Tuesday, 27 November 2018

"मेरा आज"(MERA AAJ)


तुझसे दूरियां मैं युहीं नही बढ़ा रहा हूँ,
इन हालातों में खुद को आजमा रहा हूँ।।

वो जो सोचते है मुझे फ़र्क नही पड़ता,
उनकी सोचों को हकीक़त बना रहा हूँ।।

मेरे पागलपन की हद देख हैरान है वो,
ज़ख्मों पर मलहम नमक का लगा रहा हूँ।।

इस कदर मिट्टी हुए सपने मेरे मुझमे,
खुद कब्र खोद खुद को दफना रहा हूँ।।

बस नाम के रह गए है रिशते कुछ ,
फिर भी ज़िम्मेदारी से निभा रहा हूँ।।

और वक़्त तो आज ये आ गया है "चौहान",
अपनी बर्बादी देख खुद मुस्कुरा रहा हूँ ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



Friday, 23 November 2018

"असली हिंदुस्तान" (ASLI HINDUSTAN)


यहाँ सब अपनी परेशनियों को लेकर परेशान है,
आओ तुम्हे दिखाऊँ क्या असली हिंदुस्तान है।।

यूँ तो देश मेरा बहुत तेज़ी से विकसित हो रहा है,
पर उनका क्या जो आज भी फुटपाथ पर सो रहा है।।

खुद की बोई की फसलों का मोल भी नही मिल पता ,
आज दूसरों को खिला खुद भूखा मर रहा किसान है।।

विज्ञान के युग मे इंसानियत भूल बैठा है हर कोई,
दौलत के गुरुर पर हर कोई बन बैठा भगवान है।।

दिखावे को तो अब हम दस्तूर बना कर बैठे है,
डरते है तभी सच की तसवीर छुपा कर बैठे है।।

कपड़ो है पैमाना आज भी इज्ज़त का यहाँ पर,
कहीं खुले में तो कहीं छुपकर बिक रहा ईमान है।।

सियासत ने कर दिया खोखला देश दीमक की तरहा,
अंदर झांक के देखो मेरा भारत कहाँ अब महान है।।

वक़्त आने पर तो बापु के बंदर बन जाते है लोग यहाँ,
तभी आजकल यहाँ पर इंसानियत कत्ल-ए-आम है।।

थोड़ी लगाम लगा कर रख अपनी कलम को "चौहान",
जो देश बेच खा गए हमें आज भी उनपर अभिमान है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।





Thursday, 15 November 2018

"आजा ना यार लौट के" (AAJA NAA YAAR LAUT KE)


ONLY FOR MY BRO VIKAS SINGHMAR,
I CAN'T FORGET U ..MISS U ALOT BRO..
LOVE U FOREVER..FIRSF  TIME AISA LGA RGA HAI KE KUCH BCHA HI NHI .EK BAAR BOLTE HI AATA THA MILNE AAJ BHI AAJA NAA YAAR PLZ .BHUT ZARURT HAI TERI. LOVE U FOREVER.😭😭 REST IN PEACE.

आजा ना यार लौट के ,
देख तुझबिन मैं भी मर जाऊँगा,
आजा ना यार लौट के,
मेरे हालात ठीक नही है,
दोस्ती नही निभानी मत निभा,
पर तेरा यूँ छोड़ जाना ठीक नही है,
आजा ना यार लौट के ,
देख तुझबिन मैं भी मर जाऊँगा।।

देख ना मैं घर किससे मिलने आऊँगा,
देख ना बातों से अपनी किसको पकाउंगा,
तूने किये वो वादे सच्चे नही है,
दोस्त लाखों है पर तुझसे पक्के नही है,
हाल-ए-दिल अब किसको बताऊंगा,
आजा ना यार लौट के ,
देख तुझबिन मैं भी मर जाऊँगा।।


देख ना सब तुझ बिन सुनसान नज़र आता है,
जहाँ बातें करते थे वो पार्क शमशान नज़र आता है,
क्या सही क्या गलत मुझे कौन बताएगा,
मेरी हँसी में छिपी उदासी कौन ढूंढ पायेगा,
अपने सपने अब मैं किसको सुनाऊँगा,
आजा ना यार लौट के ,
देख तुझबिन मैं भी मर जाऊँगा।।


