कुछ तुम बदले ,कुछ हम बदले ,
वो रंग ना बदले अपनी चाहत के ,
कुछ वक़्त बदला दस्तूर बदला ,
पल बेचैनी के न बदले राहत में ,
शिकवे भी है तुमसे शिकायत भी,
माना अब भी है तुमसे वही चाहत भी ,
देखे तुमसे बहुत इस जहाँ में ,
बस वो ढंग ना बदले हमपे इनायत के,
ढलती गयी शाम और ढलते गए हम ,
फिर उस रात अकेला था चाँद और अकेले थे हम,
लिखते रहे फिर उठा के कलम अपने जज़्बात ,
क्यों ना बदले "चौहान" एहसास तेरी चाहत के ,
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां




