Friday, 31 July 2020

"एक शायर" (EK SHAYAR)


कोई पूछे तो तुम मेरा नाम बताना,
मुहोब्बत लिखना मेरा काम बताना।।

जिसमें तुमपर ना कोई दाग लगे,
ऐसे ही कुछ मेरे इल्ज़ाम बताना।।

कहानी अगर पूछे कोई इश्क़ की अपनी,
मुझे ज़मी खुद को आसमान बताना।।

वो जो उठने से पहले ही दब गए,
वो ज़िंदा दफन अरमान बताना।।

पूछेंगे सब की कैसा है ये इश्क़ का शहर,
सबको कहना भूले से भी यहाँ मत आना।।

कही सपने, अरमान, ख्वाइशें दफन है यहाँ,
इस शहर को तुम शमशान मत बताना।।

जितनी ग़ज़ल लिखी "चौहान" ने "जान" के लिए,
उनकी तस्वीर बना फिर दीवारों पर मत सजाना।।

एक नज़्म लिख तो जाऊँगा तेरी ख़ातिर मगर,
जवाबों की तलाश में मेरी कब्र तक मत आना।।

कोई पूछे कि हर वक़्त ये उदासी, तन्हाई क्यूँ है,
"एक शायर को दिल दिया था" कहकर मुकर जाना।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 28 July 2020

"सवाल" (SAWAAL)



सवाल नज़र का नज़रो से ही बताने दो,
इशारों को इशारे रहने दो ज़ुबाँ तक ना आने दो।।

कुछ बातें है जो तेरे मेरे दरमियां रहने दे,
पहलियों को पहलियों में ही सुलझाने दो ।।

अब क्या बताऊँ की क्या राज़ है जिंदगी मेरी,
राज़ को अब बस एक राज़ ही रह जाने दो ।।

ना जाने क्या क्या ज़ुबाँ बोलता है ज़माना,
अपने राह पर रहो जमाने को बोलते जाने दो।।

क्या हुआ गर लहरे टकराकर मुड़ रही है किनारो से,
सुनामी बनकर भी आयेंगी एक रोज़ वक़्त तो आने दो।।

वो जो इश्क़ किताबों में अधूरा रह गया "चौहान",
अब गड़े मुर्दे ना उखाड़ उन्हें दफन रह जाने दो।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 24 July 2020

"हो नही सकता" (HO NHI SAKTA)



अब कागज़ पर नही कलम से पानी पर लिखना है,
बिना पँख इस आसमाँ की ऊंचाइयों में उडना है,
नंगे पैर अब जलते-सुलगते अंगारो पर चलना है,
नापना है अब इस गहरे सागर की गहराई को,
जो हो नही सकता "चौहान"अब वही तो करना है।।
वो दूर से मिलते नज़र आते है अम्बर और ज़मी,
आज उनको हकीकत में एक करना है,
ये हवायें जो छू कर गुज़र रही है मुझे यहाँ,
आज इनको अपनी आगोश में करना है,
फिसल जाता है ये रेत बारहां मुट्ठी से मेरी,
आज इसको बंद मुट्ठी में करना है,
अब नही रुकना इन राहों में इतना आगे आकर,
अब वक्त को वक़्त से पीछे करना है,
नही जानता कौन कितने पानी मे है यहाँ "चौहान",
आज खुद को खुद से बेहतर करना है,
मिट्टी पे मिट्टी हर कोई लिख देगा,
आज पानी पर पानी लिखना है,
जो हो नही सकता "चौहान"अब वही तो करना है।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 22 July 2020

"अलिफ़-लैला" (ALIF-LAILA)



अलिफ़ लैला की कहानी ,
जैसे मैं जहाज़ी सिंदबाद ।।

कई राज समेटे खुद में जैसे,
कोई तिलस्मी क़िताब ।।

ये मेरे ख़्वाबों का शहर,
जैसे सल्तनत बगदाद।।

मेरे हाथों की लकीर जैसे,
हो अलादीन का चिराग।।

कुछ ख्वाईशें ऐसी रही जैसे,
नूरानी चहरे पर हिज़ाब।।

शायरों की बस्ती में "चौहान",
जैसे किसी रुख़ पर नक़ाब।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 19 July 2020

