Monday, 31 December 2018

"इस साल"(ISS SAAL)


इस साल कोशिशें नाकाम नही होगी,
महफिलें भी फिर आम नही होंगी,
नही रखेंगे वास्ता तुझसे तेरी यादों से,
इस साल तेरी यादों में ढलती शाम नही होगी।।

सावन तो आएगा पर ये आंखें ना बरसेंगी,
तुझे देखने को अब कभी ना तरसेंगी,
खुशियाँ भी देंगी दस्तक़ चौंखट पर मेरी,
इस साल मंज़िलें गुमनाम नही होंगी।।

ना लिखेंगे फ़साने मुहोब्बत के हम,
ना बनेंगे नासूर अब दिल के ज़ख्म,
अब फ़र्क नही पड़ेगा किसी की बातों का,
अब दिल की बस्ती किसी की गुलाम नही होंगी।।

जो पाया वो कुछ काम ही ना आया,
जो छोड़ गया वो कभी लौट ही ना पाया,
छुपके से आ ही जाऊंगा करीब तुझ तक,
हसरतें तुझे पाने की अब शरेआम नही होंगी।।

तन्हाइयों से भी अपना सारा नाता तोड़ लेंगे,
खुद का खुद से ऐसा रिश्ता हम जोड़ लेंगे,
लिखना छोड़ देगा अब ज़िक्र तेरा "चौहान",
इस साल ये कविताएं भी बेनाम नहीं होंगी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Saturday, 29 December 2018

"वो ज़ुदा हो गए " (WO JUDAA HO GYE)


कसमे खाई थी जिन रास्तों पर चलने की साथ मेरे,
मंज़िल से पहले फिर क्यों हमसफ़र वो जुदा हो गए।।

कभी पल भर में बरस जाती थी आंखें जो दूरी में,
आज कैसे वो आँखों के साग़र सुख के सहरा हो गए ।।

दिल क्या जान तक रख दी जिसके कदमो में हमनें,
आज कैसे मान लूं की वो हमसे बेवफा हो गए ।।

जो कभी झुकाते थे सर हर दर चोंखट पर तेरी खातिर,
सुना है आज कल वो शक़्स तो खुद से खफ़ा हो गए।।

तूने इश्क़ में जिसे चाहा जिसकी इबादत की हर पहर,
देख ले  "चौहान" वो पत्थर तो सच मे खुदा हो गए।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।





Thursday, 27 December 2018

"इस साल" (ISS SAAL)





S.M.CREATIONS "MERI KALAM - DIL KI ZUBAA'N " PRESENTS….


TITLE : “इस साल” (ISS SAAL) 

https://youtu.be/CeLaq0QnO8U

WRITER: SHUBHAM SINGH CHAUHAN 

LABEL : S.M.CREATIONS "MERI KALAM - DIL KI ZUBAA'N " 

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 https://merikalamdilkizubaan.blogspot.com/ 

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"वक़्त और याद"(WAQT AUR YAAD)


माना अच्छे में ना सही , वक़्त बुरे में सही,
याद तो आज भी करती होगी वो मुझको।।

माना महफ़िल में ना सही,तन्हाइयों में ही सही,
ज़हन में आज भी रखती होगी वो मुझको।।

माना हक़ीक़त में ना सही, ख़्वाबों में ही सही,
कभी ना कभी देखती तो होगी वो मुझको।।

माना पाने को ना सही, भुलाने को ही सही,
सजदों  में याद तो करती होगी वो मुझको।।

माना जिस्म से नहीं, पर रूह से ही सही,
हरपल महसूस तो करती होगी वो मुझको।।

माना बहाने से ही सही , क़ब्र पर मेरी,
मिलने तो आती होगी "चौहान" वो मुझको ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।




Monday, 24 December 2018

"तेरा-मेरा इश्क़" (TERA MERA ISHQ)


तेरी यादों ने रात भर सोने ना दिया,
तेरे वादों नेें पल भर भी रोने ना दिया ।।

ना जाने क्या रिश्ता क्या एहसास है तुमसे,
हकीकत दूर, दूर ख्यालातों में भी होने ना दिया।।

कब तुम ज़िन्दगी और ज़िस्म में रूह बन गए,
तेरी चाहतों ने तन्हाइयों में खोने ना दिया ।।

सब मोती समेट कर रख लिए हमने इश्क़ के,
टूट जाने के डर से कभी माला में पिरोने ना दिया।।

हर दर्द हर ज़ख़्म को अपना बना लिया तूने,
क्यों कभी ये दर्द का एहसास मुझे होने ना दिया।।

जला रखा था तेरे इंतज़ार में जो मुहोब्बत का दिया,
हवाओं की गिरफ्त में हमनें कभी होने ना दिया।।

इश्क़ तेरा भी सच्चा था , इश्क़ मेरा भी सच्चा था,
मिल ना पाए पर कभी किसी और का होने ना दिया।।

चंदन तो ना बन सका कभी "चौहान" तेरी ख़ातिर,
मिट्टी की खुशबू था भीग कर भी अलग होने ना दिया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।





Thursday, 20 December 2018

"कमी" (KAMI)


कोई वजह तो बता,
तेरी सज़ा क़बूल,
मेरा गुनाह तो बता,
मैंने तो अपना सब गवा लिया,
वो तो बता जो तूने मुझे खो के पा लिया,
कब तेरा मन मुझसे उब गया,
कब दरार आयी इस रिश्ते में,
कब ये कांच सा टूट गया,
प्यार तो मैंने भी किया था तुझसे,
माना प्यार तो उसने भी किया,
क्या कमी रह गयी फिर,
प्यार में मेरे वो कमी तो बता,
ये चाँद सितारे ज़मी आसमा ,
क्या कदमो में ला दिया उसने,
ज़रा मुझे भी तो बता,
वो शाम तो बता जो मेरी,
डुब के अब रात हो गयी ,
वो वादें तो याद कर ,
जो आज गुज़री बात हो गयी,
क्या मेरी तरहा कभी उसने भी,
हाथों से तेरे बालों को सहलाया,
क्या कभी उसने भी आँसू पोंछ तेरे,
तुझे सीने से लगाया,
क्या बिन बोले जान जाता है ,
वो भी तेरे दिल के जज़्बात,
क्या गुज़ार देता है पहरों,
तेरे इंतज़ार में तेरी यादों के साथ,
क्या वो भी तेरे हर गम को अपना समझता है,
क्या वो भी तेरे सपनो को हकीकत समझता है,
क्या वो भी खुश है तेरी बातों के ढंग से,
समझा लेता है क्या दिल को तेरे बदलते रंग से,
मुहोब्बत के किस ढंग से वो तेरा दिल बहलाता है,
साँसों से साँसें मिल जाती थी हमारी,
क्या वो भी इतना करीब आ जाता है,
जो तुझे रात भर पढ़ के सुनाता है,
वो गज़ल वो शायरी वो नज़्म तो सुना,
कमी क्या रह गयी थी मुहोब्बत में मेरी,
मुझे वो कमी तो बता।।
मुझसे दूरियां करीब उसके ला गयी,
या उसकी नज़दीकियां तुझे भा गयी,
दोष हालातों का था या मजबूरियां थी,
सच नही तो "चौहान" को झूठा बहना ही बता,
कमी क्या रह गयी थी मुहोब्बत में मेरी,
मुझे वो कमी तो बता।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



Tuesday, 18 December 2018

"पागल लड़की" (PAGAL LADKI)


सहमी होगी ,ख़ामोश भी,शायद कहने से डरती होगी,
वो पागल लड़की आज भी मुझसे मुहोब्बत बेइंतहा करती होती।।

आज भी उसके ख्यालों में बस मेरा बसेरा होगा,
आज भी शायद उसकी रातें मेरी यादों में गुज़रती होंगी।।

मन तो आज भी करता होगा उसका मुझसे लिपट रोने का,
आज भी शायद घूंट आँसुओं के पी पी कर खुद में ही मरती होगी।।

आज भी शायद उस परवरदिगार से मुझे माँगती होगी,
आज भी शायद एक झलक पाने को रात-रात भर जगती होगी।।

आज भी वो शायद मेरे खामोशी से एहसास को भाँपती होगी,
आज भी शायद वो अतीत को साथ ले आज से भागती होगी।।

