Monday, 29 April 2019

"मैं और मैं" (MAIN AUR MAIN)


बड़ी जदोजहद से गुज़र रही है जिंदगी मेरी,
क्यों समझाऊँ लोगों को की मैं क्या लिखता हूँ।।

कुछ को कलाकार ,तो कुछ को बेरोजगार दिखता हूँ,
सोच अपनी अपनी किसी को पत्थर, किसी को इंसान दिखता हूँ।।

मैं गालिब नही पढ़ता,मातम मुहोब्बत का आस-पास देखकर,
अकेले में अक्सर "शिव" की "बिरहाँ दा सुल्तान" पढ़ता हूँ।।

लफ्ज़-लफ्ज़ में मुहोब्बत नज़र आती है मुझे अक्सर,
जब "शिव" का "माएँ नी माएँ" "एक कुड़ी जिदा नाम मुहोब्बत" सुनता हूँ।।

माना कोई वजूद नही मेरा अभी शायरों की बस्ती में ,
सूरज नही ,जुगनू हूँ अक्सर अँधेरी रात में ही दिखता हूँ।।

लोग कहते है कि बगावत की बू आती है कलम से मेरी,
आज कल लोगो का रुतबा नही, उनकी औकात लिखता हूँ।।

अगर लिखने बैठा कभी मुहोब्बत तो कलम तोड़ दूँगा,
फिर मत कहना "चौहान" के जाती ज़िंदगी की बात लिखता हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 27 April 2019

"दिल का दर्द" (DIL KA DARD)



सुना है इस दुनिया मे एक अनोखा बाज़ार लगता है,
जहाँ प्यार का व्यापार होता है,
मैं भी एक छोटा सा व्यापारी बनकर आया हूँ,
दिल का दर्द कागज़ पर लिखकर मैं भी यहाँ बेचने आया हूँ।।

खरीदने को ना कोई यहाँ तैयार है,
और दर्द देने वालों की तो यहाँ भरमार है,
लिख के जज़्बात, कुछ फ़साने मुहोब्बत के मैं भी लाया हूँ,
दिल का दर्द कागज़ पर लिखकर मैं भी यहाँ बेचने आया हूँ।।

लिखा है कुछ रात के एहसास को,
पल-पल थमती हुई साँस को,
अपने ज़ख्मों को उनकी बेवफ़ाई से मैं भी सींचने आया हूँ,
दिल का दर्द कागज़ पर लिखकर मैं भी यहाँ बेचने आया हूँ।।


मैं ना कोई शायर हूँ ना कोई ग़ज़लगोर हूँ,
बस वक़्त और किस्मत के हाथों मज़बूर हूँ,
"मेरी कलम" को बना कर"दिल की ज़ुबाँ",
"चौहान", अपने दर्द का मरहम ढूंढने आया हूँ,
दिल का दर्द कागज़ पर लिखकर मैं भी यहाँ बेचने आया हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 26 April 2019

"लौटे नही" (LAUTE NHI)


रास्तों पर करते रहे इंतज़ार हम ,
सदियां गुज़री पर वो लौटे नहीं।।

टूट के बिखर गया खुद में ही मैं,
बाँध उम्मीद के मेरे अभी टूटे नही।।

माना कि उन्होंने कभी समझा नही,
पर वो वादे मेरे प्यार के झूठे नही।।

बिगड़े तो वो हर आदत पर मेरी,
उन्हें खोने के डर से हम रुठे नही।।

लुटा दिया हमने अपना सब कुछ,
वो कहते है इश्क़ में हम डूबे नही।।

कब्र तक ले आया मुझे इश्क़ मेरा,
"चौहान" मरकर भी रिश्ते छुटे नही।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।





Thursday, 25 April 2019

"दूर कहीं " (DOOR KAHIN)



दूर कहीं कायनात में एक घर बनाऊँगा,
तुझे लेके दूर इस जहाँ से उसे प्यार से सजाऊँगा,
हर तरफ बस प्यार ही प्यार होगा वहाँ,
कुछ ऐसा क़ुदरत का अलग रंग बरसाऊँगा,
दूर कहीं कायनात में एक घर बनाऊँगा।।

