Sunday, 31 May 2020

"क्यूँ" (KYU)


हक़ीक़त कुछ और है ,वो नही है जो सबको नज़र आती है,
टूट जाते है रिश्ते, दो दिन बात ना हो तो बातें बढ़ जाती है।।

कोई पास रहकर भी पास नही होता,ना कोई दूर होकर भी दूर,
दूरिया खुद ढूंढ लेते है, जब नजदीकियां हद से ज़्यादा बढ़ जाती है।।

बात किसी को देखने ना देखने की नही है दिल मे उतर जाने की है,
वरना नज़रो का क्या है अच्छी बुरी हर अनदेखी चीज़ पर ठहर जाती है।।

मैं लिखता रहूँ तुम पढ़ते रहो ये लिखे फ़साने मेरे,पर होगा क्या,
शायरी तो वो है "चौहान" जो लबों से उतर के लबों पे ठहर जाती है।।

कोई पार कर गया है इस राह को तो एक दफा आकर मुझसे मिले,
मैं भी तो देखूँ ये गली मुहोब्बत की आखिर में कहाँ तक जाती है।।

ख्वाइशें जिस्म की करो तो लाखों मंज़िले है इस तन्हा सफर में ,
रूह की ख्वाइशें की ज़िंदगी क्यों मंज़िलो की चाह में गुज़र जाती है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 28 May 2020

"इंसानियत ज़िंदा है" (INSAANIYAT ZINDA HAI)



यहाँ जब हर कोई एक दूसरे पर तोहमतें लगा रहा है,
एक शक्श मैंने देखा जो अँधेरे में रास्ता दिखा रहा है।।

ये ना किसी सियासत में है ना किसी दल का प्रमुख,
फिल्मों का खलनायक,नायक के काम कर दिखा रहा है।।

वो पैसे लेकर भी उनको घरों तक ना पहुँचा सके,
एक शक्श बिना पैसे लिए सबको घर पहुँचा रहा है।।

तुम्हारे दानराशि का उपयोग आंकड़ों में सिमट गया,
फर्क नियत का है जो बिना दान काम किया जा रहा है।।

सब सियासी खेल है अनुमति मिलना या ना मिलना,
काम इंसानियत का सियासतों को तमाचे लगा रहा है।।

पैसा इतना तो नही लगता के तुम्हे सोचना पड़ जाए,
एक विलन का काम देख रोता गरीब मुस्कुरा रहा है।।

कोई तो है "चौहान" जिसका ज़मीर ज़िंदा है यहाँ आज भी,
तभी आज "सोनू सूद" में गरीबों को भगवान नज़र आ रहा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 26 May 2020

"पूछा करो तुम " (PUCHHA KRO TUM)



क्या ख़बर कब किसकी नज़र लग जाए,
मुझसे मेरे ये ख़्वाब ना पूछा करो तुम।।

मैं जिसपर हूँ उस राह की मंज़िल नही कोई,
मुझ काफिर की जात ना पूछा करो तुम।।

किसी की मुहोब्बत ने ज़िंदा रखा है मुझे,
मुझ फ़क़ीर के हालात ना पूछा करो तुम।।

ना जाने कब ये आँखे बेक़ाबू हो जाये,
मुझसे मेरे जज़्बात ना पूछा करो तुम।।

बड़ा सुकून मिलता था आगोश में उसकी,
मुझसे वो इश्क़-ए-रात ना पूछा करो तुम।।

मेरी कलम देती है आजकल परिचय मेरा,
मुझसे मेरी औक़ात ना पूछा करो तुम।।

लिखने पर आया तो जला के ख़ाक कर दूँगा,
"चौहान" कलम की बिसात ना पूछा करो तुम।।

कलाकार हूँ अपनी कला में ही जीता हूँ,
मुझसे यूँ मेरा ईमान ना पूछा करो तुम।।

मैं राम को भी मानता हूँ राहीम को भी,
मुझसे मेरा भगवान ना पूछा करो तुम।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 24 May 2020

"क्यूँ??" (KYU??)


अब कहाँ काली तुम अपनी ये रात करते हो,
हम तो सो जाते है तुम्हारा इंतज़ार करते करते,
तुम ये रात भर फिर किस से बात करते हो??

