Monday, 30 December 2019

"साल के आखिरी पन्ने" ( SAAL KE AAKHIRI PANNE)


बड़ी ख्वाइशें , बड़ी उम्मीदें थी,
अच्छा भी नही ,बुरा भी नही,
कुछ ले गया तो कुछ दे गया,
ये साल जैसा भी रहा,
कुछ लम्हे क़ीमती दे गया।।

कुछ अपने बेगाने हो गए,
कुछ गैरों ने दिल मे घर कर लिया,
कुछ आँखो से जज़्बात बह गए,
कुछ खुद को ही कह के रह गया,
ये साल ....

सोचा तो बहुत था मगर,
हमें कुछ भी ख़बर ना थी,
जो मुझे पहचान ले भीड़ में,
ऐसी भी नजर ना थी,
कोशिशें लाख की मगर,
एक आईना टूटा ही रह गया,
ये साल ....

नज़राना भी ऐसा मिला ,
जिसकी उम्मीद नही थी,
तुझे भी माँग लेता खुदा से,
शायद मैंने ही जिद्द नही की,
एक हाथ भरा खुशियों से,
एक खाली का खाली ही रह गया,
ये साल...

कभी हाल लिखकर सुनाऊँगा तुझे,
कभी खुद से मिलवाऊँगा तुझे,
फिर कभी मेरे होकर पढ़ना मुझे,
हर लफ्ज़ में नज़र आऊँगा तुझे,
सोचा था इस साल ना लिखूँगा तुझे,
ये ख़्वाब भी अब ख़्वाब ही रह गया,
ये साल....

शिकायत खुदा से भी नही कर सकता,
बिन मांगे दिया उसने मैं मुकर नही सकता,
अब तुझे कहानियों में याद कर लूँगा मैं,
एक दिन "चौहान" खुद मैं कहानी बन जाऊँगा,
मिटा कर सारे जमाने के मोह,
आ देख बनकर तेरा मैं जोगी रह गया,
ये साल जैसा भी रहा,
कुछ लम्हे क़ीमती दे गया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 28 December 2019

"कल" (KAL)


अब रो लेने दे जी भर के तेरे सीने से लग के,
कल जब कहीं मिले तो फिर बस बात होंगी।।

आज वक़्त भी अपने साथ है भले दो पल का है,
कल कहीं मिले तो मज़बूरियां भी साथ होंगी।।

बस जहन में होंगे वो इश्क़-ए-लम्हात अतीत बनकर,
कल तो बस इन आँखो से जमकर बरसात होंगी।।

एक ख़्वाब टूट गया तो एक मुक्कमल भी हुआ है,
हाँ सच अब भी रात भर तन्हाइयों से बात होंगीं।।

एक कमी रही मुझमें की तुझे एहसास ना करा सका,
ख़ैर तुझे भी तो मेरे जैसी मुहोब्बत किसी के साथ होगी।।

अब तो कुछ लिखने को भी ना रहा ज़िंदगी मे "चौहान",
इश्क़ कब्र तक ले आया आज मिट्टी की मिट्टी से मुलाकात होगी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 27 December 2019

"ऐसे शक्श" (AISE SHAKSH)


जाने वाले फिर कहाँ आते है,
बस एक याद बन जाते है,
बड़ा अजीब खेल है खुदा का,
एक ख़्वाब पूरा तो बाकी टूट जाते है,
मैं मौसम की तरह तो नही बदला,
पर हक़ीक़त है ये भी,
पतझड़ में कहाँ पत्ते नए आते है,
सूखे दरख़्त पर एक पत्ता हरा सा मैं,
कहाँ तक अपने वजूद को बचा पाते है,
सब आये इस ज़िंदगी मे एक तेरे सिवा,
गलत कहते है कि इश्क़ करने वाले मिल जाते है,
आज मेरी खामोशियाँ चुभ रही है सबको,
कहते है तेरी बातों के पल बहुत याद आते है,
उसने हर कहीं देखा मुझे एक खुद को छोड़कर,
शायद अनजान था के प्यार करने वाले ,
दिल मे बस जाते है,
कोई जाओ उसे बतला दो इश्क़-ए-कहानी का अंज़ाम,
जो इश्क़ में हार जाते है,
वो आँखो में उदासी, लबों पे ख़ामोशी,
और चहरे पर मुस्कान लिए,
चलती साँसों के साथ "चौहान" खुद को दफ़न कर जाते है।।
रहते है सबके दरमियाँ पर देख ज़रा,
ऐसे शक्श कहाँ लौट कर आते है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 25 December 2019

