Thursday, 30 January 2020

"किरदार" (KIRDAAR)


तेरी किताब ,तेरी कहानी,
हम किरदार,
हम मिट्टी बेमोल से,
तू शिल्पकार,
तेरे रंग ,हम तस्वीर,
तू चित्रकार,
सब तेरी मर्ज़ी का था कहानी में तेरी,
वक़्त पड़ा तो अच्छा दिखाया,
वक़्त गया तो बेकार....
थोड़ा सोच संभल के चल "चौहान",
हर कहीं तो अच्छा नही तू,
किसी और कि कहानी में फिर,
तेरा भी है एक क़िरदार।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 29 January 2020

"कहाँ अच्छा है" (KAHAN ACCHA HAI)



ये रिश्ते है दिल से है ये फ़र्ज़ी तो नही,
जमाने को जो दिखाए क्या वही सच्चा है।।

तू मेरे लिए क्या है मेरा रब जनता है,
ये बात तुझे लोग बताएँ क्या वही अच्छा है।।

इस दोस्ती का कोई पैमाना तो नही था,
चंद बातों से रिश्ते तोले जाएं कहाँ अच्छा है।।

इक रोज़ तो बता जब खुद से अलग किया हो तुझे,
मुहोब्बत निभाना या दिखना तू ही बता क्या अच्छा है।।

तू कोहिनूर है मेरा मैं खोने से डरता हूँ तुझे,
तुझे यूँ शरेआम लाना बता कहाँ तक अच्छा है।।

हाँ नही लिखता मैं कभी तुझे कलम से अपनी,
मिलकर बता सकता हूँ ,लिखकर बताना कहाँ अच्छा है।।

हाँ तेरी तस्वीरें दिखाता नही, लोगो को साथ अपने,
दिल की दीवारों से कच्ची दीवारों पर लाना कहाँ अच्छा है।।

तेरी जगह तेरी अहमियत हमेशा यही रहेगी,
यूँ हर किसी को साथ देख घबराना कहाँ अच्छा है।।

उसको लिखता हूँ "चौहान" जिसको मिल नही सकता,
मुझे बिना समझे तेरा मुझसे रुठ जाना कहाँ अच्छा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 26 January 2020

"क्या ऐसा"KYA AISA)



क्या ऐसा नही हो सकता,
हम फिर किसी राह पर मिल जाये,
अनजान बनकर ही सही,
बस एक दुजे को दिख ही जाये
ये फासले दूरियां युहीं बरकरार रख,
क्या ऐसा नही हो सकता,
फिर वजूद हम दोनों के इस जहाँ में हो जाये,
क्या ऐसा नही हो सकता....
मैं खुदा तुझसे कोई तिज़ारत नही माँगता,
कैसे करने है सज़दे ये इबादत नही जानता,
मंज़िल ना मिले कोई बात नही,
ख़्वाबों का शहर मेरा शमशान ही सही,
क्या ऐसा नही हो सकता,
हम एक रास्ते के मुसाफ़िर हो जाये,
क्या ऐसा नही हो सकता...
कोई खुशियों की दौलत ना दे,
कोई हुनर कोई शोहरत ना दे,
ना दे चाहे अल्फ़ाज़ कोई कलम को मेरी,
जिसे लिखता है "चौहान"उसे देखने की मोहलत दे दे,
क्या ऐसा नही हो सकता.....


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 23 January 2020

"दास्तान-ए-इश्क़"