ना जाने किन ख्यालो के गुम रहने लगे हो,
हमारी याद आती तो तुम बात कर लेते,
वो कौन है जिसे तुम आजकल याद करते रहते हो??

क्यूँ अब वो पहले की तरह जज़्बात नही है,
माना मिलने आ जाते हो साल में एक दफ़ा,
ये मिलना कैसा की आते ही जाने की बात करते हो??

इश्क़ दोनों ने किया था कोई सौदा तो नही,
हम किसी पिज़रें में कैद कोई पँछी तो नही,
के दिल बहला लिया और अब आज़ाद करते हो।।

अब प्यार से ज़्यादा तो गुस्सा आने लगा है तुम्हे,
कहीं साथ किसी और का तो नही भाने लगा है तुम्हे,
क्यों अब बातें कम और गलतियाँ ज़्यादा याद रखते हो??

अगर साथ मंज़ूर नही हमारा तो लौट जाएंगे हम,
अंज़ाम मौत है तो ये भी कर गुज़र जाएंगे हम,
क्यूँ इन पाक रिश्तों को तार-तार करते हो??

क्यूँ ये जिंदगी तुम्हे अब भाती नही है,
क्यूँ ये खुशियाँ तुम्हे नज़र आती नही है,
क्यूँ हर कलाम में कब्र और मशानो की बात करते हो??

कहाँ गया वो जो इश्क़ मुक्कमल लिखता था,
आजकल देखा मैंने लिखना भी तुम्हारा"चौहान"
बस मिलकर बिछड़ जाने की बात करते हो??

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 21 May 2020

"बचपन" ( BACHPAN)


कितना अच्छा था ,
कितना प्यारा था,
मेरा बचपन।।
माँ झूला झुलाती थी,
लौरी गा के सुलाती थी,
सबकी आँखों का तारा था मैं,
शरारतें भी बहुत करता था मैं,
पापा की डाँट से बचा,माँ
आँचल में छुपाती थी,
बेफिक्री में था वो मेरा जीवन,
कुछ ऐसा था मेरा बचपन।।

रोता था जब माँ स्कूल छोड़ के जाती थी,
खिलौनों के लालच दे मन मेरा बहलाती थी,
रो पड़ता था फिर जब माँ याद आती थी,
खेलता था जहाँ याद आता है वो आँगन,
कुछ ऐसा था मेरा बचपन।।

रात को दादा दादी परियों की कहानी सुनाते थे,
सबका मैं खिलौना था, जो माँगू वो लाते थे,
वो ज़िंदगी तो हसीन नज़र आती थी,
खुशियों और बेफ़िक्री में था मेरा जीवन,
कुछ ऐसा था मेरा बचपन।।

किसी भी बात की ना कोई फ़िक्र सताती थी,
आज ज़िंदगी बोझ सी लगती है,
माथे पर सिकन हरपल रहती है,
एक अनजानी सी फ़िक्र सताती है,
कुछ लम्हात खुदा हँसी के ला दे,
हो सकता है तो फिर से बचपन लौटा दे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 19 May 2020

"इश्क़ का सफर" (ISHQ KA SAFAR)


इश्क़ हसीन मुलाकातों का सफर,
उधर तू बेसबर, इधर मैं बेसबर।।

काटों से भरी मुश्किल ये डगर,
उधर तू बेखबर, इधर मैं बेखबर।।

दो पल के हमराही है हम,
फिर ना जाने तू किधर, मैं किधर।।

कहाँ कहाँ से होकर गुज़री है,
तेरी मेरी ज़िंदगी की रहगुज़र।।

कुछ ख़्वाब आरज़ू दफ़न हो गयी,
श्मशान बन गया दिल का शहर।।

अब तक कलम हाथ मे है "चौहान",
कुछ ऐसा था मुहोब्बत का असर।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 17 May 2020

"मज़बूर कौन" (MAZBUR KAUN)


