Wednesday, 1 November 2017

"फिर कहाँ " (PHIR KAHAN)



सुखे पत्ते टूट के शाखों से फिर कहाँ जुड़ेंगे,
बिछड़ गए जो एक बार हम तो फिर दोबारा कहाँ मिलेंगे ...

आ गई जो दरार तेरे उस मन के दर्पण में,
तु बता कहाँ फिर चहरे एक साथ दिखेंगे ..

टूट ही गये अगर धागे वो कच्चे तेरे इश्क़ के ,
तु बता कहाँ फिर वो बिना गांठों के जुड़ सकेंगे ...

चलते रहे अगर उम्र भर भी इन रास्तों पर यूँ अकेले,
तू बता अगर ना हो कोई मंज़िल तो कहाँ तक हम चल सकेंगे ..

अगर ना ही रहे कोई तालुकात मेरे दिल के मेरी कलम से,
तू बता "चौहान" कहाँ हम "मेरी कलम" से " दिल की जुबां" लिख सकेंगे...

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां

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