"चौहान "का एहसास करता हर एक अल्फ़ाज़ मेरे नाम का होगा !!

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Thursday, 7 December 2017

"अंदाज़ " (ANDAAZ)


अंदाज़ अब भी वही है , तेरी बातों का ..
सिमटे हुए सहमे हुए उन जज़्बातों का ..

वो चेहरे के नूर का , इश्क़ के सुरूर का ,
तेरे अश्क़ों से भीगी हुई उन तन्हा रातों का..

दिल में उठते हर एक सवाल का , जहन में आते तेरे ख्याल का,
किसी बक्से में बंद पड़ी उन इश्क़ की सौगातों का ..

खुद से ज़्यादा मेरी फ़िक्र का , बातों में मेरे ज़िक्र का ,
चोरी छुपे होती थी जो रोज़ उन मुलाक़ातों का ..

तुझसे मिलने की बेकरारी का , इश्क़ की चढ़ती खुमारी का ,
"चौहान" की ख्वाईश बन कर रह गई उन बेरंग चाहतों का ..

अंदाज़ आज भी वही है ....

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Monday, 4 December 2017

"मुक़ाम" (MUKAAM)


खुशियां कहाँ अब तो गम भी मेहरबान होगा,
इश्क़-ए-सफ़र में मुक़्क़मल हमें भी मुक़ाम होगा!!

जलता है तो जलता रहे ये जहाँ मेरे दिल का ,
कभी तो यहाँ भी वस्ल-ए-गुल का फ़रमान होगा!!

कभी तो बदलेगी रिवायत-ए-मुहोब्बत तेरे शहर में,
कभी तो यहाँ भी मुहोबत का खुशनुमा अंजाम होगा!!

कब तक बहाता रहेगा "चौहान" लहू अपनी आँखों से ,
कभी तो तेरे इश्क़ में लिपटा हर लम्हा मेरे नाम होगा !!

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम- दिल की ज़ुबाँ

Friday, 1 December 2017

" सफ़र आख़िरी " (SAFAR AKHIRI)


ख़ुद को ख़ुद से हार के बैठा हूँ तेरे इश्क़ में ,
सफ़र आख़री है ये मेरा तुम तक आने का !!

बहा के बैठा हूँ समुंदर अश्क़ों का तेरे इश्क़ में ,
वक़्त आख़री है ये मेरा अश्क़ बहाने का !!

बना के बैठा हूँ नासूर ज़ख़्मों को तेरे इश्क़ में ,
ग़म आख़री है ये तेरा दिल से लगाने का !!

बह निकले है जज़्बात बन के अलफ़ाज़ मेरी कलम से तेरे इश्क़ में,
"चौहान" आख़री है ये फ़साना लिखने लिखाने का !!

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Wednesday, 29 November 2017

"अब तलक " (AB TALAK)


सिलसिला तुझे चाहने का , अब तलक जारी है ,
यूँ पल पल अश्क़ बहाने का , अब तलक जारी है !!

सिमटी है कई यादें आज भी उन चाँद तारों में,
इन आसुओं का लबों पे रुक जाना , अब तलक जारी है !!

क्या जो डूब गयी कश्ती हमारी आ के किनारे पर ,
जज़्बा साहिल की चाह में तूफानों से टकराने का , अब तलक जारी है !!

किसको तलाश है अब सहरा में गुलिस्तां की ,
तन्हाई में तेरी यादों का सताना अब तलक जारी है !!

कर भी क्या लेंगे "चौहान" लिख कर "मेरी कलम - दिल की जुबां",
पर क्यूँ तेरा अश्क़ों को लफ़ज़ बनाना अब तलक जारी है!!

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां

Friday, 24 November 2017

"रोग इश्क़ का "(ROG ISHQ KA)


रोग पुराना है ये तुम मत लगाना ,
दर्द जाना पहचाना है ये तुम मत लगाना,
हर एक दिल का फ़साना है ये तुम मत लगाना ,
ये तो सदियों पुराना है इसे तुम मत लगाना,
रिश्ता बेगाना है ये तुम मत लगाना,
इस मर्ज़ की ना कोई दवा है ,
ये दिल आशिक़ाना तुम मत लगाना ,
मैंने तो चढ़ा लिया लाल रंग ख़ुद पर ,
ये रंग इश्क़ का "चौहान" तुम मत लगाना...
कहता है ये शायर दीवाना ,
मैं तो संभल ना पाया कश्ती इश्क़ की,
 इस दरिया में कहीं तुम भी भटक ना जाना .......

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां

Friday, 17 November 2017

"अच्छा लगता है " (ACCHA LAGTA HAI)


तेरा रूठना भी अच्छा लगता है,
तेरा मानना भी अच्छा लगता है ,
क्या चीज़ है ये मुहोबत समझ नहीं आती,
तेरा हँसना भी अच्छा लगता है ,
तेरा रुलाना भी अच्छा लगता है ...
फ़िक्र तुझे भी होती है मेरी ,
तेरा ना जता के भी वो जताना अच्छा लगता है..
क्या करना उस मंज़िल का जिसमें तुम ना हो,
"चौहान " तुम तक आके ठहर जाना अच्छा लगता है ..

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Friday, 3 November 2017

"रंग" (RANG)


रंग ख्यालों के है तो रंग है जज़्बात के,
रंग तेरी उल्फ़तों के रंग मेरे हालात के,
रंग तेरे इश्क़ में गुज़रे दिन रात के ,
रंग बदले नहीं आज भी वो शाम की मुलाकात के...
रंग तारों भरी तन्हा रात के ,
रंग आँखों से कही उन बात के ,
रंग अपनी कहानी की शुरुआत के ,
रंग बदले नहीं तेरे इश्क़ की सौगात के....
रंग आँखों में छिपे समुन्दर के ,
रंग दिलों में उठते बवंडर के,
रंग तेरे इश्क़ से पाक उस मंदिर के,
रंग बदले नहीं तेरे मेरे मुक्क़दर के ...
रंग मेरे गीतों में तेरे दिल की आवाज़ के,
रंग जज़्बात बयां करते उस साज़ के,
रंग तेरे इश्क़ के आसमा में उड़ते हुए परवाज़ के ,
रंग बदले नहीं "चौहान" तेरे इश्क़ के अंदाज़ के .....

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां

Wednesday, 1 November 2017

"फिर कहाँ " (PHIR KAHAN)



सुखे पत्ते टूट के शाखों से फिर कहाँ जुड़ेंगे,
बिछड़ गए जो एक बार हम तो फिर दोबारा कहाँ मिलेंगे ...

आ गई जो दरार तेरे उस मन के दर्पण में,
तु बता कहाँ फिर चहरे एक साथ दिखेंगे ..

टूट ही गये अगर धागे वो कच्चे तेरे इश्क़ के ,
तु बता कहाँ फिर वो बिना गांठों के जुड़ सकेंगे ...

चलते रहे अगर उम्र भर भी इन रास्तों पर यूँ अकेले,
तू बता अगर ना हो कोई मंज़िल तो कहाँ तक हम चल सकेंगे ..

अगर ना ही रहे कोई तालुकात मेरे दिल के मेरी कलम से,
तू बता "चौहान" कहाँ हम "मेरी कलम" से " दिल की जुबां" लिख सकेंगे...

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां

Friday, 20 October 2017

"एक किस्सा " (EK KISSA)


"एक किस्सा "बयाँ करूंगा ..
इश्क़ में हालातों का ,
गुज़री तन्हा रातों का ...
"एक किस्सा "बयाँ करूंगा ..

तन्हा उन काली रातों का ,
पल पल साथ तेरी उन यादों का ,
जो होती थी कभी उन हसीं मुलाक़ातों का,
"एक किस्सा "बयाँ करूंगा ..

ख़त में लिखे हुए उन जज़्बातों का,
रात भर जाग कर की जो उन बातों का ,
तुझे लेकर जहन में रहते उन खयालातों का,
"एक किस्सा "बयाँ करूंगा ..

इश्क़ में मिली बेवफाइयों का ,
पल पल बढ़ती हुयी रुस्वाइयों का ,
"चौहान" से की तूने उन बेपरवाहियों का ,
"एक किस्सा "बयाँ करूंगा ..

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Thursday, 19 October 2017

"जीता भी तो कितना " (JEETA BHI TO KITNA)


जीता भी तो कितना जीता ज़िंदगी तेरे बिन,
साँसों को तो रुक जाना ही था ..

ढूंढता भी तो कितना ढूंढता मरहम दिल के ज़ख्मो का,
नासूर तो इन्हे इक दिन बन जाना ही था ..

छोड़ के तो एक दिन यूँ भी तुम्हे मुझे चले जाना था ,
मुक़दर और लकीरों का तो बहाना ही था ..

किसे पता था की वक़्त इतना बदल जायेगा "चौहान" के वो कहेंगे ,
झूठे तो तुम थे सच्चा तो ये सारा ज़माना ही था ...

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल कि जुबां

Monday, 16 October 2017

"तुम ना आये होते " (TUM NA AAYE HOTE)


ना ये दर्द होते , ना ये गम होते ,
अगर मेरी ज़िंदगी में तुम ना आए होते...

ना रोती ये आँखें ना तरसती तेरी एक झलक को ,
अगर कभी तुमसे हमने नैन ना लड़ाए होते...

ना सुलगता ये दिल का आँगन, ना होता तन्हाइयों का आलम,
अगर कभी तुमसे हमने दिल ना लगाए होते ..