मजबूर थे तभी आज राहों पर आ गए,
मसला रोटी ओर निजी जरूरतों का था,
साहाब!! बेमतलब कहाँ हम जान गवा गए,
भूख से मरते कैसे देख ले औलाद को अपनी,
तभी आज पैदल शहर से गाँव की और आ गए।।
बाहर से तो पानी और थोड़ी काई नज़र आती है,
दलदल का तो उन्हें पता है जो इसमें अंदर तक आ गये।।
ये रिवायतें हम गरीबों के लिए मिली ही कहाँ है,
हम देश मे होकर भी सड़कों पर भटकते रहे,
वहाँ लोग विदेशों से अपने घरों मे आ गये,
पेट की भूख, पाव के छाले , कहाँ नज़र आये ,
हम भक्षक आप वतन के रखवाले हो गए,
ये जो लोग शराब के लिए लाइने लगा रहे है,
कोई समझाएगा ये किनकी ज़िंदगी बचा रहे है,
कह रहे है पैसे आ रहे है खातों में गरीबों के,
हकीकत में गरीब खाते खुलवा कहाँ पा रहे है,
देखा मरते हुए उनको वो जो आत्मनिर्भर बने थे,
कही पटरी तो कहीं सड़को पे कुचले जा रहे है,
कर्ज़ मिल रहा है जो कल लौटाना भी पड़ेगा,
साहूकार बन बैठे है और सहायता आर्थिक बता रहे है,
बातें आज़ बूरी लगे मेरी तो अनदेखा कर देना,
समाज का हिस्सा है समाज को आईना दिखा रहे है,
ख़ैर छोड़ो ये सब लिखकर भी क्या होगा "चौहान"
ये कोई जादू का तो खेल नही आँखो का धोखा है,
सब देख रहे है तमाशा और ख़ामोश ताली बजा रहे है।।
एक अरसे से आखिर यही सब तो होता आया है,
मिट्टी चहरे पर लगी है और हम आईना चमका रहे है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 16 May 2020

"क़िताब-ए-ज़िंदगी"(KITAB-E-ZINDAGI)


मैं भुला नही हूँ, वो बीते दिनों की बात,
वो बुरे हालात ,मैं अब तक भुला नही हुँ।।

वो ख़्वाब,उम्मीद, हालात, जज़्बात,मुहोब्बत,नफरत,
दगा,साथ, सब याद है, मैं अब तक भुला नही हूँ।।

कुछ ख्वाबों को हक़ीक़त बनाने की कहानी,
कभी पानी संग रोटी,तो कभी सिर्फ पानी।।

वो सड़क पर बिताई एक अनजान शहर में रात,
वो ज़िंदगी के शिशे में नज़र आती मेरी औकात।।

वो कतरा कतरा करके हर रोज़ ज़हर पीना,
वो यारो संग हर हाल में मुस्कान लिए जीना।।

वो आठ किलोमीटर दूर साईं मंदिर से पानी लाना,
वो सारा दिन बस दो कप चाय के सहारे बिताना।।

वो काम के ख़ातिर रोज़ दर-ब-दर भटकना,
वो पहली नौकरी जैसे बंद मुकद्दर का खुलना।।

वो जो पहले बात बात पर नखरे शिकायत करना,
फिर एक रात शिकायतों को खुद में दफन करना।।

मेरी कहानी का ये एक छोटा सा किस्सा है,
पर मेरे वजूद का ये एक अहम हिस्सा है।।

छोड़ो पूरी कहानी मेरी, कभी फुर्सत में बताऊँगा,
अपने मुंह से नही ये कहानी जमाने से सुनवाऊंगा।।

अभी तलाश में हूँ उस राह की जो मंज़िल को जाती है,
पहुँचा तो "चौहान" की किताब-ए-ज़िंदगी भी सुनाऊँगा।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Wednesday, 13 May 2020

"हाल-ए-दिल" (HAAL-E-DIL)


अब हँसी ख़ुशी तस्वीरों में ठहर गयी ,
हकीकत में गुमशुदा है ना जाने किधर गयी ।।

बहुत सख्त बना कर रखे थे ये दरवाजे आँखो के,
आसुओं से टूट गए एक रात और बिखर गई ।।

तुझे जुदा हुआ के रूठ गया हूँ खुद से ही,
जिस्म ही बाकी है रूह तो कभी बिछड़ गयी ।।

अभी आया भी कहाँ था तूफ़ान तेरी यादों का,
मेरी दिल की बस्ती देख आज फिर उजड़ गयी ।।

