Saturday, 31 March 2018

"छोड़ दिया" (CHORD DIYA)


उन्होंने पूछना छोड़ दिया,
हमने बताना छोड़ दिया,
जब इश्क़ उन्हें मज़बूरी लगने लगा ,
हमने जाताना छोड़ दिया ।।

वादे भी सच्चे थे ,
इरादे भी पक्के थे ,
जब मज़बूरी बन गए रिश्ते ,
हमने निभाना छोड़ दिया ।।

पास वो आना नही चाहते थे ,
दूर हम जाना नही चाहते थे ,
जब वो ढूँढने लगे बहाना,
हमने करीब आना छोड़ दिया।।

कुछ जज़्बात हमारे भी थे ,
कुछ ख़यालात हमारे भी थे ,
जब महज़ बातें लगी उनको,
हाल-ए-दिल हमने बताना छोड़ दिया ।।

आँखों में हमारे भी नमी थी ,
ज़िन्दगी में हमारे भी कमी थी ,
जब बेपरवाह हुए वो हमसे ,
हमने भी अश्क़ बहाना छोड़ दिया।।

कुछ ख़्वाब हमने भी पाले थे,
तेरे गम हमने भी संभाले थे ,
जब सौंगत लगने लगे तेरे दिए ज़ख्म,
मरहम हमने भी लगाना छोड़ दिया ।।

लिखा हमने भी बहुत कुछ था ,
कहा हमने भी बहुत कुछ था ,
जब अनदेखा करने लगे वो "चौहान"
हमने भी लिखना-लिखाना छोड़ दिया।।

आज आलम ये है के तन्हा हम है ,
तन्हा वो है हमारी यादों में ,
जबसे हो के गए है वो हमारी कब्र से ,
सुना है मुहोब्बत की गलियों में अब जाना छोड़ दिया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 30 March 2018

"एक रात " (EK RAAT )


एक रात जाग के काटी,
कुछ ख़्वाब भी संग जागे थे।
मुझसे मेरे जज़्बात कुछ,
दो चार कदम ही आगे थे ।।

ना जाने कैसी चाहत की ,
दिल में चादर बुनते थे ।
बुनी थी ये जो चादर जिनसे ,
वो तेरे इश्क़ के कच्चे धागे थे ।।

लिपटा था दिल सहमा हुआ,
जो तूने दिए उन ज़ख्मो से ।
तेरे प्यार की आग में जल गए,
कुछ ख्वाब जो मैंने पाले थे ।।

अलफ़ाज़ बन के दर्द वो ,
जब कागज़ पर उतरता है ।
नासूर मेरे ज़ख्मो पर,
मुझे मरहम सा लगता है ।।

कहाँ से लाऊँ शाम और वो ,
छिपता सूरज पहाड़ों में ।
कहाँ से लाऊँ खुशबू वो ,
फूलों और बहारों में ।।

अब ना ऐसी चाहत है ,
सब भ्रम जाल के धागे थे ।
"चौहान" सब कुछ झूठा था,
क्या कसमे थी क्या वादे थे ।।

कहती रही बस मेरी कलम ,
वो बस जिस्मों के नाते थे ।।

एक रात जाग के काटी,
कुछ ख़्वाब भी संग जागे थे।
मुझसे मेरे जज़्बात कुछ,
दो चार कदम ही आगे थे ।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



Wednesday, 28 March 2018

"फिर कहाँ वो " (PHIR KAHAN WO )


ना पहले जैसे हम रहे , ना पहले जैसे तुम होगे,
अब कहाँ वो फिर पहले जैसे हालात होंगे।।

चलना तो आज भी है उन्ही रास्तों पर ,
पर कहाँ हर कदम अब वो साथ होंगे ।।

मिलेंगे लाखों हमसफ़र उनको भी हमको भी ,
पर कहाँ किसी के साथ ऐसे जज़्बात होंगे ।।

बातें तो कर लोगे आज भी पहरो किसी से ,
पर कहाँ वो सुकूँ दिलाते एहसास होंगे ।।

लिखता रहेगा उम्र भर "चौहान" तेरे लिए ,
हम न होंगे तो कहाँ फिर बोलते ये अल्फ़ाज़ होंगे ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Tuesday, 27 March 2018

"रौनकें" (ROUNKEN)



रौनकें है बेपनाह तेरे दिल में ,
सुनसान मेरे दिल की गली है।।

ज़िन्दगी तो दोनों के पास थी मगर ,
तेरी आफ़ताब सी चमकी ,मेरी शाम सी ढली है ।।

क्या वफ़ा क्या मुहोब्बत क्या शिकवे -गिले तुमसे,
रूह कबकी मर चुकी है साँसें है जो बेवज़ह इतनी चली है ।।