आज भी मेरी मुहोब्बत का दिया अपने दिल मे जगाती होगी,
लाश बना "चौहान" खुद को वो नज़र दुनिया को जिंदा आती होगी।।

आज भी शायद उसे इंतज़ार होगा मेरी कविताओं का,
आज भी वो छुपके से "मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ" पढ़ती होगी।।



शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Thursday, 13 December 2018

"शायद तुम नही जानती" (SHAYAD TUM NHI JAANTI)


शायद तुम नही जानती,
कोशिश तो कई दफा की ,
की बता दूँ तुम्हे,बता दूँ की,
ये दिल खफ़ा -खफ़ा सा क्यों है,
गर पहले जैसा ही है सब आज भी,
तो फिर ये दिल जुदा-जुदा सा क्यों है,
क्यों अब तेरे दीदार में करार आता है,
क्यों तेरी हर एक बात पर प्यार आता है,
क्यों फिर दिल दूरी सह ना पाता है,
दूर जाने की सोच कर भी क्यों घबराता है,
शायद तुम नही जानती,
तुम नही जानती के अब ,
तेरी उदासियां से उदास होता है,
हर वक़्त बस तेरे ही पास होता है,
तेरी आँखों मे आँसू सह ना पायेगा,
जानता हूँ तुझसे कभी कह ना पायेगा,
कुछ ख़त लिखे थे तुझे ,
लिखे ही रह गए ,
बारिश में उनके संग मेरे ,
जज़्बात भी बह गए,
दोस्ती कभी की नही तुझसे ,
पर दोस्त से बढ़ कर ही माना है तुझसे,
तुझ बिन अब जीना कैसा,
जिस्म में रूह सा जाना है तुझे,
शायद तुम नही जानती,
रोज़ रात आईने के सामने,
बातें भी करता है बैठकर,
पर खामोशी आ जाती है लबों पर,
हकीकत में तुझे सामने देखकर,
यूँ तो बातें तेरी चाँद तारों को बताता है,
कहीं खो ना दूँ तुम्हे ,
ये सोचकर ही रुक जाता है,
ना जाने कहाँ कहाँ सज़दे किये तेरी ख़ातिर,
जहाँ सर झुके "चौहान" बस तुझे मांगता है,
शायद तुम नही जानती।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Tuesday, 11 December 2018

"मेरे बाद" (MERE BAAD)


मेरे बाद खुद ही में ढूंढोगी मुझे,
तेरे जिस्म में रूह बन जाऊंगा मैं।।

कहीं नजर ना आऊँगा तुम्हे मैं,
कुछ इस कदर गुम हो जाऊंगा मैं।।

आँखो से अश्क़ बनकर आऊंगा मैं,
तेरी आँखों से हि बह जाऊँगा मैं।।

दिल मे जज़्बात बनकर आऊंगा मैं,
होठों से बात बनकर निकल जाऊँगा मैं।।

हर रात ख़्वाब बनकर आऊंगा मैं,
सुबह नींद के साथ निकल जाऊँगा मैं।।

गम की धूप में साये सा साथ पाऊंगा मैं,
सुख की छांव में दूर निकल जाऊंगा मैं।।

हर किसी में नज़र फिर आऊँगा मैं,
छू कर तुझे हवा सा निकल जाऊँगा मैं।।

कैसे रखोगी "चौहान" को हाथों से रोक कर,
रेत बनकर तेरे हाथों से फिसल जाऊंगा मैं।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 1 December 2018

"प्यार नही आता" (PYAR NHI AATA)


हाँ मुझे प्यार करना नही आता ,
तेरी बातों से इंकार करना नही आता।।

माना आज अकेला हूँ इस दुनिया के बाज़ार में,
क्या करूँ  रिश्तों में व्यापार करना नही आता।।

चाँद सितारे कदमो में लाने की बातें तो मैं भी कर लेता,
पर अपनी कही बातों से इंकार करना नहीं आता।।

आज अकेला हूँ सच्ची मुहोब्बत लेकर इस बाजार में,
क्या करूँ मुहोब्बत में जिस्मो वाला प्यार नही आता।।

मन तो मैं भी बहला देता तेरा चंद मीठी बातों से ,
क्या करूँ मुझे खुद ये दिखावे का संसार नही भाता।।

लिख तो "चौहान" भी देता तेरे इश्क़ में कोई ग़ज़ल,
क्या करूँ अहसासों को लफ़्ज़ों में पिरोना नही आता।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।




Tuesday, 27 November 2018

"मेरा आज"(MERA AAJ)


तुझसे दूरियां मैं युहीं नही बढ़ा रहा हूँ,
इन हालातों में खुद को आजमा रहा हूँ।।

वो जो सोचते है मुझे फ़र्क नही पड़ता,
उनकी सोचों को हकीक़त बना रहा हूँ।।

मेरे पागलपन की हद देख हैरान है वो,
ज़ख्मों पर मलहम नमक का लगा रहा हूँ।।

इस कदर मिट्टी हुए सपने मेरे मुझमे,
खुद कब्र खोद खुद को दफना रहा हूँ।।

बस नाम के रह गए है रिशते कुछ ,
फिर भी ज़िम्मेदारी से निभा रहा हूँ।।

और वक़्त तो आज ये आ गया है "चौहान",
अपनी बर्बादी देख खुद मुस्कुरा रहा हूँ ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



Friday, 23 November 2018

"असली हिंदुस्तान" (ASLI HINDUSTAN)


यहाँ सब अपनी परेशनियों को लेकर परेशान है,
आओ तुम्हे दिखाऊँ क्या असली हिंदुस्तान है।।

यूँ तो देश मेरा बहुत तेज़ी से विकसित हो रहा है,
पर उनका क्या जो आज भी फुटपाथ पर सो रहा है।।

खुद की बोई की फसलों का मोल भी नही मिल पता ,
आज दूसरों को खिला खुद भूखा मर रहा किसान है।।

विज्ञान के युग मे इंसानियत भूल बैठा है हर कोई,
दौलत के गुरुर पर हर कोई बन बैठा भगवान है।।

दिखावे को तो अब हम दस्तूर बना कर बैठे है,
डरते है तभी सच की तसवीर छुपा कर बैठे है।।

कपड़ो है पैमाना आज भी इज्ज़त का यहाँ पर,
कहीं खुले में तो कहीं छुपकर बिक रहा ईमान है।।

सियासत ने कर दिया खोखला देश दीमक की तरहा,
अंदर झांक के देखो मेरा भारत कहाँ अब महान है।।

वक़्त आने पर तो बापु के बंदर बन जाते है लोग यहाँ,
तभी आजकल यहाँ पर इंसानियत कत्ल-ए-आम है।।

थोड़ी लगाम लगा कर रख अपनी कलम को "चौहान",
जो देश बेच खा गए हमें आज भी उनपर अभिमान है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।





Thursday, 15 November 2018

"आजा ना यार लौट के" (AAJA NAA YAAR LAUT KE)


ONLY FOR MY BRO VIKAS SINGHMAR,
I CAN'T FORGET U ..MISS U ALOT BRO..
LOVE U FOREVER..FIRSF  TIME AISA LGA RGA HAI KE KUCH BCHA HI NHI .EK BAAR BOLTE HI AATA THA MILNE AAJ BHI AAJA NAA YAAR PLZ .BHUT ZARURT HAI TERI. LOVE U FOREVER.😭😭 REST IN PEACE.

