आँखों में ठहरा हुआ ख्वाब हो तुम ,
दिल में पनपता हुआ एक अरमान हो तुम।
कैसे दूर कर दूँ भला खुद को तुमसे ,
मेरा वजूद मेरी पहचान हो तुम ।।
तराशा है खुदा ने संगमरमर की मूरत सा तुम्हे ,
मुहोबत में ताज़महल सा एक पैगाम हो तुम ।
ज़ुल्फ़ों में सिमटी है एक काली घनी रात तुम्हारे ,
लबों पर सुर्ख लाली मानो सूरज की लालिमा लिए शाम हो तुम।।
किस मंदिर किस मस्जिद किस दर से मांगू मैं तुम्हे ,
मेरे लिए तो मेरा परवरदिगार मेरा भगवान् हो तुम ।
लोग कहते है तो कहते रहे काफ़िर मुझे " चौहान ",
मेरे लिए तो मेरी मंज़िल मेरा मुकाम हो तुम ।।
कैसे दूर कर दूँ भला तुमको खुद से ,
मेरा वजूद मेरी पहचान हो तुम ।।
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां
दिल में पनपता हुआ एक अरमान हो तुम।
कैसे दूर कर दूँ भला खुद को तुमसे ,
मेरा वजूद मेरी पहचान हो तुम ।।
तराशा है खुदा ने संगमरमर की मूरत सा तुम्हे ,
मुहोबत में ताज़महल सा एक पैगाम हो तुम ।
ज़ुल्फ़ों में सिमटी है एक काली घनी रात तुम्हारे ,
लबों पर सुर्ख लाली मानो सूरज की लालिमा लिए शाम हो तुम।।
किस मंदिर किस मस्जिद किस दर से मांगू मैं तुम्हे ,
मेरे लिए तो मेरा परवरदिगार मेरा भगवान् हो तुम ।
लोग कहते है तो कहते रहे काफ़िर मुझे " चौहान ",
मेरे लिए तो मेरी मंज़िल मेरा मुकाम हो तुम ।।
कैसे दूर कर दूँ भला तुमको खुद से ,
मेरा वजूद मेरी पहचान हो तुम ।।
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां
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