अब क्या करेंगे मंज़िलों को पाकर तुम्हारे बिना ,
साथ तुम थे तो साथ ये बहार-ए-फ़िज़ा भी चली है ।।

क्या करूँ अब बना के वो रंगों की होली , दीपों की दीवाली,
मेरी चिता के साथ मेरे अरमानों की तो राख भी जली है ।।

तू ना मिला बाकी सब मिला इस ज़िन्दगी में "चौहान",
तेरी कमी तो मुझे आते जाते हर सांस में खली है ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 26 March 2018

"उन दिनों की बात " (UNN DINO KI BAAT)


आँखों में नमी लिए ,सहमे-सहमे कुछ जज़्बात है,
हो सकता है भुल गये तुम ,ये उन दिनों की बात है।।

रातों को ना नींद थी , दिन को ना करार था ,
एक दूजे में गुम थे हम ,इश्क़ का ख़ुमार था ।।

सदियों सा मुझको तो तेरे बिन पल पल लगता था ,
मेंरे बिन जीना तो तूझको भी सजा सा लगता था।।

अपनी हाथों की लकीरों में तुम मेंरे नाम को ढूंढा करते थे,
बैठ अकेले चाँद में  हम तेरे अक्ष को देखा करते थे ।।

माना के आज खुशियों के सवेरे है तेरी ज़िन्दगी में ,
"चौहान" के लिए तो उम्र भर वो गम की काली रात है।।

कुछ वादे किये थे तुमने हाथों में हाथों को लेकर,
माना अब वो तुम्हारे लिए महज़ एक गुज़री बात है ।।

हो सकता है भुल गये तुम ,ये उन दिनों की बात है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 25 March 2018

"वक़्त"(WAQT)


वक़्त बनकर आये थे वो ,
और वक़्त की तरह निकल गए ।।

जिन आँखों में बसे थे हम,
अश्क़ बनकर उन्ही आँखों से निकल गए ।।

रूह बन कर समाये थे मेरे जिस्म में  ,
बेजान कर हमें एक पल में निकल गए ।।

ख़्याल बनकर आये थे ज़हन में ,
जज़्बात बनकर लबों से निकल गए ।।

"चौहान" मरहम बन के आये थे वो ,
 ज़ख्मो को नासूर बना के निकल गए ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 24 March 2018

"रंगत"(RANGAT)


तेरे इश्क़ की रंगत में इस कदर रंग जाऊँ,
हो के फ़ना तेरे इश्क़ में , लाल चोला कर जाऊँ।।

हो फिक्र ना नींद खुल जाने की , ख्वाब सारे टूट जाने की,
तेरी बाँहों की आगोश में कुछ ऐसी नींद सो जाऊँ।।

छा जाए कितनी भी काली घटाएं, दिखा ले मौसम भी अपने तेवर,
तेरे प्यार के आसमाँ में आज बेख़ौफ़ उड़ता जाऊँ।।

ना फ़िक्र हो लहरों से टकराने की , ना तूफ़ाँ में ग़ुम जाने की,
तेरे आँखों के गहरे सागर से तेरे दिल में उतर जाऊँ।।

तुम हर्फ़ हो मैं बात बनु, तेरी कलम से निकले जज़्बात बनु,
मिटा ना सके जिसे कोई "चौहान" वो रूह बन तेरे जिस्म में उतर जाऊँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Wednesday, 21 March 2018

"इश्क़-ए-बाज़ार" (ISHQ-E-BAZAAR)


मैं चलकर तुमसे आगे जाता भी तो कहाँ तक जाता,
जब मेरी मंज़िल ही तुम हो ।
ये कश्ती मुहोब्बत की चलता भी तो कहाँ तक चलता,
जब मेरा साहिल तुम हो ।।
कहते हो तुम साथ रह लोग पर पास नही ,
कैसे मान लुँ ये समझोता तेरे दिल के जज़्बात नही ,
मेरा इश्क़ है रूहानी जहाँ जिस्मों की कोई औक़ात नही ,
कहाँ से लाऊँ अलफ़ाज़ वो जिसमे हो तेरी कोई बात नही ,
जा जाने कितनी किताबों में लिखा तुझे अलफ़ाज़ बना ,
ना जाने कितने गीतों में गाया तुझे अंदाज़ बना ,
कहते है रब की तराशी हर मूरत अनमोल है जहाँ में ,
तू बता कैसे ना बिकता "चौहान" तेरे इश्क़-ए-बाज़ार में ,
भाव कोड़ियों के भी बिक जाऊंगा अगर खरीदार तुम हो ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ



"मुहोब्बत-ए-दास्ताँ" (MUHOBBAT-E-DASTAAN) )


एक ऐसी मुहोब्बत-ए-दास्ताँ,
ना किसी ने सुनी , ना किसी ने देखी,
ना कुछ पाया , ना ही कुछ खोया ,
एक ऐसा एहसास जिसमें जिया और खुद को मरा हुआ पाया ,
लबों पर हँसी, आँखों पर अश्क़ों के निशान,
एक ऐसी मुहोब्बत-ए-दास्ताँ।।

