तेरा रूठना भी अच्छा लगता है,
तेरा मानना भी अच्छा लगता है ,
क्या चीज़ है ये मुहोबत समझ नहीं आती,
तेरा हँसना भी अच्छा लगता है ,
तेरा रुलाना भी अच्छा लगता है ...
फ़िक्र तुझे भी होती है मेरी ,
तेरा ना जता के भी वो जताना अच्छा लगता है..
क्या करना उस मंज़िल का जिसमें तुम ना हो,
"चौहान " तुम तक आके ठहर जाना अच्छा लगता है ..
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

No comments:
Post a Comment