जब सामने ना हो तुम ,
तो आँखों को करार कहाँ...
जब जिक्र ना हो तेरा,
तो बातों में क़रार कहाँ ..
जब खाव्बों में ना हो तुम,
तो नींदों में क़रार कहाँ ..
जब जज़बातों में ना हो तुम,
तो इश्क़ में करार कहाँ ...
जब मरहम ना बनो तुम ,
तो इन ज़ख्मों में क़रार कहाँ..
जब "चौहान" तेरे अलफ़ाज़ ही नहीं मेरे नाम,
तो "मेरी कलम"- "दिल की जुबां" कहाँ..
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां

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