तोडूं तो टुटे ना , छोड़ू तो छूटे ना, धागा तेरे इश्क़ का ,
जैसे मैं तेरा जिस्म और तू मेरी जान,
नाम लूँ जब तेरा तो इबादत,
दीदार हो तेरा तो इनायत ,
जैसे तू मेरा खुदा ,तू ही पहचान,
एक ऐसी मुहोब्बत-ए-दास्ताँ।।

जिसमें ना उसने थामा ,ना ही छोड़ा,
मंज़िल कभी मिलने नही थी रास्ता भी ना छोड़ा,
क्या मिला "चौहान" तुझे भी यूँ होके बेज़ुबान,
एक उसी को चाहा, उसी को पूजा ,
उसी को माना , उसी को माँगा ,
अब तो वो ही मेरा घर मंदिर वो ही शमशान,
एक ऐसी मुहोब्बत-ए-दास्ताँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Tuesday, 20 March 2018

"एक नज़रिया" (EK NAZARIYAA)


बड़ी मतलब की दुनिया है ,
हर कोई अपने मतलब से नापता है ।।

अपने नज़रिये से सोचते है सब ,
हर कोई मुझे वैसा ही जनता है।।

मज़हब की बात करते है लोग मेरे ,
नहीं समझते इंसान है इंसानियत को मानता है ।।

मशरूफ है डूंढ़ने में वो मेरी कमियाँ,
कौन है यहाँ जो खुद के बारे में जानता है ।।

झूठी दुनियां में सुकून आता है यहाँ सबको ,
सच के आईने से डरकर हर कोई भागता है ।।

तू लिख ले "चौहान" क्या होगा कागज़ काले करके ,
कहाँ होगा हर कोई यहाँ जो अल्फ़ाज़ों से तेरे दिल का हाल जनता है ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ



Thursday, 15 March 2018

"फिर याद मेरी " (PHIR YAAD MERI)


कही बैठ अकेले में वो अश्क़ बहा रही होगी ,
फिर याद उसे मेरी आ रही होगी ।।

आती जाती हवाऐं ज़ुल्फों को छु कर गुज़र जा रही होंगी ,
बार बार उसके चेहरे पर आ ज़ुल्फें उसे सता रही होंगी ,
अपने चेहरे से जब वो बिखरी लटों को हटा रही होगी ,
फिर याद उसे मेरी आ रही होगी ।।

महफ़िलों का शोरोगुल जब उसे भाता ना होगा ,
उदासियों भरा आलम दूर जब जाता ना होगा ,
फिर कहाँ उसे किसी की बात सुकून दिला रही होगी ,
फिर याद उसे मेरी आ रही होगी ।।

बहुत सताता होगा वो तन्हा रात का अँधेरा ,
बहुत रुलाता होगा वो दिल में मेरी यादों का फेरा,
अब कहाँ "चौहान" तेरी कलम उसे हाल-ए-दिल बता रही होगी,
फिर याद उसे मेरी आ रही होगी ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Wednesday, 14 March 2018

"पहले जैसा प्यार" (PEHLE JAISA PYAR)


आज के ज़माने में ही सही ,पर किया है मैंने तुझसे ,वो पहले जैसा प्यार,
चिट्ठियों में भेजा करते थे जज़्बात और फिर एक लंबा इंतज़ार,
दिल में बेचैनी, एक डर ,तेरे जवाब की खातिर दिल बेक़रार,
जिस्म की तो कोई बात ही नही थी वही रूह से रूह वाला प्यार,
आज के ज़माने में ही सही......

एक अरसा गुज़र जाता था तेरे दिदार की खातिर,
इबादतें होती थी एक दूजे के प्यार की खातिर ,
छुप-छुप कर ख़ामोश एक दूजे को देखा करते थे ,
आँखों ही आँखों में पहरों बातें किया करते थे ,
ठीक वैसा ही प्यार .....
आज के ज़माने में ही सही ......

दिल से दिल को एक विश्वास का धागा बंधता था,
रिश्ते की पवित्रता तो तेरा भगवान और मेरा अल्लाह जानता था ,
जब शिकायतें कम प्यार में चाहतें ज़्यादा हुआ करती थी ,
ठीक वैसा ही प्यार .....
आज के ज़माने में ही सही ......

जब दूर होकर भी एक दुजे के पास रहते थे ,
खुशियां और गम हम साथ मिलकर सहते थे ,
जब "चौहान" एक झलक पाकर रब का दिदार हो जाता था,
ठीक वैसा ही प्यार .....
आज के ज़माने में ही सही ......