एक अलग सी महक होगी फिर फ़िज़ाओं में,
एक अलग सा नूर होगा इन घटाओं में,
बस मैं तू और मेरा रब , हम तीनों होंगे वहाँ,
दिल की हर दीवार तेरे नाम से सजाऊँगा,
दूर कहीं कायनात में एक घर बनाऊँगा।।

तू घूमना मेरे संग खुशियों के मेलो में,
रहना दूर पर मेरे संग ज़िन्दगी के रेलो में,
मेरे गीतों में फिर एक नया सुरूर होगा,
फिर मेरी कलम से तेरी दास्तां लिखता जाऊँगा,
दूर कहीं कायनात में एक घर बनाऊँगा।।

फिर ना ये उदास सवेरे होंगें,
खुशियों के बादल तुझे हर तरफ से घेरे होंगे,
महक उठेगी फिर मिट्टी मुहोब्बत की बरसात में,
फिर तेरे ख़्वाबों को मैं हक़ीक़त का रंग दिखलाऊँगा,
दूर कहीं कायनात में एक घर बनाऊँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 23 April 2019

"नज़र आ रहा है" (NAZAR AA RHA HAI)


सब अपने हाथों से छूटता नज़र आ रहा है,
एक घर था जो अब टूटता नज़र आ रहा है।।

दीवारो में भी अब दरारें दिखने लगी है ,
पौधा था तुलसी का ,सुखता नज़र आ रहा है।।

उम्र का पड़ाव है और वक़्त बीत रहा है,
आँचल माँ का अब छूटता नज़र आ रहा है।।

अज़ीब नज़ारा है आसमाँ में इस रात का,
चाँद है के घर तारों का लुटता नज़र आ रहा है।।

इन उलझनों में उलझकर रह गयी ज़िन्दगी "चौहान",
ठोकर मार खुशियों को, खुशियों की राह ताकता नज़र आ रहा है।।

वो जो रात रात भर जागा था जिन्हें मुक्कमल करने को,
खुद कब्र अपने सपनो की खोदता नज़र आ रहा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 21 April 2019

"आज की कहानी" (AAJ KI KAHANI)


कहाँ मुहोब्बत रह गयी है आज के इस दौर में,
मतलब के रिश्तों के पीछे रिश्ते खून के टूट गए।।

अब तो बातें चाँद तारों वाली सच्ची लगती है,
ताज़ बाप के सिर के इश्क़ में पैरों में छूट गए।।

वो माँ जिसने तालीम दी संस्कारों की अपने,
उसके दिए संस्कार झूठी कसमो वादों में टूट गए।।

ख्वाइशें जिस्म की थी उसे जिसे वो भगवान समझती थी,
माँ-बाप भगवान है ये बाते तो हम कब के भूल गए।।

बड़े ख्वाब देखे होंगे एक तुझे लेकर इस दुनिया में,
विश्वास था खुद से ज़्यादा वो ही ईमान अपनो का लूट गए।।

खुद से ज़्यादा भरोसा करते थे माँ-बाप जिसपर,
दर्पण भ्रम के तो ना जाने कबके हाथों से छुट गए।।

वो जिस खातिर "चौहान" इज़्ज़त घर की भुलाये बैठी है,
वो सच्ची मुहोब्बत रिश्ते जिस्मों पर आकर टूट गए।।

ज़्यादा समझ तो नही है अभी "चौहान" इस बाजार की,
दो दिन के इश्क़ के खेल में घर अच्छे अच्छे टूट गए।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 19 April 2019

"किताब"(KITAAB)


