Friday, 31 May 2019

"इश्क़ की कहानी" (ISHQ KI KAHANI)


वो कहती है मुझसे कोई इश्क़ की कहानी लिखो,
अपनी हो या बेगानी मुहोब्बत-ए-रूहानी लिखो।।

वो जो हमने की है ,तुमने की है, हाँ सबने की है,
वो उस हसीन उम्र की हसीन नादानी लिखो।।

वो जो हर खुशी हर गम में निकल कर बह गया,
लबों पे आकर रुक गया , वो आंखों का पानी लिखो।।

वो जिसका करते रहे इंतज़ार हम एक अरसे से,
वो मुहोब्बत-ए-मौसम में फ़िज़ाओं की रवानी लिखो।।

वो जिसमे अक्सर भीग जाया करते थे हम दोंनो,
वो सावन की महकी बारिशों का पानी लिखो।।

वो जिसे बार बार पढ़े पर दिल ना भरे "चौहान",
ऐसी कोई इश्क़-ए-शबाब की कहानी लिखो।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 28 May 2019

"काश" (KAASH)


काश जलाने का नहीं, यहाँ भी दफनाने का रिवाज होता,
जब भी तेरी याद आती ,तेरी क़ब्र पर मिलने चला आता।।

छोड़ देता ये रीति रिवाज़, इस समाज के झूठे नातों के,
तेरी कब्र की मिट्टी उठा मैं भी अपने माथे से लगा लेता।।

बैठ कर मैं भी कर लेता बातें तुझसे,क़िस्से अपनी यारी के,
फूल चढ़ाने के बहाने ,तुझसे रोज़ मुलाकातें ही कर लेता।।

जो आज टूट के बिखर गए है मोतियों से रिश्ते सभी,
पल भर को सही , सबको अपने दामन में भर लेता।।

यकीन था दोस्ती पर,मेरी एक बार आज़माइश तो करता,
तेरी ख़ातिर "चौहान" दुनिया क्या,भगवान से भी लड़ लेता।।

बहाने आज मैं खुद को बहलाने के लिए, खुद से ना बनाता,
आज भी दिल कहता है तु होता ,तो मेरी आवाज़ सुन चला आता।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 27 May 2019

"साज़िश" (SAZISH)


हाथ उसके भी जले होंगे जिसने आशियाँ मेरा जलाया होगा,
मेरा तो माना सब कुछ खो गया,उसने भी तो कुछ न कुछ गवाया होगा।।

मैं इस राख में , इस ख़ाक में ,ढूंढता रहा रात भर उस शक्श को,
जिसने मेरा अक्ष बचाने के ख़ातिर खुद को खाक में मिलाया होगा।।

मैं दीये की तरह खुद को जला उम्र भर उसको रौशन करता रहा,
साज़िश उसकी थी खिड़की खुली रखना, हवाओं को पता मेरा उसने ही बताया होगा।।

एक जगह थी जो बस हम जानते थे , हम मिलते थे जहाँ अक्सर,
मुझसे दूर हो कर ,मेरी तलाश में अकेला वो वहां ज़रूर आया होगा।।

उसे आज मैं बेवफ़ाई का इल्जाम दूँ भी तो कैसे " चौहान",
मुझमे वो प्यार नज़र ना आया होगा तभी किसी और से दिल लगाया होगा।।

सिर्फ बातों का खेल ही तो बनकर रह गई है मुहोब्बत यहाँ,
कौन सा वो इश्क़ में हक़ीक़त में चाँद तारे ज़मी पर लाया होगा।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 25 May 2019

"कुछ तो" (KUCH TO)


कुछ तो रिश्ता रहा होगा हमारा तुम्हारा,
यूँ बेमतलब बेवज़ह तो मुलाक़ात नही होती।।

तपिश नज़र आई होगी ज़मी की आसमाँ को,
वरना कभी यूँ बेमौसम बरसात नहीं होती।।

ये अंधेरा है ये रात है जो वज़ूद बरकरार रखती है,
वरना चाँद तारों की कोई बिसात नही होती।।

ये करामात है उस खुदा की ,के पत्थरो का भी मुकाम है,
पैरो की ठोकरें रहते, मंदिरों में पूजने की औकात न होती।।

ये दिल है जो समझ लेते है जज़्बात एक दूजे के बिन बोले,
वरना कभी बिना लफ़्ज़ों के खमोशी से बात नही होती।।