कोई पूछे तो मैं भी लिखुँ,
आज ये दास्तान-ए-इश्क़।।

क्या होगा आखिर पढ़कर ,
रात भर क़िताब-ए-इश्क़।।

कुछ यादें कुछ जज़्बात होंगे,
रिसता आँखो से पानी इश्क़।।

क्यों जमाने को रास नही,
तेरा मेरा ये रूहानी इश्क़।।

कोई ना जाने कैसा है ये
कही आग कही पानी इश्क़।।

ना मोल-भाव ना नफा-मुनाफ़ा,
तो कहीं है बेइमानी इश्क़।।

कही हकीकत , कहीं फ़साना,
कहीं किस्से कही कहानी इश्क़।।

तुमने भी किया मैंने भी किया,
है ये कोई रीत पुरानी इश्क़।।

ये संसार एक बाज़ार है यहाँ,
होती है रोज़ नुमाइश-ए-इश्क़।।

फिर मैं कैसे कह दूँ के मेरा,
परवर दिगार है मेरा इश्क़।।

अगर मिल ना सके रूह से रूह,
क्या करना जिस्मों का बेज़ान इश्क़।।

क्यूँ समझ ना आये किसी को,
तेरे शहर में ज़ुबाँ-ए-इश्क़।।

लिख तो देता "चौहान" भी,
पानी पर भी पानी से इश्क़।।

कोई बता देता अगर मुझको भी,
क्या होगा मेरा अंज़ाम-ए-इश्क़।।

कोई पूछे तो मैं भी लिखुँ,
आज ये दास्तान-ए-इश्क़।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 22 January 2020

"बारिशें" (BARISHE'N)


ये जो बारिशें आयी है,
क्या तुम लौट आयी हो,
ज़ख्म मेरे भरने लगे है,
अश्क़ मेरे थमने लगे है
क्या तुम लौट आयी हो।।

जज़्बात सोये मेरे फिर  जागने लगे है,
ख़्वाब नींदों के पीछे फिर भागने लगे है
इस जिस्म में जान फिर लौट आयी है,
ये जो वीरान सी थी गालियाँ मेरे दिल की,
फिर आज रौनकें नज़र आयी है,
एक फूल सुख गया था बंद किताब में,
आज वही खुशबू लौट आयी है,
ख़्वाब है या हक़ीक़त अब समझ नही,
सच है या झूठ अब क्या कहूँ,
दिल कहता है कि वो लौट आयी है,
होश में बेहोशी सी है,
लफ़्ज़ों में ख़ामोशी सी है,
एक अजब सी खुमारी छाई है,
कशमकश में ना गुज़र जाए ये लम्हा "चौहान",
रोक देना वक़्त मेरे खुदा गर वो लौट आयी है।।

ये जो बारिशें आयी है,
क्या तुम लौट आयी हो,
ज़ख्म मेरे भरने लगे है,
अश्क़ मेरे थमने लगे है
क्या तुम लौट आयी हो।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 19 January 2020

"मैं कुछ गलत नही करता" (MAIN KUCH GALAT NHI KARTA)


अगर तेरी हाँ में हामी नही भरता,
सच मैं कुछ गलत नही करता।।
इश्क़ में हद से नही गुज़रता,
सच मैं कुछ गलत नही करता।।

हर किसी की अपनी सोच है,
हर किसी का अपना नज़रिया है,
किसी की बातों में आकर,
मैं अगर रास्ता नही बदलता,
सच मैं कुछ गलत नही करता।।

तुझे अपना समझ खुदा बनाया,
तूने करके दगा जब सब गवाया,
आज अगर मैं तुझसे बात नही करता,
आज अगर तुझसे मुलाक़ात नही करता,
सच मैं कुछ गलत नही करता।।

हाँ मैं औरों की तरहा बेफ़िक्र नही हूँ,
अनजान हूँ किसी के ज़िक्र में नही हूँ,
हाँ हकीकत में दूरियाँ है अब दरमियान,
मैं दूरी कम करने की कोशिश नही करता,
सच मैं कुछ गलत नही करता।।

जिस्म में रूह सा समाया था तुझे,
इश्क़ में अपना मुर्शद बनाया था तुझे,
अब "चौहान" पत्थरों पर नही झुकता,
सच मैं कुछ गलत नही करता।।

इस आसमाँ में हम और तुम थे कभी,
ना जाने कितने मौसम गुज़रे थे यही,
पर जो हर किसी के साथ उड़ जाए,
"चौहान" ऐसे परिंदों के साथ नही उड़ता,
सच मैं कुछ गलत नही करता।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 18 January 2020

"ये किस्से" (YE KISSE)