सोचा था के एक रोज़ भुला ही दूँगा तुझे मैं,
इस सोच में भी कही तेरी याद उमड़ गयी ।।

क्या बताऊँ हाल क्या है"चौहान" इस मोड़ पर आकर,
एक कब्र के सामने आके ज़िंदगी ख़ामोश निकल पड़ी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 11 May 2020

"दो आँसू" (DO AANSU)


अब आंखों में आँसू आ भी गए तो क्या,
सब कुदरत का लिखा लिखाया है,
हर किसी के चहरे पर तो हँसी थी तब भी,
तू कौनसा दुनिया मे हँसता हुआ आया है।।

एक आदत ही तो है जो अब तक छोड़ नही पाए,
कभी माँ के आँचल तो कभी खेल खिलौनों के लिए,
दो आँसु आँखो में लाकर सब ऐसे ही तो पाया है,
अब आंखों में आँसू आ भी गए तो क्या,
सब कुदरत का लिखा लिखाया है।।

जब रोया दूध पिलाया जब रोया सीने से लगाया,
मेरी आँखों मे आँसू कभी हक़ीक़त थे कभी शरारते,
इन आँसुओ से तो मनचाहा बचपन मे सब पाया है,
अब आंखों में आँसू आ भी गए तो क्या,
सब कुदरत का लिखा लिखाया है।।

अब बस दौर बदला है कहानी में रवानी आ गई,
छूट गया बचपन अब जवानी आ गयी,
अब अश्क़ बहाते जरूर है पर दिखाते नही है,
अब ज़ख्मो पर मरहम छोड़ ,ज़ख्मो को ही छुपाया है,
अब आंखों में आँसू आ भी गए तो क्या,
सब कुदरत का लिखा लिखाया है।।

अब कहाँ कुछ मनचाहा रोने से मिल जाता है,
अब कहाँ फिर वो रोना हँसी में बदल जाता है,
अब सहरा है वो आँखो के सागर सुख गए है,
तू कहाँ अकेला है "चौहान" इस दुनिया में,
जिसने खुद में खुद को दफ़नाया है,
अब आंखों में आँसू आ भी गए तो क्या,
सब कुदरत का लिखा लिखाया है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 9 May 2020

"माँ- कल और आज"(MAA-KAL AUR AAJ)


खुद गीले में सो, मुझे सूखे में सुलाती थी,
जिसके आँचल की छांव में नींद सुकूँ की आती थी,

माँ तब भी वही थी, माँ आज भी वही है।।

खुद ना खाकर जो पहले मुझे खिलाती थी,
मेरी छोटी सी चोट पे आँखें जिसकी नम हो जाती थी,

माँ तब भी वही थी, माँ आज भी वही है।।

बाहर कहीं जाने पर मेरे घर आने की फिक्र सताती थी,
मुसीबतों में मुझको जो सबसे पहले याद आती थी,

माँ तब भी वही थी, माँ आज भी वही है।।

जिसको मैंने हर वक़्त अपने संग संग पाया ,
जिसकी बातों ने मुझे बेहतर इंसान बनाया,

माँ तब भी वही थी, माँ आज भी वही है।।

जिसके पैरों में अक्सर मुझको ज़न्नत मिल जाती है,
जिसकी सूरत में "चौहान" रब की सूरत नज़र आती है,

माँ तब भी वही थी, माँ आज भी वही है।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 8 May 2020

"ये कैसे लोग" (YE KAISE LOG)


सियासती खेल,सियासत वालों को ही समझ आते है,
हमारा क्या है हम तो बिना किसी बात पर लड़ जाते है।।

ये ना मंदिरों में आस्था रखते है ना मस्जिद-मज़ारों में,
इंसानियत का कत्ल कर हम तो धर्मो पर लड़ जाते है।।

रोते बिलखते देखा है मैंने दिनभर खाने के लिए उसको,
शाम को फिर कैसे ये महख़ानों के दरवाजे खटखटाते है।।