"मुहोब्बत लिखना" ( MUHOBBAT LIKHNA)


अब मैं मुहोब्बत लिखना छोड़ दूँगा,
अब इन बाज़ारो में बिकना छोड़ दूँगा।।

तुझे ही मुबारक हो तेरी ये राहे ये मंज़िले,
अब मैं साये सा तुझे दिखना छोड़ दूँगा।।

अगर पूछा कभी किसी ने मेरी ख़ामोशी का राज़,
कसम खुदा की मैं नाम तुम्हारा लिखना छोड़ दूँगा।।

मैंने कब कहा कि ये सफर यही तक था,
तुमने खुद ही सोच लिया मैं रिश्ता तोड़ दूँगा।।

तुम कहाँ तक सच्चे थे अपने इश्क़-ए-ईमान के,
आमने सामने सवाल कर तेरा गुमाँ भी तोड़ दूँगा।।

बेमतलबी इबादत थी मेरी इसका भी मतलब था,
खुदा ना मिला तो क्या मैं इबादत ही छोड़ दूँगा।।

ये इश्क़-मुश्क, प्यार वफ़ा , सब कुछ तो झूठ फरेब है,
जिस्मों को पाना इश्क़ है तो दिल लगाना ही छोड़ दूँगा।।

हर एक अपने तो खंज़र घोपा है पीठ पर मेेरे,
"चौहान" अब सबसे अपना पेश आना ही छोड़ दूँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 23 December 2019

"बेहतर है" (BEHTAR HAI)


कई दफा मंज़िलों को छोड़,
रास्तों का हो जाना बेहतर है।।

जरूरी नहीहर सवालों का जवाब दे,
खामोशी को जवाब बनाना बेहतर है।।

मैं इस मोड़ पर आ गया हूँ इश्क़ में,
अब तो खुद को मिटाना ही बेहतर है।।

कहाँ शायरों की ज़ुबाँ समझ आएंगी ,
अब कलम ना ही उठाना बेहतर है।।

रोज़ खुद की तलाश में निकल पड़ता हूँ,
अपनो से अपना पेश ना आना बेहतर है।।

इंसानियत तो पहले ही दम तोड़ चुकी है,
पत्थरों पर सिर झुकना ही बेहतर है।।

अब सबसे किनारा कर लिया "चौहान",
खुद को हमराज़ खुद का बनाना बेहतर है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम -दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 20 December 2019

"तरसेगा" (TARSEGA)


जिस रोज़ खुद को लिखूँगा तुझपर कहर बरसेगा,
सुन कहानी मेरी ये आसमाँ इस ज़मी को तरसेगा।।

तब आना खुदा तू भी सुनने किस्से- कहानी मेरी,
तेरे इन बादलों से पानी नही फिर सैलाब बरसेगा।।

तूने तो बस देखा है मैं तो गुज़रा हूँ उस हाल से,
जब तुझ पर गुज़रेगी तो मौत पाने को तरसेगा।।

आज तेरे क़रीब हूँ तो तुझे कदर नही मेरी मेरे जज़्बात की,
जब चला जाऊँगा दूर तुझसे तो एक झलक को तरसेगा।।

क्या हुआ आज महज़ मजाक लगते है ख़्वाबो के घर मेरे,
जब बनेगें आशियाँ ख्वाबों के तो अंदर आने को तरसेगा।।

यकीन मान पढ़कर रोएगा बहुत किस्से मेरी किताब के,
यकीन मान मेरा फिर अपने अतित में जाने को तरसेगा।।

कुछ बताऊँगा कुछ जला कर राख कर लूंगा संग अपने,
फिर अंज़ाम जानने को "चौहान" ये पूरा जहान तरसेगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 19 December 2019

"रात-ब-रात" (RAAT-B-RAAT)


अब तो रात-ब-रात मुश्किल हो रही है,
नींद आँखों से औझल हो रही है,
अभी कशमकश हो गयी है जिंदगी,
ना क़रीब आ रही है ना दूर हो रही है...
अब तो रात-ब-रात......

एक सैलाब सा उठता है इस दिल मे,
एक दरिया खामोश है इन आँखो में,
ना जाने कैसी रूह से जिस्म की अनबन हो रही है,
एक लौ है जो जल रही है और बुझ रही है...
अब तो रात-ब-रात......