ना होते ये जज़्बात ,ना होते ये ख्यालात ,
अगर तेरे इश्क़ में ख़ुद को ना लुटाये होते ..

ना बनाता "चौहान" "मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ"
अगर रोग तेरे इश्क़ का  यूँ लगाए ना होते ..

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां

Saturday, 14 October 2017

"सामने न हो तुम " (SAMNE NA HO TUM)


जब सामने ना हो तुम ,
तो आँखों को करार कहाँ...
जब जिक्र ना हो तेरा,
तो बातों में क़रार कहाँ ..
जब खाव्बों में ना हो तुम,
तो नींदों में क़रार कहाँ ..
जब जज़बातों में ना हो तुम,
तो इश्क़ में करार कहाँ ...
जब मरहम ना बनो तुम ,
तो इन ज़ख्मों में क़रार कहाँ..
जब "चौहान" तेरे अलफ़ाज़ ही नहीं मेरे नाम,
तो "मेरी कलम"- "दिल की जुबां" कहाँ..

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां

Friday, 13 October 2017

"याद तो आता होगा " (YAAD TO AATA HOGA)


आज भी तुम्हे याद तो आता होगा ,
हर एक पल हर एक वो लम्हा ...
मिलने की बेकरारी दिन में और ,
रातें तन्हा तन्हा ...
आज भी तुम्हे याद तो आता होगा ...

वो मुझसे यूँ छुप छुप के मिलना ,
मेरे हाथों को थामे संग संग चलना ,
सावन की पहली बारिश में मेरे संग भीगना ,
आज भी तुम्हे याद तो आता होगा ...

वो तेरा दिन भर का इंतज़ार ,
वो बेफ़िक्री में छुपा हुआ प्यार ,
वो शाम को मीठी सी तकरार ,
आज भी तुम्हे याद तो आता होगा ...

वो मेरी बाजुओं में सिमटना,
वो तेरा मुझसे यूँ लिपटना ,
वो रात भर मिलने को तड़पना,
आज भी तुम्हे याद तो आता होगा ...

वो तेरे लबों को छूकर निकालता मेरा नाम ,
वो तेरे इश्क़ में ढलती मेरी हर शाम ,
वो चौहान की कलम से लिखा इश्क़-ए-पैगाम,
आज भी तुम्हे याद तो आता होगा ...

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां 

Thursday, 12 October 2017

"मुझे इंतज़ार रहेगा " (MUJHE INTZAR RAHEGA)



मुझे इंतज़ार रहेगा उस शाम का ...

जिस पल तेरे हाथों में हाथ मेरा होगा,
तेरे चेहरे के नूर सा सवेरा होगा ...

शामे गुज़रेंगी तेरे आगोश में मेरी ,
मेरे चहरे को तेरी ज़ुल्फ़ों ने घेरा होगा ...

पहरों तेरा दीदार होगा ,
इश्क़ का नया रंग नया खुमार होगा ..

तेरा दिल भी जब मेरे लिए बेक़रार होगा,
मेरी एक झलक का ये तलब्दार होगा ...

काली घनी रात में ना वो चाँद अकेला होगा ,
ना तेरे लबों पर ख़ामोशी होगी ,ना ये तन्हाईयों का मेला होगा ....

मुझे इंतज़ार रहेगा उस शाम का ....

जब तेरे हाथों की मेहँदी का रंग गहरा होगा ,
जब तेरा मेरी बाँहों में नया सवेरा होगा ..

जब पहन के आएगी तू लाल रंग का जोड़ा "चौहान" के नाम का ,

मुझे इंतज़ार रहेगा उस शाम का ....

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

"बदल सा गया हूँ " (BADAL SA GYA HOON)


जब से तेरी चाहतों में ढल गया हूँ मैं ,
सब मुझसे कहते है की बदल गया हूँ मैं ....

कोई और ख्वाईश ना की खुदा से तुझे देखने के बाद ,
आज तुझे पाने को कितना मचल गया हूँ मैं ...

कौन करेगा इंतज़ार मुहोब्बत में इतना ,
तु आ के देख वक़्त की आग में कितना जल गया हूँ में..

क्या लिखे "चौहान" पैग़ाम-ए- मुहोब्बत,
फुर्सत मिले तो देखना शाम के सूरज की तरह ढल गया हूँ में...

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां 

Tuesday, 3 October 2017

"बीते-दिन " (BEETE DIN)


मिली थी नज़रें तो थम सा गया था वक़्त ,
ना होश था खुद का ना कोई थी खबर ..
नज़रे चुरा के तू भी देखा करती थी ,
बात करने के बहाने तु भी ढूंढा करती थीं ..
मेरी ख़ामोशी तक पढ़ लेती थी जब तु,
क्या वो बीते दिन याद हैं तुम्हे..
वो सावन की पहली बारिश में साथ मेरे भीगना ,
वो लंबे रास्तों पर तेरा हाथ थामे चलना ,
वो मुझे मिलने को पल पल मचलना ,
वो खुद से भी ज़्यादा मेरी फ़िक्र करना ,
वो तेरे संग गुज़री थी जो शाम ,
क्या वो बीते दिन याद है तुम्हे...
तेरा वो बारिश में मेरे संग भीग जाना ,
वो बिजलियों की खड़खड़ाहट से मेरी बाँहों में सिमट जाना ,
तेरा वो अपने हाथों से खिलाना ..
क्या वो बीते दिन याद है तुम्हे ....
तेरा वो मेरी आदतों में ढल जाना ,
तेरा यूं मुझे पल पल रुलाना ,
तेरा वो बीच सफ़र में छोड़ जाना ,
"चौहान " की जान बन के निकल जाना ..
तेरी हर सजा हर सितम  याद है मुझे पर ,
क्या वो बीते दिन याद है तुम्हे ...

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की जुबां



Wednesday, 16 August 2017

"रंग चाहत के " (RANG CHAHAT KE)


कुछ तुम बदले ,कुछ हम बदले ,
वो रंग ना बदले अपनी चाहत के ,
कुछ वक़्त बदला दस्तूर बदला ,
पल बेचैनी के न बदले राहत में ,
शिकवे भी है तुमसे शिकायत भी,
माना अब भी है तुमसे वही चाहत भी ,
देखे तुमसे बहुत इस जहाँ में ,
बस वो ढंग ना बदले हमपे इनायत के,
ढलती गयी शाम और ढलते गए हम ,
फिर उस रात अकेला था चाँद और अकेले थे हम,
लिखते रहे फिर उठा के कलम अपने जज़्बात ,
क्यों ना बदले "चौहान" एहसास तेरी चाहत के ,

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की जुबां 

"एक वक़्त " (EK WAQT)


हर वक़्त एक चहरा नज़र आएगा ,
दिल हर वक़्त तेरा मुझे बुलाएगा ,
आज दूरियाँ है दरमियान तो क्या ,
एक वक़्त ऐसा भी कभी आएगा ,
एकपल भी तुझसे मेरे बिन जिया ना जाएगा..
अच्छी ना लगेगी वो तन्हा रात चांदनी ,
खामोशियों का साया जब तुझपर मंडराएगा ,
मोहलत ना होगी कुछ कहने की जब ,
मेरा साया तक तुम्हे नज़र ना आएगा ,
एक वक़्त ऐसा भी कभी आएगा ,
एकपल भी तुझसे मेरे बिन जिया ना जाएगा..
वो भीगा सावन भी आग सा जलाएगा ,
तेरा दिल मुझे जब पाने को मचल जायेगा ,
लबों से निकलता जब नाम "चौहान" ही आएगा ,
एक वक़्त ऐसा भी कभी आएगा ,
एकपल भी तुझसे मेरे बिन जिया ना जाएगा..

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Monday, 7 August 2017

"रोता रहा "(ROTA RHA)


रात भर तेरे दर्द से लिपट कर रोता रहा ,
तेरी यादों में खो के अश्क़ों की माला पिरोता रहा ,
हसरतें भी ना रही दिल की शिव एक तेरी चाहत के,
इन् आँखों में बस वही खवाब बार बार संजोता रहा ..

मिलना भी कहा मुनासिब होता हमारा ,
कहाँ मंज़िल होती उन रास्तों की तुम ,
एक वक़्त-ए-अंदाज़ था जो गुज़र गया ,
बस यही सोच खुद को तेरे गम में डुबोता रहा ...

छू कर कभी ठहर जाता जो तेरे लबों पर हंसी बनकर ,
एक एक कतरा जो बहा तेरी मुस्कानों में छुपकर ,
न गुजरने वाला वो वक़्त "चौहान" तेरी यादों में खोता रहा ,
रात भर तेरे दर्द से लिपट कर रोता रहा ..

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Friday, 4 August 2017

"आराम चाहिए " (AARAM CHAHIYE)


इन रास्तों को मुकाम चाहिए ,
इन चाहतों को तेरा नाम चाहिए ,
बहुत चला ज़िंदगी की तलाश में ,
अब इस सफर को आराम चाहिए...
इन खामोशियों को आवाज़ चाहिए,
तन्हाइयों को तेरा एहसास चाहिए,
अब नहीं गुज़रता एक पल भी तेरे बिना ,
अब इस सफर को आराम चाहिए ...
लिखने को फिर वही जज़्बात चाहिए ,
ज़िंदगी के हर दौर में तेरा साथ चाहिए ,
मुक्कमल कर दे फ़साना दिल का "चौहान",
अब इस सफर को आराम चाहिए ...