बड़ा इंतज़ार बड़ी खुशी थी तुझे शादी की मेरी,
अब बता ना वो जश्न कौन मनाएगा,
कौन होगा खड़ा मेरे अच्छे बुरे वक्त में बिना सोचे,
कौन होगा तो मेरी एक आवाज़ पर मिलने चला आएगा,
बता ना बिना बहानेे गले किसे लगाऊंगा,
आजा ना यार लौट के ,
देख तुझबिन मैं भी मर जाऊँगा।।


अभी तो बहुत सारे हमारे ख़्वाब बाकी थे,
तुझे बताने थे जो कुछ राज़ बाकी थे,
साले मेरे साथ अब हिसार कौन जाएगा,
जयपुर जाने का वादा था वो कौन निभाएगा,
वो पूछेगी तेरे बारे में तो क्या बताऊंगा,
आजा ना यार लौट के ,
देख तुझबिन मैं भी मर जाऊँगा।।


कोई गिला शिक़वा था तो मुझे बोल देता,
कोई गलती कर दी थी आके मार लेता,
धोखेबाज निकला तू तो चुपचाप पीछा छुड़ा गया,
कैसे भुलाऊँ तुझे ये तो बता जाता,
किस्से दोस्तों के मैं किसको सुनाऊंगा,
आजा ना यार लौट के ,
देख तुझबिन मैं भी मर जाऊँगा।।


देख ना "चौहान" कविता किसको सुनाएगा,
मैं जीतूँगा एक दिन ये हौसला कौन दिलाएगा,
अभी तो पूरी उम्र बाकी है ना यार,
गर रूठा तुझसे तो कौन मनायेगा,
देख ना भाई कहकर किसको बुलाऊँगा,
आजा ना यार लौट के ,
देख तुझबिन मैं भी मर जाऊँगा।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 9 November 2018

"ज़रूरत" (ZARURAT)


मेरे सपनों की हकीक़त बन बैठी,
मुहोब्बत अब ज़रूरत बन बैठी।।

यकीन ना रहा अब साँसों पर अपनी,
कुछ ऐसे वो मेरी रूहानियत बन बैठी।।

अंदाज़ में उसके जीने लगा हूँ खुद को,
जैसे वो मेरी अदब- लियाकत बन बैठी।।

बचा के रखने लगा हूँ दुनिया की नज़रों से,
मुहोब्बत आज जैसे तिज़ारत बन बैठी।।

बैर कर लिया अब तो ज़िन्दगी से हमने,
इस दिल-ए-नादां की हिमाकत बन बैठी।।

बड़े अदब से पेश आने लगा हूँ गमो से अपने,
ख़ामोशी ऐसे चढ़ी ज़ुबाँ की शराफ़त बन बैठी।।

लिहाज़ आँखो का था के बस कुछ बोली नही,
नींदे तो आँखों से की बाते बगावत बन बैठी।।

एक दिल का ही तो हेर-फेर हुआ था ,
जान से कीमती वो अमानत बन बैठी।।

राख शमशान की होकर भी खामोश था "चौहान",
वो जिस्म में कैद साँसों की ज़मानत बन बैठी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।







Tuesday, 6 November 2018

"दिवाली" (DIWALI)


अपने पराये वैर द्वेष में आज कहीं गुम हो गयी,
वो दीपों वाली दीवाली ना जाने कहाँ खो गयी।।

अब वो एक दूजे के घर उपहार लेकर नही जाते,
रिश्तों की अहमीयत मैं की आग में राख हो गयी।।

बनवटी खुशियाँ नज़र आती है अब हर चहरे पर,
बधाई दीवाली की तो लगता है मज़ाक हो गयी ।।

वो इंतज़ार भी नही होता महीने भर से दीवाली का,
पटाखों का जश्न भी अब प्रदूषण वाली बात हो गयी।।

सजाते है घर आज कल वो कई तरहा की लाईटें लगा कर,
वो खुशबू मिटी के दिये कि ना जाने कहाँ खो गयी।।

कहाँ अब वो पहले जैसा बात बाकी है "चौहान",
त्यौहार तो आज कल बस दिखावे की बात हो गयी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...