ये तेरा कर्म है "चौहान" के तेरे बाद भी लोग चाहते है तुझे,
अमर रूह होती है कभी आदम की जात नही होती।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"जब कभी" (JAB KABHI)



कभी खुशी तो कभी गम नया दे जाती है,
होंठों पे हँसी, आँखों मे नमी होती है,
जब कभी तेरी याद आती है ।।

लम्हा- लम्हा टूटना है मुझे, टूटे के बिखरना है,
जोड़ कर खुद से ये तन्हा मुझे कर जाती है ,
जब कभी तेरी याद आती है ।।

काली रात में काली घटाओं सी तन्हाई है,
मिल जाती है चाँद की झलक ,
जब कभी तेरी याद आती है ।।

रास्ते धूंधला गए है मंज़िलों पर आकर,
मंज़िले तो अब तुझमे ही नज़र आती है,
जब कभी तेरी याद आती है ।।

आधे अधूरे अल्फाज़ लब ख़ामोश है मेरे ,
कह जाते है सब बिन बोले ,
जब कभी तेरी याद आती है ।।

लिखने को आज भी कुछ नही "चौहान" कलम से मेरी,
पर नज़्म रोज़ नई बन जाती है ,
जब कभी तेरी याद आती है ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 23 May 2019

"खामोशियों के जवाब" (KHAMOSHIYON KE JAWAB)


एक रात गुज़री थी उसकी बाहों के आगोश में,
अब वक़्त थम सा गया है अब वैसी रात नही होती।।

खामोशियों से मिल रहे है खामोशियों के जवाब,
कैसे कह दूँ अब उससे मेरी बात नही होती।।

आते जाते लोग पूछते है मुझसे हाल तुम्हारा,
कैसे कह दूँ की अब तेरी मेरी मुलाकात नही होती।।

नज़र नही आते आजकल जो गवाह थे कल मुहोब्बत के तेरी,
कहीं छिप गए वो चाँद तारे या तेरे शहर में अब रात नही होती।।

सुना है आजकल तुम्हे नफरत सी हो गयी है बारिशों से,
मेरी याद सताती है या वो मुहोब्बत-ए-बरसात नही होती।।

वो जो ऊपर बैठा है, तेरे,मेरे ,सबके दिल का हाल जानता है,
वरना लोग अपनो को ही जानते यूँ अजनबियों से मुलाक़ात नही होती।।

इश्क़ कमा "चौहान" दौलत का क्या है, ये साथ नही जाती ,
मिट्टी हो मिट्टी में मिलना है सबको मिट्टी की कोई जात नही होती।।

लौट आते है लोग खाली हाथ अमीरों दे दरवाज़ों से,
किसी फ़क़ीर की दुआ लेना, उनकी कही खाली कोई बात नही होती ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 22 May 2019

"कहाँ से लिखूँ" (KAHAN SE LIKHUN)


जो तेरी रूह को छू जाए ऐसी बात कहाँ से लिखूँ,
जो तुझे अपने से लगे ऐसे जज़्बात कहाँ से लिखूँ।।

मौसम पतझड़ के देखे है हर मौसम में मैंने,
वो सावन की पहली बरसात कहाँ से लिखूँ।।

जब भी मिला वो हिज़ाब में मिला है मुझे,
फिर उसके नूर-ए-हुस्न की बात कहाँ से लिखूँ।।

हमेशा तन्हाइयों में गुज़री है रात उसकी याद लेकर,
इस अमावसी रात में चाँद तारों की बात कहाँ से लिखूँ।।

इस सफर में कोई हमसफ़र ही नही है मेरा,
कैसा होता है किसी का साथ, ये बात कहाँ से लिखूँ।।

एक अरसा बीत गया तेरा दीदार किए बिना,
कैसी होती है वो चाँद तारों भरी, पूनम की रात कहाँ से लिखूँ।।

जैसा कहानियों में पढ़ा वैसा हक़ीक़त में कुछ नही था,
फिर तू बता मैं इश्क़ मुहोब्बत की बात कहाँ से लिखूँ।।

कभी लिखा तो ज़िक्र ज़रूर आएगा तेरा कहानी में मेरी,
अभी उलझे- उलझे से है हालात, जज़्बात कहाँ से लिखूँ।।