ये किस्से ठीक है जैसे भी है ,
तुम्हारे अपने है मुझे मत सुनाओ।।

अपने ज़ख्मों का मरहम खुद बनो,
किसी और को ज़ख्म ना दिखाओ।।

मतलबी दुनिया यहाँ कौन किसका है,
ये ज़िंदगी कीमती है गैरों पर ना लुटाओ।।

इश्क़ कहाँ अब यहाँ चालसाज़ियाँ है,
अब भी वक़्त है वक़्त पर संभल जाओ।।

क्या हुआ गर मैं हाल-ए-दिल लिखता हूं ,
अजनबी ठीक हूँ मेरे करीब ना आओ।।

अच्छा है मेरी ज़ुबाँ तुम्हे समझ नही आती,
शायरों की बात है सुनो और भूल जाओ।।

मेरी कविताओं को मेरा हाल ना समझो ,
मैं खुश हूँ यहाँ तुम अपना हाल बताओ।।

एक खुशबू है जो "चौहान" को फिर ज़िंदा कर रही है,
वक़्त मिले तो कभी कब्र से मेरी वो फूल हटा जाओ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 15 January 2020

"एक कहानी" ( EK KAHANI)


कहीं इश्क़ में रवानी,
कही जिस्म और जवानी,
कोई मुद्दतों पुरानी,
एक कहानी लिखूँगा।।

कुछ मौसम बरसातों की,
इश्क़ में मुलाकातों की,
कुछ गुज़री हसीन रातों की,
एक कहानी लिखूँगा।।

तेरे मेरे साथ की,
दिलों के जज़्बात की,
एक अधूरी मुलाकात की,
एक कहानी लिखूँगा।।

वक़्त के हाथ मज़बूर सी,
इश्क़ में मगरूर थी,
कुछ रिवाज़ो और दस्तुर सी,
एक कहानी लिखूँगा।।

जो मुझमें आकर सिमट गई,
जो अश्क़ों में यूँ बह गयी,
जो अनकही सी रह गयी,
एक कहानी लिखूँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 14 January 2020

"एक लड़की" (EK LADKI)


बड़ी बेफ़िक्र सी है वो हसरते पूरी दिल की करती है,
एक लड़की है जो मेरी कविताओं में खुलकर जीती है।।

थोड़ी बेबाक थोड़ी चंचल थोड़ी मासूम सी है,
जामने की बातों पर नही अपने इरादों पर जीती है।।

किसी की सोच नज़रिए से फर्क नही पड़ता उसको,
अपने असूलों की है अपने असूलों पर जीती है।।

जो मन आया वो पहनती है नज़रे सबकी भाँपती है,
गीदड़ भेड़ियों के झुंड में भी वो शेर सी रहती है।।

जमाने की तरह पीठ पीछे ज़हर नही घोलती वो,
हाँ मुँहफट है थोड़ी जो भी बोलती है मुँह पर बोलती है।।

फिर तुम्हे अच्छा लगे या ना लगे रवैया उसका,
जमाने की तरह लाखों चहरे नही रखती है।।

क्यों बदलना है उसे जमाने के खोंखले रिवाज़ों के आगे,
दरिया सी है वो "चौहान" अपनी मौज में बहती है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 11 January 2020

"आज भी माँ" (AAJ BHI MAA)


हाँ उम्र में बड़ा हो गया तो क्या,
माँ आज भी मेरी नींदों में सोती है,
मेरी साँस-साँस से वाकिफ है वो,
माँ आज भी मेरी फिक्र में होती है।।

कुछ पल को बाहर क्या चली जाए,
ये घर,घर नही खाली दीवारें होती है,
खरोंच आये जो ज़रा मेरे जिस्म पर,
आज भी उसकी आँखें नम होती है।।

एक अजब सा जादू भी है हाथों में उसके,
माथे पर रखती है सिकन पल में दूर होती है,
ना जाने किस मिट्टी क़ा बनाया है भगवान तूने,
वो अकेली मेरे दुखो में आगे सुखों में पीछे होती है।।

