Sunday, 30 June 2019

"महकदे का नशा" (MAHKADE KA NASHA)


नशे के अँधेरे में आज हस्ती अपनी मैं मिटा बैठा,
दो पल की ख़ुशी ख़ातिर, खुशियाँ अपनो की जला बैठा।।

कुछ ख्वाब मेरे थे तो कुछ मेरे अपनो के मुझे लेकर,
उम्मीद अपनो की तो मैं आज महकदे में डूबा बैठा।।

कभी बस आदतन थी आज ज़रुरत बन बैठी है मेरी,
इस ज़रुरत के पीछे तो मैं क्या कुछ ना लुटा बैठा।।

वो जिसने काबिल बनाया मुझे अपने पैरों पे खड़ा कर,
इज्ज़त मिला मिट्टी में उसकी,आंखे उसको दिखा बैठा।।

वो जो पर्दा गिराती रही हमेशा मेरी नादानियों पर,
आज हाथ अपना शान से उसी पर उठा बैठा।।

किसे पता था कफन खुद अपना सिल रहा हूँ मैं,
कब्र खोद अपनी आज खुद उसी कब्र में जा बैठा।।

वो आंखे देखती रही रास्ता घर आने का मेरे,
क्या कहूँ कि कैसे उन्हें ज़िंदा लाश मैं बना बैठा।।

एक अच्छा खासा खुशियों का संसार था मेरा,
महकदे के नशे मैं "चौहान" उसे नर्क बना बैठा।।

जो सोचते रहे कि उनका अभिमान बनके दिखाऊंगा मैं,
आज उनके गुरुर को ख़ाक कर मिट्टी में मिला बैठा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 29 June 2019

"मेरी कहानी" (MERI KAHANI)


चलो अब तुम्हे भी हक़ीक़त से रूबरू करवाता हूँ,
खामोश था सदियों से आज अपनी कहानी बताता हूँ।।

ज़्यादा बड़ी तो नही बस कुछ पन्नों में सिमट कर रह गयी ,
ठीक वैसे की कोई गम की बेल खुशियों के पेड़ से लिपट कर रह गयी।।

थोड़े बचपन के किस्से है थोड़ी जवानी की कहानी है,
दोस्ती मुहोब्बत से बनी ये मेरे अहसास की कहानी है।।

पहले ज़िन्दगी मेरे इशारों पर थी अब मैं ज़िन्दगी के इशारों पर हूँ,
बरसों पहले डुब गया था इश्क़-ए-सागर में आज लाश बन किनारों पर हूँ।।

हाँ मुहोब्बत भी की है किसी से हद से बढ़कर मैंने,
पर अब तलक जो लिखी वो सब कहानी बेगानी है।।

वो मुझे मिले या फिर मिलकर बिछड़ जाए सब किस्मत है,
पर ये मेल हमारा जिस्मों का नही ये इश्क़ रूहानी है ।।

हाँ जहाँ सही हूँ वहाँ अपने बड़ो, गुणकारो से भी लड़ा हूँ,
जहाँ गलत हूँ वहाँ मैंने शरेआम अपनी गलती भी मानी है।।

चार दोस्त बनाये थे मैंने , सब के सब कोहिनूर थे ज़िंदगी के मेरी,
एक हीरा खो दिया मैंने, दो मशरूफ़ है ज़िन्दगी में अपनी,एक में बसती मेरी ज़िंदगानी है।।

एक से दूर होकर भी कभी मैं दूर हो ना पाया ,
एक ऐसा सो गया कि फिर मैं सो ना पाया।।

कुछ पन्ने थे जो छुपा कर रखे थे मैंने सबसे,
वक़्त ने साज़िश कर सारे अल्फ़ाज़ मिटा दिए।।

कुछ रिश्तों को आज भी संभाल कर रखता हूँ नई किताबों की तरह,
कुछ अहम है आज भी उन किताबों की तरह जिनकी जिल्द पुरानी है।।

कौन रोक पाया है आखिर किसी को हदों से गुजरने पर,
ये रास्ता अपना खुद बना लेगा ये बारिशों का पानी है।।

आज थोड़ा रुक कर सोच रहा हूँ की किन रास्तों पर हूँ,
ये मेरी मंज़िल तो नही फिर क्यों लगती जानी पहचानी है।।

ये जो कल इन किताबों में बंद होकर मर जाएगी ये मुहोब्बत रूहानी है,
ये मेरी कहानी है "चौहान" , एक दिन युहीं अनकहीं रह जानी है।।