शुभम सिंह  चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

"तेरे इश्क़ के " (TERE ISHQ KE)


कुछ लम्हात पुराने बाकी है तेरे इश्क़ के ,
कुछ ख्यालात पुराने बाकी है तेरे इश्क़ के ,
सुनी आँखों में कुछ सपने है,
कुछ ख्वाब अधूरे है तेरे इश्क़ के ....
चलते थे जिन रास्तों पर हाथों में हाथ थाम,
गुज़री थी जो बाँहों में ढलती हुई शाम ,
देखे तेरे इश्क़ के अंदाज़ जो "चौहान",
कुछ राज़ पुराने बाकी है तेरे इश्क़ के ....

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की जुबां 

Wednesday, 26 July 2017

"उस रात " (USS RAAT)


जब गहनों से तू सजी थी अश्क़ों और गमो से हम ,
लबों की ख़ामोशी में आँखों से बोल उठे थे हम ,
जिस रात हमारी मुहोब्बत के वो ख्वाब मुक्कमल ना हो सके ,
उस रात ना चैन से सो सके , ना जी भर के रो सके हम।।


यादों में तेरी जब हम मशरूफ थे इस कदर ,
जेहन-ओ-जान को ना थी किसी की खबर ,
लम्हा लम्हा जब इस रूह को खो चुके थे हम ,
उस रात ना चैन से सो सके , ना जी भर के रो सके हम।।

जब मान कर चले थे तुझको ज़िंदगी का हमसफ़र ,
थाम के तेरा हाथ जब चले थे यूँ बेखबर ,
तेरे जाने से अपना मुक़ाम अपनी मंज़िल खो चुके थे हम
उस रात ना चैन से सो सके , ना जी भर के रो सके हम।।

लिखते भी तो क्या लिखते जब तेरा सहारा ना था ,
माँगा था जिसे दुआओं में "चौहान" वो हमारा ना था ,
दिल की जुबां बन आज बयां कर रही है मेरी कलम ,
उस रात ना चैन से सो सके , ना जी भर के रो सके हम।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Thursday, 20 July 2017

"लाखों मंज़र " ( LAKHON MANZAR)


लाखों मंज़र देखे इश्क़ के ,
अब वो पहले वाली बात कहाँ ,
अब वो इश्क़ के जज़्बात कहाँ ,
ना मौसम वो सावन के अब ,
वो प्यार भरी बरसात कहाँ ,
चले थे जिनको थाम कर ,
हाथों में अब वो हाथ कहाँ,
बन के चले थे जो हमसफ़र ,
अब वो हमारे साथ कहाँ ,
टूट के सब बिखर गए ,
वो कांच से जज़्बात यहाँ ,
तेरे संग थी जो गुज़री मेरी ,
अब वो प्यारी रात कहाँ ,
लफ़्ज़ों की ख़ामोशी पढ़ "चौहान",
तेरी कलम की यहाँ औक़ात ही क्या,
लाखों मंज़र देखे इश्क़ के ,
अब वो पहले वाली बात कहाँ ,

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ


Tuesday, 18 July 2017

"साथ अगर " ( SATH AGAR)


एक नज़र भर देखना था तुझे, पल भर का भी अब सबर नहीं होता,
अपना हाल किस से कहूँ दर्द-ए-दिल पर किसी का असर नहीं होता ।।

लिखा था अश्क़ों की श्याहीं से दिल के कौरे कागज़ पर ,
नाम जिसका हमने उम्र भर काश लिखा वो मेरे मुक़्क़दर में होता ।।

ढल जाते शाम की तरह तेरी बाँहों की आगोश में ,
अगर किसी मरहम का असर तेरे दिए ज़ख्मों पर होता ।।

मुक़ाम मेरा भी था इश्क़ में हम भी निकले थे किसी राह पर
साथ अगर देता तू बनके हमसफ़र आज  "चौहान" काफ़िर ना होता ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Monday, 17 July 2017

"तू लाज़मी " (TU LAZMI)


तेरे बिना क्या सफर क्या ज़िंदगी है ,
तू आँखों की नमी तू लबों की हसीं है ।।

क्या आसमां मेरा कैसी तुझ बिन ज़मीं है ,
तुझे मैं ना सही पर मुझे तू लाज़मी है ।।

बात कैसे कहुँ तुमसे हाल-ए-दिल की ,
इस दिल-ए-नादान की मुश्किल की,
तेरी यादों में गुमशुदा हूँ इस ज़िंदगी में तेरी कमी है।।

कोई बदले जो मुक्कदर तो मैं भी फ़रियाद करूँ ,
तुझे पा के खुद को आबाद करूँ,
क्या बताये "चौहान" तुझ बिन आलम दिल का ,
ज़िस्म तो है बस रूह की कमी है ।।

तुझे मैं ना सही पर मुझे तू लाज़मी है ।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Friday, 14 July 2017

"हिन्दुस्तान" ( HINDUSTAN)



जो बचपन में किताबों में पढ़ाया जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

जिसे कभी सोने की चिड़िया बताया जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए।।

महापुरुषों की भूमि जिसे , ऋषिमुनियों का देश बताया ाता था,
मुझे वो हिंदुस्तान चाहिए  ।।

नहीं चाहिए ये ऊँची इमारतें ये बड़े बड़े मकान तुम्हारे ,
जहाँ लोगों को दिल में बसाया जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

दो जिस्मों का खेल बनकर रह गयी मुहोब्बत यहाँ ,
जहाँ गोपियों संग रास रचाया जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

दो गज़ ज़मीन खातिर बँट जाते है परिवार यहाँ ,
जहाँ भाई संग भाई बनवास जाया करता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

हिंदी अंग्रेजी दो पाटों में पीस रहा ये देश यहाँ ,
जहाँ माँ बोली को धर्म बताया जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

आज अपनों से अपनी आबरू का डर नारी को यहाँ ,
जहाँ नारी को देवी बनाके पूजा जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

गुरु शिष्य की क्या बात करूँ आज इस कलयुग में ,
जहाँ एकलव्य जैसा शिष्य और द्रोणा जैसा गुरु पाया जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

राम कृष्ण की क्या बात कहूं वो तो चलो भगवन है ,
जहाँ गौ और गंगा माँ को पूजा जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

किसी मज़हब की बात करना मुझे गवारा नहीं पर ,
जहाँ ईद दिवाली को मिलकर मनाया जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

माना के सोच , रीती रिवाज़ सब बदल गए "चौहान" वक़्त के साथ ,
जहाँ "भारत माता की जय" से सारा विश्व गूंज  जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।

जो बचपन में किताबों में पढ़ाया जाता था ,
मुझे वो हिन्दुस्तान चाहिए  ।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

"मेरा क्या कसूर " (MERA KYA KASOOR)


मेरा क्या कसूर अगर याद तेरी आयी ,
खामोश लबों पर बस एक बात तेरी आयी,
पलकों पर आकर ठहर गए आँसू,
अब के सावन भी तेरा आया और बरसात भी तेरी आयी।।

बेदखल कर दिया हमने ज़िंदगी को ज़िंदगी से ,
जब छोड़ के गए थे तुम साथ मेरा ,
एक दफा मुड़के देखा तक नहीं तूने मुझे ,
क्यों तुझे फिर मेरी तड़प भी नज़र ना आयी।।

कहाँ है मंज़िल कोन सा है रास्ता कुछ याद नहीं ,
मिटा दिया वो सफर भी जहाँ हमसफ़र बनके तू साथ नहीं ,
वीरानियाँ है अब इस दिल के आँगन में "चौहान",
वो गयी ऐसे वक़्त की तरह के फिर कभी लौट के ना आयी।।

मेरा क्या कसूर अगर याद तेरी आयी ,
खामोश लबों पर बस एक बात तेरी आयी,
पलकों पर आकर ठहर गए आँसू,
अब के सावन भी तेरा आया और बरसात भी तेरी आयी।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ


"गुज़रे-लम्हे"(GUZRE LAMHE)


गुज़रे लम्हे याद बनके आएंगे ,
तेरे दिल की दुनिया में सैलाब बन कर आएंगे ।।

आँखों से आंसू थम ना पाएंगे ,
तेरे जहन में ऐसे ख्यालात बन कर आएंगे ।।

सवेरा नया होगा पर वो पल ना तेरा होगा ,
मुझे पाने को बेबस जब दिल तेरा होगा ।।
ऐसे दर्द-ए-दिल के हालत बनकर आएंगे ,
गुज़रे लम्हे जब याद बन कर आएंगे ।।

तेरी तन्हाइयों में शरीक़ जब हम होंगे ,
हर पल तड़पते तुझे जब ये गम होंगे ।
कहाँ तेरे दिल में फिर "चौहान" के सिवा किसी और का बसेरा होगा ,
तेरे लबों पर फिर वो गम दर्द भरे अलफ़ाज़ बन कर आएंगे ।।

गुज़रे लम्हे जब याद बन कर  आएंगे  ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

"बिन तेरे " (BIN TERE)


अधूरा इश्क़ , अधूरी ज़िंदगी , अधूरे हम ,
बिन तेरे मुक्कमल होते भी तो कैसे।।

माना मंज़िल पाने की चाह छोड़ दी हमने ,
तुझ जैसा कोई हमसफ़र पाते भी तो कैसे।।

अरमान जला के सब राख कर दिए इस दिल के मैंने ,
तुझ बिन कोई ख्वाब सजाते भी तो कैसे।।