आज माना उसके आँचल से थोड़ा दूर हूँ तो क्या,
दुनिया के इन कामों में थोड़ा मज़बूर हूँ तो क्या,
सब लोग पूछते है यहाँ मुझसे कमाई मेरी,
वो अकेली है जिसे फिक्र मेरी भूख की होती है।।

लिखना तो बहुत कुछ है पर लिखा नही जाता,
तेरे सहारे के बिना कदम एक भी रखा नही जाता,
हर कहीं तो बचकर निकल जाता हूं बुरी बलाओं से,
उनसे लड़ती "चौहान" मेरी माँ की दुआएं होती है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 10 January 2020

"ज़िंदगी के मोड़" ( ZINDGI KE MOD)

ज़िंदगी ऐसे मोड़ पर आ गयी सब सही सब गलत लगता है,
अब तो रौशनी भी नही भाती, और ये अँधेरा भी चुभता है।।

क्या फैसले करूँ मैं अपने इन तन्हा ज़िंदगी के मुकदमों के,
अब मंज़िल सामने नज़र आती है रास्ता है कि पलभर भी ना कटता है।।

मैं किसी से अब किसी बहस बातों के आलम में भी नही हूँ,
कोई रात को दिन या फिर आग को पानी कहे सब ठीक लगता है।।

मैं कहाँ किसका हमसफ़र बनूँ अब इन तन्हा रास्तो में आखिर,
यहाँ छाव जरूर है मगर मुझे मेरे साये का साथ खलता है।।

एक वक्त था के सबकी दुवाएँ काम आती थी हर मुश्किलों में,
अब तो बस सबका यहाँ सलाह मशवरों से काम चलता है।।

लोग हाल जरूर पूछते है "चौहान" पर मरहम नही बनते,
यहाँ उसकी ही जीत है जो गिरकर फिर खुद संभलता है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 8 January 2020

"क्या हुआ" (KYA HUA)


बड़ी ख़्वाईश बड़े अरमान थे उसे अपना बनाने के,
उसे अगर मेरा होना ही नही था तो क्या हुआ।।

लिखकर कहकर हर तरीके से तो बताए थे मैंने,
जज़्बात मेरे उसे समझ आये ही नही तो क्या हुआ।।

घर ,आँगन ,गालियां तक सजाई थी राह में उसके,
वो मेरी गली से कभी आये ही नही तो क्या हुआ।।

रोये भी थे जी भर के उससे दूरी की तड़प में,
उसे आँसू मेरे कभी नज़र आये ही नही तो क्या हुआ।।

उसे भी पता है किस हाल से गुज़र रहे है हम,
वो कभी पूछने आये ही नही तो क्या हुआ।।

ना जाने कितनी लाशें दफन है ख़्वाईशो की,
एक लाश और दफन हो जाएगी तो क्या हुआ।।

कभी मेरे हाल में मेरा ना हो सका आज अगर,
मेरी कब्र से लिपट कर रो भी लिया तो क्या हुआ।।

ताह उम्र करता रहा जिसका जिक्र "मेरी कलम दिल की ज़ुबाँ" में,
आज मेरी कब्र पर बैठ कर वो पूरी क़िताब पढ़ भी लेगा तो क्या हुआ।।

मैं अब कभी लौट के ना सकूँगा उसके इस जहाँ में "चौहान",
अब वो इबादत सज़दे उपवास रोज़े कर भी लगा तो क्या हुआ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 6 January 2020

"एक वादा" (EK WAADA)