ये मेरी ज़िंदगी की किताब है,
कुछ पन्ने है जो बहुत ख़ास है,
कुछ लम्हे हसीन है इसमें,
मासूम शरारत भरे ,
पर ना जाने क्यों "चौहान",
कुछ है जो आज भी बहुत उदास है।।
एक बचपन छुपा कर रखा है,
मासुमियत ,शरारतों भरा,
कुछ अनमोल यादें है ,
वो कहानियां है परियों की, राजे महाराजाओं की,
जो दादी नानी सुनाया करती थी,
एक आँगन था जो भरा रहता था खुशियों से,
जिसकी मुझे अब तलक तलाश है।।
एक दौर जवानी का भी है ,
मुहोब्बत की रवानी का भी है,
माँ के संस्कार भी है,
पापा से मिली नसीहतें भी है,
कुछ परायों ने अपना समझ के साथ निभाया,
कुछ अपने थे जो अब तक ख़िलाफ़ है,
दिल शुक्रगुज़ार है उनका,
जो वक़्त पर साथ छोड़ गए ,
और जो इस वक़्त में मेरे साथ है,
कुछ है जो अब यादों से भी परे है,
कुछ है जिनका मेरी हर साँस को आभास है,
टूट चुका हूँ कुछ को खोकर,
कुछ है जो मेरे जिस्म में आती जाती साँस है,
कुछ रिश्ते खून के नही पर ज़रूरी थे,
वो जो ना समझ पाए मुझे कभी,
उनको खोने से दिल थोड़ा उदास है,
एक चेहरा जो मैं ला ना सका इन तस्वीरों में,
कैसे समझाऊँ वो मेरी ज़िंदगी मे बहुत खास है,
सुना है बड़ी रहमत बरसती है खुदा तेरी तहरीरों से,
लिख दे उसे मेरे नसीब में जो मेरे दिल के बहुत पास है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 18 April 2019

"दिल का हाल" (DIL KA HAAL)



ना खुदा कुछ सुनता है , ना वो कुछ सुनना चाहते है,
आ जाओ एक दफा हम तुम्हें अपने दिल का हाल सुनाना चाहते है।।

ये लबों की ख़ामोशी, आँखों की नमी का दर्द है जो,
आ जाओ वो सब सुनाना चाहते है।।
आ जाओ एक दफा हम तुम्हें अपने दिल का हाल सुनाना चाहते है।।


मिलता था सुकून जो तेरी बाहों की आगोश में,
आज इन तन्हाइयों का आलम बताना चाहते है,
क्यों जागते है रहते है हम रात-रात भर,
वो अकेलेपन, वो तन्हाइयों का एहसास कराना चाहते है,
आ जाओ एक दफा हम तुम्हें अपने दिल का हाल सुनाना चाहते है।।

क्यों मेरा दिल इतना बेकरार है,
क्यों इन आँखो को अब तलक तेरा इंतज़ार है,
क्यों तेरी हँसी भूल ना पाते है हम,
क्यों तेरी यादों में हम अकेले मरते जाते है,
आ जाओ एक पल को ही सही, तुम्हे अपने दिल का हाल बताना चाहते है।।

मेरी साँसें थमने लगी है, ये नब्ज़ भी अब जमने लगी है,
ऐसा ना हो के बंद किताबों की कहानियां बनके रह जाये हम,
आ जाओ एक बार आके फिर चले जाना,अब अकेले जीना नही चाहते है,
आ जाओ एक दफा हम तुम्हें अपने दिल का हाल सुनाना चाहते है।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 16 April 2019

"जी हज़ूरी" (JI HAZURI)


रिश्ता कोई भी हो पर मज़बूरी मत रख,
मुहोब्बत बेहिसाब कर ,जी हजूरी मत रख।।

गर इश्क़ है तो बेधड़क इजहार कर,
अब दिलों के बीच ये दूरी मत रख ।।

छुपा के रख ज़माने से ,इश्क़ कोहिनूर है,
थोड़ा पर्दा भी रहने दे ,मशहूरी मत रख।।

क्या हुआ गर कुछ खताएँ कर बैठे हो,
भुला दे शिकवे सभी , ये मगरूरी मत रख।।

थोड़ा सोच समझ कर रख कदम इश्क़ में,
बिना सोचे हर बात की मंजूरी मत रख।।

हर दर्द का मरहम मिल जाएगा वक़्त के साथ,
दिल पर कोई भी अब ज़ख्म नासूरी मत रख।।

सज़दे भी कर लाख इबादत भी कर "चौहान",
बेमतलब कोई भी रिवाज़ अब दस्तूरी मत रख।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



Monday, 15 April 2019

"जरुरत"(JARURAT)