"रास्ते" (RAASTE)



 
क्या हुआ अगर फासले ही फासले मिले,
रास्ते तो हमको भी तुम्हारे जैसे ही मिले।।

क्या हुआ अगर सावन की बारिश ना आयी,
हमको भी राहो में मौसम पतझड़ के मिले।।

महकता गुलाब था उसके गुलिस्तां का मैं,
मुझे तोड़ने वाले हाथ मेरे अपनो के मिले।।

कहाँ कोई ख़्वाब आकर बस जाता आँखों मे मेरी,
इन आँखों मे तो हमेशा गहरे समुन्दर ही मिले।।

बड़ी मुहोब्बत से गले से लगाया था उसने हमें,
पीठ में खंज़र घोपने वाले हाथ उसके ही मिले।।

वो जिसकी साँसे चलती थी नाम पर हमारे,
आज वो गैरो की आगोश में लिपटे हुए मिले।।

हाँ गुलाब ही तो थे वो "चौहान" इस बगिया के,
वो अलग बात है हमारे हिस्से में कांटे ही मिले।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 14 July 2020

"मेरी ज़िंदगी" (MERI ZINDAGI)



एक तेरे बाद क्यूँ यूँ बर्बाद सी हो गयी है जिंदगी,
किसी पुरानी बंद किताब सी हो गयी है जिंदगी।।

हर रात नए ख़्वाब सँजोते थे तेरे संग जीने के,
बस नाम तेरा ही लिखा दिल के हर कोने पे,
आज तन्हा काली रात सी हो गयी है जिंदगी,
किसी पुरानी बंद किताब सी हो गयी है जिंदगी।।

सदियों से लिखते आ रहे है जिंदगी के पन्नों पर,
कोई मरहम ना असर करे अब मेरे इन ज़ख्मो पर,
किसी पुराने फ़टे लिबाज़ सी हो गयी है जिंदगी,
किसी पुरानी बंद क़िताब सी हो गयी है जिंदगी।।

कोई राह नज़र आये तो चला भी जाऊँ,
यूँ मर मर कर कितना जीता जाऊँ,
अमावस में ग्रहण लगे महताब सी हो गयी है ज़िंदगी।।
किसी पुरानी बंद किताब सी हो गयी है जिंदगी।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 13 July 2020

"रोक लेते" ( ROK LETE)


सुनते कभी तेरी शिकायतों को,
दूर करते सभी शिकवे गिले,
ना होती ये दूरियाँ , ना ग़मो के काफिले,
जाते जाते मुड़ के देख लेते,
रोक लेते वही एक बार कहकर तो देखते।।

आँखो में नमी थी पर तुम देख ना पाए,
रोते रहे रात भर अश्क़ थम ना पाए,
देखना गवारा नही था तो ना सही,
एक बार चलते कदम ही रोक लेते,
रोक लेते वही एक बार कहकर तो देखते।।

ये रास्ते मुझे आज भी तुम तक ले जाते है,
ये होंठ तेरे ही गीत गुनगुनाते है,
चाहे कुछ भी हमारी खताओं की सज़ा दी लेते,
रोक लेते वही एक बार कहकर तो देखते।।

हम आज भी उन्हीं राहों पर घूमते है,
ख्यालों-मसक्कत में तुझे ही ढूंढते है,
"चौहान" को सपनो में ही आकर कह देते,
रोक लेते वही एक बार कहकर तो देखते।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Saturday, 11 July 2020

"तज़ुर्बा -ए-ज़िन्दगी-3" (TAZURBA-E-ZINDAGI-3)



ये जो रियासतें बना रखी है तुमने इश्क़ में, ख़्याल रखो,
कोई मिला के उन्हें साम्राज्य तुम्हारा ना उजाड़ दे।।

माना हुक़ूमते है तुम्हारी पर थोड़ा प्रजा का भी ख़्याल करो,
वक़्त से पहले कहीं राज्यभार से ये प्रजा ही ना लताड़ दे।।

