Tuesday, 31 March 2020

"झूठा है" (JHUTHA HAI)



ये इश्क़ मुहोब्बत अब हमे तो ना समझाओ,
इस बस्ती में तो हर किसी का दिल टूटा है।।

अब इस रिश्ते की बागडोर हम ही क्यूँ संभाले,
मैं अकेला थोड़ी हूँ जो पत्थरों से टकरा के टूटा है।।

तुम्हे हँसता मुस्कुराता मिलेगा यहाँ हर शक्श,
यकीन मत करना इस राह का हर शक्श झूठा है।।

याद रखना ये मुहोब्बत भी एक जुआ ज़नाब,
एक जीत के बाद यहाँ सबका सबकुछ लुटा है।।

चाँद में चहरे नज़र आते है जो आईने में मुस्कुराते है,
सब दिखावा है इस बस्ती का तो आईना भी झूठा है।।

मत लिख ये जज़्बात, ये फ़साने ,"चौहान",
मैंने सुना है तेरा लिखा हर किस्सा झूठा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 28 March 2020

"हम नही है??" ( HUM NHI HAI ??)


ये कैसा मंज़र है, जिसके गुनहगार हम नही है,
क्या इन सब हालातों के क़सूरवार ,हम नही है??

जिसे मन आया मार दिया, मन आया कैद किया,
क्या इस हैवानियत के शिल्पकार, हम नही है??

वक़्त के खेल है ,कब ,कहाँ ,करवट लेले किसे ख़बर,
आज पँछी आज़ाद ,पिंजरे में गिरफ्तार, हम नही है??

वो तो आज भी वैसे ही जी रहे है ,जैसे कल जीते थे,
इन पाबंदियों के असलियत में हक़दार ,हम नही है??

वो भूख के लिए मारते थे, हम इंसानी हुकूमतों के लिए,
इंसानियत कहाँ, इन जानवरों से बेकार ,हम नही है ??

हर किसी को ग़ुलाम बना, जीव पर हुकूमत करने वालो ,
आज पूछता है "चौहान" गुलामी के हक़दार,हम नही है??

हर किसी को तो नुकसान पहुँचाते आये है, अपने फायदे के लिए,
क्या आज इन हालातों के हकीकत में रचनाकार , हम नही है??

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 27 March 2020

"इल्म" (ILAM)


मंज़िले ऐसे मोड़ पर आ जाएंगी,
हमें कहाँ इल्म था,
मौत ज़िंदगी से बेहतर नज़र आएगी,
हमें कहाँ इल्म था,
हमने तो मुहोब्बत इबादत्त जानी थी,
लैला मजनूं ,हीर राँझा, सबकी मुहोब्बत रूहानी थी,
पर आज फिर मुहोब्बत जिस्मानी जीत जाएगी
हमें कहाँ इल्म था,
कहाँ इल्म था के हम खुद ही,
खुद के गुनहगार हो जाएंगे,
ज़िंदगी तेरे यूँ कर्ज़दार हो जाएंगे,
यूँ बाँटते बाँटते दर्द लोगों का,
आँखें हमारी पानी पानी हो जाएंगी,
हमे कहाँ इल्म था,
रास्तों के हो गए ना कोई मुकाम आया,
सादिया बीत गयी ना कोई पैग़ाम आया,
जिस गुनाह से बचते रहे ताह उम्र,
उसी गुनाह का हमपर इलज़ाम आया,
मौत से भी बद्तर "चौहान" ये ज़िंदगानी हो जाएगी,
हमें कहाँ इल्म था।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 25 March 2020

"आवारापन" (AWARAPAN)


ये कैसा आवारापन है ,
की ये मिटता ही नही,
क्यूँ धुँवा-धुँवा है हर कहीं,
की ये छँटता ही नही,
ये कैसी मुहोब्बत है तुझसे,
तेरे अलावा कुछ दिखता ही नही,
तू मेरा तो नही है फिर क्यूँ,
नक्श तेरा दिल से मिटता नही,
कैसी तन्हाई है जान ले रही है,
अजब तमाशा है ज़िंदा हूँ पर ज़िंदा नही,
कितना समझाऊँ खुद को,
दिल मेरा दिलासे समझता नही,
ये कैसा ज़ख्म लगा है मुझको,
कोई मरहम काम करता ही नही,
हर दिन चलता रहता हूँ बेखबर,
ये कैसा रास्ता है कि कटता ही नही,
हर दर चौंखट पर झुका है ये सिर,
अब ये मंदिर मज़ारों पर झुकता नही,
ख़ामोशी घर कर गयी है मुझमे इस कदर,
अब खुद से भी मैं मिलता नही,
ये बारिश जला कर राख कर रही है मुझे,
काले बादलों का साया है कि हटता नही,
अब इस सफ़र में मुझको आराम चाहिए,
अब इन गलियों से मेरा कोई वास्ता नही,
ये रात आखिरी है जो लिख रहा हूँ,
अब मुझे हाल दिलों का लिखना ही नही,
ये तन्हाई अकेलापन ठीक है "चौहान",
शायरों की मंडी में अब मुझे बिकना नही।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 23 March 2020

