ना दर्द लिखूँगा, ना आराम लिखूँगा,
एक रोज़ खुद को मैं तेरे नाम लिखूँगा।।
क्या सफ़ा है हाथों में उसके,
माँ के आँचल का आराम लिखूँगा।।
एक शक्श है जो मुझसे हारकर भी जीत जाता है,
पूछेगा कोई तो मैं बस पापा तुम्हारा नाम लिखूँगा।।
जिसकी खुशी के लिए लड़ खुदा से भी सकता हूँ,
ये खुशियों की सौंगात मेरी बहन के नाम लिखूँगा।।
कैसे बन जाती है ज़िंदगी मुहोब्बत,
चुपके से मैं फिर तेरा नाम लिखूँगा।।
लड़ाई ,झगडा ,प्यार ,मुहोब्बत, बचपन, जवानी,
अगर बात आ ही गयी है तो मैं तेरा नाम लिखूँगा।।
एक याद ने मुझे संभाल रखा है अब तलक,
तुझपर दोस्ती में दुरियों का इल्जाम लिखूँगा।।
लिखनी पड़ी अगर कभी खुद पर किताब,
हर पन्ने पर बस एक तेरा नाम लिखूँगा।।
पूछा अगर किसी ने मुझसे दोस्ती का मुक़ाम,
अपनी कलम से "चौहान" तेरा नाम लिखूँगा।।
बड़ा अजीज है तू मेरे खातिर क्या बताऊँ तुझे,
अपनो की बात अगर आयी तो पहले तेरा नाम लिखूँगा।।
बहुत कुछ गवाया है इस ज़िंदगी मे मैंने मगर,
कुछ माँगने को दे खुदा तो मैं तेरा नाम लिखूँगा।।
अब पहले जैसे नही है तालुकात हमारे तुम्हारे,
बेफ़िक्र रह तेरी दोस्ती में धोखे वाली बात नहीं लिखूँगा।।
मुहोब्बत तुझसे बेपनाह है और बेपनाह रहेगी,
तुझे लिखूँगा हर लफ्ज़ में पर तेरा नाम ना लिखूँगा।।
किसी ज़ागीर से कम नही मेरी ख़ातिर ये नाम,
मेरी पहचान में हर जन्म "चौहान" लिखूँगा।।
कुछ और शक्श है जो अहम है मेरी ख़ातिर,
वक़्त मिला तो एक क़िताब उनके नाम लिखूँगा।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।