तू मेरे लिए क्या है क्या था,
जरूरत किसी को बताने की नही है,
एहसास क्या है दिल मे तेरी ख़ातिर,
जरूरत औरों को जताने की नही है,
राख मिट्टी में भी मिलती है तो,
लगती तिलक बनकर माथे पर भी है,
अहमियत दीये को अँधेरे में,
खुद का वजूद बताने की नही है,
बात तो वक़्त पर काम आने की है,
सुई की जगह जरूरत तलवार चलाने की नही है,
पहलू दो होते है हर बात के,सिक्के की तरह,
बात हरबार नज़रिया खुद का अपनाने की नही है,
सच खामोशी में भी सच है,
ज़रूरत चिल्लाकर साबित करवाने की नही है,
वो हर कोई अहमियत रखता है मेरी ज़िंदगी मे,
जो कभी मेरे हाल से होकर गुज़रा है,
ज़रूरत चहरे की उदासी,
हर किसी को दिखाने की नही है।।
रिश्ते वो निभा "चौहान" जो दिल से हो,
जरूरत मजबूरियों से निभाने की नही है,
अपने जज़्बात समेट के रख ले दिल मे कहीं,
जरूरत यूँ खुद को नीलाम करवाने की नही है।।
अदबो-तहज़ीब से पेश आ हर किसी से मगर,
ज़रूरत किसी के आगे सिर झुकाने की नही है।।
यकीन रख अपनी किस्मतों पर भी लेकिन,
जरूरत हर कहीं सज़दे कर गिड़गिड़ाने की नही है।।
जिसका जितना साथ था वो साथ रहा तेरे,
जरूरत बार बार यूँ हर रिश्ता बचाने कि नही है,
ज़ुबाँ कड़वी होती है सच की खामोश रह ,
ज़रूरत "चौहान" हर बात बोलकर बताने की नही है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 12 April 2019

"शायरी"(SHAYARI)


शब्दों का मेल, जज़्बातों का खेल,
बातें है दिल की जो समझ पाते नही,,
मैं लिखता कभी,कभी मैं लिखता नहीं,
ना मैं शायर और मेरी बातें शायरी नही।।

लिखुँ मुहोब्बत या टूटे दिल का हाल,
खाली दिमाग मे पलते कितने सवाल,
जवाब तेरी बातों का या हिसाब जज़्बातों का,
मैं लिखता कभी ,कभी मैं लिखता नही,
ना मैं शायर और मेरी बातें शायरी नही।।

इस दुनिया के बाजार में, रिश्तों के व्यापार में,
तराज़ू झूठ के है सच यहाँ कहीं पे बिकता नही,
जिस्मफ़रोसी शरेआम यहाँ मुहोब्बत के नाम पर,
है झूठ का बोलबाला सच यहाँ क्यों टिकता नही,
मैं लिखता कभी,कभी मैं लिखता नही,
ना मैं शायर और मेरी बातें शायरी नही।।

बातें धर्म की हो या बातें जात-पात की,
असल मे हमारी सोच ही जड़ है फसाद की,
नकाबपोश, चहरे के पीछे है कई चहरे,
असली चेहरा लेकर यहां कोई क्यों मिलता नही,
मैं लिखता कभी, कभी लिखता नही,
ना मैं शायर और मेरी बातें शायरी नही।।

सच जानते सभी है पर मानना कोई चाहता नही,
किसी का दर्द क्या है जानना कोई चाहता नही,
फायदे और मलतब के रिश्ते ही बाकी है,
बेमतलब से बातें भी कोई अब करता नही,
मैं लिखता कभी, कभी लिखता नही,
ना मैं शायर और मेरी बातें शायरी नही।।

फ़लसफ़ा ये ज़िन्दगी का मुझे समझ नही आता,
अपनो से ज़्यादा यकीन दुश्मनों पर क्यों होता जाता,
क्यों बातों में हर एक के चालसाज़ी दिखती है,
इतने ही सच्चे है तो आखों से आँखे क्यों ना मिलती है,
क्यों हर चीज़ में फायदा अपना देखते है,
मतलब की दुनिया है स्वार्थ ही है मज़हब,
बिना मतलब के सिर खुदा के दर पे भी झुकता नही,
मैं लिखता कभी, कभी मैं लिखता नही,
ना मैं शायर और मेरी बातें शायरी नही।।

