Thursday, 13 July 2017

"तेरी-मौजूदगी " ( TERI MOZUDGI)


साँसों में अब भी वो रवानगी है ,
जज़्बातों में अब भी वो दीवानगी है ,
पागलपन है हद्द से ज़्यादा बेखुदी है ,
तू कहीं भी रहे मेरे दिल में तेरी मौजूदगी है।।

आँखों में एक तड़प एक इंतज़ार है ,
एक अरसे से तुझे देखने को बेक़रार है ,
तन्हाइयों का आलम है मेरे ज़ेहनोजान में ,
मेरे लम्हों में अब आहिस्तगी है ,
तू कहीं भी रहे मेरे दिल में तेरी मौजूदगी है।।

हर बात में आज भी तेरा ज़िक्र है ,
हर पल दिल को तेरी फ़िक्र है ,
तेरे दिए जो पैगाम है "चौहान" को ,
उनमे आज भी ताज़गी है
तू कहीं भी रहे मेरे दिल में तेरी मौजूदगी है।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

No comments:

Post a Comment

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...