कुछ घर ऐसे भी है जहाँ चूल्हा ना जला है हफ़्तो से कई,
वो कौन से ग़रीब है जिनके खाते में सरकारी पैसे आते है।।

आग लग जाती है बड़े बड़े दफ्तरों में यूँ आजकल ,
हैरान हूँ,ये दस्तावेज अमीरों के ही कैसे जल जाते है।।

कोई कुछ करे तो भी गलत ना करे तो भी गलत,
आलोचनाएं करो, हमे तो इसमें ही मज़े आते है।।

कीमत उनसे पूछो जान की जो लड़ रहे सरहद, अस्पतालों में,
अजीब तरह के लोग देखे अपने ही घरों में रहने से कतराते है।।

बचना सब चाहते है इस दलदल में फ़सने से "चौहान",
इंतज़ार है किसी और का,हम खुद उतरने से कतराते है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 6 May 2020

"ये जान" (YE JAAN)


रुक भी गया हूँ, ठहर ही तो गया हूँ,
इन रास्तों का ही तो हूँ,
किस घर की बात करते हो तुम,
इस घर मे भी तो मुसाफिरों सा ही तो हूँ,
यूँ अब बेचैनी ना बढ़ाओ,
जज़्बातों को अब और ना दहकाओ,
ये मेरे आँगन के हर फूल तेरे है,
जी चाहे उसे ले जाओ,
अब खुशियों की मुझे जरूरत नही,
इनसे तुम अपना आँगन सजाओं,
क्या करूँ ऐसा के सकूँ मिले समझ नही आता,
मेरी रूह में तो समा ही गए हो ,
तुम ऐसा करो ये जान भी ले जाओ ।।
एक बार सीने से लगा इस,
बंजर ज़मी को भी हरी कर जाओ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 4 May 2020

"कौन बोलेगा" (KAUN BOLEGA)



गर मैं ना बोलूंगा तो फिर कौन बोलेगा,
ये पट्टी भर्म की आँखों से कौन खोलेगा।।

क्यों सच कहीं बिकता नही है,
क्यों सच कोई लिखता नही है,
ये मीठी मीठी बातों का दलदल,
क्यों हर किसी को दिखता नही है।।

अपने ही अपनो को लूटते है,
धागे विश्वास के फिर टुटते है,
हाँ में हाँ मिलाओ तो सब राज़ी है,
नही तो रिश्ते यहाँ टुटते है।।

रात को दिन बोलो तो सम्मान है,
आईना दिखाओ तो अपमान है,
मिट्टी में मिट्टी हो जाएगा सब,
तुझे किस बात का अभिमान है।।

क्यों अब वो साँझा परिवार नही है,
क्यों रिश्तों में अब प्यार नही है,
सब मतलब के रिश्ते है,
क्यों अब किसी पर ऐतबार नही है।।

क्यों यहां सब गर्ज़ में ही बोलते है,
क्यों सबको पैसे के तराजू में तोलते है,
सीरत कौन देख पाता है किसी की,
क्यों सब फिर सीरत का भला सही कहते है।।

क्यों अपने लिखे पर सबको अभिमान है,
क्यों कलम चंद पैसों में होती बेईमान है,
तू लिख कर बाते दिल की क्या करेगा "चौहान",
अभी तेरी उम्र ही क्या है अभी बहुत नादान है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 1 May 2020

"कितने गम" ( KITNE GAM)


कितने गम है जमाने मे की कम ही नही होते,
कितने फ़साने लिखुँ ये ख़त्म ही नही होते।।

बातें कुछ दिल में रोज़ ही घर कर जाती है,
क्या सबके ज़ख़्म नासूर है जो ख़त्म नही होते।।

हर कोई इस आस में है कि फरियाद करें,
रोज़ टूटते है तारे पर कभी ख़त्म नही होते।।

जिस्मों पर आकर ही तो रुक रही है कहानी इश्क़ की,
वो कौन से रिश्ते है जो मरकर भी ख़त्म नही होते।।

जो तुझे दिया है खुदा ने क्यों उसमे सब्र नही तेरा,
क्यों "चौहान" सागर ख़्वाईशो के कभी ख़त्म नही होते।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...