जब मिलना था तब मज़बूरी बताता था वक़्त और हालतों को "चौहान",
जब कभी हम मिल ही ना पाए तो मुलाक़ात कहाँ से लिखूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 20 May 2019

"मैं और तू" (MAIN AUR TU)


खुद को समझता हूँ बार-बार,
के तू अब मेरे पास नही,
जहाँ जाकर तू रहने लगा है,
लौट आने की कोई आस नही।।

ऐसा नही के थक गया रास्तों पर,
सच कहूं तो अब मंज़िल की तलाश नही।।

कहने को तो दोस्त बहुत है ,
पर जिसे जगह तेरी दे दूं,
इतना भी कोई खास नही।।

बहुत ख़लिश है जिंदगी में मेरी,
क्या खोया है मैंने,
इस बात का किसी को एहसास नही।।

अब तो तू बस किस्से-कहानियों में आबाद रहेगा,
दो दिन आँसू बहाएंगे लोग फिर किसको तू याद रहेगा,
हकीकत है मिट्टी का जिस्म एक रोज़ मिट्टी हो जाना है,
संभालकर रखता कोई यहाँ मशान की राख नही।।

सब कहते है कि भुला दूँ तुझे अब ,
तेरे पास वो जिस्मानी लिबास नही,
ये दुनिया सिर्फ ज़रूरत देखती है "चौहान",
यहां रूहानी नातों की कोई औक़ात नही ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Saturday, 18 May 2019

"पहला प्यार" (PEHLA PYAR)


देखते है उन्हें तो आंखों में इश्क़ का ख़ुमार भरते है,
दिन भर किसी की यादों में अपना दिन गुज़रा करते है,
जब नज़रे उन्हें देखने की गुज़ारिश बार-बार करती है,
जब किसी की खातिर सारे जमाने से तकरार करते है,
लगता है लोग शायद इसी को पहला प्यार कहते है।।

इश्क़-ए-समुन्दर में ख़्वाबों की नाव पर खुद को सवार करते है,
दरवाज़े पर खड़े हो जिसके गली से गुजरने का इतंज़ार करते है,
जिनको हम अपनी ज़िंदगी के हर रास्तों का मुक़ाम समझते है,
लगता है लोग शायद इसी को पहला प्यार कहते है।।

हर मंदिर मज़ारों में जिसे पाने की फरियाद करते है,
अपने नाम के साथ जोड कर जिसका नाम लिखते है,
उनकी हर एक अदा ,नज़ाकत शरारत को प्यार करते है,
लगता है लोग शायद इसी को पहला प्यार कहते है।।

हक़ीक़त कहुँ तो जिसको अपना खुदा परवरदिगार समझते है,
जो कभी मिलना ही नही फिर क्यों उसी से हम प्यार करते है,
तुझे समझ आती है तो मुझे भी समझा दे खुदा,
वो ज़मी मैं आसमान, क्यों हम अपने मिलन की राह तकते है,
लगता है लोग शायद इसी को पहला प्यार कहते है।।

"चौहान" को तो समझ आते नही तू ही बता दे खुदा,
क्यों वो अज़नबी की तरह आते है ,
रूह बन जिस्म से रूह निकाल ले जाते है,
रिश्ता तो तोड़ जाते है फिर क्यों उम्रभर,
जहन में एक याद बनकर रह जाते है,
एक फूल की तरहा ही तो है वो,
जिसे पास तो रखना चाहते है,
पर उसके मुरझाने के डर तोड़ भी ना पाते है,
फिर क्यों ऐसी चाहत को लोग,
इश्क़ मुहोब्बत का नाम बताते है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 16 May 2019

"फ़क़ीर का हाल" (FAQIR KA HAAL)


कभी किसी फ़क़ीर का हाल लिखूँगा,
जो करता हूँ खुद से वो सवाल लिखूँगा।।

किस विरहा का रोग लगा बैठा हूँ दिल को,
क्या है मुझको मुझसे वो मलाल लिखूँगा।।

कैसे बदलती है क़िस्मत हाथो में आते ही उस काँसे के बर्तन की,
सब उस फ़क़ीर की फ़कीरी का क़माल लिखूँगा।।

पास कुछ नही है पर खाली किसी को जाने नही देता है,
रंक से जो राजा बना दे ऐसी दुवाओं का कमाल लिखूँगा।।