आजा ना यार लौट के ,
देख तुझबिन मैं भी मर जाऊँगा,
आजा ना यार लौट के,
मेरे हालात ठीक नही है,
दोस्ती नही निभानी मत निभा,
पर तेरा यूँ छोड़ जाना ठीक नही है,
आजा ना यार लौट के ,
देख तुझबिन मैं भी मर जाऊँगा।।

देख ना मैं घर किससे मिलने आऊँगा,
देख ना बातों से अपनी किसको पकाउंगा,
तूने किये वो वादे सच्चे नही है,
दोस्त लाखों है पर तुझसे पक्के नही है,
हाल-ए-दिल अब किसको बताऊंगा,
आजा ना यार लौट के ,
देख तुझबिन मैं भी मर जाऊँगा।।


देख ना सब तुझ बिन सुनसान नज़र आता है,
जहाँ बातें करते थे वो पार्क शमशान नज़र आता है,
क्या सही क्या गलत मुझे कौन बताएगा,
मेरी हँसी में छिपी उदासी कौन ढूंढ पायेगा,
अपने सपने अब मैं किसको सुनाऊँगा,
आजा ना यार लौट के ,
देख तुझबिन मैं भी मर जाऊँगा।।


बड़ा इंतज़ार बड़ी खुशी थी तुझे शादी की मेरी,
अब बता ना वो जश्न कौन मनाएगा,
कौन होगा खड़ा मेरे अच्छे बुरे वक्त में बिना सोचे,
कौन होगा तो मेरी एक आवाज़ पर मिलने चला आएगा,
बता ना बिना बहानेे गले किसे लगाऊंगा,
आजा ना यार लौट के ,
देख तुझबिन मैं भी मर जाऊँगा।।


अभी तो बहुत सारे हमारे ख़्वाब बाकी थे,
तुझे बताने थे जो कुछ राज़ बाकी थे,
साले मेरे साथ अब हिसार कौन जाएगा,
जयपुर जाने का वादा था वो कौन निभाएगा,
वो पूछेगी तेरे बारे में तो क्या बताऊंगा,
आजा ना यार लौट के ,
देख तुझबिन मैं भी मर जाऊँगा।।


कोई गिला शिक़वा था तो मुझे बोल देता,
कोई गलती कर दी थी आके मार लेता,
धोखेबाज निकला तू तो चुपचाप पीछा छुड़ा गया,
कैसे भुलाऊँ तुझे ये तो बता जाता,
किस्से दोस्तों के मैं किसको सुनाऊंगा,
आजा ना यार लौट के ,
देख तुझबिन मैं भी मर जाऊँगा।।


देख ना "चौहान" कविता किसको सुनाएगा,
मैं जीतूँगा एक दिन ये हौसला कौन दिलाएगा,
अभी तो पूरी उम्र बाकी है ना यार,
गर रूठा तुझसे तो कौन मनायेगा,
देख ना भाई कहकर किसको बुलाऊँगा,
आजा ना यार लौट के ,
देख तुझबिन मैं भी मर जाऊँगा।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 9 November 2018

"ज़रूरत" (ZARURAT)


मेरे सपनों की हकीक़त बन बैठी,
मुहोब्बत अब ज़रूरत बन बैठी।।

यकीन ना रहा अब साँसों पर अपनी,
कुछ ऐसे वो मेरी रूहानियत बन बैठी।।

अंदाज़ में उसके जीने लगा हूँ खुद को,
जैसे वो मेरी अदब- लियाकत बन बैठी।।

बचा के रखने लगा हूँ दुनिया की नज़रों से,
मुहोब्बत आज जैसे तिज़ारत बन बैठी।।

बैर कर लिया अब तो ज़िन्दगी से हमने,
इस दिल-ए-नादां की हिमाकत बन बैठी।।

बड़े अदब से पेश आने लगा हूँ गमो से अपने,
ख़ामोशी ऐसे चढ़ी ज़ुबाँ की शराफ़त बन बैठी।।

लिहाज़ आँखो का था के बस कुछ बोली नही,
नींदे तो आँखों से की बाते बगावत बन बैठी।।

एक दिल का ही तो हेर-फेर हुआ था ,
जान से कीमती वो अमानत बन बैठी।।

राख शमशान की होकर भी खामोश था "चौहान",
वो जिस्म में कैद साँसों की ज़मानत बन बैठी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।







Tuesday, 6 November 2018

"दिवाली" (DIWALI)


अपने पराये वैर द्वेष में आज कहीं गुम हो गयी,
वो दीपों वाली दीवाली ना जाने कहाँ खो गयी।।

अब वो एक दूजे के घर उपहार लेकर नही जाते,
रिश्तों की अहमीयत मैं की आग में राख हो गयी।।

बनवटी खुशियाँ नज़र आती है अब हर चहरे पर,
बधाई दीवाली की तो लगता है मज़ाक हो गयी ।।

वो इंतज़ार भी नही होता महीने भर से दीवाली का,
पटाखों का जश्न भी अब प्रदूषण वाली बात हो गयी।।

सजाते है घर आज कल वो कई तरहा की लाईटें लगा कर,
वो खुशबू मिटी के दिये कि ना जाने कहाँ खो गयी।।

कहाँ अब वो पहले जैसा बात बाकी है "चौहान",
त्यौहार तो आज कल बस दिखावे की बात हो गयी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 30 October 2018

"अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने" (AB MUHOBBAT CHORD DI HAMNE)


काफ़िर हो गया हूँ, रास्तों से मुहोब्बत करली,
मंज़िल तक जाने की आस छोड़ दी हमने,
हाँ , अब फर्क नही पड़ता तुमसे तेरी बातों से,
अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने।।

सोता कल भी नही था सोता आज भी नही हूँ,
पर जागने की वजह पुरानी छोड़ दी हमने,
चाँद, तारे, तन्हाई, रुसवाई, अब फर्क नही पड़ता,
अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने।।

फिक्र कल भी थी फिक्र तो आज भी है हमें,
पर फिक्र खुद की अब छोड़ दी हमने,
हम मरे ,जिये, मिले, ना मिले, अब फर्क नही पड़ता,
अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने।।

रास्ते अलग चाहते थे तो लो अब अलग ही सही,
अब ज़रुरत हमसफ़र की छोड़ दी हमने,
फूल ,पत्थर, धूप, छाँव, अब फर्क नही पड़ता,
अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने।।


जब तलक जो भी लिखा सब जज़्बात थे मेरे,
कहानी लफ़्ज़ों में पिरोनी छोड़ दी हमने,
खून, स्याही, पानी, आसुँ, अब फ़र्क नही पड़ता,
अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने।।

कलमा पढ़े गीता पढ़े या आयात पढ़े वो कुरान की,
बंदगी इंसानों की अब छोड़ दी हमने,
इबादत, सज़दे, दुआ, दवा ,अब फर्क नही पड़ता "चौहान",
अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 27 October 2018

"पापा की परी" (PAPA KI PARI)


सच कहूँ मै वो हूँ जो माँ की कोख से ज़माने से लड़ी हूँ,
कलंक हूँ या लक्ष्मी नही पता पर मैं पापा की परी हूँ।।

काट दिए पँख अरमानों के मेरे ज़माने ने मगर,
पापा की बाँह थाम मैं हर तूफानों से लड़ी हूँ।।

तुलसी आँगन की हूँ या हूँ दाग किसी चुनर की,
गुरुर बन मेरे पापा का सिर पर ताज़ सी सजी हूँ मैं।।

माना समझ नही आता मुझे स्कूली क़िताबों का ज्ञान,
असूलों पर चलकर पापा के मैं ज़माने को पढ़ी हूँ ।।

कई किरदारों को निभाते आयी हूँ मैं अब तलक,
हर एक मुसीबतों से मैं हर वक्त डटकर लड़ी हूँ।।

माँ बनकर पाला भी है,तो पत्नी बनकर संभाला भी है,
बेटी बन प्यार भी किया है तो बहन बनकर लड़ी हूँ।।

चिता अरमानो की जलाई है, राख सपनो की बनाई है,
झूठी दुनिया के रिवाज़ो में ना जाने कितनी बार मरी हूँ।।

सच तो दिखता ही कहाँ है "चौहान" सोच के अंधो को,
नावरातों में कंजक, कोख में मरने वाली पापा की परी हूँ।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 24 October 2018

"वो फिर लौट के ना आया" (WO PHIR LAUT KE NAA AAYA)


कुछ राज़ दफ़न हो गए ,आंखों से अपनी बहने ना दिया,
वो फिर लौट के ना आया , दिल मे जिसने रहने ना दिया ।।

ख़्वाईश तो बहुत थी गम उनके चुरा कर खुशियाँ सारी देने की,
कमबख्त ऐसा था ज़ख़्म दिया और ज़ख़्म सहने भी ना दिया।।

इस जिस्म में मेरे रूह सा साँसों को हवाओं सा लाज़मी था वो  ,
इस कदर मिले के जान भी ना ली और जीने भी ना दिया।।