अब बस तन्हाई ही तन्हाई नज़र आती है हर कहीं ,
तुझ बिन कोई महफ़िल सजाते भी तो कैसे।।

रख लिया दबा के दिल ने अपने दर्दों को ,
तुझबिन किसी को हाल-ए-दिल बताते भी तो कैसे।।

छोड़ "चौहान" मतलब की दुनिया में बेमतलब से जीना ,
मतलबी लोगों में बेमतलब इश्क़ का एहसास करवाते भी तो कैसे।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Thursday, 13 July 2017

"फासले" ( FASLE)


क्यूँ फासले आज हमारे दरमियाँ है ,
तू नहीं तो सुना मेरा ये जहाँ है ।।

बात मुकद्दर की तो नहीं है मिलना बिछरड़ना,
फरेब की दुनिया में ये मेरे इश्क़ का इम्तिहान है।।

कौन आ के बसेगा मेरे तन्हा दिल में तेरे सिवा,
इस दिल में खंण्डर तेरे बिन एक मकान है ।।

मेरे लिए तो मेरा पीर-ओ-मुरशद मेरा परवर दिगार है,
तेरे बिना मेरे लिए घर मंदिर सब शमशान हैं।।

तुम होते तो शायद ना होती "मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ "
तू सोच के देख मेरे बिना  क्या वजूद तेरा "चौहान" है।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

"तेरी-मौजूदगी " ( TERI MOZUDGI)


साँसों में अब भी वो रवानगी है ,
जज़्बातों में अब भी वो दीवानगी है ,
पागलपन है हद्द से ज़्यादा बेखुदी है ,
तू कहीं भी रहे मेरे दिल में तेरी मौजूदगी है।।

आँखों में एक तड़प एक इंतज़ार है ,
एक अरसे से तुझे देखने को बेक़रार है ,
तन्हाइयों का आलम है मेरे ज़ेहनोजान में ,
मेरे लम्हों में अब आहिस्तगी है ,
तू कहीं भी रहे मेरे दिल में तेरी मौजूदगी है।।

हर बात में आज भी तेरा ज़िक्र है ,
हर पल दिल को तेरी फ़िक्र है ,
तेरे दिए जो पैगाम है "चौहान" को ,
उनमे आज भी ताज़गी है
तू कहीं भी रहे मेरे दिल में तेरी मौजूदगी है।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

" तुम साथ होते " ( TUM SATH HOTE)


ना ये हालत होती , ना ये हालात होते ,
ना कुछ ख्याल होते , ना कुछ जज़्बात होते ,
फिर कुछ अलग ही ये लम्हात होते ,
आज अगर तुम साथ होते ।।

टूटा ना ये दिल होता , जीना ना यूँ मुश्किल होता ,
बड़ा हसीं ये सफर होता तू जो मेरा हमसफ़र होता ,
ना ये तन्हा रातें होती ना ये अश्क़ों की सौंगात होते,
फिर कुछ अलग ही ये लम्हात होते ,
आज अगर तुम साथ होते।।

रखता बसा के सीने में तुझे रूह की तरहां,
बहती रगो में "चौहान" के तू लहू की तरहां,
ना यूँ बेखबर तुम होते , ना यूँ लम्हा-लम्हा हम रोते,
फिर कुछ अलग ही ये लम्हात होते ,
आज अगर तुम साथ होते।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की जुबां 

"तुम्हें मुझसे प्यार " ( TUMHE MUJHSE PYAR)


मैं नहीं तेरे ख्वाबों का राजकुमार ,
आखिर तुम्हे मुझसे प्यार कैसे हो ।।

तेरे दिल को नहीं मेरी चाहत की दरकार,
आखिर तुम्हे मुझसे प्यार कैसे हो ।।

माना तलाशती है तेरी नज़रें किसी और को ,
उनको नहीं मेरे आने का इंतज़ार ,
आखिर तुम्हे मुझसे प्यार कैसे हो ।।

गम ही गम मिलते रहे है तुमसे ,
नहीं हुई तेरी कोई ख़ुशी मेरी तरफ़दार,
आखिर तुम्हे मुझसे प्यार कैसे हो ।।

क्या हुआ जो तुम रहते हो सोचों में ग़ुम,
मेरा आया न तुम्हे ख्याल एक भी बार ,
आखिर तुम्हे मुझसे प्यार कैसे हो ।।

नमाज़ें भी पढ़ी सजदे भी किये ,
तूने ही ना की हमें पाने दरक़ार,
आखिर तुम्हे मुझसे प्यार कैसे हो ।।

लिखते रहो चाहे उम्र भर "चौहान",
तुम्हारी कलम से हुआ ना मेरा ज़िक्र एक भी बार ,
आखिर तुम्हे मुझसे प्यार कैसे हो ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Wednesday, 12 July 2017

"क्या हुआ अगर " ( KYA HUA AGAR )



क्या हुआ अगर तू बुलाये या न बुलाये ,
तेरे दिल की चोखट पर आ ही जाऊंगा ।।

क्या हुआ अगर तू मेरा जिक्र मेरी बात ना करे ,
लफ्ज़ बन के तेरे लबों पर आ ही जाऊंगा ।।

क्या हुआ अगर तू महसूस ना करे ,
हवा बन के तेरी साँसों में घुल ही जाऊंगा ।।

क्या हुआ अगर कबूल न हो सजदे मेरे ,
तेरे इश्क़-ए-इब्बादत में मर भी जाऊंगा ।।

तू माने या ना माने "चौहान" को अपना ,
मैं तो मरकर भी तेरी ही कहलाऊंगा  ।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

"साथ कहां " ( SATH KAHAN)



माना ज़िंदगी के सफर में साथ चलता है काफ़िला
पर इश्क़ में मुक़्क़मल वो साथ कहाँ मिलते है ।।

माना मिले है चंद लम्हात साथ उनके जीने के ,
पर उम्र भर जो थामे वो हाथ कहाँ मिलते है ।।

सफर भी होता है और यहाँ हमसफ़र भी ,
मंज़िल और हमसफ़र कहाँ एक साथ मिलते है ।।

ख़ुशी कम है तो गम हज़ारों है यहाँ ,
ताह उम्र प्यार भरे वो जज़्बात कहाँ मिलते है ।।

माना लकीरें हज़ार है हाथों में "चौहान",
पर जिनमें तुम मिल जाओ वो हाथ कहाँ मिलते है  ।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Monday, 10 July 2017

"गुनाह" (GUNAAH)



इश्क़ तुझसे किया तो क्या गुनाह किया ,
जितना जिया तुझमे जिया तो क्या गुनाह किया ।।

क्या करूँ अगर आता नहीं ख्याल किसी और का ,
जब भी लिया नाम तेरा लिया तो क्या गुनाह किया ।।

सफर में तुम भी थे सफर में हम भी थे ,
तुझे मंज़िल बना के चला तो क्या गुनाह किया ।।


उदासी तो रहती है आज भी इस चेहरे पर ,
तेरी ख़ुशी में थोड़ा हंस लिया तो क्या गुनाह किया ।।

तुम पूछो ना पूछो हाल -ए-दिल मेरा ,
करली जो थोड़ी फ़िक्र तेरी तो क्या गुनाह किया ।।

क्या हुआ जो तुम मिल न सके हमे इस ज़िंदगी में ,
तुम्हे ज़िंदगी बना के जिए तो क्या गुनाह किया ।।

क्या हुआ तुझे अगर क़बूल नहीं "चौहान",
तुझसे चाहत नहीं तेरी इबादत की तो क्या गुनाह किया।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ


"कभी सोचा है " ( KABHI SOCHA HAI)


कभी सोचा है ये तूने मैं ना रहा तो ,
तुमसे यूँ मुहोब्बत करेगा कौन

खुद के जिस्म की बना के रूह तुमको ,
तुमसे यूँ चाहत करेगा कौन ??

कौन करेगा यूँ हरपल फ़िक्र तेरी ,
तेरे लिए नींदें खराब अपनी करेगा कौन ??

कौन करेगा सजदे दर-दर तेरी ख़ातिर,
तुझे पाने की हसरत फिर करेगा कौन ??


कौन करेगा हद्द से ज़्यादा इश्क़ तुम्हे मेरे बाद ,
तुझे खुदा बना के तेरी इब्बादत करेगा कौन ??

कर बेपरवाही लाख "चौहान " से मगर याद रखना ,
मेरे बाद तेरे गमो से अपना दामन फिर भरेगा कौन ??