ये सब जो भी आज कविताओं में लिखते आया हूँ बस एक सोच है मेरी,
थोड़ा सुकून मिलता है रूह को बस तब से "चौहान" ने कलम उठा ली है ।।

कुछ बातें आज भी छुपा के रख ली है वक़्त की नजाकत समझ कर,
कुछ का ज़िक्र नही हुआ क्योंकि वो बीते वक़्त की कहानी है।।

कुछ कमी है अभी शायद जो यूँ अधूरी अधूरी सी लगती है ,
ये मेरी कहानी है "चौहान" , एक दिन युहीं अनकहीं रह जानी है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 27 June 2019

"तेरी राह में" (TERI RAAH ME)


एक तेरी चाहत में लाखों ख़्वाब सजाये बैठे है,
तेरे इश्क़ में हम तो यूँ खुद को लुटाए बैठे है,
तू आये या ना आये , हम तो तेरी राहों में,
पलकों को बिछाए बैठे है।।

रोग ना जाने कैसा है, जिसके दर्द में आराम है,
तेरे दिए ज़ख़्मो को हम, नासूर बनाये बैठे है,
तू आये या ना आये , हम तो तेरी राहों में,
पलकों को बिछाए बैठे है।।


चाँद तारे ला ना सका, मुहोब्बत में ताज बना ना सका,
हम तो तेरी रातें देख जुगनुओं से सजाये बैठे है,
तू आये या ना आये , हम तो तेरी राहों में,
पलकों को बिछाए बैठे है।।


उम्र भर का इंतज़ार करके ,खुद को यूँ बेज़ार करके,
तेरे इश्क़ में दामन अपना अश्क़ों से भिगाये बैठे है,
तू आये या ना आये , हम तो तेरी राहों में,
पलकों को बिछाए बैठे है।।

चाँद, सितारें ,फूल ,शबनम ,सबसे तू अनमोल है,
ना जाने रंग कैसे कैसे क़ुदरत तुझपर बरसाये बैठे है,
तू आये या ना आये , हम तो तेरी राहों में,
पलकों को बिछाए बैठे है।।

समेट के रख लूँ आज तुझको इन किताबों में,
इसी उम्मीद में तुझपर कितनी नज़्म बनाये बैठे है,
तू आये या ना आये , हम तो तेरी राहों में,
पलकों को बिछाए बैठे है।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 25 June 2019

"माँ -रब का नाम" (MAA - RAB KA NAAM)


"चौहान" की इतनी औक़ात नही, तेरा कर्ज़ चुका पाऊँ मैं
एक बार फिर आ ना माँ, फिर तेरे सीने लग जाऊँ मैं।।

बरसो से सोया नही था ,तेरे आँचल में सिर क्या रखा ,
सुकून से सो गया,
अब तक बस सुनते ही आया था के भगवान होते है,
तुझे देखा तो यकीन हो गया।।

सुना था के वो हाकिमों से भी बढ़कर होती है,सफा है हाथों में उसके,
उसने प्यार से माथा क्या सहलाया,हर दर्द मानो सुकून हो गया।।

जितनी गुज़री है बस इन ग़मो को अपना बनाकर ही तो गुज़री है ज़िन्दगी,
तूने सहारा क्या दिया मुझे, खुशियों से तोएबा जन्मों का नाता हो गया।।

बड़े नसीब वाले होते है वो जिन्हें ताह उम्र नसीब होता है तेरा प्यार,
आज तूने सीने से लगाया तो जाना क्यों तेरी ममता का खुदा भी तलबदार हो गया।।

क्या पता था कि कभी मेरा लिखा भी चलेगा जमाने मे इस कदर,
बरसो पहले लिखी थी एक नज़्म आज सच होते देखी तो "चौहान" खुद ही रो गया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 22 June 2019

"मेरे पापा" (MERE PAPA)


वो मेरी माँ तो नही पर बिल्कुल माँ जैसा है,
हक़ीक़त है मेरा बाप उस खुदा के जैसा है।।

जज़्बात उसके दिल मे भी है माँ जैसे ही,
पर सच, कभी आँखों से बहने ना देता है।।

फ़िक्र उसे भी उतनी ही होती है मेरे घर आने की,
बेचैन रहता था मेरे इंतज़ार में,चौंखट पर बैठा ना है।।

गुस्सा करता है वो लाखों दफ़ा माँ के कहने पर,
पर कोई मुझे कुछ बोले ये भी सहता ना है।।