माना के टूट के बिखर गई माला आज मेरे ख़्वाब-ए-मुहोब्बत की,
ऐसा मोती था वो माला का मेरी जिसे जुदा खुद से कभी होने ना दिया।।

बस एक अतीत बनकर ही रह गया वो बंद क़िताबों में "चौहान",
जो ना कभी तेरा हुआ ना तुझे किसी का कभी होने दिया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Thursday, 18 October 2018

"रावण" (RAVANN)


हाँ मुझे राम नही रावण बनना है,
अहम की ख़ातिर मुझे भी मरना है।।

पूजा भी करनी है तो जाप मुझे भी करना है,
हदों में रहकर थोड़ा पाप मुझे भी करना है।।

हाँ गुमान नही करना मुझे कामियाबी पर मेरी,
आन की ख़ातिर तो मंज़ूर भगवान से भी लड़ना है।।

अटल रहना है मुझे इरादों पर अपने ,
वक़्त पड़े तो तांडव फिर मुझे भी करना है।।

जाना नही है वापिस मुड़कर अंज़ाम अपना देखकर,
मरना है तो फिर अपने इरादों पर डंटकर मरना है।।

एक सोच बनकर उतर जाना है जहन में लोगो के,
फिर एक रिवाज़ सा बनकर मुझे हर साल जलना है।।

बुरा हूँ या बुरा नही ये सोच लोगों की है मेरे लिए,
अधर्मी अहंकारी सही पर "रावण" सा ज्ञानी भी बनना है।।

अच्छे बुरे का फ़र्क हो तो कोई भी पहचान ले "चौहान",
मुश्किल तो इस दौर में बुरे से बुरे में फर्क करना है।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 15 October 2018

"एक बात - एक राज़" (EK BAAT - EK RAAZ)


हाँ हर बात में कहीं एक बात छुपा कर रखता हूँ,
चहरे की हँसी से अपने हालात छुपा कर रखता हूँ।।

कभी आँखों से आंसू बन बहने ना दिया मैंने,
तेरे दिए घाव कुछ ऐसे सीने से लगा कर रखता हूँ।।

क्या हुआ गर टूट के बिखर गई माला मेरे सपनों की,
मोती तेरी यादों के सीने से लगाकर रखता  हुँ।।

क्या हुआ गर ज़िन्दगी रात काली है अमावस की,
दिल के आंगन में अरमानो की लौ जला के रखता हूँ।।

क्या पता कल ये हवाएँ मेरे हक में हो या ना हो,
मुठ्ठी भर सही जेब मे आसमान छुपा कर रखता हूँ।।

राज़ है एक अनकहा कानों में बालियाँ भी मेरे,
सच है नाम में किसी का नाम छुपा कर रखता हूँ।।

ये जो हर वक़्त खिला-खिला सा नज़र आता है "चौहान",
सच कहूँ इस दिल में भी एक शमशान छुपा कर रखता हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 10 October 2018

"माँ सब जानती है" (MAA SAB JANTI HAI)


खूबियाँ भी जानती है खामियां भी,
हँसी भी पहचानती है उदासियाँ भी,
बिन बोले समझ जाती है मेरे दिल का हाल,
माँ मेरी सब जानती है।।

वो रातों को ना सोना,
मेरा छुपछुप कर रोना,
चालाकियां भी समझती है ,
मासूमियत भी पहचानती है,
बिन बोले समझ जाती है मेरे दिल का हाल,
माँ मेरी सब जानती है।।

शरारतें भी जानती है मेरी शराफ़त भी,
बदतमीजियां भी , मेरी लियाक़त भी,
मेरे ख़्वाबों में जीती है खुद को,
हकीक़त भी पहचानती है,
बिन बोले समझ जाती है मेरे दिल का हाल,
माँ मेरी सब जानती है।।

यूँ तो भोली है थोड़ी अनपढ़ भी है,
पर ज़िन्दगी की किताब पढ़ाती है,
सिखाती है मुझे सलीका जीने का,
ज़माने के आव-भाव सब पहचानती है,
बिन बोले समझ जाती है मेरे दिल का हाल,
माँ मेरी सब जानती है।।

मेरी बेफिक्री का नाटक भी करती है कभी कभी,
एक उमदा अदाकार भी है,
थोड़ी भी सिकन नही लाती माथे पर अपने,
क्या कहूँ कलाकार भी है,
दिन रात रब से मेरी कामियाबी का मुकाम मांगती है,
बिन बोले समझ जाती है मेरे दिल का हाल,
माँ मेरी सब जानती है।।

सच कहूँ आज कल मंदिर मज़ारों में कम जाता हूँ,
मुसीबतों में साथ हरदम अपनी माँ को पाता हूँ,
बोल नही पता कभी "चौहान" पर ये भी सच है,
रब से उसकी खुशियाँ उसका आराम मांगता हूँ,
मेरी रूह तो ताह उम्र उसे अपने पास मांगती है,
बिन बोले समझ जाती है मेरे दिल का हाल,
माँ मेरी सब जानती है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम -दिल की ज़ुबाँ।।




Friday, 5 October 2018

"इश्क़ क्या है" (ISHQ KYA HAI)


पूछा था एक रोज़ उसने मुझे,की इश्क़ क्या है,
वक़्त भी दिया था सोचने का की ये इश्क़ क्या है।।

जवाब तो कई थे मेरे पास ,उस वक़्त भी तेरी बातों के,
सोचा वक़्त आएगा तो बताऊँगा हकीक़त में इश्क़ क्या है।।

तेरा-मेरा रिश्ता इश्क़ है तो सब झूठ-फरेब है बेकार है,
मेरा ना होकर भी मेरा होना हकीकत में ये इश्क़ है।।

चंद मीठी बातें कर दिल बहला देना इश्क़ है तो बेकार है,
तेरे हर हाल में खुद को जीना हकीकत में ये इश्क़ है।।

जिस्मो का मिल जाना,मिलने की चाहत रखने प्यार नही है,
ज़िस्म में रूह बन कर उतर जाने हकीक़त में ये इश्क़ है।।

किसी को दिखाकर या जताकर फिक्र करना इश्क़ नही है,
किसी के लिए नाता नींदो से टूट जाने हकीकत में ये इश्क़ है।।

जरूरी नही के नाम राधा-मोहन् सा जुड़े तो इश्क़ है,
किसी से मीरा सा दिल लगाना हकीक़त में ये इश्क़ है।।

किसी को पाने की चाहत करना भी इश्क़ नही है,
किसी के लिए खुद को खो देना हकीक़त में ये इश्क़ है।।

जो लिखा अभी तक मैंने तेरे लिए वो इश्क़ नही है,
जो मैं कभी लिख ही ना पाया हकीक़त में वो इश्क़ है।।

नही कहता "चौहान" के किसी को खुदा बनाना इश्क़ है,
उस खुदा की इबादत में मिट जाना हकीक़त में ये इश्क़ है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Monday, 1 October 2018

"तेरा नाम" (TERA NAAM)


आ मेरी क़िस्मतों में तेरा नाम लिखूँ,
कुछ ऐसा मुहोब्बत-ए-पैग़ाम लिखूँ,
ना वो वीरानियाँ ना तन्हाईयां हो दरमियाँ,
तेरे नाम एक ऐसी हसीन शाम  लिखूँ।।

लिखूँ वो खामोश जज़्बात दिल के ,
लिखूँ वो किस्से इश्क़-ए-महफ़िल के ,
थोड़ी शिकायतें हो थोड़ी मुहोब्बत भी,
आ एक ऐसी तेरी-मेरी मुलाकात लिखूँ।।

आ इन आंखों में कुछ राज़ लिखूँ,
आ इन गीतों के अल्फ़ाज़ लिखूँ,
मिलकर फिर बिछड़ ना सके कभी हम,
आ ऐसी कुछ खुदा-ए-करामात लिखूँ।।

लिखूँ दिल मे धड़कन सा तुझे,
लिखूँ मौसम-ए-सावन सा तुझे,
कैदकर के रख लूं कहीं खुद में "चौहान",
आ इस जिस्म में तुझे जान सा लिखूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।




Friday, 28 September 2018

"कड़वा सच" (KADWA SACH)


वजूद अपना भूल सब खुद को परवरदिगार समझ बैठे है,
महज़ कठपुतली है वो जो खुद को कलाकार समझ बैठे है।।

