Friday, 17 November 2017

"अच्छा लगता है " (ACCHA LAGTA HAI)


तेरा रूठना भी अच्छा लगता है,
तेरा मानना भी अच्छा लगता है ,
क्या चीज़ है ये मुहोबत समझ नहीं आती,
तेरा हँसना भी अच्छा लगता है ,
तेरा रुलाना भी अच्छा लगता है ...
फ़िक्र तुझे भी होती है मेरी ,
तेरा ना जता के भी वो जताना अच्छा लगता है..
क्या करना उस मंज़िल का जिसमें तुम ना हो,
"चौहान " तुम तक आके ठहर जाना अच्छा लगता है ..

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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