यकीन कर पर इतना भी नही के सच को देख अनदेखा कर दो,
ये खेल सियासती है कहीं छूरा पीठ में अपने ही ना मार दे।।

तुम शातिर ,बलवान,होशियार ,पर ये घमंड किस बात का,
वक़्त पर कही इस दौड़ में तुम्हे लँगड़े ना पछाड़ दे।।

उड़ान ऊँची रख पर इतनी के ज़मी नज़र आती रहे,
हालातों के बिगड जाने पर पैर आसमाँ नही तलाशते।।

तू जैसा है ठीक है किसी को देख कर मत बदल,
टूट जाने पर तो भगवान भी मंदिर में नही रखे जाते।।

जो रंग भरे तसवीर में तेरी उनको सँजो के रख,
कुछ के हिस्से में "चौहान" ये रंग भी नही आते।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 7 July 2020

"राज़ कोई" (RAAZ KOI)


ना जाने "चौहान"दुनिया क्या क्या पढ़ लेती है,
तेरी कलम से ज़्यादा राज़ तेरी आँखें लिए बैठी है।।

ये कोई उम्र का तज़ुर्बा तो नही है फिर क्यूँ हर बार,
तेरी कलम लोगो की दिल की बात कह देती है।।

क्या ऐसी ख़लिश है तुझमे जो अब तलक भरी नही,
हर वक़्त तेरी आँखे है कि किसी की तलाश में रहती है।।

सुख गया वो दरख़्त पर कमज़ोर नही पड़ा अब तलक, 
टहनी है पतझड़ में भी हरे होने की उम्मीद में रहती है।।

रोज़ सोचता हूँ के अब बंद कर दूंगा लिखना मुहोब्बत "चौहान"
ये कलम है के मेरी हर वक़्त इश्क़ के नशे में चूर रहती है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 5 July 2020

"अब थक गया" (AB THAK GYA)



अब थक गया हूँ तुझे ढूंढते-ढूंढते,
कभी किसी राह में मिल जा अनजाने से।।

फिर शिकायतें भी कर लेना जी भर के,
एक बार फिर सीने से लगा किसी बहाने से।।

कहाँ सजदे करूँ कहाँ मन्नतें माँगू तेरे लिए,
क्या अब नही आएगा तू मेरे बुलाने से।।

ये आँखों के आँसू क्यूँ नज़र ना आते तुझे,
फिर रिश्ते टूट जाते है क्या मर जाने से।।

तूने ही तो कहाँ था अच्छा लगता है तुझे,
मुझसे यूँ बार बार मिलने आने से।।

अब मैं भी तुझसा हो जाऊँ क्या "चौहान",
क्या पा लिया मैंने भी लिखने लिखाने से।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 1 July 2020

"बद्तमीज़ कलमकार" (BATMEEZ KALAMKAAR)



हम पहले ही उन ख्यालो से निकल नही पा रहे,
तुम हमसे यूँ बार बार एक वही बात मत किया करो।।


बड़े कमज़ोर है, मिट्टी के ये आशियाने हमारे साहब!!,
हमसे यूँ बार - बार बरसात की बात मत किया करो।।


हम खुश है हमारी इस छोटी बस्ती, छोटे मकानों में ही,
महलों के ख्वाब दिखा हमारी ज़मीने मत लिया करो।।


छोटी छोटी बातों में ही ख़ुशी ढूंढ लेते है ज़िंदगी की ,
बड़ी खुशियों के ये झूठे वादे हमसे ना किया करो।।


हम गरीबों का क्या है अगर हम मर भी गए तो,
आप बड़े लोग हो साहब,ज़िंदगी चैन से जिया करो।।


हुकूमत आपकी है जो दिल आये आप वो किया करो,
निशाना साधने को सहारा हमारे कंधों का ना लिया करो।।


ग़रीबो की ज़िंदगी का कोई मोल थोड़ी होता है साहब,
हम मरे चाहे जिये आप तो बस सियासत किया करो।।


थोड़ी बदतमीज़ है कलम चौहान की "हक़ीक़त" लिखती है,
मुझसे यूँ झूठी कामियाबी के किस्से लिखने की उम्मीद ना किया करो।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...