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Thursday, 8 March 2018

"फैसला" (FAISLA)


तेरे बिना मुझे जीना नही मरना है ये मेरा फैसला है,
तू मेरे साथ होकर भी साथ नही बस यही गिला है ।।

फरियाद करनी आती है मुझे वही की है हरपल तुझसे ,
गम तो ये है की आप एक पल को भी नही सुनते।
अब  दिल में जो उठ रहा है यूँ यादों का ज़लज़ला है,
तेरे बिना मुझे जीना नही मरना है ये मेरा फैसला है।।

रास्तों से लौट कर आना मेरी फितरत नही है ,
क्या हुआ अगर मंज़िल-ए-मुहोब्बत मेरी किस्मत में नही है,
तेरा दिया हर ज़ख़्म मेरी मुहोब्बत में वफा का सिला है ,
तेरे बिना मुझे जीना नही मरना है ये मेरा फैसला है।।

मेरी कलम में को कैसे बताऊ के ज़िक्र तेरा ना करे,
नादाँ-ए-दिल कहाँ से लाऊँ जो फिक्र तेरी ना करे ,
"चौहान" का तो बस तुझसे उम्र भर का दर्द-ओ-गम मिला है ,
तेरे बिना मुझे जीना नही मरना है ये मेरा फैसला है।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Monday, 5 March 2018

"सोचता हूँ " (SOCHTA HOON)


हर रोज़ खुद से ये सवाल करता हूँ ,
क्यों तेरे लिए अपना जीना मुहाल करता हूँ ।।

सोच लेता हूँ अब जी लूँगा तेरे बिना,
न जाने फिर क्यों तुझे पाने को मरता हूँ।।

सोचता हूँ की छोड़ दूँ फिक्र करनी अब तेरी,
फिर ना जाने क्यों तेरी खातिर अपना बुरा हाल करता हूँ ।।

सोचता हूँ छोड़ दूँ अब तेरी यादों मे रहना ,
फिर न जाने क्यों जेहन मे तेरे ख़यालात रखता हूँ ।।

सोचता हूँ छोड़ दूँ बयान करना हाल-ए-दिल,
ना जाने क्यों "चौहान" बार बार तेरा नाम लिखता हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Friday, 2 March 2018

"पहलू ज़िंदगी का "(PEHLU ZINDAGI KA )


ज़िन्दगी के हर पहलु को बदलते देखा है ,
उम्र को वक़्त से पहले ढलते देखा है ।।

रहने दो मुझे , मैं अकेला ही ठीक हूँ ,
मैंने वक़्त के साथ अपनों को बदलते देखा है ।।

किस बात का अभिमान है दुनिया को न जाने ,
मैंने तो पल में जिस्म को राख होते देखा है ।।

कौन कहता है यहाँ कला का कोई मोल नही होता ,
मैंने तो यहाँ लोगों के ज़मीर बिकते देखा है ।।

ये तो खेल है तकदीर का तू क्या जाने ,
मैंने तो पत्थरों पर सर झुकते देखा है ।।

ये दौर है आज का झूठी शान-ओ-शौक़त का ,
दो गज़ ज़मीन पर खून को खून से लड़ते देखा है ।।

मनाने दो जशन उनको भी बेइमानी की जीत का ,
मैंने तो किनारो पर आके कश्ती को डूबता देखा है ।।

कब तलक रहेगा "चौहान" नाम तेरा इस जहाँ में ,
मैंने तो यहाँ अच्छे- अच्छों का वजूद मिटते देखा है ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Thursday, 1 March 2018

"ज़िंदगी" (ZINDAGI)


एक ज़िन्दगी ये भी है ,एक ज़िन्दगी वो भी थी ।
एक ज़िन्दगी तेरे बिन है , एक ज़िंदगी तेरे संग भी थी ।।

क्या हुआ रंग आज थोड़ा फीका है कल गहरा था ।
रंगत इश्क़ की तो आज भी है , और रंगत इश्क़ की कल भी थी ।।

क्या हुआ कल गुज़री तेरे संग थी , आज तारों के संग ।
रातें तो काली आज भी है और रातें तो काली कल भी थी ।।

क्या फर्क पड़ता है ख़ुशी है या किसी का गम,
आँखें नाम आज भी है और आँखें नम कल भी थी ।।

क्या हुआ कुछ मिला हमें या कुछ नही मिला ,
इबादत-ए-इश्क़ आज भी है ,इबादत-ए-इश्क़ कल भी थी ।।

क्या हुआ अगर आज हम ज़िंदा होके भी ज़िंदा नही,
साँसें तो चलती आज भी है ,और साँसें तो चलती कल भी थी ।।

और कोण पढता है "चौहान" मेरी कलम- दिल की ज़ुबाँ।
जज़्बात-ए-नज़म तो आज भी है ,जज़्बात-ए-नज़म कल भी थी ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...