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Friday, 7 July 2017

"रोई तो होगी" ( ROI TO HOGI)


रोई तो होगी वो भी मुझसे दूर होके ,
दुनियाँ के खोंखले रिवाज़ो में मजबूर होके ।।

टूटे होंगे ख़्वाब उसके भी शीशे की तरहा ,
सहमी होगी रूह उसकी यूँ निश्त-ओ-नाबूद होके ।।

अब सजना-सवरना भी उसको कहाँ अच्छा लगता होगा ,
करती होगी शिकवे किस्मत से गमो में चूर होके ।।

छिप गयी होगी वो चेहरे की मुस्कान उदासियों के पीछे ,
याद करती होगी चेहरा मेरा अपनी आँखों को मींचे।।

रंग फीका लगा होगा उसे मेहँदी का मेरे इश्क़ के रंग के आगे ,
ये दुनिया भी फिर उसे बेरंग नज़र आयी होगी मुझसे दूर होके ।।

पहन कर लाल जोड़ा जब किसी और के नाम की मांग सजाई होगी ,
रात बिस्तर पर मेरे इश्क़ की लाश बिछाई होगी।।

कटपुतली सी बन कर रह गयी होगी फिर वो ,
फिर कहाँ उस जिस्म में वो रूह लौट कर आयी होगी।।

अब कौन आँसू पोंछ उसे सीने से लगता होगा ,
कौन होगा जो खुद रोकर भी उसे हॅसता होगा ।।

शायद अब भी वो उँगलियाँ अपनी लटों में घुमाती होगी ,
शायद अब भी वो बिन बोले मेरे दिल का हाल जान जाती होगी।।

शायद अब भी उसे पल-पल मेरी फ़िक्र सताती होगी ,
शायद अब भी उसे तन्हाई में मेरी याद आती होगी ।।

क्यों छोड़ जाते है लोग अक्सर इश्क़ में मग़रूर होके ,
तूने भी क्या पा लिया "चौहान" इस बस्ती में मशहूर होके ।।

रोई तो होगी वो भी मुझसे दूर होके ,
दुनियाँ के खोंखले रिवाज़ो में मजबूर होके ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

"बेशुमार "(BESHUMAR)


चाहतें तुमसे ऐसी बार-बार होंगी ,
हर बार युहीं बेशुमार होंगी।।

आँखों में रहेगा एक चेहरा तेरा ,
दिदार- ए -हसरत युहीं बेशुमार होंगी ।।

फिर एक ख्वाब होगा हर रात तुमसे मिलने का ,
मिलने की हसरतें तुमसे युहीं बेशुमार होंगी ।।

भर लूंगा हँस के दामन तेरे दर्द-ओ-गम से अपना ,
हर जनम तेरी ख़ुशी के लिए मिटने की लगन बेशुमार होगी।।

क्या हुआ अगर मुक़्क़मल न हो सकेगा ये फलसफ़ा इश्क़ का ,
हर सज़दे में तुझे पाने की चाहत बेशुमार होगी ।।

क्या हुआ "चौहान " अगर तुम  मिले न मिले इस जनम ,
तुम्हे खुदा बना तेरी इबादत हर जनम युहीं बेशुमार होंगी।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की जुबां


Thursday, 6 July 2017

"मुहोब्बत " (MUHOBAT)



क्या हुआ अगर गुनहगार सिर्फ हम ही बताये ,
उनसे मुहोब्बत भी तो हमने ही की थी ।।

क्या हुआ अगर सारे इल्ज़ामात हम ही पर आये ,
उन्हें पाने की हसरत भी तो हमने की थी ।।

कसूर उनका क्या था आखिर इसमें कसूर तो हमारा था ,
उन्हें खुदा बना पाने की ज़ुर्रत भी तो हमने ही की थी ।।

भूल गया था बिक जाना पड़ता है इश्क़-ए -बाजार में ,
महोब्बत में ताज़महल बनाने की ख्वाइश भी हम ही ने की थी।।

किसको क्या फर्क पड़ता है किसी के जीने मरने से " चौहान" यहाँ ,
मतलब की दुनियाँ में बेमतलब की मुहोब्बत भी तो हमने ही की थी ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Wednesday, 5 July 2017

"दीदार -ए- हसरत " (DEDAAR - E - HASRAT)


तामाम इंतज़ाम किये थे हमने चकाचोंध के ,
इंतज़ार था बस उनके एक दफ़ा आने का ।।

आँखों से आंसू छलक आये थे उनके बस एक दिदार को ,
एक अरमान था चाँद उनके लिए आँगन में सजाने का।।

ना जाने कितने ख़्वाब सँजो रखे थे उनसे मिलने की तलब में ,
आज भी ज़ज़्बा था उसकी खातिर दुनियाँ से लड़ जाने का।।

वो रात भी पूरी मदहोश थी आज दिदार -ए -हसरत के लिए ,
मिट रहा था बहाना धीरे -धीरे तन्हा जिए जाने का ।।

बेताब थी मेरे दिल की बंज़र ज़मी बरसों की प्यास बुझाने को ,
एक अरसे बाद लगा था मौसम फिर से सावन आने का ।।

लगता है कबूल करली आज दुआ उस खुदा उस भगवान ने ,
"चौहान " आज फिर मिलने वाला है मौका प्यार में मिट जाने का ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

"लौट के ना आऊँगा" ( LAUT KE NA AAUNGA)



चला गया जो छोड़ के, फिर कभी लौट के ना आऊंगा ,
ख्वाबों में आना तो दूर , ख्यालों में भी ना आऊंगा ।।

कोई गम ना रहने दूंगा पास तेरे फिर भी ,
अपनी ख़ुशी दे के तुझे ,तेरे गम चुरा ले जाऊंगा ।।

कर सको तो महसूस कर लेना मुझे अपने खालीपन में ,
मैं तो हवा बनके इन वादियों में घुल जाऊंगा ।।

कहाँ रोक पाओगे फिर मुझे तुम उन बहती आँखों में ,
मैं तो अश्क़ बन के आँखों से निकल जाऊंगा ।।

कर लेना कैद अगर कर सको तो "चौहान" को अपनी ख़ामोशी में ,
मैं तो लफ़ज़ बन तेरे होंठों से निकल जाऊंगा ।।

चला गया जो छोड़ के, फिर कभी लौट के ना आऊंगा ,
ख्वाबों में आना तो दूर , ख्यालों में भी ना आऊंगा ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम-दिल की ज़ुबाँ


Tuesday, 4 July 2017

"ए ज़िंदगी " ( AE ZINDGI)


रूठ सा गया हूँ ,तुझसे ए ज़िंदगी ,
टूट सा गया हूँ मैं अभी-अभी ।।

दिल रो रहा है पर आँखों में आंसू नहीं ,
कैसे समझाऊ दिल को खुद पर भी काबू नहीं ।।

अजीब खेल है खुदा का भी , जिस से प्यार है उसे पास लता नहीं ,
तुझसे नफरत है तो तुझे मुझसे दूर ले जाता नहीं।।

देख हालत मेरी मुझे तो समझ आती नहीं ,
"चौहान" आँखों में नमी है चेहरे पर हसीं।।

मंज़िल तो मौत है फिर क्यों चला जा रहा हूँ तेरे संग बेवजा युहीं ,
क्यों लिए फिर रहा हूँ एक उम्र भर की तन्हाई और बेबसी ।।

रूठ सा गया हूँ ,तुझसे ए ज़िंदगी ,
टूट सा गया हूँ मैं अभी-अभी ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ


Monday, 3 July 2017

" तेरी￰ याद " (TERI YAAD)



अमावस की रात के अँधेरे की तरह ,
मेरे जहन-ओ-जां पर ये बढ़ती जाती है।
आज तुमने शायद भुला दिया हो मुझे ,
पर सच कहूं तो मुझे आज भी तेरी याद आती है ।।

ख़ामोशी को सजा के रखता हूँ अपने लबों पर ,
ये गुस्ताख़ आँखें है जो सब बता जाती है ।
आज तुमने शायद भुला दिया हो मुझे ,
पर सच कहूं तो मुझे आज भी तेरी याद आती है ।।

आज भी तुझसे तेरे नाम से मुहोब्बत करता हूँ मैं ,
जिस्म में रुह की तरहां,रगो में बहते लहु की तरहां,
तेरे नाम को मेरे नाम से जोड़ के रखता हूँ मैं।
तुझे पाने की थोड़ी सी हसरत क्या करने लगता हूँ ,
मेरी किस्मत मुझे मेरी औकात दिखा जाती है ।।

आज तुमने शायद भुला दिया हो मुझे ,
पर सच कहूं तो मुझे आज भी तेरी याद आती है ।।

आज भी अच्छा लगता है मुझे तेरा इंतज़ार करना ,
तुझसे एक पल भी बात करने को खुद को बेक़रार करना ।
ढल जाती थी कभी शाम तेरे हाथों को हाथों में थामे,
आज वो यादें मुझे रात-रात भर रुला जाती है ।।

आज तुमने शायद भुला दिया हो मुझे ,
पर सच कहूं तो मुझे आज भी तेरी याद आती है ।।

बनाना चाहा तुझे हमसफ़र इश्क़ में तूने काफ़िर बना दिया,
इश्क़ के सफर में उम्र भर का मुसाफिर बना दिया ।
तेरे पास आने की बेइख़्तियारी "चौहान" को ज़िंदगी से दूर ले जाती है।।

आज तुमने शायद भुला दिया हो मुझे ,
पर सच कहूं तो  मुझे आज भी तेरी याद आती है ।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ



"एक-ख्याल " ( EK KHYAL)

आज कुछ लिखने को नहीं था ,
फिर भी कलम उठा के सोचता रहा ..
सोचता रहा रात भर के क्या लिखूं ???
फिर कहीं दूर दिल में झांक कर देखा ,
तो मुझे बस तेरा ख्याल आया ...
फिर सोचा के आज कुछ लिखूं तेरे बारे में,
पर ना जाने क्यों वो जज़्बात -ए-तहरीर थम गयी,
और सोचता रहा रात भर ,
तेरी बेपरवाही लिखूं या फिर तेरी बेवफाई लिखूं ,
बस इसी मजलिश में रात भर जागता रहा ,
और सोचता रहा के क्या लिखूं ???
जब आँखों को बंद करके देखा ,
तो तेरी सूरत नज़र आयी ...
फिर लिखने लगा जो मुझे हर कहीं ,
बस तेरी बेगैरत नज़र आयी ...
जब लिखना चाहा के क्यों अब तक मुझे तेरा इंतज़ार है ,
क्यों अब तक मेरे इस दिल को तुमसे प्यार है ..
बस इन्ही सोचो ने तुझे याद कर आँखों का सागर छलका दिया ,
कुछ लिख ना पाया "चौहान " उस रात ,
जो लिखा वो तेरी याद में बहे मेरे आंसुओं ने मिटा  दिया ...