खून पसीने सा बहाया है दिन रात मेहनत कर उसने,
जो कुछ भी मैंने माँगा वो मुझे लाकर भी देता है।।

ना जाने कितनी ही जगह से रफ़ू है वो पहरान उसके,
मेरे कपड़े फटने पर वो हमेशा नए ही दिलाता है।।

ऐसा नही है के उसकी ख्वाईशें उसके सपने नही थे,
अलग ही किरदार है मेरे सपनों की खतिर जीता है।।

क्या कुछ नही करता है एक मेरी ख़ुशी की ख़ातिर,
"चौहान" अपनी औकात अपनी हदों से गुज़र जाता है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 21 June 2019

"मेरा हाल" ( MERA HAAL)


क्या हाल है मेरे आजकल तुम्हे क्या मैं बताऊँ,
मुझे खुद समझ नही आता तुम्हे क्या समझाऊँ।।

अजीब सा डर है दिल मे की कुछ खो ना दूँ,
खुद लिख के कहानी अपनी खुद ही रो ना दूँ।।

अब खुद को भी मैं खुद से खोना नही चाहता हूँ,
जैसा हो गया हूं वैसा मैं होना नही चाहता हूँ।।

पहले सब कुछ ठीक था इन आँखों मे आँसू ना आते थे,
हर बुरे दौर से गुजरे पर अश्क़ ना कभी बहाते थे।।

अब बेगानों से नही अपनो से डर लगता है,
अब हकीकत से नही सपनो से डर लगता है।।

आज हर किसी के गम को अपना समझ लेता हूँ,
लिखने के बहाने "चौहान" अकेले में रो लेता हूँ।।

क्या पता कब तक यूँ हाल अपना लिख लिख कर बताऊँगा,
एक रोज़ आएगा इन कहानियों की तरह मैं भी किताबों में दफ़न हो जाऊँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 19 June 2019

"अनदेखा सच" (ANDEKHA SACH)


मैं बातें इश्क़ की करूँ, हक़ीक़त की करूँ या किसी के हक की करूँ,
ये मेरा ईमान है किसी बाज़ार में चंद कागज़ के टुकड़ों पर नही बिकता।।

तुम्हे गुरुर दिखता होग मुझमे ,क्योंकि कभी खुद में नही झाँकते,
दिये की रौशनी सबको नज़र आती है उसके तले अँधेरा किसी को नही दिखता।।

अच्छी थी वो घनी छाव उस राह पर गुज़रने वाले हर राहगीरों के लिए,
जो खुद को उस आग में तपा कर छाव तुम्हे देता रहा, उस दरख़्त का सहारा नही दिखता।।

कभी ज़िक्र आया मेरी नज़्म में तेरा ,तो भुलाना मुश्किल हो जाऊँगा मैं,
आज बड़ी बेरुखी से कहती हो के "चौहान" तू कभी मेरे बारे में नही लिखता।।

मैं अच्छा तब तलक लगूँगा तुम्हे, जब तक तेरे हक में बोलता रहूँगा,
बात साफ है मुहोब्बत में चाँद तो दिखता है पर उसमे दाग नही दिखता।।

इतना भी गुरुर ना कर अपने हुस्न पर, बस कुछ दिन की कहानी है,
ये मिट्टी है मिट्टी में मिल जायेगा, हर उम्र में ये जिस्म एक जैसा नही दिखता।।

किसको समझाने निकल पड़ा "चौहान" सब नशे में है झूठी शानो-शौकत के,
ये सावन के अंधे है , इनको रंग कोई क़ुदरत का दूसरा नही दिखता।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 18 June 2019

"मेरे बाद" "MERE BAAD)


मेरे बाद भी तुझे कभी कहीं झुकने नही दूँगा,
तू चाँद है इस आसमाँ का, तारों से टूटने नही दूँगा।।

माना शाम अच्छी है मुहोब्बत के रंग की मगर,
शाम के ख़ातिर तुझे सूरज की तरह डूबने नही दूँगा।।

किनारे तक आज आ ही गए हो तो यही ठहर जाना,
लहरों की तरह पत्थरों से टकरा वापिस मुड़ने नही दूँगा।।

इन आँसुओं को समझा कर रखना के आँखे दहलीज़ है,
हालात कैसे भी हो इस चौंखट से पार गुज़रने नही दूँगा।।