यूँ तो पूरा गुलिस्तां सजा है फूलों से,
बस एक फूल की ही कमी है,
अब होश में ना आऊँ तो ही बेहतर है,
इस ज़िंदगी से तो सच मौत भली है,
अब तो हँसी भी मेरी छुप-छुप कर रो रही है,
अब तो रात-ब-रात......


कुछ समझ आये तो जज़्बात जमाने को बताऊँ,
कुछ नज़र आये तो राह में चलता चला जाऊँ,
अब बस ज़ुबाँ खामोश हो रही है,
धीरे धीरे "चौहान" ये रूह मिट्टी मिट्टी हो रही है,
अब तो रात-ब-रात......


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 17 December 2019

"छोड़ दे" (CHHORD DE)


कोई अश्क़ों से कहदे आँखो में आना छोड़ दे,
दिल को कहदे अब तड़पाना छोड़ दे,
अब और नही सहे जाते ये घाव रिश्तों के ,
कोई मरहम लगा खुदा,नासूर बनाना छोड़ दे,
इन बारिशों को समझाओ रोने का बहाना ना दे,
करीब उसे ला जो मेरा है ,
बेगानों को मेरा बनाना छोड़ दे,
डूब जाने दे गर डुबोना है तो ,
यूँ तिनको का सहारा ना दे,
हर रोज़ खुद की तलाश में निकल पड़ता हूँ,
अब मुझे ख्वाइशों ख़्वाबों का इशारा ना दे,
कोई जाकर उसे कहदे अब याद आना छोड़ दे,
मेरे हाल से बखूबी वाकिफ़ हूँ मैं मगर,
कोई आकर मुझे कहदे "चौहान",
अब मुर्दों को जगाना छोड़ दे,
ये जो दिल मे तू श्मशान लिए फिरता है,
जला कर राख कर ख्वाइशें को दफनाना छोड़ दे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 14 December 2019

"जैसा है ठीक है" ( JAISA HAI THEEK HAI)


मैं और तू ,चल!!
जैसा है ठीक है।।

मेरे गम तेरी खुशी,
चल!! जैसा है ठीक है।।

तेरे लबो की हँसी,
मेरी आँखों की नमी,
तू अच्छा सही ,
मैं बुरा ही सही,
चल!! जैसा है ठीक है।।

मेरी हार सही,
तेरी जीत सही,
चल!! जैसा है ठीक है।।

मेंरा झूठ तेरा सच,
कुछ घाव और ये वक़्त,
चल!! जैसा है ठीक है।।

मेरी ज़ुबाँ जैसे ख़िलाफ़त,
तेरी बेअदबी जैसे लियाक़त,
चल!! जैसा है ठीक है।।

अब "चौहान" थोड़ा मगरूर है,
मतलबियों से बहुत दूर है,
जहाँ वफ़ा मिली वहाँ सिर झुकाया,
जहाँ दगा हुआ उन्हें माफ किया,
जो करीब है वो कोहिनूर है,
जो दूर है वो अब बस दूर है।।

वक़्त का लिखा सामने सबके आएगा,
क्या खोया क्या पाया वक़्त बताएगा,
उम्रभर के रास्ते है तो क्या हुआ,
मंज़िल कौनसा हमसे दूर है।।

ये वक़्त, ये मौसम,
ये रास्ते , ये मंज़िल,
ये तन्हाई, ये रुसवाई,
चल!! जैसा है ठीक है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Friday, 13 December 2019

"ज़िम्मेदारी " (ZIMMEDARI)


ज़िंदगी हर मोड़, हर राह पर सिखाती है,
उम्र से पहले भी हालातों से लड़वाती है,
कोई बचपन कोई जवानी भुल के बैठा है,
लोग कहते है शादी के बाद जिम्मेदारियाँ आती है।।

कोई दो वक्त की रोटी की तलाश में मज़बूर है,
कोई घर की खातिर अपने ही घर से दूर है,
अपने ही घर मे उन्हें मेहमानों सा बनाती है,
लोग कहते है शादी के बाद जिम्मेदारियाँ आती है।।

माना घर के लोग चार से पांच हो जाते है,
इन्होने अपना घर बसा लिया ये अल्फाज़ कहे जाते है,
हाँ बस राह की कठिनाइयाँ बढ़ जाती है,
लोग कहते है शादी के बाद जिम्मेदारियाँ आती है।।

किसी को माँ बाप के इलाज की फिक्र थी,
किसी को रात के खाने की फिक्र थी,
किसी की आँखें घर जाने को तरस जाती है,
लोग कहते है शादी के बाद जिम्मेदारियाँ आती है।।