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Sunday, 2 July 2017

"इश्क़-ए-मिजाज़ " (ISHQ-E-MIZAZ)

वक़्त बदला ,वक़्त के साथ बदला ये मौसम ,
पर मेरे इश्क़ का मिज़ाज नहीं बदला ।।

मर कर भी जी रहा हूँ देख तेरे बिन ,
आज भी मेरे जीने का अंदाज़ नहीं बदला ।।

ना जाने कितनी रातें गुज़ार दी तेरे इंतज़ार में ,
पर मेरी खामोशियों का वो साज़ नहीं बदला ।।

मेरी कलम बन तो बैठी ज़ुबाँ दर्द- ऐ -दिल की ,
"चौहान" की कलम से तेरे ज़िकर का  वो रिवाज़ नहीं बदला ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Saturday, 1 July 2017

" कोई तो होगा " ( KOI TO HOGA)

दीया मेरे जज़बातों का किसी के दिल में कहीं तो जलता होगा ,
ये सोच के लिख देता हूँ हाल-ए-दिल कोई तो होगा जो रात भर बैठ के पढता होगा ।

भले ही कोई नज़र नहीं आता मुझे अपने आस-पास ,
पर कोई तो होगा जो तन्हाई में रात भर मेरे साथ जगता होगा ।।

भले ही समझ लिया होगा दुनिया ने बेगाना मुझे ,
पर कोई तो होगा जो मेरे गमो को अपना समझता होगा ।


हम मरते रहे पल-पल तुम्हें पाने की हसरत लेकर ,
पर कोई तो होगा जो मुझे पाने को तड़पता होगा ।।

ये तो एक रिवाज़ हो गया इश्क़ का ,जो मुझे तुमसे है तो तुम्हे किसी और से ,
पर कोई तो होगा जो इन रिवाज़ों में बंधकर भी मुझसे प्यार करता होगा ।

बस यही  सोच कर लिख देता है चौहान , मुझे तो अब जीना नहीं ,
पर कोई तो होगा जो मुझे देख कर जीता होगा ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Friday, 30 June 2017

"मुलाक़ात " ( MULAKAT)

शाम ढलती है तेरी बाँहों में ढलते -ढलते रात हो जाए ,
आ ऐसी एक बार फिर तेरी मेरी मुलाक़ात हो जाएँ ।

खबर ना हो मुझे मेरी , ना खबर तुझे फिर तेरी रहे ,
आ एक दूजे में फिर कुछ ऐसे हम दोनों खो जाएँ।।

तेरे बिन ना मेरे दिन कटें , ना मेरे बिन गुज़रें तेरी रातें,
आ एक दूजे में फिर कुछ इस कदर मुलतवी हो जाएँ।

ज़िक्र तेरा हो मेरी हर बात पर , हक़ मेरा रहे तेरी रूह-ए-क़ायनात पर,
कुछ ऐसे फिर तेरे मेरे यें इश्क़-ए-जज़्बात हो जाएँ।।

मेरा कलमा हो ये किताबी आँखें तेरी , तू मेरा परवरदिगार हो जाए ,
इश्क़ में नमाज़ें अत्ता करूँ बस इसलिए के "चौहान" तू मेरा राज़दार  हो जाये ।।

आ ऐसी एक बार फिर तेरी मेरी मुलाक़ात हो जाएँ ।
आ ऐसी एक बार फिर तेरी मेरी मुलाक़ात हो जाएँ ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

"नज़र तू आती है " ( NAZAR TU AATI HAI)

हर कहीं नज़र मुझे अब तू आती है ,
जो सांस लूँ तो तेरी खुशबू आती है ।

बिन तेरे बेचैन रहूँ , बेकरारी अब किस से कहूं ,
जो सोचूं पल भर को भी , ख्यालों में बस तू आती है ।।

इसे इश्क़ कहूं या मेरा दीवानापन कुछ समझ नहीं आता ,
देखूं जो परछाई अपनी तो नज़र तू आती है ।

ये ख्यालों की जुंबिश है या किस्मत की हेरा-फेरी ,
अब ज़िंदगी में ज़िंदगी से ज़्यादा ज़रूरी नज़र तू आती है ।।

पल भर भी जीना मुमकिन नहीं लगता अब बिन तेरे ,
"चौहान" को तो हर नज़म हर अल्फ़ाज़ों में नज़र तू आती है।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

"अज़नबी" ( AZNABI)

आ एक बार फिर अजनबी हो जाएँ ,
भूल कर एक दूसरे को कहीं खो जाएँ ...

ना कभी तुम मिलना हमें दोबारा ,
ना कभी हम मिलेंगे तुम्हे कहीं ,
आ इस तन्हाई से दूर कहीं चैन से सो जाएँ,
आ एक बार फिर अजनबी हो जाएँ ।।

ना तुम रोना कभी हमें याद करके ,
ना हम रोयेंगे तुम्हे याद करके ,
आ एक दूजे से कुछ इस कदर मुलतवी हो जाएँ,
आ एक बार फिर अजनबी हो जाएँ ।।

ना तुम देखना कभी हमें ,
ना हम नज़र आएंगे कभी तुम्हे ,
"चौहान" आ कुछ इस कदर पर्दानशीं हो जाएँ,
आ एक बार फिर अजनबी हो जाएँ ।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Thursday, 29 June 2017

"मुहोब्बत एक कहानी " (MUHOBAT EK KAHANI)

हार गया हार के भी क्या हारा ,
इश्क़ था जान तो वैसे भी जानी थी ।

बात जज़्बातों की थी ज़रूरतों की नहीं ,
तेरी खुशियों की ज़िद्द तो हमने भी ठानी थी ।।

रूह तो कब की मिल गयी थी तुझसे ,
एक ज़िंदगी ही थी जो बेगानी थी ।

क्या लिखना और क्या सुनाना हाल-ए-दिल उनको "चौहान",
जिनके लिए महोब्बत बस चंद लफ़्ज़ों की कहानी थी ।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की जुबां 

"इम्तिहान" (IMTIHAAN)

बड़ा बेसबर था इश्क़ में , इम्तिहान मेरे सबर का था ,
कैसे मिल जाती मंज़िल कोई और ,जुनून दिल में  तेरी बसर का था।

देखता रहा ज़िंदगी में किस्मत की उथल-पथल को ,
अरमान तो बस इस दिल में तेरी रहगुज़र का था ।।

लाख दफा सिर झुकाया मंदिर में , सज़दा मस्जिद में किया तेरे लिए ,
हर दफा इस दिल की चौंखट में बैठ इंतज़ार किया तेरे लिए ,
डूबना ही था आखिर कब तक संभालता खुद को ,
जो मेरे दिल का महल उजड़ गया वो इश्क़ में तेरी बेपरवाही का बवंडर था ,
बड़ा बेसबर था इश्क़ में , इम्तिहान मेरे सबर का था ।।

बात कहाँ दो जिस्मों की थी ,ये मुहोब्बत तो तेरी रूह तेरी सादगी से थी ,
कैसे जीता तेरे बिन "चौहान " , ये ज़िंदगी तो तेरी ज़िंदगी से थी ,
जो खुदा अपनी तहरीर से लिखना भूल गया वो मेरा फूटा मुक्कदर था ,
बड़ा बेसबर था इश्क़ में , इम्तिहान मेरे सबर का था ।।

बड़ा बेसबर था इश्क़ में , इम्तिहान मेरे सबर का था ,
कैसे मिल जाती मंज़िल कोई और ,जुनून  दिल में तेरी बसर का था।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की जुबां



Wednesday, 28 June 2017

" खुदगर्ज़ " (KHUDGARZ)

खुदगर्ज़ हूँ वहां जहाँ बात तेरी आती है ,
ताल्लुक नहीं रख पाता खुद से जब याद तेरी आती है।

सच है ये भी की बात मुकदर की तो है मैं खुदा तो नहीं ,
मुहोब्बत की लड़ाई यहाँ दुनिया से ज़्यादा अपनों से लड़ी जाती है।।

रोक नहीं पाता अपनी अपनी आँखों का ये समुन्दर ,
तेरी यादों की सुनामी मुझे हर रात तबाह कर जाती है।

मिट जाने दे हो जाने दे राख आज "चौहान" को ,
सुना है सच्ची मुहोबत यहाँ पुरानी किताबों में बंद पायी जाती है।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की जुबां 

" अंज़ाम मुहोब्बत का " ( ANZAAM MUHOBAT KA)

एक अंज़ाम लिख दे आज मेरी मुहोब्बत का ,
यूँ इंतज़ार में चलती साँसों का बोझ अब उठाया नहीं जाता ।

कोई हाल सुना दे जाके उसे मेरी बेबसी का ,
यूँ हँस हँस के अब दिल का दर्द छुपाया नहीं जाता ।।