रास्ते अनजान सही पर आखिर मंज़िल इनकी भी है,
साये सा तेरे साथ रहूँगा सफर में अकेला पड़ने नहीं दूंगा।।

कलम जब भी उठेगी ज़िक्र तेरा हमेशा करेगा "चौहान",
मुहोब्बत इबादत है मेरी बंद किताबों में मरने नही दूँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 15 June 2019

"अच्छा होता" ( ACCHA HOTA)


हम अज़नबी ही रह जाते तो अच्छा होता,
तुम्हे अपने करीब ही ना लाते तो अच्छा होता।।

क्या हुआ गर एक दो मुलाकात हो भी गयी तो,
ये वक़्त की साज़िश समझ जाते तो अच्छा होता।।

समझ तो हम पहले ही गए थे इरादे तुम्हारे,
इस नादाँ दिल को भी समझा पाते तो अच्छा होता।।

बात दोस्ती तक थी वो भी चलो अच्छा ही था,
इस दोस्ती को प्यार ना बनाते तो अच्छा होता।।

अनजानी राहो पर चले थे जिनका कोई मुक़ाम ना था,
तुम्हे मंज़िल ही ना बनाते तो अच्छा होता ।।

मैं और मेरी कलम बनती रही खामोशियों की ज़ुबाँ,
कभी ये कलम ही ना उठाते तो अच्छा होता।।

जिसे जो समझा जो माना वो तो काबिल ही ना था,
पत्थरों को खुदा ना बनाते तो अच्छा होता।।

इस आस में मर गया "चौहान" के थोड़ी राहत मिलेगी गम से तेरे,
तुम कब्र पर आ कर मेरी, ये अश्क़ ना बहाते तो अच्छा होता।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 14 June 2019

"हौंसला" (HAUNSLA)


"कब तक तुझे यूँ किताबों में लिखता रहूँगा,
क्या यही ज़िन्दगी है तेरे नाम पे बिकता रहूँगा।।"

इतना हौंसला मैं कहाँ से लेकर आऊँ,
तू बता ना तेरी यादों से दूर कैसे जाऊँ,
बार बार उस मिट्टी तक आ जाता हूँ,
जी करता है इसी मिट्टी में मैं भी मिल जाऊँ ।।

अब सब कहाँ पहले जैसा है,
जो दिख रहा है कहाँ सब वैसा है,
दिखा ना कोई तो रौशनी मुझे भी,
जिसमे आज मैं भी रौशन हो जाऊँ।।

रिश्ते क्या होते है अब समझ आये है,
रंग ज़िन्दगी ने भी खूब दिखलाये है,
कोई तो मलहम बता ज़ख़्मो का मेरे,
साथ इन ग़मो का मैं कब तक निभाऊं।।

क्यों कभी तुझसे कुछ गिला ना हुआ,
शिकायते ना हुई कोई शिकवा ना हुआ,
दिखा ना तेरी नई दुनिया कैसी नज़र आती है,
बुला ना मुझे भी मैं भी तेरे साथ वहाँ नई दुनिया बसाऊँ।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 11 June 2019

"मेरा क्या रहा" (MERA KYA RHA)


कभी सोचा तेरे बिना मुझमे अब मेरा क्या रहा,
दरख़्त सूख गया अब ना छाव रही ना बसेरा रहा।।

वो कैसी रात थी जिसकी सुबह में शामिल तू नही था,
वक़्त गुज़रा पर अब वो रोशन सवेरा ना रहा।।

ना जाने क्या रिश्ता रहा है तुझसे मेरी ज़िंदगी का,
सासों ने साथ तब छोड़ा जब ज़हन में ख्याल तेरा ना रहा।।

वो सब मोती टूट के बिखर गए ,मैं समेट ना पाया,
समेटता भी कैसे अब वो धागे का घेरा ना रहा।।

उस रोज लिखना भी छोड़ दूंगा ये नज़्म ,ये ग़ज़ल,
गर कभी मेरी बातों में कहीं ज़िक्र तेरा ना रहा।।

मिट्टी हो मिट्टी में मिल जाने दे अब "चौहान",
मेरा क्या रहा जब दुनिया मे तेरा बसेरा ना रहा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 9 June 2019

"दर्द की दास्तां" (DARD KI DASTAAN)


आओ उसके दर्द का कुछ एहसास आज तुम भी करलो,
तुम्हरी अपनी नही तो क्या ,बेटी समझ के आंखे भरलो।।