वो जो ना मोह माया का भूखा है ना वैभव- सम्मान का,
हाँ कभी किसी वैरागी के वैराग्य का कमाल लिखूँगा।।

वो जो किसी महल अटारी में सोने चांदी से नही मिल पाता,
दरवेश की चौंखट पे जो मिलता है सुकून उस चौंखट का कमाल लिखूँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 15 May 2019

"ऐसा लगता है" (AISA LAGTA HAI)


ऐसा लगता है कि सब कुछ हार कर बैठा हूँ,
ज़िन्दगी बाकी है पर उम्र गुज़ार कर बैठा हूँ।।

वो बचपन वो लड़कपन वो आँगन सब खो गया,
चेहरा भी झूठा है हंसी का नकाब ओढ़ कर बैठा हूँ।।

कम थे पर अच्छे थे रिश्ते नाते वो सारे सच्चे थे,
वक़्त के खेल है रिश्ता खुद से भी बिगाड़ कर बैठा हूँ।।

बेबसी है मेरी पाया कुछ नही खोने को कुछ रहा नही,
एक रूह थी आज वो भी किसी के नाम कर बैठा हूँ।।

रंग बिरंगे फूलों सा  सजा रखा था बगीचा ख्वाबों का मेरे,
खुद अपने हाथों से "चौहान" वो बगीचा उजाड़ कर बैठा हूँ।।



शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 13 May 2019

"कुछ और है" (KUCH AUR HAI)


कभी तो समझ जाओ ये जज़्बात कुछ और है,
जो तुम्हे खामोशी लगती है वो मेरी बेबसी का शोर है।।

क्यों बेचैन हो जाते है तुम्हारे लिए हम बिन बात,
लगता है किसी कच्चे रिश्ते की ये कोई पक्की डोर है।।

दिखाई नही देते हर किसी को पर दर्द बहुत देते है ,
इस रोग में हकिम तेरे अलावा कहाँ कोई और है ।।

इतना भी ना आज़माओ मुझे के मैं टूटे ही जाऊँ,
आईना हूँ तेरा माना वज़ूद मेरा थोड़ा कमज़ोर है।।

"चौहान" तो कब का तोड़ देता तालुकात तुझसे ए ज़िन्दगी,
एक दिल ही है मेरा ये जो थोड़ा तेरे इश्क़ में मग़रूर है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



Sunday, 12 May 2019

"माँ" (MAA)



नीँद नही आती है,
बेचैनी सताती है माँ,
कैसे कहुँ हर रोज़,
तेरी याद रूलाती है,

आँचल में रख सिर मेरा,
हाथों से सहला दे माँ,
मैं तो तुझसे कह ना पाऊँ,
लौरी गा के सुला दे माँ,

थक गया हूँ घूम घूम कर,
दुनिया के कमकारों से,
सुखी रोटी का निवाला,
 तेरे हाथों से खिला दे माँ,

लेजा फिर उसी बचपन मे माँ,
फिर गोद मे अपनी सुला दे माँ,
अब और ना सता मुझको माँ,
आ सीने से लगा ले माँ,
आ सीने से लगा ले माँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 11 May 2019

"माँ तो माँ है" (MAA TO MAA HAI)


बड़ा तू जमाने की नज़र में है,
उसकी नज़र में तो नही,
तू घूमता रह बेफ़िक्री से,
माँ तो माँ है,
उसे कब हुई तेरी फिक्र नही।।

जिसने तेरी हँसी में अपनी ख़ुशी पाई,
तेरी उदासी जिसकी आँखों में नमी ले आयी,
कहाँ कबूल होंगे फिर सजदे तेरे,
गर तुझे तेरे घर के भगवान की कदर नहीं,
माँ तो माँ है,
उसे कब हुई तेरी फिक्र नही।।

जो तुझे खाना खिलाने के बाद खाती है,
तुझे सुलाने के बाद जिसे नींद आती है,
पुजता रह दिन रात बना के गौ को माता,
जब तेरी अपनी माँ के लिये तेरा घर नही,
माँ तो माँ है,
उसे कब हुई तेरी फिक्र नही।।

तेरी हल्की सी चोट से जिसका दिल सिहर जाता है,
बुरे वक्त में सबसे पहले नाम जिसका तेरी ज़ुबाँ पर आता है,
ये उसकी दुवाओं का असर है ,
के तुझपे बलाओं का असर नहीं,
माँ तो माँ है,
उसे कब हुई तेरी फिक्र नही।।