बाते समाज की करूँ ,चलो रहने दो आईना झूठा है,
चुनावी दौर है,सियासती जाल है,
रेगिस्तान में मिराज है ,भ्रम सबका टूटा है,
होते बलात्कार है कहते कपड़ो का दोष है,
किस किस को समझाए चलो अपनी अपनी सोच है,
दो दिन का रोष है,मातम है,सबके लिए खेद है,
ताह उम्र किसी की कब्र पे जा कोई रोता नही,
मैं लिखता कभी, कभी मैं लिखता नही,
ना मैं शायर और मेरी बातें शायरी नही।।

अपनी ख़ुशियाँ छोड़ दूसरों की खुशियों से परेशान है,
बर्बादी देख दूसरों की इनको मिलता क्यों आराम है,
हैरान हूँ मैं देख के ,के हर शक्श में अभिमान है,
चाहने वाले यहाँ बहुत कम,
मेरी कला से जलने वाले लोग तमाम है,
नुक्स निकलते है वो दूर कहीं बैठ के,
बुरे वक्त में "चौहान" क्यों साथ कोई चलता नही,
मैं लिखता कभी, कभी मैं लिखता नही,
ना मैं शायर और मेरी बातें शायरी नही।।

किताबे हज़ारों पढ़ी पर वो ज्ञान नही,
पैसे कमाए खूब पर कहीं आराम नही,
मैं आज भी मुसाफ़िर हूँ, जहाँ रुकने को मन करे,
ऐसे मिले कभी मुझे मुकाम नही,
खुली आँखों के अंधे, जागे है पर सो रहे,
बेज़ुबाँ मज़बूर है ,ज़ुबाँ वाले ख़ामोश सब हो रहे,
सच है "चौहान" मन अब लिखने को करता नही,
मैं लिखता कभी, कभी मैं लिखता नही,
ना मैं शायर मेरी बातें शायरी नही।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 11 April 2019

"नई शुरूआत" (NAYI SHURWAAT)


सारी कसमे भी खाई थी,
वो वादे भी किये थे मुहोब्बत के उसने,
"मैं बस तुम्हारी हूँ" ये दावे भी किये थे उसने,
दो दिन बात क्या नही हुई,
वो पाक मुहोब्बत का रिश्ता ही टूट गया,
ऐसा नही के झूठ कहा था उसने,
वो सारे वादे भी सच्चे थे उसके,
वो इरादे भी सच्चे थे उसके,
वो मुहोब्बत भी पाक थी उसकी,
बस आज इस कहानी के किरदार बदल गए,
गैर हो गए हम उनके हक़दार बदल गए,
जब मुहोब्बत का आगाज़ था,
तब उनका एक अलग ही अंदाज़ था,
तब उसे मुझे कोई खामी नज़र ना आती थी,
मेरी वो नादानियां वो शरारतें सब भाती थी,
फिर धीरे-धीरे वक़्त गुज़रता गया,
वो जैसा चाहती थी मैं वैसा नही था,
शायद उसे ये एहसास होने लगा,
अब उसकी मंज़िले बदल गयी थी,
मेरी मंज़िल रास्तों में ढल गयी थी,
अब वो सारी बातें उसे,
किसी और की अच्छी लग रही थी,
वो बालों से खेलना, बाहों में सिमटना,
अब उसे किसी और का अच्छा लग रहा था,
अब तो आलम इश्क़ का ये होगा "चौहान",
वही कसमे होंगी वही वादे होंगे,
वही बात मुलाकात होगी,
जब जान जाएंगे वो उनको ,
फिर एक नई शुरुआत होगी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 9 April 2019

"कागज़ की कश्ती" (KAGAZ KI KASHTI)


कागज़ की कस्ती पानी मे चलाने चले थे,
सागर किनारे रेत का घर बनाने चले थे,
ना लहरों का डर था ना आँधी, तुफानो का,
तुझको पाने की चाहत में,
कुछ ऐसे अनचाहे ख़्वाब सजाने चले थे।।

बुनते गए हम तेरे दी हुई यादों की चादर,
आ गए वापस वहाँ जहाँ आना ना था खुद भी चाहकर,
वो मोती हसीन लम्हों के धागे में पिरोने चले थे,
तुझको पाने की चाहत में,
कुछ ऐसे अनचाहे ख़्वाब सजाने चले थे।।

काफिला बना बैठे थे हम सपनो का,
जग भुला बैठे थे तेरे संग अपनो का,
कुछ यूं तेरे इश्क़ की बेखुदी में खो जाने चले थे,
तुझको पाने की चाहत में,
कुछ ऐसे अनचाहे ख़्वाब सजाने चले थे।।