नुक्स निकल देते है उसमे भी जो दुनिया तराश के बैठा है,
दूसरों की ज़िंदगी पर तो वो खुद को हक़दार समझ बैठे है।।

हर बात पर तर्क- वितर्क कर लेते है आज यहाँ बच्चे भी,
नादान है समझते है के सूरज को दीपक दिखाकर बैठे है।।

खुद की उलझनों से ही नही सुलझ पाते है आजकल वो लोग,
जो खुद को किसी के भविष्य के शिल्पकार समझ बैठे है ।।

अपने अहम को अपने अतीत से जोड़ कर रखना "चौहान",
राख पड़े है शमशान में वो भी जो खुद को भगवान समझ बैठे है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 26 September 2018

"फ़र्क तब पड़ेगा" (FARK TAB PADEGA)


मुहोब्बत आज हमें है तुमसे,
जब कभी तुम्हे किसी से होगी,
फर्क तब पड़ेगा।।
गुज़ार लेंगे हम तो ज़िन्दगी तेरे इंतज़ार में
जब राह तुम किसी की देखोगी,
फर्क तब पड़ेगा।।
हम तो कर लेंगे दोस्ती तन्हाई से अपनी,
बेचैन रात भर जब तुम रहोगी,
फर्क तब पड़ेगा।।
निभा लेंगे रिश्ता खामोशी से भी अपना,
बातें तस्वीरों से जब तुम करोगी
फर्क तब पड़ेगा।।
कोई गिला नही मुझे बर्ताव से तेरे
जब कोई तुझसे बात तेरे लहज़े में करेगा,
फर्क तब पड़ेगा।।
ज़रूरत अपनी अपनी है इश्क़ यहाँ,
जब ज़िन्दगी कोई तुम्हारी बनेगा
फर्क तब पड़ेगा।।
मैं तो चल दिया तेरे बिछाये अंगारों पर भी,
चलना इश्क़ की राह में जब तुझे पड़ेगा,
फर्क तब पड़ेगा।।
क्या हुआ आज गम तेरे चाहत है हमारी,
जब हसरत किसी के गम की तू करेगा
फर्क तब पड़ेगा।।
कभी कोई शिकायत हुई ही नही तुझसे,
जब शिकायतें कोई तेरी बनेगा,
फर्क तब पड़ेगा।।
कबुल है हँस कर हमें तेरे दिए ज़ख़्म,
मरहम जब कोई तेरा बनेगा,
फर्क तब पड़ेगा।।
माना के आज तुम्हे कोई फर्क नही पड़ता,
जब दुनिया मे "चौहान" ना रहेगा ,
फर्क तब पड़ेगा।।


शुभम् सिंह चौहान,
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Monday, 24 September 2018

"अंजाम"(ANZAAM)


अब तो इस कहानी का अंजाम लिख दे,
बहुत चल लिया अब आराम लिख दे।।

कई बरसों से दिन से रात है रात से दिन,
मेरे हिस्से में अभी अब कोई शाम लिख दे।।

बस दर्द ही देने है मुझे तो फिर आँसू ना देख,
नासूर कर दे या इन ज़ख़्मो में आराम लिख दे।।

जाने भी नही देता और जान भी नही लेता ,
प्यार ना सही जज़बातों में इंतकाम ही लिख दे।।

गर मिलाया है मुझसे तो मेरा बना भी दे उसे,
या इन लकीरों में अब मौत का ही नाम लिख दे।।

कब तलक लिखता रहूंगा यूँ फसाने मुहोब्बत के ,
अब तो कलम से तेरी मेरा कोई मुक़ाम लिख दे।।

कर दे रूह उसके नाम 'गर सच्ची है इबादत मेरी,
या हिस्से में "चौहान" के आज शमशान लिख दे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 21 September 2018

"ये रात" (YE RAAT)


ये जो रात है ,इस रात में ,कोई बात है , इस रात में ,
मेरे ज़हन में ,जज़्बात में , कोई साथ है, इस रात में।।

बादलों में छुपकर देख रहा है चाँद आज ज़मी पर,
ये कैसा नूर दिख रहा है आज धरती पर इस रात में।।

आँखो में कई सवाल है पर लबों पर खामोशी है आज,
कोई सिमट गया है मेरी बाहों में आकर इस रात में।।

बह गए है आज गम सारे यूँ आँखों से अश्क़ बनकर,
हक अत्ता हो रहा है नमाज़ का मेरी जैसे इस रात में।।

अब जान भी निकल जाए तो क्या परवाह "चौहान",
कोई जिस्म में समा गया मेरी रूह बनके इस रात में ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 19 September 2018

"शायर" (SHAYAR)


लिखने वाले तो हर वक़्त लिख लेते है ,
मैं तो बस तन्हा रातों को लिखता हूँ।।

शायर तो वो हैं जो हर हाल पर लिख लेते है,
मैं तो बस तेरे-मेरे जज़बातों को लिखता हूँ।।

नही आती मुझे बातें चाँद तारों की करनी ,
बस मैं तो बात तेरे दीदार की लिखता हूँ।।

नही पता नशा क्या होता है महखाने की शराब का,
मैं तो तेरे इस नूरे-हुस्न के शबाब पर लिखता हूँ।।

वो स्याही और होगी फीके पड़ जाते है अल्फ़ाज़ जिसके,
मैं तो लहू से अपने हाल-ए-दिल की किताब लिखता हूँ।।

लिखा तो कई दफ़ा पर कभी भेज ही नही पाया तुम्हे,
दफ़न होकर रह गयी ख़त में जो आज वो बात लिखता हूँ।।

क्या करूँ गर कोई समझ ही नही पाता मेरे जज़बातों को,
मैं तो अक्सर चींखती खामोशियों की आवाज़ लिखता हूँ।।

हाँ कुछ अनकही बातों ने "शायर"बना दिया "चौहान",
पर कौनसा ग़ालिब की तरह इश्क़ का ख्वाब लिखता हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Sunday, 16 September 2018

"ज़ख़्म" (ZAKHAM)


तन्हाइयों की आग में पल पल जलता रहा,
ज़ख़्म गहरे थे और मैं अंगारों पर चलता रहा।।

शायद कुछ मज़बूरी ही रही होगी दिल की,
तुझे रोशन करने को मैं मोम-सा पिंगलता रहा।।

देखते देखते शमशान बन गया मेरे दिल का शहर,
ख्वाइशें मेरी मरती रही और मैं दफ़न करता रहा।।

धागे कच्चे तो क्या, मोती कोहिनूर थे सपनो के मेरे
कहीं टूटे ना जाये इसलिए मैं टूट के बिखरता रहा।।

तेरी आरज़ू ने जीने की ख़्वाईश पैदा कर दी मुझमे,
और तेरे संग जीने की चाहत में  हरपल मरता रहा।।

असलियत तो कभी लिख ही नही पाया "चौहान",
वहम था लोगो का की दर्द अपने मैं लिखता रहा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।






Friday, 14 September 2018

"बचपन और जवानी" (BACHPAN AUR JAWANI)


जवानी से मेरी आज वो लड़कपन रुठ गया ,
बड़ा क्या हुआ माँ का आँचल छूट गया ।।

दो आँसू बहने से हो जाती थी हर बात पूरी,
आज ज़ख़्मो पर भी अश्क़ बहाना छूट गया।।

कभी रुठ जाते थे तो मनाने आता था हर कोई,
आज लगता है कि मुझसे ये सारा जमाना रुठ गया।।

हर किसी के लिए खिलौने जैसा ही था मैं कभी,
आज बेखबर है वो के उनका ये खिलौना टूट गया ।।

उम्र का पड़ाव था बिन बात हँस लेता था "चौहान",
आज लगता है जवानी से हँसी का नाता ही टूट गया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Tuesday, 11 September 2018

"रोई होगी" (ROI HOGI)


तू भी कहाँ फिर रात भर सोई होगी,
याद करके हर पल को तू भी तो रोई होगी।।

कहाँ छुपा कर रखें तूने  टूटे हुए ख़्वाब,
राख अरमानों की कहाँ पर संजोई होगी।।

मिटना चाहा होगा तुमने भी हाथों की लकीरों को,
खुशबू हाथों से हाथों की कहाँ अब तक खोई होगी।।

