Friday, 28 September 2018

"कड़वा सच" (KADWA SACH)


वजूद अपना भूल सब खुद को परवरदिगार समझ बैठे है,
महज़ कठपुतली है वो जो खुद को कलाकार समझ बैठे है।।

नुक्स निकल देते है उसमे भी जो दुनिया तराश के बैठा है,
दूसरों की ज़िंदगी पर तो वो खुद को हक़दार समझ बैठे है।।

हर बात पर तर्क- वितर्क कर लेते है आज यहाँ बच्चे भी,
नादान है समझते है के सूरज को दीपक दिखाकर बैठे है।।

खुद की उलझनों से ही नही सुलझ पाते है आजकल वो लोग,
जो खुद को किसी के भविष्य के शिल्पकार समझ बैठे है ।।

अपने अहम को अपने अतीत से जोड़ कर रखना "चौहान",
राख पड़े है शमशान में वो भी जो खुद को भगवान समझ बैठे है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 26 September 2018

"फ़र्क तब पड़ेगा" (FARK TAB PADEGA)


मुहोब्बत आज हमें है तुमसे,
जब कभी तुम्हे किसी से होगी,
फर्क तब पड़ेगा।।
गुज़ार लेंगे हम तो ज़िन्दगी तेरे इंतज़ार में
जब राह तुम किसी की देखोगी,
फर्क तब पड़ेगा।।
हम तो कर लेंगे दोस्ती तन्हाई से अपनी,
बेचैन रात भर जब तुम रहोगी,
फर्क तब पड़ेगा।।
निभा लेंगे रिश्ता खामोशी से भी अपना,
बातें तस्वीरों से जब तुम करोगी
फर्क तब पड़ेगा।।
कोई गिला नही मुझे बर्ताव से तेरे
जब कोई तुझसे बात तेरे लहज़े में करेगा,
फर्क तब पड़ेगा।।
ज़रूरत अपनी अपनी है इश्क़ यहाँ,
जब ज़िन्दगी कोई तुम्हारी बनेगा
फर्क तब पड़ेगा।।
मैं तो चल दिया तेरे बिछाये अंगारों पर भी,
चलना इश्क़ की राह में जब तुझे पड़ेगा,
फर्क तब पड़ेगा।।
क्या हुआ आज गम तेरे चाहत है हमारी,
जब हसरत किसी के गम की तू करेगा
फर्क तब पड़ेगा।।
कभी कोई शिकायत हुई ही नही तुझसे,
जब शिकायतें कोई तेरी बनेगा,
फर्क तब पड़ेगा।।
कबुल है हँस कर हमें तेरे दिए ज़ख़्म,
मरहम जब कोई तेरा बनेगा,
फर्क तब पड़ेगा।।
माना के आज तुम्हे कोई फर्क नही पड़ता,
जब दुनिया मे "चौहान" ना रहेगा ,
फर्क तब पड़ेगा।।


शुभम् सिंह चौहान,
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Monday, 24 September 2018

"अंजाम"(ANZAAM)


अब तो इस कहानी का अंजाम लिख दे,
बहुत चल लिया अब आराम लिख दे।।

कई बरसों से दिन से रात है रात से दिन,
मेरे हिस्से में अभी अब कोई शाम लिख दे।।

बस दर्द ही देने है मुझे तो फिर आँसू ना देख,
नासूर कर दे या इन ज़ख़्मो में आराम लिख दे।।

जाने भी नही देता और जान भी नही लेता ,
प्यार ना सही जज़बातों में इंतकाम ही लिख दे।।

गर मिलाया है मुझसे तो मेरा बना भी दे उसे,
या इन लकीरों में अब मौत का ही नाम लिख दे।।

कब तलक लिखता रहूंगा यूँ फसाने मुहोब्बत के ,
अब तो कलम से तेरी मेरा कोई मुक़ाम लिख दे।।

कर दे रूह उसके नाम 'गर सच्ची है इबादत मेरी,
या हिस्से में "चौहान" के आज शमशान लिख दे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 21 September 2018

"ये रात" (YE RAAT)


ये जो रात है ,इस रात में ,कोई बात है , इस रात में ,
मेरे ज़हन में ,जज़्बात में , कोई साथ है, इस रात में।।

