Friday, 30 June 2017

"मुलाक़ात " ( MULAKAT)

शाम ढलती है तेरी बाँहों में ढलते -ढलते रात हो जाए ,
आ ऐसी एक बार फिर तेरी मेरी मुलाक़ात हो जाएँ ।

खबर ना हो मुझे मेरी , ना खबर तुझे फिर तेरी रहे ,
आ एक दूजे में फिर कुछ ऐसे हम दोनों खो जाएँ।।

तेरे बिन ना मेरे दिन कटें , ना मेरे बिन गुज़रें तेरी रातें,
आ एक दूजे में फिर कुछ इस कदर मुलतवी हो जाएँ।

ज़िक्र तेरा हो मेरी हर बात पर , हक़ मेरा रहे तेरी रूह-ए-क़ायनात पर,
कुछ ऐसे फिर तेरे मेरे यें इश्क़-ए-जज़्बात हो जाएँ।।

मेरा कलमा हो ये किताबी आँखें तेरी , तू मेरा परवरदिगार हो जाए ,
इश्क़ में नमाज़ें अत्ता करूँ बस इसलिए के "चौहान" तू मेरा राज़दार  हो जाये ।।

आ ऐसी एक बार फिर तेरी मेरी मुलाक़ात हो जाएँ ।
आ ऐसी एक बार फिर तेरी मेरी मुलाक़ात हो जाएँ ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

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