तड़पी होगी फिर रूह तेरी रूह से ज़ुदा होकर,
चादर फिर तूने अपने अश्क़ों से भिगोई होगी।।

फिर कहाँ करार आया होगा दुनिया के ऐशोआराम में,
जब चौहान" वो तेरी कब्र से लिपट कर सोई होगी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।




Sunday, 9 September 2018

"तुमसे शिकायत" (TUMSE SHIKAYAT)


तुमसे शिकायत है कि तुम हमे मिलते नही,
हाँ ये दर्द अकेले मुझसे अब संभलते नही।।

इस नींद को बोले दे आना है तो बस जाए ना कभी,
खुली आँखों के ये ख़्वाब अब हमसे पलते नही।।

खामोशी की लगाम रखना अपने जज़बातों पर,
ये घोड़े ख्यालातों के हक़ीक़त में चलते नही ।।

जाओ कोई उन्हें सुना दो गर्जना इन बादलों की ,
जो ये सोच कर बैठे है गर्ज़ने वाले कभी बरसते नही ।।

फिर कैसे काले पड़ गए पन्ने मेरी इस किताब के ,
'गर वो सच कहते है कि वो अब इसे पढ़ते नही ।।

ले आओ उन्हें भी आज कब्र पर मेरी "चौहान" ,
जो कहते है इश्क़ करने वाले कभी मरते नही ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।




Wednesday, 5 September 2018

"काश" (KAASH)


काश के मेरे खुदा कोई अब चमत्कार हो जाये,
पल भर ही सही उनको भी हमसे प्यार हो जाये।।

क्या होती है बेकरारियाँ ,ये तड़प जाने वो भी,
उनका भी अब मेरे बिन जीना दुश्वार हो जाये।।

रहूँ रमज़ान में भूखा इबादत में खुदा के मैं,
जो पालूं एक झलक उसकी मेरा इफ़्तार हो जाये।।

बैठ कर करे बातें रात भर चाँद तारों से फिर वो,
आमना -सामना तन्हाइयों से एक बार हो जाये।।

पार कर ले आग का दरिया फिर हम दोनों,
माँझी बनूँ मैं और वो मेरी पतवार हो जाये।।

हीर रांझे ,लैला मजनू जैसी मुहोब्बत ना भी हो चाहे,
पर मेरे जिस्म मेरे रूह की वो हक़दार हो जाये।।

भले ही वो आये शब-ए-वस्ल पर मिलने हिज़ाब में ,
आंखें भी मिले ऐसे के रमज़ान में इफ़्तार हो जाये।।

समझ लिया मुहोब्बत को हमने जिस तरहा "चौहान",
काश वो भी थोड़ी-बहुत अब समझदार हो जाये।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम- दिल की ज़ुबाँ।।




Saturday, 1 September 2018

"मेरी खोई किताब" (MY LOST BOOK)


कुछ मिल गए कुछ बाकी है, पन्ने मेरी खोई किताब के,
कुछ जल गए कुछ बाकी है,पन्ने मेरी कोई किताब के।।

हर कहानी हर किस्से हर सपने पूरे होते थे कभी इसमें,
मेरी तरह सब कुछ अधूरे हैं आज मेरी खोई किताब के।।

कभी संभाला भी था तो कभी बच्चों सा पाला भी था ,
बचपन की तरह ही हो गए पन्ने मेरी खोई किताब के।।

कभी महके है हवाओ में तो कभी बिखरे भी है हवा से,
बेमौसम फूलों से हो गए पन्ने मेरी खोई किताब के।।

कुछ ज़हन में अड़ गए कुछ ज़ुबाँ पर लोगो की यूँ चढ़ गए,
चर्चे आज महफ़िल-ए-आम हो गए है पन्ने मेरी खोई किताब के।।

नाम होकर भी गुमनाम रहा एक अरसे तक "चौहान",
राख क्या हुआ मेरी पहचान ही बन गए पन्ने मेरी खोई किताब के।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 28 August 2018

"तुम मत बदलना" (TUM MAT BADALNA)


हवाएँ रुख बदलेंगी तुम मत बदलना,
रहगुज़र ज़िन्दगी की है ज़रा संभालना।।

याद रहना तुम सावन की बारिश की तरहा,
बेमौसम बारिश की तरह तुम मत बरसना।।

माना उम्मीदें हज़ार है आज तुझे इश्क़ में उनसे,
इश्क़ करना बेपनाह पर हद से मत गुज़रना।।

बहुत मसक्कत से पहुचे हो इन ऊंचाइयों पर,
झरने की  तरहां यूँ पल भर में मत बिखरना।।

राख बना खुद को मिटा डाला जिसने तेरी खातिर,
क्या था तेरा "चौहान" में फिर तुम खुद ही परखना।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।





Saturday, 25 August 2018

"मेरी बहन - मेरी जान" (MERI BEHAN -MERI JAAN)


मेरे आँगन की तुलसी है तू तो मेरे घर की लक्ष्मी है,
हर भाई के हाथों पर तो तू राखी की पहचान है।।

चुलबुली सी है नटखट भी है वो हम मेरी शान है,
माना कभी कह नही पता पर मेरी बहन मेरी जान है।।

सताता हूँ तो मनाता भी हूँ, रुलाता हूँ तो हँसता भी हूँ,
छोटी है और प्यारी है हाँ मेरा वो मेरा अभिमान है।।

पापा की फटकार से बचाती है कभी छोटी बात से चिढ़ जाती है,
ज़िद्दी तो है वो अपनी चीजों को लेकर पर वो मेरा एकलौता जहान है।।

यूँ तो चिल्लाना उसे सुनाई नही देता कभी मेरा ,पर खामोशी पढ़ जाती है,
दोस्त बन साथ निभाती है कभी वो, मेरा वो गुमान है।।

कभी गलती कर मेरी पीठ पीछे छुप जाती है, कभी अपनी गलती मेरे सिर कर जाती है,
दिखने में तो प्यारी सी है वो ,पर सच कहूं तो बड़ी शैतान है।।

अपनी खुशियों का शहर मुझमे देखती है, हक भी जताती है कभी डर से ना कहती है,
तेरी खुशियों की खातिर तो "चौहान" की जान भी कुर्बान है।।

हर वक़्त तेरे संग खड़ा हूँ मैं,मेरे सिर का तू ताज़  है,
माना कभी कह नही पता पर मेरी बहन मेरी जान है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 21 August 2018

"कोई तो है" (KOI TO HAI)


डगमगा तो आज भी रहे होंगे कदम उनके,
कोई तो है जो थाम कर हाथ उनका चल रहा है।।

जज़बातों से अपने अब भी हो रही होगी बहस,
कोई तो है जो अब ख्वाइशों पर हावी हो रहा है ।।

ये चाँद अब अकेला नज़र ना आता होगा रात को,
कोई तो है जिसकी बाहों वो हमें भूल कर सो रहा है।।

अब उस पर  ज़ख्मों का भी असर ना रहा होगा,
कोई तो है  जो उसके लिए मरहम सा हो रहा है।।

आज दूरियां युहीं तो नही बढ़ रही "चौहान",
कोई तो है जो तेरी कमी पूरी कर रहा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 18 August 2018

"ख़त"(KHAT)


कभी हिम्मत ना हुई भेजने की तुम्हें,
ख़त तो रोज़ लिखे थे मैंने तेरे लिए।।

देख ही लेते एक दफा आंखें खोलकर ज़रा,
चोंखट पर थी खुशियां कबसे सवेरे लिए।।

चाँद तारे तो ना ला सके कभी हम इश्क़ में,
रात जुगनुओं से आशियाँ सजाया था तेरे लिए।।

क्या हुआ तुम दिन बन गए और मैं काली अंधेरी रात,
कोशिश तो बहुत की मैंने शाम सा वस्ल होने के लिए।।

मुहोब्बत की आग लगा तुम तो कर गए किनारा हमसे,
एक अरसे जलाया है खुद को राख बनाने के लिए।।

तुझ पत्थर को ना पिंघला पाया कभी "चौहान",
शिद्दत देख तो खुदा खुद ज़मी पर आ गया मुझे लेने के लिए।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