बादलों में छुपकर देख रहा है चाँद आज ज़मी पर,
ये कैसा नूर दिख रहा है आज धरती पर इस रात में।।

आँखो में कई सवाल है पर लबों पर खामोशी है आज,
कोई सिमट गया है मेरी बाहों में आकर इस रात में।।

बह गए है आज गम सारे यूँ आँखों से अश्क़ बनकर,
हक अत्ता हो रहा है नमाज़ का मेरी जैसे इस रात में।।

अब जान भी निकल जाए तो क्या परवाह "चौहान",
कोई जिस्म में समा गया मेरी रूह बनके इस रात में ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 19 September 2018

"शायर" (SHAYAR)


लिखने वाले तो हर वक़्त लिख लेते है ,
मैं तो बस तन्हा रातों को लिखता हूँ।।

शायर तो वो हैं जो हर हाल पर लिख लेते है,
मैं तो बस तेरे-मेरे जज़बातों को लिखता हूँ।।

नही आती मुझे बातें चाँद तारों की करनी ,
बस मैं तो बात तेरे दीदार की लिखता हूँ।।

नही पता नशा क्या होता है महखाने की शराब का,
मैं तो तेरे इस नूरे-हुस्न के शबाब पर लिखता हूँ।।

वो स्याही और होगी फीके पड़ जाते है अल्फ़ाज़ जिसके,
मैं तो लहू से अपने हाल-ए-दिल की किताब लिखता हूँ।।

लिखा तो कई दफ़ा पर कभी भेज ही नही पाया तुम्हे,
दफ़न होकर रह गयी ख़त में जो आज वो बात लिखता हूँ।।

क्या करूँ गर कोई समझ ही नही पाता मेरे जज़बातों को,
मैं तो अक्सर चींखती खामोशियों की आवाज़ लिखता हूँ।।

हाँ कुछ अनकही बातों ने "शायर"बना दिया "चौहान",
पर कौनसा ग़ालिब की तरह इश्क़ का ख्वाब लिखता हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Sunday, 16 September 2018

"ज़ख़्म" (ZAKHAM)


तन्हाइयों की आग में पल पल जलता रहा,
ज़ख़्म गहरे थे और मैं अंगारों पर चलता रहा।।

शायद कुछ मज़बूरी ही रही होगी दिल की,
तुझे रोशन करने को मैं मोम-सा पिंगलता रहा।।

देखते देखते शमशान बन गया मेरे दिल का शहर,
ख्वाइशें मेरी मरती रही और मैं दफ़न करता रहा।।

धागे कच्चे तो क्या, मोती कोहिनूर थे सपनो के मेरे
कहीं टूटे ना जाये इसलिए मैं टूट के बिखरता रहा।।

तेरी आरज़ू ने जीने की ख़्वाईश पैदा कर दी मुझमे,
और तेरे संग जीने की चाहत में  हरपल मरता रहा।।

असलियत तो कभी लिख ही नही पाया "चौहान",
वहम था लोगो का की दर्द अपने मैं लिखता रहा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।






Friday, 14 September 2018

"बचपन और जवानी" (BACHPAN AUR JAWANI)


जवानी से मेरी आज वो लड़कपन रुठ गया ,
बड़ा क्या हुआ माँ का आँचल छूट गया ।।

दो आँसू बहने से हो जाती थी हर बात पूरी,
आज ज़ख़्मो पर भी अश्क़ बहाना छूट गया।।

कभी रुठ जाते थे तो मनाने आता था हर कोई,
आज लगता है कि मुझसे ये सारा जमाना रुठ गया।।

हर किसी के लिए खिलौने जैसा ही था मैं कभी,
आज बेखबर है वो के उनका ये खिलौना टूट गया ।।

उम्र का पड़ाव था बिन बात हँस लेता था "चौहान",
आज लगता है जवानी से हँसी का नाता ही टूट गया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Tuesday, 11 September 2018

"रोई होगी" (ROI HOGI)