मत बना किसी बेगाने को मेरा अपना ,
इन रिश्तों का क़र्ज़ मुझसे अब चुकाया नहीं जाता ।

थम जाने दे साँसें मिट जाने दे फ़साने ,
"चौहान" भर के लहू कलम में शब्द भर भी अब चलाया  नहीं जाता ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

" वज़ूद " (WAZOOD)

आँखों में ठहरा हुआ ख्वाब हो तुम ,
दिल में पनपता हुआ एक अरमान हो तुम।

कैसे दूर कर दूँ भला खुद को तुमसे ,
मेरा वजूद मेरी पहचान हो तुम ।।

तराशा है खुदा ने संगमरमर की मूरत सा तुम्हे ,
मुहोबत में ताज़महल सा एक पैगाम हो तुम ।

ज़ुल्फ़ों में सिमटी है एक काली घनी रात तुम्हारे ,
लबों पर सुर्ख लाली मानो सूरज की लालिमा लिए शाम हो तुम।।

किस मंदिर किस मस्जिद किस दर से मांगू मैं तुम्हे ,
मेरे लिए तो मेरा परवरदिगार मेरा भगवान् हो तुम ।

लोग कहते है तो कहते रहे काफ़िर मुझे " चौहान ",
मेरे लिए तो मेरी मंज़िल मेरा मुकाम हो तुम ।।

कैसे दूर कर दूँ भला तुमको खुद से ,
मेरा वजूद मेरी पहचान हो तुम ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की जुबां


Tuesday, 27 June 2017

" काफ़ी है " ( KAFI HAI)

दर्द-ए-दिल की दवा मिले ना मिले,
दर्द दिल को मिले तो काफी है ।

बात अगर वो करें या ना करें ,
होंठ उनके हिल जाएं तो काफी है ।।

आशिक़ी उनकी आँखों से बहे या ना बहे ,
हमें देख नज़रें भी झुक जाए तो काफी है ।

इज़हार-ए-मुहोब्बत वो हमसे करे या ना करें ,
ऐतबार सिर्फ हम हीं पर करे तो काफी है ।।

 माना हमसे मिलने कि उनकी हसरत हो या ना हो ,
खवाबों में ही मिलने आ जाएँ तो काफी है ।

हमें अपने दिल में बसाये या न बसाएं ,
हमारे दिल में अपना घर बना ले तो काफी है ।।

वो हमें हरपल याद करें या न करें ,
उनके नाम की हिज़कियाँ ही आ जाए तो काफी है ।

सुनहरी शाम हमारे नाम करे या न करें ,
यादों भरी रात दे जाए तो काफी है ।।

कोई गम नहीं तुम ज़िंदगी के सफर में संग चलो ना चलो ,
ना मरने वाली आरज़ू बन "चौहान" के दिल में बस जाओ काफी है ।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ 

Monday, 26 June 2017

" रिश्ता महोब्बत का " ( RISHTA MUHOBAT KA)

ये रिश्ते आम नहीं होते , माना इनके कुछ नाम नहीं होते ,
ये एक ऐसा  सफर है ज़िंदगी का ,जिसमें हासिल  मुक़ाम नहीं होते ।

माना के मिलकर भी नहीं मिल पाती मुहोब्बत इस फरेब  की दुनिया  में ,
क्योंकि   आजकल  सच्ची  मुहब्बत  करने  वाले  तमाम  नहीं होते ।।

कौन समझाए  दुनिया वालों  को की मुहोब्बत मारे नहीं मरती ,
जो मरती तो मंदिरों में आज राधा- श्याम  नहीं होते ।

माना के नहीं  होती  मुहोब्बत पूरी  आज इस कलयुग  में ,
क्योंकि आजकल कहीं  राधा नहीं होती तो कहीं श्याम नहीं होते ।।

ढलती है  मेहखानो में शाम  इश्क़ के मरीज़ों   की ,
वैद्य ,हक़ीम, दवाखानों में इस रोग के आराम नहीं होते।

मिल जाती है सच्ची मोहब्बत जिन्हें यहां "चौहान" ,
वो बस भगवान ही होते हैं यहां इंसान नहीं होते ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां !!













"थोड़ी सी चाहत " (THORI SI CHAHAT)


एक अरमान लिए बैठा हुं दिल में तुझे लेकर ,
थोड़ी सी चाहत मेरे लिए तू भी करले ।

बड़े नसीब से मिलते हैं मुक्कदर यहाँ ,
मुझे पाने की हसरत कभी तू भी करले ।।

ख्वाइशें नहीं हैं मेरी कुछ ज़्यादा तुमसे इस ज़िंदगी में,
हदों में रहकर ही सही थोड़ी मुहोब्बत तू भी करले ।

मंज़िलों की परवाह मत कर संग हुँ तेरे हर सफर में,
मुझे हमसफ़र बना के चलने की हसरत तू भी करले।।

लग ना पायेगा मोल चाहत का इस इश्क़ के बाजार में ,
मुहोब्बत में मुहोब्बत से बिक जाने की ज़ुर्रत तू भी करले।

पूजा है तुझे खुदा बना हर घड़ी " चौहान " ने ,
आज मुझे पाने को इबादत थोड़ी तू भी करले ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ  

Saturday, 24 June 2017

WAADE

Tere wade juthe tut gye ,
hathon se hath ab chhut gye ,
jo sapne dekhae the sath tere,
kiye the hathon main le k hath mere,
ab kya kru unn baaton ka ,
tere jhoothen unn wadon ka ..
tu mujhse jo dur gyi..
wo kaanch se bikhar k toot gye...
lauta de kahin se shaam wo ,
pila de tere ishq ka jaam wo ,
sab khali khali sa lagta h ,
kyu mna k hmako khud ruth gye ..
likhna b ab to mumkin nhi ,
na kat'ti raate'n dhalta din nhi,
"chauhan" ishq k sagar main ,
hum aa manzil pr doob gye ...


BY:Shubham singh chauhan
Meri kalam -Dil ki zubaa'n


Friday, 23 June 2017

TUM NA HO

Kal raat ek khyal bhi aisa na tha,
ki jismain tum na ho...
kiye lakho'n sawal iss chote se dil ne ,
ek bhi swal aisa na tha jismain tum na ho ...
bunta gya chadar khyalo'n ki raat bhar ,
dekhta rahan apne halat ishq main ek nazar,
koi bhi aisa jahan main khyalat na tha jismin tun na ho ..
Milna bichardna to Baat Mukkadar ki h ,
Gin'nt raha aasmaa'n Dekhta raha taaro'n ko ,
Na dikhao aisa ek bar b wo chand jismain tum na ho ...
Likhta Raha apne hi Hatho'n apni barbadi ka falsafa ,
"Chauhan" "Meri kalam " se wo "Dil ki zubaa'n",
Na hua koi fasana aisa baya'n jismain jikar tera na ho ...

BY : Shubham Singh Chauhan
Meri Kalam - Dil Ki Zubaa'n

"जीता भी तो कितना" (JEETA BHI TO KITNA)

जीता भी तो कितना जीता ज़िन्दगी तेरे बिन,
साँसों को तो रुक जाना ही था।।

ढूंढता भी तो कितना मरहम दिल के ज़ख़्मो का,
नासूर तो इन्हें एक दिन बन ही जाना था।।

छोड़ के तो एक दिन यूँ भी चले जाना था तुम्हे मुझे,
मुक्कदर , लकीरों, तकदीरों का तो बहाना ही था।।

किसे पता था के वक़्त इतना बदल जायेगा "चौहान",
वो कहेंगे झूठे तुम थे सच्चा तो सारा जमाना ही था।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


"अगर"(AGAR)

ना ये दर्द होते, ना ये गम होते,
अगर मेरी ज़िंदगी मे आये ना तुम होते।।

ना रोती ये आँखे ना तरसती तेरी एक झलक को,
अगर कभी तुमसे हमने नैन ना लड़ाए होते।।

ना सुलगता ये दिल का आँगन, ना होता तन्हाई का आलम,
अगर कभी तेरे संग सावन ना बिताए होते।।

ना होते ये जज़्बात, ना होते ये ख़्यालात,
अगर तेरा इश्क़ मैं खुद को ना लुटाए होते।।

ना बनाता कभी "चौहान" "मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ",
अगर चोट तेरे इश्क़ में इस कदर ना खाएं होते।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 22 June 2017

"आदत"(AADAT)

दर्द मिटता नही, ज़ख़्म भरता नही,
आदत ऐसी लगी तेरी, तुझबिन दिल धड़कता नही।।

चैन ना क़रार है ,अब दिल की तन्हा महफ़िल है,
कैसे जियूँ तुझबिन एक पल भी जीना मुश्किल है,
पल पल सदियों से ये तन्हा वक़्त भी अब गुज़रता नही,
दर्द मिटता नही........

तुझे भुला दूँ वो जज़्बात कहाँ से लाऊँ,
तेरा ज़िक्र ना हो जिसमें वो बात कहां से लाऊँ,
आँखो से चहरा तेरा "चौहान" एक पल भी हटता नही,
दर्द मिटता नही ......