कोई उम्र ना थी ये उसके काम करने की,
यूँ हँसती खेलती ज़िंदगी हराम करने की,
"चौहान" की कलम से फिर बगावत नज़र आती है,
लोग कहते है शादी के बाद जिम्मेदारियाँ आती है।।

उसका भी बचपन हँसी खेल में गुज़रता,
यूँ मज़बूरियों के बोझ तले ना दबता,
सोच देख जमाने की फिर कलम उठानी पड़ जाती है,
लोग कहते है शादी के बाद जिम्मेदारियाँ आती है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 11 December 2019

"माफ कर" (MAAF KAR)


कब तक खुद को जलाऊँगा मैं,
अंधेरो में रौशनी दिखाऊंगा मैं,
ये फलक ,ज़मी मेरा कुछ नही,
तुझे किस जगह ठहराऊंगा मैं,
अब टूटा बिखरा साज़ हूँ मैं,
खामोश सी आवाज़ हूँ मैं,
पहुँचे खुदा तक बादलों को चीर के,
ऐसी सदा कहाँ से लाऊँगा मैं,
क्यों सबका एक सवाल है,
जिसका तू जवाब है,
तुझे गलत मैं कह नही सकता,
जमाने को सच क्या बताऊंगा मैं,
सूखे हुए दरख़्त सा मैं,
अब किसके काम आऊँगा मैं,
तेरी छुवन से हरा हो जाता,
अब तो बस जलाया ही जाऊँगा मैं,
रोक लेने दे जज़्बात अपने,
कहीं लिख ना दूँ हालात अपने,
हर किस्से में तो ज़िक्र तेरा है मगर,
कब तक "मेरी कलम-दिल की ज़ुबाँ" बनाऊँगा मैं,
बात तुझ तक कभी आने नही दूँगा,
तेरे चेहरे पर उदासी छाने नही दूँगा,
अब लिखना लिखाना बहुत हुआ,
सब राज़ अपने साथ दफन कर जाऊँगा मैं,
चल अब तो इंसाफ कर,
सब गिले-शिकवे माफ कर,
अब हाल-ए-दिल लिखा नही जाता,
बस,अब "चौहान" को माफ कर।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 9 December 2019

"तुझे याद" (TUJHE YAAD)


क्या ये उम्र युहीं गुज़र जाएगी,
क्या ये ख्वाइशें यूँही मर जाएंगी,
तुझे याद करते करते,
तेरी राह देखते देखते।।

दिल के पलते उन अरमानों का क्या,
आंखों के सागर में तूफानों का क्या,
क्या ये एक दिन सहरा बन जाएंगी,
तुझे याद करते करते,
तेरी राह देखते देखते।।

उन टूटे रिश्ते नातों का क्या,
उन बिखरे काँच से वादों का क्या,
क्या लाश बन मुझमे दफन हो जाएंगे,
तुझे याद करते करते,
तेरी राह देखते देखते।।

अब लिखना लिखाना भी क्या,
अब सुनना सुनाना भी क्या,
"चौहान" एक रोज़ कलम भी मर जाएगी,
तुझे याद करते करते,
तेरी राह देखते देखते।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



Thursday, 5 December 2019

"अब बस और नही" (AB BAS AUR NHI)


बहुत उठा ली आवाज़े अब खुद हाथों में हथियार उठाओ,
किलकारियां चिल्लाहटों में बदले उस से पहले संभल जाओ।।

अब आवाज नही अस्त्र उठाओ,
अपनी अस्मत खुद बचाओ ,
बहुत हो गया लोक-लिहाज़ ,
अब दुर्गा से चण्डी बन जाओ।।


