हक़ीक़त कुछ और है ,वो नही है जो सबको नज़र आती है,
टूट जाते है रिश्ते, दो दिन बात ना हो तो बातें बढ़ जाती है।।
कोई पास रहकर भी पास नही होता,ना कोई दूर होकर भी दूर,
दूरिया खुद ढूंढ लेते है, जब नजदीकियां हद से ज़्यादा बढ़ जाती है।।
बात किसी को देखने ना देखने की नही है दिल मे उतर जाने की है,
वरना नज़रो का क्या है अच्छी बुरी हर अनदेखी चीज़ पर ठहर जाती है।।
मैं लिखता रहूँ तुम पढ़ते रहो ये लिखे फ़साने मेरे,पर होगा क्या,
शायरी तो वो है "चौहान" जो लबों से उतर के लबों पे ठहर जाती है।।
कोई पार कर गया है इस राह को तो एक दफा आकर मुझसे मिले,
मैं भी तो देखूँ ये गली मुहोब्बत की आखिर में कहाँ तक जाती है।।
ख्वाइशें जिस्म की करो तो लाखों मंज़िले है इस तन्हा सफर में ,
रूह की ख्वाइशें की ज़िंदगी क्यों मंज़िलो की चाह में गुज़र जाती है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।














