Friday, 23 October 2020

"कुछ भी तो नही " (KUCH BHI TO NHI)


अब इन तस्वीरों में आखिर क्या ढूंढ रहे हो,
अब वो हँसी, वो खुशी, कुछ भी तो नही है।।

आँखो के नीचे काले गहरे निशान आ गए ,
आँखो में अश्क़ों के सिवा, कुछ भी तो नही है।।

हाँ ये सच है हम कल महफ़िल में मुस्कुरा रहे थे,
सब गम बतला रहे थे बस और कुछ भी तो नही है।।

सब एक दूसरे से उम्मीद में है कि कोई दवा मिले,
पर इश्क़ में ज़ख्मो की दवा, कुछ भी तो नही है।।

ऐसा सफर है जिसकी मंज़िल सोच के सुकून मिलता है,
इन रास्तों में रास्तों के सिवा मिला कुछ भी तो नही है।।

खुद से शिकायतें है हम खुद को कोस कर सो जाते है,
यहाँ तन्हाई के सिवा अब तक मिला कुछ भी तो नही है।।

बात लिखने की है तो बस लिख देता हूँ "चौहान",
बाकी मुझे गिला शिकवा किसी से कुछ भी तो नही है।।

ज़िंदगी ज़िंदगी के सिवा मुझसे छीन भी क्या लेगी,
ज़िंदगी में ज़िंदगी से कभी मिला कुछ भी तो नही है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
 

Thursday, 15 October 2020

"चाहत" (CHAHAT)


दिल को तेरी चाहत आज भी है,
तुझको पाने की हसरत आज भी है।।

कुछ इस कदर मुहोब्बत है तुझसे,
इन नींदों को शिकायत मुझसे आज भी है।।

दूर रहना भी अब गवारा नही,
तेरे संग की आदत मुझको आज भी है।।

झुकता है सिर आज भी मंदिर मज़ारों पे,
तुझसे ये इश्क़-ए-इबादत आज भी है।।

अब लिख के भी दिल को आराम नही,
"चौहान" में थोड़ी लियाकत आज भी है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
 

Friday, 9 October 2020

"तुम कब तक" (TUM KAB TAK)


 

कब तक झूठ को सच मान कर जियोगे,
कब तक इस राह में भटकते रहोगे,
मैं तो कब का हो गया बेवफ़ा तुमसे,
तुम कब तक मुझसे प्यार करते रहोगे,
मैं तो मंज़िल पाकर भी राहों में हूँ,
तुम कब तक यूँ मेरे पीछे आओगे,
मैं तो खुद किसी और का हो गया,
तुम मुझे कब तक अपना बनाओगे,
ज़ुर्म मेरा था तो सज़ा भी मेरी है,
मेरी ग़लती को कब तक तुम अपना बताओगे,
मैं अकेला ठीक हूँ इस बेमौसम बरसात में,
तुम नाज़ुक हो झुलस जाओगे,
हर बार तो भरोसा तोड़ा है मैंने तुम्हारा,
तुम कब तक यूँ आँखे बंद कर भरोसा करोगे,
अभी भी वक़्त है लौट जाओ इस राह से,
इस राह पर मैं अकेला ही ठीक हूँ,
हर वक़्त हर राह पर मेरे साथ क्या करोगे,
अब वक़्त आ गया बर्बादी का मेरी,
क्यों मेरी ख़ातिर तुम खुद को बर्बाद करोगी,
एक नया सवेरा है सामने तेरे,
एक नई उम्मीद है,
इस राह से मुड़ जाना वापिस ,
क्यूँ मुझे तुम इस ज़िन्दगी से आज़ाद नही करोगी,
मेरा तुम्हारा साथ यही तक ही तो था,
अब ये साँसे ये कलम अब सब थम रहा है,
तुम कब तक "चौहान" से मुहोब्बत करोगी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 6 October 2020

"शायर का हाल" ( SHAYAR KA HAAL)



एक सोच, एक सवाल,
कुछ रंजिशें कुछ मलाल,
यही है क्यूँ हर शायर का हाल।।

एक तस्वीर अधूरी सी,
कुछ ख़्वाब, कुछ ख़्याल,
यही है क्यूँ हर शायर का हाल।।

कुछ लिखा कुछ छोड़ दिया,
कुछ अपना कुछ दिल का हाल,
यही है क्यूँ हर शायर का हाल।।

कुछ घिरा, कुछ छँट गया,
काली रात तन्हाई का जाल,
यही है क्यूँ हर शायर का हाल।।

लबों की हँसी, आँखो की नमी,
एक ज़िंदगी वो भी बेहाल,
यही है क्यूँ हर शायर का हाल।।

कुछ छूट गए कुछ रह गए,
बंद कमरे खाली मकान,
यही है क्यूँ हर शायर का हाल।।

तूने भी क्या पाया "चौहान",
दिल-ए-ज़मी को बना श्मशान,
यही है क्यूँ हर शायर का हाल।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
 

Saturday, 3 October 2020

"आये जो तू" (AAYE JO TU)


कभी आये जो तू तो बताऊँ,
हाल मेरा क्या है,
जिसका बस एक जवाब है तू,
वो सवाल क्या है,
आलम कुछ ऐसा है आजकल,
एक बस्ती विरान सी नज़र आती है,
उसमे एक घर मशान सा है,
चहरे पर नक़ाब है हँसी का खुशी का,
जो पूरा हो नही सकता अब चाहकर भी,
वो अरमान क्या है,
कुछ लिखा है कुछ अभी बाकी है,
अब जो मिल गया वही काफी है,
जो अब तलक नही लिख पाया,
"चौहान" वो जज़्बात क्या है
कभी आये जो तू तो बताऊँ...

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
 

Thursday, 1 October 2020

"तुम बता देना"

 


बता देना मुझे ,

वैसे ये हर बार की कहानी है ,

बता देना ,

कब सड़कों पर उतरना है,

कब रोष में पुतले फूंकने है,

कब मोमबत्तियां मशाल जलानी है,

कब दोष देना है कपड़ो को,

कब तक ये पाबंदियाँ लगानी है,

कब तक इल्ज़ाम लगाना है दुसरो पर,

कब तक ये दरिंदगी छुपानी है,

बता देना मुझे,

कब तक यूँ अकेले नही घूमना है,

डरना है अकेले में,

बाहर घर से अकेले नही निकलना है,

कब तक ये भेड़िये शरेआम रहेंगें,

कब तक हम यूँ बेज़ुबान रहंगे,

कब चलानी है कलम "चौहान" को,

कब तक इस मुद्दे पर आवाज उठानी है,

कब तक ये असमते युहीं लुटती रहेंगी,

कब तक बेटियाँ युहीं घुटती रहेंगी,

कब तक यूँ लिख कर कोशिश करनी है,

क्या बदल पाएगी सोच जमाने की,

चलो तुम बता देना,

कब ये कहानी फिर दोहरानी है।।


शुभम् सिंह चौहान,

मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...