इन दीवारों में तू ही क्यूँ रहेगी,
ये दर्द सारे तू ही क्यूँ सहेगी,
नज़रे तो बुरी जमाने की है ,
फिर घूंघट में तू क्यूँ रहेगी,
शाम से पहले घर क्यों आना होगा,
बाहर निकलते तुझे क्यों घबराना होगा,
क्यूँ तू किसी और पर निर्भर रहेगी,
अपनी आवाज़ दबा कर तू चुप क्यूँ रहेगी,
कब तक ज़िम्मेदारी के बोझ में दबती रहेगी,
कब तक संस्कारों के लिहाज में पिसती रहेगी,
आत्मरक्षा में खुद हथियार उठाने होंगे तुझे,
काली बन कब तक तू गौरी बनकर रहेगी,
कर सँहार जो हाथ उठाये अस्मत पर तेरी,
फिर लाल रक्त से इंसानियत की ज़मी हरी होगी,
छोड़ अब बात बात पर अश्क़ बहाना,
अब तुझे खुद आगे आना होगा,
हैवानियत में जन्मे हैवानों का फिर,
बन चण्डी रक्त बहाना होगा,
अपने अस्तित्व का परचम तुझे,
खुद लहराना होगा,
जो बरसों से झुकी रही,
उन नज़रो को उठाना होगा,
जो कभी दहक ना पाया,
वो ज्वालामुखी सुलगाना होगा,
हाँ ज़िम्मेदार है हम इन हालातों के,
कहीं ना कहीं गुनहगार भी है,
यूँ सड़को पर उतर के कुछ ना होगा,
यूँ घर मे छुपकर कुछ ना होगा,
बात मान "चौहान" की ,
तेरी आबरू अस्मत की खातिर,
शस्त्र तुझे खुद उठाना होगा,
कान्हा का इंतजार ना कर,
वो कलयुग कोई और था,
ए द्रोपदी मेरी बात सुन,
यहाँ शस्त्र तुझे खुद चलना होगा,
मोमबत्ती जला कर कुछ ना होगा,
अब तुझे हथियार उठाना होगा,
अब तुझे हथियार चलाना होगा,
अपनी अस्मत आत्मसम्मान को,
तुझे खुद बचाना होगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"सच्ची मुहोब्बत" (SACCHI MOHABBAT)


क्यों कहानियां अधूरी रह जाती है,
क्या इबादत में फिर कमी रह जाती है,
जिनको भी होती है सच्ची मुहोब्बत "चौहान",
क्यों वो एक तरफा होकर रह जाती है।।

तेरी कायनात में इश्क़ का कोई मुकाम नही है,
क्यों मुहोब्बत का हकीकत में कोई नाम नहीं है,
क्यों जिस्मों तक सिमट कर रह गया इश्क़,
क्यों हवस जिस्मों की मुहोब्बत बनकर रह जाती है।।

मैं नही कहता कि मेरी पाक मुहोब्बत है,
राधा कृष्ण के जैसी इश्क़-ए-इबादत है,
पर इतना जरूर है कि करता मुहोब्बत हूँ,
वो नही जो हर किसी हुस्न पर बदल जाती है।।

कोई इश्क़ का भी अपनी कलम से मुकाम लिख,
सच्ची मुहोब्बत का भी कोई नेक अंजाम लिख,
"चौहान" के लिखने से तो सोच भी नही बदलती लोगों की,
सुना है तेरे लिखने से लोगों की तकदीर बदल जाती है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 1 December 2019

"रहने दो" ( RAHNE DO)


अब चलो ठीक है जो भी हुआ रहने दो,
आँसू बहाने लाज़मी नही सबके रहने दो।।

कही ना कही गुनहगार हम भी है हालातों के,
मोमबत्तियां बुझी ही ठीक बुझी ही रहने दो।।

दो दिन की गर्मी है बस हालतों का ज़ोर है,
यूँ तैश में ना आओ नरमी ही रहने दो।।

हैवानियत इंसानियत की हदों से आगे है,
खुद को अब राम ना बनाओ रहने दो।।

जिस्म की भूख थी चलो बुझ गयी होगी,
यूँ ज़िंदा तो ना जलाओ चलो रहने दो।।

आज फिर एक बार ख़िलाफ़त में देश उतरा तो क्या,
ये झूठी हमदर्दी ना दिखाओ अब चलो रहने दो।।

होगा कश्मीर आज तुम्हारी सल्तनत में साहब,
इन हालतों पर भी एक नज़र लाओ चलो रहने दो।।

रात, कपड़े, जात, हालात किस का बहाना दोगे,
अगर यही है संस्कृति संस्कार तो चलो रहने दो।।

बहुत हुई बातें अब कुछ तो कानून बनाओ,
हवस की आग में यूँ न झुलसाओ, चलो रहने दो।।

एक नज़र भर देख ले "चौहान" अपने किरदार में,
यूँ लिख कर बातें ना समझाओ ,चलो रहने दो।।

कल भी यही थे देश मे हालात आज भी यही है ,
यूँ चौक पर इज्ज्ज़ते नीलाम ना करवाओ ,चलो रहने दो।।

गर हश्र यही होना है तो फिर खुद ही दफन कर दो,
यूँ किसी का खिलौना ना बनाओ चलो रहने दो।।

नासमझों की टोली में सब समझदार बने बैठे है,
खामोशी रख "चौहान" हमे ना समझाओ, चलो रहने दो।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...