Tuesday, 14 August 2018

"आज का हिंदुस्तान" (AAJ KA HINDUSTAN)



जितना हिंदुओं ने सींचा है अपने रक्त से ,
उतना खून यहाँ मुस्लिम सिख ईसाइयों ने बहाया है ,
सच कहा है किसी के बाप का नही हिंदुस्तान,
इसे इंसानियत की एकता ने बनाया है।।

माता कहकर पूजा भी है इसकी धरती को हमनें,
ध्वज के आगे शीश हम सबने अपना झुकाया है,
जो मिट जाते है इस देश की आन बान शान पर ,
कभी उनसे पूछो उन्हें शहीदी का धर्म क्या बताया है ।।

सियासत के बाटों में पीस रहे है आज दो धर्म यहाँ,
क्या फर्क पड़ता है राम मंदिर बने या बाबरी मस्जिद,
जहां इंसानियत है वहां तो देखा है मैने की आज तक,
क्रिसमस का जश्न भी दीवाली, ईद जितना मनाया है।।

मार दिया है हमने खुद को इस बनावटी दुनिया पीछे,
एक हरिश्चंद्र अपना सब कुछ दान करके भी चुप था,
एक आज का दौर है के है ये दिखावे का भारत,
किसी को खाना खिलाया तो वो भी बढ़-चढ़ के दिखाया है।।

अरे यूँ तो कोई फर्क नही पड़ता किसी को कोई जिए कोई मरे,
अपने अधिकारों के लिए भी इंतज़ार है कोई और आके लड़े,
लूट जाती है इज़्ज़त कहीं छुपकर तो कहीं शरेआम,
मोमबत्ती जला दो दिन कहते है हमने भी लड़ के दिखाया है।।

नानक, पीर, साईं,राम, सबका यहां  बसेरा था,
नदियाँ भी माता थी ,सोने की चिड़ियाँ देश मेरा था,
हैवानियत की क्या बात कहूँ हाल देख का ,
बताने से तो आज अखबार भी कतराया है।।

कैसे ना करुँ ज़िक्र तेरा अपनी बेज़ुबान कलम से मैं,
ख़ामोश फांसी के तख्ते पर कोहराम तेरी शहादत ने मचाया है,
वो हिन्दुस्तान कोई और था भगत सिंह, ध्वज जिसपर
आजादी का तेरी शहादत ने लहराया है।।

छोड़ "चौहान" बातें सच्ची है कहीं कड़वी ना लग जाये,
सियासती अंधे है लोग यहां कहीं तुझसे ना लड़ जाए,
सोच की गुलामी में कैद है ये जिस्म से आज़ाद लोग,
सोचते है 15-अगस्त-1947 को देश में इन्कलाब आया है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 12 August 2018

"राज़ कोई" (RAAZ KOI)


गर बयाँ कर दिया हाल-ए-दिल कलम से तूने अपनी,
तो क्या है जो इन आंखों में छुपा रखा है।।

क्या ऐसा है जो लिपट गया है तुझे चंदन समझ कर,
किस खुशबू को तूने अपनी साँसों में बसा रखा है।।

कैसी ये तेरी खामोशी है के ख़ामोश होके भी ख़ामोश नही होती,
कौन है वो अब तलक जिसे नज़रों से ज़माने की बचा के रखा है।।

कैसी रहगुज़र है फिर यहाँ 'गर वीरान है वो तेरे दिल शहर,
कौन है वो जिसने तेरे दिल के आशियाने में कोहराम मचा रखा है।।

'गर आसमान का होता तो फिर नज़र आता यहां सबको,
कोई तस्वीर है चाँद की ये जिसको तुमने दीवारों पर लगा रखा है।।

ना होता दर्द कोई तो फिर कब का छोड़ देता लिखना "चौहान",
कोई तो है जिसके खातिर खुद को तूने मिटी में मिला रखा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 8 August 2018

"माँ नही होती" (MAA NHI HOTI)


अब लोरी नही गाता कोई ये आंखें रात भर नही सोती,
कैसी होती है ज़िन्दगी उनकी जिनकी माँ नही होती।।

सुनी है चोंखट मेरे घर की ,मेरे आने की अब किसी को फिक्र नही होती,
खुले दरवाज़े आज बंद मिलते है,राह देखती दरवाज़े पर अब माँ नही होती।।

हाल भी अब मेरा कोई नही पूछता, माथे का पसीना दुप्पटे से कोई नही पोंछता,
कोई नही रखता हाथ मेरे सिर पर, किसी को मेरी परेशानियों की भनक नही होती।।

पापा की डाँट से भी कोई नही बचता,चुपके से मेरे हाथ मे पैसे कोई नही दबाता,
नींद से तो माना पहले भी अनबन थी ,पर अब सिर रखने को कोई गोद नही होती।।

अब कोई नही पूछता मुझसे सपने मेरे, अब बेमतलब के मेरे लिए दुआए नही होती,
कोई नही रखता रोज़े उपवास मेरे ख़ातिर, मेरे दर्द में अब कोई आंखें नही रोती।।

सोच कर ही डर लगता है "चौहान",जिनके सिर पर ममता की चादर नही होती,
मेरी माँ को पास मेरे रहने दे ताह उम्र खुदा, हर किसी की चाहत दौलत शोहरत नही होती।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।




Monday, 6 August 2018

"मेरी कहानी-मेरा सच" (MERI KAHANI - MERA SACH)


हाँ यूँ तो बहुत दूर आया हूँ मैं,
कुछ रिश्ते करके चकनाचूर आया हूँ मैं ,
ख़्वाबों की चमक ने अंधा कर दिया मुझे,
खुद से थोड़ा होके मग़रूर आया हुँ मैं,
कही किसी का आँचल छोड़ आया ,
कही वो बचपन का आंगन छोड़ आया,
कहीं छोड़ आया फिक्र किसी की आंखों में
कहीं दिल किसी का तोड़ आया हूँ मैं,
हाँ यूँ तो बहुत दूर से आया हूँ मैं....

यूँ तो पहले छोटी छोटी बात पर भी अड़ा हूँ मैं,
क्या कहूँ ख़्वाबों की चाहत में नींद से भी लड़ा हूँ मैं,
समझौता करना तो किसी ने सिखाया ही नही,
घर आने की ख़्वाईश में घर से हो दूर चला हूँ मैं,
हाँ उम्र से पहले हालातों ने बड़ा कर दिया,
गिरने के डर ने आज इन ऊँचाई पर खड़ा कर दिया,
किसी का कर्ज कभी उतार ही नही पाया मैं,
किसी का बन के आज गुरुर आया हूँ मैं,
हाँ यूँ तो बहुत दूर आया हूँ मैं....

रिश्ते बनाये ही नही यहां रिश्ते संभाले भी है मैंने,
दिल को दिलासा दे कुछ वहम भी पाले है मैंने,
ज़िक्र नही करता ज़ुबाँ और कलम से कभी उनका,
जो सोचते है उनसे मतलब अपने निकाले है मैंने,
सलीका जीने का नही बदला अब तलक मैंने,
ज़ख़्मो को अपने बना के नासूर आया हुँ मैं,
दीये बुझ गए है पर टूटे नही मेरे जुनून के,
इन दियों में भरने "चौहान" नूर आया हूँ मैं,
हाँ यूँ तो बहुत दूर आया हूँ मैं ...