तू भी कहाँ फिर रात भर सोई होगी,
याद करके हर पल को तू भी तो रोई होगी।।

कहाँ छुपा कर रखें तूने  टूटे हुए ख़्वाब,
राख अरमानों की कहाँ पर संजोई होगी।।

मिटना चाहा होगा तुमने भी हाथों की लकीरों को,
खुशबू हाथों से हाथों की कहाँ अब तक खोई होगी।।

तड़पी होगी फिर रूह तेरी रूह से ज़ुदा होकर,
चादर फिर तूने अपने अश्क़ों से भिगोई होगी।।

फिर कहाँ करार आया होगा दुनिया के ऐशोआराम में,
जब चौहान" वो तेरी कब्र से लिपट कर सोई होगी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।




Sunday, 9 September 2018

"तुमसे शिकायत" (TUMSE SHIKAYAT)


तुमसे शिकायत है कि तुम हमे मिलते नही,
हाँ ये दर्द अकेले मुझसे अब संभलते नही।।

इस नींद को बोले दे आना है तो बस जाए ना कभी,
खुली आँखों के ये ख़्वाब अब हमसे पलते नही।।

खामोशी की लगाम रखना अपने जज़बातों पर,
ये घोड़े ख्यालातों के हक़ीक़त में चलते नही ।।

जाओ कोई उन्हें सुना दो गर्जना इन बादलों की ,
जो ये सोच कर बैठे है गर्ज़ने वाले कभी बरसते नही ।।

फिर कैसे काले पड़ गए पन्ने मेरी इस किताब के ,
'गर वो सच कहते है कि वो अब इसे पढ़ते नही ।।

ले आओ उन्हें भी आज कब्र पर मेरी "चौहान" ,
जो कहते है इश्क़ करने वाले कभी मरते नही ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।




Wednesday, 5 September 2018

"काश" (KAASH)


काश के मेरे खुदा कोई अब चमत्कार हो जाये,
पल भर ही सही उनको भी हमसे प्यार हो जाये।।

क्या होती है बेकरारियाँ ,ये तड़प जाने वो भी,
उनका भी अब मेरे बिन जीना दुश्वार हो जाये।।

रहूँ रमज़ान में भूखा इबादत में खुदा के मैं,
जो पालूं एक झलक उसकी मेरा इफ़्तार हो जाये।।

बैठ कर करे बातें रात भर चाँद तारों से फिर वो,
आमना -सामना तन्हाइयों से एक बार हो जाये।।

पार कर ले आग का दरिया फिर हम दोनों,
माँझी बनूँ मैं और वो मेरी पतवार हो जाये।।

हीर रांझे ,लैला मजनू जैसी मुहोब्बत ना भी हो चाहे,
पर मेरे जिस्म मेरे रूह की वो हक़दार हो जाये।।

भले ही वो आये शब-ए-वस्ल पर मिलने हिज़ाब में ,
आंखें भी मिले ऐसे के रमज़ान में इफ़्तार हो जाये।।

समझ लिया मुहोब्बत को हमने जिस तरहा "चौहान",
काश वो भी थोड़ी-बहुत अब समझदार हो जाये।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम- दिल की ज़ुबाँ।।




Saturday, 1 September 2018

"मेरी खोई किताब" (MY LOST BOOK)


कुछ मिल गए कुछ बाकी है, पन्ने मेरी खोई किताब के,
कुछ जल गए कुछ बाकी है,पन्ने मेरी कोई किताब के।।

हर कहानी हर किस्से हर सपने पूरे होते थे कभी इसमें,
मेरी तरह सब कुछ अधूरे हैं आज मेरी खोई किताब के।।

कभी संभाला भी था तो कभी बच्चों सा पाला भी था ,
बचपन की तरह ही हो गए पन्ने मेरी खोई किताब के।।

कभी महके है हवाओ में तो कभी बिखरे भी है हवा से,
बेमौसम फूलों से हो गए पन्ने मेरी खोई किताब के।।

कुछ ज़हन में अड़ गए कुछ ज़ुबाँ पर लोगो की यूँ चढ़ गए,
चर्चे आज महफ़िल-ए-आम हो गए है पन्ने मेरी खोई किताब के।।

नाम होकर भी गुमनाम रहा एक अरसे तक "चौहान",
राख क्या हुआ मेरी पहचान ही बन गए पन्ने मेरी खोई किताब के।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...