अमावस की रात के अँधेरे की तरह ,
मेरे जहन-ओ-जां पर ये बढ़ती जाती है।
आज तुमने शायद भुला दिया हो मुझे ,
पर सच कहूं तो मुझे आज भी तेरी याद आती है ।।
ख़ामोशी को सजा के रखता हूँ अपने लबों पर ,
ये गुस्ताख़ आँखें है जो सब बता जाती है ।
आज तुमने शायद भुला दिया हो मुझे ,
पर सच कहूं तो मुझे आज भी तेरी याद आती है ।।
आज भी तुझसे तेरे नाम से मुहोब्बत करता हूँ मैं ,
जिस्म में रुह की तरहां,रगो में बहते लहु की तरहां,
तेरे नाम को मेरे नाम से जोड़ के रखता हूँ मैं।
तुझे पाने की थोड़ी सी हसरत क्या करने लगता हूँ ,
मेरी किस्मत मुझे मेरी औकात दिखा जाती है ।।
आज तुमने शायद भुला दिया हो मुझे ,
पर सच कहूं तो मुझे आज भी तेरी याद आती है ।।
आज भी अच्छा लगता है मुझे तेरा इंतज़ार करना ,
तुझसे एक पल भी बात करने को खुद को बेक़रार करना ।
ढल जाती थी कभी शाम तेरे हाथों को हाथों में थामे,
आज वो यादें मुझे रात-रात भर रुला जाती है ।।
आज तुमने शायद भुला दिया हो मुझे ,
पर सच कहूं तो मुझे आज भी तेरी याद आती है ।।
बनाना चाहा तुझे हमसफ़र इश्क़ में तूने काफ़िर बना दिया,
इश्क़ के सफर में उम्र भर का मुसाफिर बना दिया ।
तेरे पास आने की बेइख़्तियारी "चौहान" को ज़िंदगी से दूर ले जाती है।।
आज तुमने शायद भुला दिया हो मुझे ,
पर सच कहूं तो मुझे आज भी तेरी याद आती है ।।
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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