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"एक सवेरा" (EK SWERA)

एक सवेरा फिर काली रात,
चंद लम्हे और तेरा साथ,
हर मौसम पतझड़ पर एक बरसात,
एक पल को सही हाथों में तेरा हाथ,
तेरे दर्द-ओ-गम में तेरा साथ,
छोटा हो सफर पर तु चले साथ, 
दे मेरे दामन में तेरे दर्दों की सौंगात,
उम्रभर खामोशी पर तेरा ज़िक्र तेरी बात,
माँगा ही क्या था "चौहान",
पलभर की ज़िंदगी पल भर का साथ,
तेरे बिन, क्या ज़िंदगी, क्या मैं, क्या मेरे हालात।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 21 June 2017

"चल अलविदा"(Chal Alwida)

चल अलविदा!!

अब कभी ये रात नही होगी,
रात भर अश्क़ों की बरसात नही होगी,
लो छोड़ दी आज हमने ज़िन्दगी अपनी,
अब कभी हमारी तुम्हारी मुलाकात नही होगी,

चल अलविदा!!

अब कोई अरमान नही होगा,
दिल मे तेरी यादों का तूफान नही होगा,
लो हार गया मैं और जीत गए तुम,
अब ज़िंदगी मे कोई और इम्तिहान नही होगा।।

चल अलविदा!!

तूने सहारा ना दिया लो डूब गया मैं,
अकेली ज़िन्दगी को जीते जीते ऊब गया है,
तुमको बनाते बनाते ज़िन्दगी अपनी,
देख खुद अपनी ज़िंदगी से रूठ गया मैं।।

चल अलविदा!!

अब कोई तुम्हे ना हरपल सताएगा,
अब कोई तुम्हें ना पल पल याद आएगा,
ले लगा लिया मौत को गले मैने अपने,
अब "चौहान" कभी ख्वाबों में भी नज़र न आएगा।।

चल अलविदा!!

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 19 June 2017

"क़रार कहाँ" (KARAR KAHAN)

जब सामने ना हो तुम,
तो आँखो में करार कहाँ।।

जब ज़िक्र ना हो तेरा,
तो बातों में करार कहाँ।।

जब ख़्वाबो में ना हो तुम,
तो नींद में करार कहाँ।।

जब जज़बातों में नाहो तुम,
तो इश्क़ में करार कहाँ।।

जब मरहम ही ना बनो तूम,
तो ज़ख़्मो में करार कहाँ।।

जब "चौहान" तेरे अल्फ़ाज़ ही नही मेरे नाम,
तो फिर "मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ" कहाँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 18 June 2017

"एक किस्सा" (Ek Kissa )

एक किस्सा बयाँ करूँगा ,
इश्क़ में हालातों का,
गुज़री तन्हा रातों का,
एक किस्सा बयाँ करूँगा ।।

तन्हा काली रातों का,
पल पल सताती तेरी यादों का,
जो होती थी कभी उन हसीन मुलाक़ातों का,
एक किस्सा बयाँ करूँगा ।।

खत में लिखे जज़्बातों का,
रात भर की जो उन बातों का,
तुझे लेकर जहन में उठते जज़बातों का,
एक किस्सा बयाँ करूँगा ।।

इश्क़ में मिली बेवफाईयों का,
पल पल बढ़ती रुसवाइयों का,
"चौहान" से की जो बेपरवाहियोँ का,
एक किस्सा बयाँ करूँगा ,

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"कोई असर"(KOI ASAR)

कोई असर मुहोब्बत का मुझपर भी होने दे,
कुछपल तेरी यादों में मुझको भी रोने दे।।

ये जज़्बात नही बदलेंगे कभी आज़मा के देख लेना,
दर्द तेरे दिए ज़ख़्मो का दिल पर भी होने दे।।

कतरा कतरा बह जाएगा ये समुंदर आखों का,
कोई बीज मुहोब्बत का इस दिल मे भी होने दे।।

क्या होगा गर छोड़ भी जाओगे तुम कभी,
मुहोब्बत में "चौहान" दिल को शमशान राख मुझे भी होने दे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 16 June 2017

"तुम ना हो "(TUM NA HO)

कल रात  एक ख़्याल भी ऐसा नही था ,
 जिसमे तुम ना हो।।
किये लाखों सवाल इस छोटे से दिल ने,
एक सवाल भी ऐसा ना था ,
जिसमे तुम ना हो।।
देखता रहा अपने हालात इश्क़ मे एक नज़र,
कोई भी ऐसा ज़हन में ख़्यालात ना था,
जिसमे तुम ना हो।।
मिलना बिछड़ना तो बात मुक्कदर की है
गिनता रहा तारे देखता रहा आसमाँ,
एक बार भी ना दिखा वो चाँद ,
जिसमे तुम ना हो।।
लिखता रहा अपने हाथों अपनी बर्बादी का फलसफा,
"चौहान" फिर "मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ"
ना ऐसा हुआ कोई फसाना बयाँ,
जिसमे ज़िक्र तेरा ना हो या,
जिसमे तुम ना हो।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 15 June 2017

"कोशिश तुझे भुलाने की" (KOSHISH TUJHE BHULANE KI)

इस साल तुझे हम याद नही रखेंगें,
कोशिशें तुझे भुलाने की बार बार रखेंगे।।

फिर तुम इसे हमारी नफ़रत समझो या बेपरवाही,
अपने जहन में तुम्हारे ख़्यालात नही रखेंगे।।

टूटती है तो टूट के बिखर जाएं माला मेरे सपनों की,
पर तुझसे जुड़े अब कोई भी ख़्वाब नही रखेंगे।।

ले आएंगे चहरे पर मुस्कान भले झूठी क्यों ना हो,
ओर तेरी यादों की उदासी अब अपने साथ नही रखेंगे।।

लाख बहाती रहे ये आँखे पानी परवाह नही,
अश्क़ पोछने को तेरा दिया रूमाल नही रखेंगे।।

जीना चाहती थी तुम मेरे बिन आज जी लो जी भर के,
हम भी पास तेरे प्यार की कोई सौंगात नही रखेंगें।।

ढूंढ लेंगे कोई और लिखने की वजह या लिखना छोड़ देंगे,
"चौहान" तेरे प्यार में कभी अब ऐसे हालात नही रखेंगे।।

नही कर पाए अगर अमल अपनी इन बातों परतों कोई बात नही,
फिर अगले साल हम जहन में कुछ ऐसे हालात रखेंगे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


"तुमसा ना मिला" (TUMSA NAA MILA)

अकेला इस लिए नही हूँ कि मुझे तुम नही मिले,
अकेला इसलिए हूँ मुझे कोई साथ तुमसा ना मिला।।

वापिस इसलिए नही मुड़ा के मंज़िल को मैं पा नही सकता,
लौटा तो इसलिए के सफर ने हमसफ़र तुमसा ना मिला।।

जानना चाहती हो कि क्यों कह ना सके ये लब कुछ,
खामोश इसलिए हूँ सुनने वाला कोई तुमसा ना मिला।।

कौन सुनता कहानी इस अदालत में वफ़ा-ए-इश्क़ की,
बताते भी तो कैसे कोई तरफ़दार तुमसा ना मिला।।

और किस से पूछते वजहा दूर जाने की या इश में बेईमानी की,
"चौहान" मौत को गले लगा जीने वाला खुद्दार तुमसा ना मिला।।

मिले होंगे लाखों इस दुनिया की भीड़ में तुम्हे भी हमे भी,
पर कोई हदों से गुज़र प्यार करने वाला तुमसा ना मिला।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Wednesday, 14 June 2017

"जुदा" (judaa)

कैसे करेगी जुदा, मैं तेरी साँसों में शामिल हूँ,
बहता हूँ तेरे जिस्म में बनके लहू, तेरी रग रग से वाकिफ़ हूँ।।

परेशानियाँ है मुझसे तुझे लाखों सही,
देख गौर से तेरा सुकून भी मैं ही हूँ,
माना कभी लेना नही चाहती तेरी ज़ुबाँ मेरा नाम,
कैसे रखेगी खामोशियाँ मैं हर खामोशी में शामिल हूँ।।

माना पास नही आज रहती है मुझसे दूर दूर,
कब तक रहेगी अलग मैं तेरी कस्ती का साहिल हूँ,
नही मुहोब्बत मुझसे ना सही कोई गिला नही,
तुझे पल पल होते एहसास में शामिल हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"तुमसे मुहोब्बत करेगा कौन"(Tumse Muhobbat karega kon )

रात मेरी यादों में बीत जाएंगी,
आंखे तेरी अश्क़ों से भीग जाएंगी,
ना कोई होगा जब पूछने वाला हाल तेरा,
फिर तेरे दर्दों का मरहम बनेगा कौन??
कभी पूछा है सवाल तुमने अपने इस दिल से,
तेरे दामन को खुशियों से फिर भरेगा कौन??
अगर मैं ना रहा तो तुमसे यूँ मुहोब्बत करेगा कौन??
कौन देगा साथ जब ये तन्हाई तुम्हे सताएंगी,
किसको सुनोगी हाल जब ख़ामोशी मेरी तड़पायेगी,
हाथों में हाथ थाम के तेरे संग संग चलेगा कौन??
तुझे पाने को पल पल रब से फ़रियाद करेगा कौन??
कौन करेगा तेरा यूँ इंतजार अपनी ताह उम्र,
इस फ़रेब की दुनिया मे तुझे खुदा बना,
तेरी इबादत करेगा कौन??
कभी पूछा है सवाल तुमने अपने इस दिल से,
तेरे दामन को खुशियों से फिर भरेगा कौन??
अगर मैं ना रहा तो तुमसे यूँ मुहोब्बत करेगा कौन??

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...