जिस दर्द से वो गुज़री है इस नन्ही सी उम्र में,
हिम्मत है तो आज उसके दर्द की दास्तां ही सुनलो।।

अभी तो वो हुस्न भी नही था,वो जिस्म भी नही था,
हवस के अंधो थोड़ा तो उम्र का भी लिहाज़ करलो।।

तड़पी होगी रोई होगी ना जाने कितना चिल्लाईं होगी,
आधे जिस्म की बेटी को कैसे वो माँ देख पाई होगी।।

जिस्म तो आखिर जिस्म है हिंदू का हो या मुसलमान का,
ऐसी हैवानियत ओर फिर क्यों ज़ोर चला ना अल्लाह भगवान का।।

सड़के भी आज खाली है ना दिखा कुछ अखबारों में,
सिसयाती खेल है सब अस्मत लूट रही है बाज़ारों में।।

सब कहने की बाते है कि नारी का सम्मान करो,
आज के हालात है "बेटी बचाओ" का नारां छोड़ो "भ्रूण हत्या" का सम्मान करो।।

तिल तिल करके मरने से अच्छा ,वो दुनिया मे ही ना आये,
इतना दर्द सहने से अच्छा वो कोख में ही मर जाये।।

छोड़ "चौहान" समाजी बातें हमपर कौन सा गुज़री है,
कहाँ कहाँ घूमेगा तक अब तू इंसानियत की लाश उठाये।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 8 June 2019

"मैं कैसे कह दूँ” (MAIN KAISE KAH DUN)



मैं कैसे कह दूँ उसको, के इश्क़ में हदो को पार करके आजा,
मैं भी किसी का भाई हूँ ,बेटा हूँ,
वो भी किसी की इज़्ज़त है ,अमानत है,
कैसे कह दूँ "चौहान" दिलों के रिश्ते के ख़ातिर, रिश्ते खून के तोड़ के आजा।।
मैं ऐसा उसका कौन हूँ ,मेरी बिसात ही क्या है,
कैसे कह दूँ के गुरुर अपनो का तोड़ के आजा।।
घर अपना देखता हूँ तो सहम जाता हूँ सोचकर,
फिर कैसे उसे कह दूँ के आँगन खुशियों का छोड़ के आजा।।
बड़े ख्वाब देखे होंगे माँ बाप ने उसको लेकर,
कैसे कहूँ चाँद तारों की बातों के पीछे ,सपना उनका तोड़ के आजा।।
बड़े नाज़ों से पाला है तुझे ,तेरी खुशियां खरीदी है अपनी ख़ुशी बेचकर,
कैसे कहूँ अपनी खुशी के ख़ातिर "चौहान" कब्र उनकी खोद कर आजा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 6 June 2019

"अपने ही तो थे" ( APNE HI TO THE)


आज गैरों के है तो क्या हुआ,कभी अपने ही तो थे,
आज टूट के बिखर गए तो क्या,सब सपने ही तो थे।।

कब उसने कसमे खाई थी उम्र भर साथ निभाने की,
धागे कच्चे थे रिश्तों के एक रोज़ टूटने ही तो थे।।

कैसे करता पलटवार, बचाव में दिल-ए-शीशमहल के,
जो पत्थर मार रहे थे वो लोग अपने ही तो थे।।

इलाज होता कोई तो भी गवारा नही होता मुझको,
जो ज़ख्मो को नासूर कर गए अपने ही तो थे।।

हर कोई डूबा ही है यहाँ कोई किनारे तो कोई लहरों में,
अज़नबी रास्तो के मुसाफ़िर थे एक रोज़ थमने ही तो थे।।

आते भी तो कितने ,लबों तक अश्क़, आँखो से बहकर,
एक रोज़ तो सुखकर निशान चहरे पर जमने ही तो थे।।

सब पता है फिर भी गौर से सुनता हूँ तेरी इस कहानी का अंजाम,
की कब तू बोले,दो आज़ाद परिंदे थे "चौहान" ,मुहोब्बत के पिंजरे में मरने ही तो थे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 4 June 2019

"ईद मुबारक" (EID MUBARAK)


तू दीवाली पर मिठाई खा लेना,
मैं ईद पर सेवइयां खा लूँगा,
धर्म की बात नहीं बात इंसानियत की है,
तू मुझे गले लगा लेना मैं तुझे लगा लूँगा।।

