जीता भी तो कितना जीता ज़िंदगी तेरे बिन,
साँसों को तो रुक जाना ही था ..
ढूंढता भी तो कितना ढूंढता मरहम दिल के ज़ख्मो का,
नासूर तो इन्हे इक दिन बन जाना ही था ..
छोड़ के तो एक दिन यूँ भी तुम्हे मुझे चले जाना था ,
मुक़दर और लकीरों का तो बहाना ही था ..
किसे पता था की वक़्त इतना बदल जायेगा "चौहान" के वो कहेंगे ,
झूठे तो तुम थे सच्चा तो ये सारा ज़माना ही था ...
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल कि जुबां

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