कल रात एक ख़्याल भी ऐसा नही था ,
जिसमे तुम ना हो।।
किये लाखों सवाल इस छोटे से दिल ने,
एक सवाल भी ऐसा ना था ,
जिसमे तुम ना हो।।
देखता रहा अपने हालात इश्क़ मे एक नज़र,
कोई भी ऐसा ज़हन में ख़्यालात ना था,
जिसमे तुम ना हो।।
मिलना बिछड़ना तो बात मुक्कदर की है
गिनता रहा तारे देखता रहा आसमाँ,
एक बार भी ना दिखा वो चाँद ,
जिसमे तुम ना हो।।
लिखता रहा अपने हाथों अपनी बर्बादी का फलसफा,
"चौहान" फिर "मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ"
ना ऐसा हुआ कोई फसाना बयाँ,
जिसमे ज़िक्र तेरा ना हो या,
जिसमे तुम ना हो।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
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