वो जो तेरे गीले में चैन से सो जाती थी,
तेरे खातिर रोज़े उपवास रख भूखी रह जाती थी,
वो तेरे घर आने तक जिसकी,
चौंखट से हटती नज़र नहीं,
माँ तो माँ है,
उसे कब हुई तेरी फिक्र नही।।

वो जिसके चरणों मे भगवान भी सिर झुकाता है,
वो जिसके चरणों के नीचे स्वर्ग कहाँ जाता है,
जिसे लिखकर बयाँ कर दूँ,
माँ सार है "चौहान"कोई अक्षर नही,
माँ तो माँ है,
उसे कब हुई तेरी फिक्र नही।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 10 May 2019

"मुमकिन"(MUMKIN)


माना के वजूद नही है सच्ची मुहोब्बत का यहाँ,
पर यूँ हर किसी का हो जाना मुमकिन तो नही।।

रोशन तो सारे तारे भी है काली अँधेरी रात में ,
सबका हकीक़त में चाँद हो जाना मुमकिन तो नही।।

ज़ख़्म गहरे भी है और हरे भी हैं माना इश्क़ के,
हर किसी को ये सौग़ात मिल जाना मुमकिन तो नही।।

माना के बन जाती है हर नदी सागर ,सागर में मिल के,
सागर में मिलकर  मीठा रह पाना मुमकिन तो नही।।

ये राह ज़िन्दगी की है यहां चलना अकेले पड़ता है सबको,
किसी का हाथ पकड़ कर मंज़िल तक जाना मुमकिन तो नही।।

मत आज़माओ किसी के यकीन तो तुम इतना,
हर कोई ख़ामोशी से चला जाए ये मुमकिन तो नही।।

गुरुर दौलत का हो या शोहरत का चढ़ता ज़रूर है अहम बनकर,
हमेशा बुलंदियों पर टिक पाना "चौहान" मुमकिन तो नही।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Wednesday, 8 May 2019

"बिखरी यादें" (BIKHRI YAADEN)


आज कुछ बिखरी यादें समेट रहा हूँ
कुछ ज़ख्म भरे नही उन्हें कुरेद रहा हूँ।।

माना इन बातों का आज कोई मतलब नही है,
जो ख़्वाब कल देखा था वैसी आज हकीकत नही है।।

तोड़ कर नाता रोज़ अपने आज से जोड़ रहा हूँ,
नकाब खुशियों का हटा चादर गम की ओढ़ रहा हूँ।।

हाँ कुछ रिश्ते आज बस नाम के ही रह गए,
बेवज़ह ही सही आज उन रिश्तों को तोड़ रहा हूँ।।

ये लकीरें तो मेरे हाथ मे कभी थी नही शायद,
फिर क्यों इन हालातों को नाम क़िस्मत का दे छोड़ रहा हुँ।।

एक खुशबू आके रम गई है मेरे जिस्म-ए-पहरान पर,
यही एक वजह है जो मरके भी ये जिस्म नही छोड़ रहा हूँ।।

लिखने पर आया तो लिख डालूँगा तकदीर भी अपनी"चौहान",
तू कभी मिल नही सकता तभी आज लिखना छोड़ रहा हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 6 May 2019

"एक साया" (EK SAAYA)


दूर कहीं अंधेरे में एक साया गुमनाम है,
सागर सुख गया पर अश्क़ों के निशान है।।

कहने को साथ चलता मेरे सारा जहाँ है,
तेरे इश्क़-ए-गम का दिल अकेला मेहमान है।।

माना राते काली है आज भी तन्हा उदास है,
चहरे पर तेरी यादों की हल्की सी मुस्कान है।।

ये दस्तूर है के इश्क़,वफ़ा सब धोखे है,
फिर भी इश्क़-ए-सागर में डूबा हर इंसान है।।

क्या फायदा "चौहान" करके काले पन्ने,
जब तेरे दर्द से वाकिफ़ होकर भी वो बेज़ुबान है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 4 May 2019

"खिलाफ" (KHILAAF)


