Saturday, 28 July 2018

"शायद" (SHAYAD)


अब नही सोती वो वक़्त पर रातों को शायद ,
 ख़्याल उसको अब नींद का आया ना होगा।।

मुहोब्बत समझ आने लगी है अब उनको शायद,
मेरी तरह किसी ने हर-पल उसे रुलाया ना होगा।।

अब शायद कोई सहारा भी मिल गया होगा,
उस कस्ती को शायद किनारा भी मिल गया होगा।।

शायद अब वो मेरी फिक्र में बेचैन नही होती,
शायद अब वो मेरी बात से खफा हो अकेले में नही रोती।।

शायद अब उसे बार-बार मेरा फिक्र करना सताता ना होगा,
शायद अब बात किसी की सुन कर चहरा मेरा याद आता ना होगा।।

उसकी महफ़िल में तो कभी कमी ही ना थी मेहमानों की,
शायद तभी रुठ कर जाना मेरा याद उसे आया ना होगा।।

लिखने बोलने से तो कहाँ नफरत हुई होगी उसे "चौहान",
याद कर शायद तेरा लिखना सुनना ही उसे भाया ना होगा।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।




Tuesday, 24 July 2018

"इश्क़ तेरा मेरा" (ISHQ TERA MERA)


दूर कहीं शोरोगुल में सहमी सी खामोशी है मेरी,
मेरी उन्ही खामोशियों का शोर है इश्क़ तेरा मेरा।।

जो कभी टुट ही नही पाई हम दोनों के दरमियाँ,
सच्चे रिश्ते की ये कच्ची डोर है इश्क़ तेरा मेरा।।

वो वक़्त जो कहीं थम सा गया था मेरे खातिर,
उस वक़्त में उन्ही हालातों का जोर है इश्क़ तेरा मेरा।।

तेरे बिना यहाँ मैं अधूरा और मेरे बिना वहाँ तुम,
संगीत में सुर और ताल सा बंधन है इश्क़ तेरा मेरा।।

कहाँ समझ आएगा "चौहान" ज़माने को आसानी से ,
ताल रूपक का सम होता जा रहा है इश्क़ तेरा मेरा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 20 July 2018

"दूर ना जाओ"(DOOR NA JAO)


दूर ना जाओ हमसे जिया नही जाएगा,
ज़ख़्म ये जुदाई वाला सिया नही जाएगा,
क्यों आंखें नम है मेरी फिर पूछेंगे सब,
पर हाल-ए-दिल बयाँ अपना किया नही जाएगा,
जी लोगे तुम तो मेरे बेगैर पहले भी जीते थे,
पर हमसे तो एक पल भी अब जिया नही जाएगा,
माँगा था साथ कुछ पल का पर वो भी गवारा नहीं,
कैसे कहूँ बेबसी का ये जहर पिया नही जाएगा,
देखता हूँ अक्ष तेरा हर एक चहरे में ,
ख़्वाब तेरा ही रहता है हर नींद के पहरे में ,
हर एक साँस माँगती है तुझे,
अब खुदा खुद तू ही आके बता दे उसे ,
"चौहान" से उसके बिना जिया भी नही जाएगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Monday, 16 July 2018

"अलविदा ज़िन्दगी" (ALVIDA ZINDGI)


नफरतें मैं निभा रहा हुँ तुझसे , नफरतें तू भी निभा,
ले कह दिया अलविदा ज़िन्दगी अब तो दूर चली जा।।

किस हद्द तक गुज़र गया हूँ मैं मंज़िल की तलाश में,
अब रास्तों से मुहोब्बत है मुझे मंज़िल ना दिखा।।

सलूक मेरे जैसा ही कर मेरे साथ भी 'गर वफ़ाएँ है,
यूँ बार-बार ज़िन्दगी जीने का मुझे सलीका ना सीखा।।

बना दे राख या कर दे दफ़न मेरे सपनों की तरहा ही,
खाक कर दे मुझे सौ दफ़ा पर यूँ बार-बार मिट्टी में ना मिला।।

कल भी था "चौहान", कायम आज भी अपने इरादे पर है ,
माना हार गया हूँ तुझसे अब यूँ मुझपर रहमतें ना दिखा।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 12 July 2018

"खुदा और मुहोब्बत" (KHUDA AUR MUHOBBAT)


अलग है तो फिर कैसे है तू बता मुझे,
खुदा और मुहोब्बत बात तो एक ही है।।

सागर नदी में मिले या नदी सागर में ,
मिलकर होना तो दोनों को एक ही है ।।

ज़िक्र तेरा मेरी बातों में हो या किताबों में,
फ़साना मुहोब्बत का तो एक ही है ।।

ख़्वाब टूटे मेरे या टुट के बिखरे दिल मेरा,
अलग क्या है हालात तो दोनों में एक ही है।।

कलमा पढूं, गीता पढूं , या आयात पढूं कुरान की,
बात मज़हब की है इबादत तो एक ही है ।।

जल के राख हो जाऊं या दफ़न हो जाऊं मिट्टी में,
इश्क़ में मिटना है "चौहान" बात तो एक ही है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम-दिल की ज़ुबाँ




Sunday, 8 July 2018

"क्या लिखूँ" (KYA LIKHUN)


आज कुछ लिखने को नही था,
फिर भी कलम उठा कर सोचता रहा,
सोचता रहा रात भर के क्या लिखूँ??
फिर कहीं दूर दिल मे झांक के देखा,
तो मुझे सिर्फ तेरा ही ख्याल आया,
सोचा आज कुछ लिखूँ तेरे बारे में ,
पर ना जाने क्यों कलम थम गई मेरी,
और सोचता रहा युहीं रात भर,
तेरी बेपरवाही लिखूं या बेवफाई लिखूँ,
बस इसी मज़लिश में रात भर जागता रहा,
और सोचता रहा के क्या लिखूँ??
आंखें बंद करके जब भी देखा,
बस एक तेरी सूरत नज़र आयी,
जब लिखना चॉहा की क्यों तेरा अब तक इंतजार है,
फिर सोचने लगा क्यों मुझे अब तलक तुझसे प्यार है,
क्यों ना जान सके तुम वफ़ा-ए-मुहोबत,
कैसे मुहोबत अपनी किसी और के नाम लिखूँ,
कैसे अपने हाथों अपनी मुहोबत पर इल्ज़ाम लिखूं,
निकल ही नही पाया तेरे ख्यालों से कभी "चौहान",
गुज़ार दी ना जाने कितनी रातें युहीं तन्हा,
और सोचता रहा के क्या लिखूँ??

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 4 July 2018

"बारिश" (BARISH)


ये बारिश सावन की रुलाये मुझको ,
ये भीगी भीगी बूंदे जलाए मुझको।।

बिखरे मुझपर यादें बनकर तेरी ये तो,
रोकूँ कैसे इनको रोक ना पाऊं खुद को।।

आँखों से निकले ये हाथोँ पर भी ना ठहरें,
हाल-ए-दिल अपना, अपना मैं सुनाऊँ किसको।।

भीगा के मुझको अब तो एहसास ये ऐसा दिलाये,
बहाने बारिश के जैसे मैं सीने से लगाऊं तुझको।।

मरहम है या ज़हर है समझ में ही ना आये मुझे,
जला बूंदों से "चौहान", ये ठंडी हवाओं से बुझाये मुझको।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...