जब साथ छूटा तेरा तब होश आया,
सब अपनी गलती नज़र अपना दोष आया,
उस खुदा की बनाई मुहोब्बत पर यकीन करके,
"चौहान" एक नई दुनिया बसाने चले थे,
तुझको पाने की चाहत में,
कुछ ऐसे अनचाहे ख़्वाब सजाने चले थे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 6 April 2019

"सवाल" ( SAWAAL)


थोड़ा बेचैन रहता हूँ आजकल,
पूछता रहता हूँ मैं खुद से,
मैं रुक गया हूँ या चल रहा हूँ??
अब कहीं वो नूर दिखाई नही देता,
क्या शाम की तरह मैं भी ढल गया हूँ,
बड़े पत्थर मारे है वक़्त ने काँच सी किस्मत पर,
टूट गया हूँ या बच के निकल गया हूँ??
जो ठोकरें लगी है मुझे ज़िन्दगी की,
क्या उनसे सच में संभल गया हूँ,
सोचता हूँ जागता हूँ रात भर,
ज़िंदा हूँ या ख्वाबो के साथ जल गया हूँ,
वक़्त ने तेवर बदले "चौहान" ज़िन्दगी ने रंग,
सलीक़ा वही है या मैं भी ढंग बदल गया हूँ??
कुछ पन्ने नही लिख पाया किताब-ए-ज़िंदगी के,
क्या खुद की तलाश में खुद से दूर निकल गया हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 3 April 2019

"मैं भी लिखता" (MAIN BHI LIKHTA)


काश मुझे भी लिखना आता,
मैं भी हाल-ए-दिल बयाँ करता।।
वो कागज़ जो ख़ाली थे तेरे इश्क़ के,
कभी स्याही, कभी अश्क़, कभी खून से लिखता।।

वो जज़्बात, ख़्यालात, जो थे तेरे खातिर,
कुछ ना रखता छुपा कर इस दिल में,
वो लफ्ज़ जो गिरफ्त में थे खामोशी के मेरे,
एक-एक अल्फाज़, गवाही मेरी मुहोब्बत की लिखता।।

हो जाने देता फिर बातें 'गर शरेआम भी होती,
सह लेते हँस कर 'गर बात सिर्फ इल्ज़ाम की होती,
वो कसमे,वादे,वो दावे मुहोब्बत में जो तूने किये थे,
समझ गया होता तो मुहोब्बत नही सियासत लिखता।।

बड़े रंगीन मौसमी मिज़ाज़ के निकले तुम,
रूत एक थी पर हर रंग में बदले तुम,
कभी दोस्त, कभी मुहोब्बत, मुझे तो समझ नही आता, पर जरूरतों पर रिश्ते बदलने की तेरी आदत ज़रूर लिखता।।

बेख़बर है वो एक उम्र गुज़री है हमने इन बाज़ारों में,
ये मोती मुहोब्बत का यूँ दर-दर नही मिलता,
वो जो नुमाइशें कर रहे है सच्ची मुहोब्बत की अपनी,
सच होती तो "चौहान" कभी "मेरी कलम- दिल की ज़ुबाँ" ना लिखता।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 1 April 2019

"झूठी कहानियाँ" (JHUTHI KAHANIYAAN)


झूठी कहानियाँ है लोग सच्चे किरदार माँगते है,
जैसा जिसने सोचा मुझे सब वैसा ही जानते है।।

एक गाँठ है धागे की जो बाँध के रखती है सबको,
लोग है कि कीमत बस उन मोतियों की मानते है।।

वो मुहोब्बत भी क्या मुहोब्बत जो जतानी पड़े,
सच्चे एहसास कहाँ सहारा लफ़्ज़ों का माँगते है।।

साथ लहरों का भी था जो आज किनारे हो तुम,
अच्छे वक़्त में कहाँ उस खुदा को पहचानते है।।

कौन समझता है मज़बूरियां यहां किसी की,
लोग पेड़ की छावं में बैठ पत्थर उसी को मारते है।।

ये तो फ़ितरत हो गयी है आजकल जमाने की "चौहान",
एक वक्त तक ही एहमियत रिश्तों की मानते है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...