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 1 August 2018

"ख़्वाब मेरी माँ के" (KHAWAB MERI MAA KE)


जो आंखें रात भर फिक्र में मेरी सोई नही ,
उनमे सुकून की नींदे भर देना ,
ज़्यादा कुछ नही मांगता तुझसे मेरे खुदा,
छोटे-छोटे ख़्वाब हैं मेरी माँ के वो पूरे कर देना।।

जिन हाथों ने पाला है दर्द मेरा हर एक संभाला है,
आज सारे दुख दर्द उसके मुझे दे,
दामन में उसके खुशियां भर देना,
ज़्यादा कुछ नही मांगता तुझसे मेरे खुदा,
छोटे- छोटे ख़्वाब हैं मेरी माँ के वो पूरे कर देना।।

अपने आँचल में जिसने मुझे सुलाया है , भूख मारकर खुद की अपना निवाला मुझे खिलाया है,
उसकी राहों में बारिश फूलों की कर देना,
ज़्यादा कुछ नही मांगता तुझसे मेरे खुदा,
छोटे- छोटे ख़्वाब हैं मेरी माँ के वो पूरे कर देना।।

जिसने आदमी से मुझे इंसान बनाया है , जीने का जिसने सलीका सिखाया है,
उसका सिर ना झुके कभी कुछ ऐसा कर देना,
ज़्यादा कुछ नही मांगता तुझसे मेरे खुदा,
छोटे- छोटे ख़्वाब हैं मेरी माँ के वो पूरे कर देना।।

जो ममता का सार है , हर दर्द में निकलती पुकार है,
स्वरूप भगवान का जो "चौहान" के लिए,
मेरा जीवन अर्पण उसके चरणों मे कर देना,
ज़्यादा कुछ नही मांगता तुझसे मेरे खुदा,
छोटे- छोटे ख़्वाब हैं मेरी माँ के वो पूरे कर देना।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।





Saturday, 28 July 2018

"शायद" (SHAYAD)


अब नही सोती वो वक़्त पर रातों को शायद ,
 ख़्याल उसको अब नींद का आया ना होगा।।

मुहोब्बत समझ आने लगी है अब उनको शायद,
मेरी तरह किसी ने हर-पल उसे रुलाया ना होगा।।

अब शायद कोई सहारा भी मिल गया होगा,
उस कस्ती को शायद किनारा भी मिल गया होगा।।

शायद अब वो मेरी फिक्र में बेचैन नही होती,
शायद अब वो मेरी बात से खफा हो अकेले में नही रोती।।

शायद अब उसे बार-बार मेरा फिक्र करना सताता ना होगा,
शायद अब बात किसी की सुन कर चहरा मेरा याद आता ना होगा।।

उसकी महफ़िल में तो कभी कमी ही ना थी मेहमानों की,
शायद तभी रुठ कर जाना मेरा याद उसे आया ना होगा।।

लिखने बोलने से तो कहाँ नफरत हुई होगी उसे "चौहान",
याद कर शायद तेरा लिखना सुनना ही उसे भाया ना होगा।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।




Tuesday, 24 July 2018

"इश्क़ तेरा मेरा" (ISHQ TERA MERA)


दूर कहीं शोरोगुल में सहमी सी खामोशी है मेरी,
मेरी उन्ही खामोशियों का शोर है इश्क़ तेरा मेरा।।

जो कभी टुट ही नही पाई हम दोनों के दरमियाँ,
सच्चे रिश्ते की ये कच्ची डोर है इश्क़ तेरा मेरा।।

वो वक़्त जो कहीं थम सा गया था मेरे खातिर,
उस वक़्त में उन्ही हालातों का जोर है इश्क़ तेरा मेरा।।

तेरे बिना यहाँ मैं अधूरा और मेरे बिना वहाँ तुम,
संगीत में सुर और ताल सा बंधन है इश्क़ तेरा मेरा।।

कहाँ समझ आएगा "चौहान" ज़माने को आसानी से ,
ताल रूपक का सम होता जा रहा है इश्क़ तेरा मेरा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 20 July 2018

"दूर ना जाओ"(DOOR NA JAO)


दूर ना जाओ हमसे जिया नही जाएगा,
ज़ख़्म ये जुदाई वाला सिया नही जाएगा,
क्यों आंखें नम है मेरी फिर पूछेंगे सब,
पर हाल-ए-दिल बयाँ अपना किया नही जाएगा,
जी लोगे तुम तो मेरे बेगैर पहले भी जीते थे,
पर हमसे तो एक पल भी अब जिया नही जाएगा,
माँगा था साथ कुछ पल का पर वो भी गवारा नहीं,
कैसे कहूँ बेबसी का ये जहर पिया नही जाएगा,
देखता हूँ अक्ष तेरा हर एक चहरे में ,
ख़्वाब तेरा ही रहता है हर नींद के पहरे में ,
हर एक साँस माँगती है तुझे,
अब खुदा खुद तू ही आके बता दे उसे ,
"चौहान" से उसके बिना जिया भी नही जाएगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Monday, 16 July 2018

"अलविदा ज़िन्दगी" (ALVIDA ZINDGI)


नफरतें मैं निभा रहा हुँ तुझसे , नफरतें तू भी निभा,
ले कह दिया अलविदा ज़िन्दगी अब तो दूर चली जा।।

किस हद्द तक गुज़र गया हूँ मैं मंज़िल की तलाश में,
अब रास्तों से मुहोब्बत है मुझे मंज़िल ना दिखा।।

सलूक मेरे जैसा ही कर मेरे साथ भी 'गर वफ़ाएँ है,
यूँ बार-बार ज़िन्दगी जीने का मुझे सलीका ना सीखा।।

बना दे राख या कर दे दफ़न मेरे सपनों की तरहा ही,
खाक कर दे मुझे सौ दफ़ा पर यूँ बार-बार मिट्टी में ना मिला।।

कल भी था "चौहान", कायम आज भी अपने इरादे पर है ,
माना हार गया हूँ तुझसे अब यूँ मुझपर रहमतें ना दिखा।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 12 July 2018

"खुदा और मुहोब्बत" (KHUDA AUR MUHOBBAT)


अलग है तो फिर कैसे है तू बता मुझे,
खुदा और मुहोब्बत बात तो एक ही है।।

सागर नदी में मिले या नदी सागर में ,
मिलकर होना तो दोनों को एक ही है ।।

ज़िक्र तेरा मेरी बातों में हो या किताबों में,
फ़साना मुहोब्बत का तो एक ही है ।।

ख़्वाब टूटे मेरे या टुट के बिखरे दिल मेरा,
अलग क्या है हालात तो दोनों में एक ही है।।

कलमा पढूं, गीता पढूं , या आयात पढूं कुरान की,
बात मज़हब की है इबादत तो एक ही है ।।

जल के राख हो जाऊं या दफ़न हो जाऊं मिट्टी में,
इश्क़ में मिटना है "चौहान" बात तो एक ही है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम-दिल की ज़ुबाँ




Sunday, 8 July 2018

"क्या लिखूँ" (KYA LIKHUN)


आज कुछ लिखने को नही था,
फिर भी कलम उठा कर सोचता रहा,
सोचता रहा रात भर के क्या लिखूँ??
फिर कहीं दूर दिल मे झांक के देखा,
तो मुझे सिर्फ तेरा ही ख्याल आया,
सोचा आज कुछ लिखूँ तेरे बारे में ,
पर ना जाने क्यों कलम थम गई मेरी,
और सोचता रहा युहीं रात भर,
तेरी बेपरवाही लिखूं या बेवफाई लिखूँ,
बस इसी मज़लिश में रात भर जागता रहा,
और सोचता रहा के क्या लिखूँ??
आंखें बंद करके जब भी देखा,
बस एक तेरी सूरत नज़र आयी,
जब लिखना चॉहा की क्यों तेरा अब तक इंतजार है,
फिर सोचने लगा क्यों मुझे अब तलक तुझसे प्यार है,
क्यों ना जान सके तुम वफ़ा-ए-मुहोबत,
कैसे मुहोबत अपनी किसी और के नाम लिखूँ,
कैसे अपने हाथों अपनी मुहोबत पर इल्ज़ाम लिखूं,
निकल ही नही पाया तेरे ख्यालों से कभी "चौहान",
गुज़ार दी ना जाने कितनी रातें युहीं तन्हा,
और सोचता रहा के क्या लिखूँ??

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 4 July 2018

"बारिश" (BARISH)


ये बारिश सावन की रुलाये मुझको ,
ये भीगी भीगी बूंदे जलाए मुझको।।

बिखरे मुझपर यादें बनकर तेरी ये तो,
रोकूँ कैसे इनको रोक ना पाऊं खुद को।।

आँखों से निकले ये हाथोँ पर भी ना ठहरें,
हाल-ए-दिल अपना, अपना मैं सुनाऊँ किसको।।

भीगा के मुझको अब तो एहसास ये ऐसा दिलाये,
बहाने बारिश के जैसे मैं सीने से लगाऊं तुझको।।

मरहम है या ज़हर है समझ में ही ना आये मुझे,
जला बूंदों से "चौहान", ये ठंडी हवाओं से बुझाये मुझको।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...