मैं कहाँ कहाँ तक जाऊँ ,
एक तेरी तालश मे,
कब तक पहने फिरूँ,
हँसी का नक़ाब मैं,
क्या ऐसा होगा कोई रात सो कर गुज़ार दूँ,
यूँ राते रो रो कर कबतक बिताऊँ मैं,
टूट चुका हूँ तेरे जाने के बाद,
इन हालातों से कितना लड़ के दिखाऊँ मैं,
नही फर्क पड़ता कौन क्या बोलेगा,
तू क्या था मेरे ख़ातिर,
क्यूँ किसी को समझाऊँ मैं,
इसी त्योहार मिला था तू आखिरी बार,
अब मिलने की उम्मीद किससे लगाऊँ मैं,
ना जाने किन किन रास्तों में भटक गया,
कोई राह बता तुझे भूल जाऊँ मैं,
जश्न खुशी हँसी सब ले गया तू,
आ कभी तुझे सबके हाल बताऊँ मैं,
बड़ा बेफिक्र हूँ मैं सब सोचते है,
परेशानी अपनी किसे सुनाऊँ मैं,
अब लिखकर भी आराम नही मिलता,
इन ज़ख्मो को कितना कुरेदता जाऊँ मैं,
तेरी खता गलतियाँ सब माफ,
बस एक वादा निभाने आजा,
अब तस्वीरों से दिल नही भरता,
हो सके तो लौट के आजा,
तुझे जी भर के सीने से लगाऊँ मैं,
फिर चले जाना मैं रोकूंगा नही,
बस इतना कर दे "चौहान"
खुद से नज़रें मिला पाऊँ मैं।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 3 January 2020

"जैसा है ठीक है" (JAISA HAI THEEK HAI)


मैं और तू ,चल!!
जैसा है ठीक है।।

मेरे गम तेरी खुशी,
चल!! जैसा है ठीक है।।

तेरे लबो की हँसी,
मेरी आँखों की नमी,
तू अच्छा सही ,
मैं बुरा ही सही,
चल!! जैसा है ठीक है।।

मेरी हार सही,
तेरी जीत सही,
चल!! जैसा है ठीक है।।

मेंरा झूठ तेरा सच,
कुछ घाव और ये वक़्त,
चल!! जैसा है ठीक है।।

मेरी ज़ुबाँ जैसे ख़िलाफ़त,
तेरी बेअदबी जैसे लियाक़त,
चल!! जैसा है ठीक है।।

अब "चौहान" थोड़ा मगरूर है,
मतलबियों से बहुत दूर है,
जहाँ वफ़ा मिली वहाँ सिर झुकाया,
जहाँ दगा हुआ उन्हें माफ किया,
जो करीब है वो कोहिनूर है,
जो दूर है वो अब बस दूर है।।

वक़्त का लिखा सामने सबके आएगा,
क्या खोया क्या पाया वक़्त बताएगा,
उम्रभर के रास्ते है तो क्या हुआ,
मंज़िल कौनसा हमसे दूर है।।

ये वक़्त, ये मौसम,
ये रास्ते , ये मंज़िल,
ये तन्हाई, ये रुसवाई,
चल!! जैसा है ठीक है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Thursday, 2 January 2020

"हाथों में हाथ" ( HATHO'N ME HATH)


सब ये देख के हैरान है,
हाथों में हाथ हमारे है किसी का,
ज़माना ये ना जाने क्यों परेशान है,
बिन पूछे बिन बोले एक बात सोच बैठे है,
हमारी बातों पर यकीन करेंगे नही,
इसलिए सब अपनी एक कहानी सोच बैठे है,
कोई मुहोब्बत सोच रहा है मेरी,
कोई मुहोब्बत का फ़साना सोच रहा है,
एक आने वाला कल सोच के बैठा है,
कोई मेरा गुज़रा ज़माना सोच रहा है,
मेरे जहन के जज़्बात बहुत अलग है,
ये मुहोब्बत है तो फिर बहुत पाक है,
ये दोस्ती है तो फिर बहुत अज़ीज़ है,
रिश्तों के मायने तो नही समझ आते,
पर जो भी है "चौहान" काबिल-ए-तारीफ़ है,
जमाने को बता कर करना भी क्या है,
समझना दूर कुछ सुनना भी नही चाहते,
हाँ ये भी सच है दोस्ती या मुहोब्बत,
हाथों में हाथ अब देखे नही जाते,
अब भी हया का पर्दा है इस कहानी में,
हर एक किरदार अभी शरेआम नही है,
हाथों में हाथ नही रिश्तों की अहमियत है,
निभाने की कोशिशें है बीच मे छोड़ने नही आते,
जो भी है जैसा है सही है "चौहान"
राज़ कुछ सबके सामने खोले नही जाते।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...