ये सियासती खेल है जो धर्म जात-पात बना बैठी,
तुझे मुझसे लड़ा बैठी, मुझे तुझसे लड़ा बैठी,
वरना फ़र्क ही क्या है मुझमे तुझमे,
तू मंदिर चुनरी चढ़ा देना,मैं दरग़ाह चादर चढ़ा दूँगा।।

फर्क ही क्या है रोज़े है या नवराते,
भूखा इबादत में तू भी है मैं भी,
बात तो खुदा,भगवान को मनाने की है,
तू मेरे व्रत खुला देना, मैं तेरा इफ़्तार करा दूँगा।।

छोड़ जमाना क्या कहता है ,
चाँद वही है ईद का भी करवाचौथ का भी,
जात परिंदों की रख "चौहान",
मंदिर पर सिर तू झुका लेना, मस्ज़िद पर सज़दा मैं कर लूंगा।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 3 June 2019

"दोषी कौन" (DOSHI KAUN?)

"दो दिन मोमबत्ती जला धरना देकर भूल गए सब, किसे पता,
आज भी वो माँ उसकी तस्वीर को सीने से लगा कर रोती है।।"

ITS ALL ABOUT 'CHILD RAPE' . I AM NOT TALKING ABOUT RECORDS. DON'T KNOW HOW MUCH TRUE THIS REPORT BUT IF IT IS 1% TRUE THEN ITS REALLY SHAMEFUL, THINK ABOUT IT."



मासूम थी वो बच्ची उसको कहाँ जमाने का होश था,
मैं कैसे मान लूँ यहाँ भी बस कपड़ो का दोष था।।

सड़को पर उतरा देश हाथों में मोमबत्तियां लेकर,
देखा मैंने जमाने में खिलाफत का कितना रोष था।।

दो दिन का हंगामा है साहब फिर भूल जाते है सब,
खुद पर गुज़रे तो समझ आये,दूसरों के दर्द का किसे होश है।।

तमाशा देखते है बस आज के वक़्त में सब खड़े होकर,
हक़ीक़त किसे पता कौन गुनहगार तो कौन निर्दोष है।।

नाबालिग कहकर छोड़ देता है क़ानून बलात्कारियों को,
क्या कहूँ इस दरिंदगी का असली दरिंदा कौन है।।

चिल्ला- चिल्ला कर पूछ रही है रूह उसकी ,
अब क्यों सड़के खाली है,क्यों हर कोई मौन है।।

वो गिध्द की तरह नोंच-नोंच कर खा गए जिस्म उसका,
उस मंदिर के भगवान क्या पत्थर भी अब तलक मौन है।।

ज़मीर मर चुका है लोगो का, सबको अपनी पड़ी है,
"चौहान" अपने गिरेबाँ में झाँक कर देखता कौन है।।

अपने किरदार को थोड़ा तो संभाल के रख "चौहान",
उसे सबकी खबर है मत सोच अकेले में देखता कौन है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



Sunday, 2 June 2019

"तज़ुर्बा-ए-ज़िंदगी-2" (TAZURBA-E-ZINDGI-2)


दिल मे नफऱत चहरे पर मुहोब्बत लेकर मिलते है लोग,
हाथों में खंज़र लेकर बड़ी शराफ़त से मिलते है लोग।।

फिर वही हाल पूछने के बहाने ज़ख़्मो को कुरेद जाते है ,
मलहम बता बता कर ज़ख़्मो पर नमक लगते है लोग।।

मतलब के रिश्ते है मतलब तक का ही साथ है जमाने मे,
वक़्त आता है तो अपनी बातों से मुकर जाते है लोग।।

हक़ीक़त तो ये है किसी को परवाह नही किसी के हाल की,
चिराग जलाने के बहाने आशियाना जला जाते है लोग।।

मैं तेरी नज़र में काफ़िर तो फिर काफ़िर ही सही ,
आजकल तो तोहमत खुदा पर भी लगाते है लोग।।

वो है कि दुनिया बनाकर भी खामोश बैठा है ,
ना समझ उसी को रूतबा दिखाते है लोग।।

आज अपनो को अपना कहने से कतराते है "चौहान",
शोहरत देख तो फिर बेगानों को भी अपना बनाते है लोग।।

विश्वास ना कर यूँ हर किसी पर,सब एक छलावा है,
गले मिलने के बहाने खंज़र पीठ पर चलाते है लोग।।

सियासती फंदे में फँसकर दम तोड़ चुकी है इंसानियत,
अब हैवानियत की चिंगारी को आतिश बनाते है लोग।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...