वार आँखों के दिल पर चले,
समझो इरादा उनका साफ है।।

मासूमियत इतनी थी खुदा के,
उनका तो हर एक गुनाह माफ है।।

चहरे की लालिमा तो मानो,
शाम की ललाट लिये आफ़ताब है।।

नूर-ए-हुस्न की दौलत लिए है,
तभी चहरे पर उनके हिज़ाब है।।

ख़्वाईश रखते भी कैसे पाने की,
खुली आँखों से देखा हुआ ख़्वाब है।।

बहुत राज़ लिए बैठी है आंखे,
मानो कोई तिलस्मी किताब है।।

बैठ कर पहरों बातें भी कर लूं,
तेरा अक्ष लिए जैसे कोई महताब है।।

कहाँ हवाएँ हक में होंगी "चौहान",
जब ये फ़िज़ा तक ख़िलाफ़ है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 3 May 2019

"शायर बदनाम" ( SHAYAR BADNAAM)


वो बात उनकी करते रहे "चौहान" जिनके नाम हो गए,
मैं अक्सर उनको पढ़ता रहा जो "शायर बदनाम" हो गए।।

बात मुहोब्बत में "शिव" की करूँ ,"फ़ैज़" की या "मज़ाज" की,
किस्से मुहोब्बत के तो सारे "ग़ालिब" के ही नाम हो गए।।

बात "तुलसीदास" की करूँ, जिसको घर से निकला था,
मस्ज़िद में सोकर लिखी, "रामचरितमानस" को लोगो के प्रणाम हो गए।।

बात कबीर कि कहूँ, जिसने लिखा नही,जिया है अपने लेख को,
आज "दोहे कबीर के" आम लोगों के जीवन का सार हो गए।।

वो जीता रहा मुहोब्बत को कविताओं में, हालातों से लड़ झगड़कर,
आज गीत "शिव" के लोगो के मुहोब्बत के कलाम हो गए।।

वो जिसने जग की परवाह ना कर ज़ुबाँ पर कृष्ण-राग चढ़ाया,
वो "मीरा" की लग्न के चर्चे तो लोगो में शरेआम हो गए।।

बात अगर करूँ "जौन" की तो मुहोब्बत के अलग मुक़ाम नज़र आये,
वो मंच पर बेबाकी , बेपरवाही के किस्से सब तमाम हो गए।।

बात "फ़ैज़" की करूँ आज भी वो उर्दू शायरी का मुकाम नज़र आता है,
"और भी गम है जमाने मे मुहोब्बत के सिवा" ये असार आज कहावतों के नाम हो गए।।

आज भी कायल हूँ तेरी शेरो-शायरी के मिज़ाज़ का "मज़ाज",
जीते जी वो मुकाम ना मिले ,आज लेख तेरे लोगो की ज़ुबान हो गए।।

आज भी सोचता हूँ "चौहान" जो बेबाकी से हक़ीक़त बना जीते थे लिखावट अपनी,
क्यों फिर वो शायर जमाने की नज़रों में "शायर-बदनाम" हो गए।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 1 May 2019

"इश्क़ और हक़ीक़त" (ISHQ AUR HAQIQAT)


कुछ बाते है जो तुम्हे बातों ही बातों में समझा दूँगा,
क्या ख्वाब है क्या हक़ीक़त है सब तुम्हे बता दूँगा।।

वो जो पर्दा गिरा मुहोब्बत का,भुला बैठे हो अपनो को,
कौन अपना है तेरा ,कौन पराया, सब तुम्हे बता दूँगा।।

कदर उनकी मिट्टी में मिला रखी है जिनके सिर का ताज हो तुम,
वो काजल कैसे बन जाता है कलंक, शीशे सा साफ तुम्हे
दिखा दूँगा।।

आज कुछ पलभर की खुशी के पीछे घर उजाड़ रहे हो,
कैसे बनते है मकाँ यादों के खंडहर सब तुम्हे दिखा दूँगा।।

आज सब हाथों में है तुम्हारे तो सँभालने से कतरा रहे हो,
कल रेत सा सब मुठ्ठी से फिसल जाएगा सब तुम्हे दिखा दूँगा।।

मेरी माला का वो धागा हो तुम जिसने सब मोतियों को पिरो रखा है,
कैसे बिखरते है टूट कर रिश्ते सब हक़ीक़त में दिखा दूँगा।।

कहीं ज़िद्द तेरी खुशियों की कब्र तक ना ले आये हमें "चौहान",
घर दीये की लौ से कैसे जल जाते है सब तुम्हे दिखा दूँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...