"सजदे" (SAZDE)


ओढ़ तिरंगा आ गए जो घर वापिस,
सजदे करता है दिल उन रूह महान को।।
रक्त से अपने सींच कर जिन्होंने,
बचाया भारत माँ की शान को।।

सजदे करता है दिल मेरा,
उन रूह महान को।।

ना देखा हाथों का वो चुड़ा,
ना माथे के लाल सिंदूर को,
छोड़ अकेले नन्ही सी जान को,
जो बचा गए मिट्टी के मान को,

सज़दे करता है दिल मेरा,
उन रूह महान को।।

जो माँ की ममता से बढ़कर,
माँ बाप का गुरुर बनकर,
जो चला देश की ढाल बनकर,
जो मिटा देश के मान पर,

सजदे करता है दिल,
उन रूह महान को।।

जो बाँध कफ़न लड़ गए,
चट्टानों से जो अड़ गए,
हर एक उस जवान को,
"चौहान" इस स्वाभिमान को,

सज़दे करता है दिल,
उन रूह महान को।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 22 March 2020

"अनजान शहर" (ANJAAN SHAHAR)


इस अनजान शहर में कोई अपना भी नही,
आखिर किस से हम यहाँ मुलाक़ात करें।।

ना ज़ुबाँ मालूम है ना लहज़ा यहाँ के लोगो का,
आखिर कैसे हम किसी से यहाँ बात करें।।

एक अजब सी मायूसी देखी है आँखों मे यहाँ सबके,
आखिर कैसे हम इन को बयाँ अपने हालात करे।।

ये मुहोब्बत का कोई शहर था शायद किसी दौर में,
तभी यहाँ आज दिल सबके जलते श्मशान मिले।।

कैसे पूछता पतझड़ में गिरते पत्तो से उनका हाल,
मुझे तो खुद से खुद बात करते हुए कई बेज़ुबान मिले।।

लौट आया वापिस फिर अपने ही शहर में "चौहान",
मेरे दिल की बस्ती थी वो जिसके हर घर वीरान मिले।।

कैसे लिख दूँ अपने हाथों अपनी बर्बादी का फ़साना,
हम खुद गुनहगार है हमारे तुमसे क्या सवालात करे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 20 March 2020

"ज़िंदगी की किताब" (ZINDAGI KI KITAB)


किताब मेरी ज़िंदगी की,
लगी ना जाने कितने हाथ,
किसी ने देखा, छोड़ दिया,
किसी ने पढ़ ली कुछ बात,
कोई पढ़कर भूल गया मुझे,
कोई यादों में ले गया साथ,
किसी ने खुद से जोड़ कर,
समझे थे कभी मेरे हालात,
कितनो ने था खरीदा मुझे,
कितनो ने समझा था बेकार,
कहीं नाम मिला बेशुमार,
कही नासमझी की दुत्कार,
ये कितने तराज़ू तोल थे,
जहाँ तुलते रहे बार-बार,
वो कहते रहे यकीन है,
और आज़माते रहे हर बार,
वो पूरा पढ़ के ख़ामोश था हमें,
जान बैठा था वो हर राज़,
बस एक छुपा रखा था उससे,
"चौहान" मेरी कहानी का,
एक तू ही था हमराज़।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 17 March 2020

"बेगाने"( BEGAANE)


सच ही तो है ये अब हम बेगाने हो गए है,
ये इश्क़ ,मुहोब्बत सब फ़साने हो गए है।।

ना मेरा अब तुमपर कोई हक रहा,ना तेरा मुझपर,
अब हम किसी और शमा के परवाने हो गए है।।

अब कसमे वादे मत दिया करो निभा ना पाएंगे,
इश्क़ के इस दौर को गुज़रे अब जमाने हो गए है।।

एक वक्त था के हम अमानत ही नही जागीर थे तुम्हारी,
अब हम किसी मशहूर इमारत के बंद तहखाने हो गए है।।

भूल गए अब कैसे इश्क़ करले किसी से भी हम,
इस राह से गुजरे अब हमको कई जमाने हो गए है।।

सँभाल कर रखना जो भी लिखा था "चौहान" ने तेरे लिए,
मेरी तरफ से तेरे लिए आज इश्क़ के नज़राने हो गए है।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 14 March 2020

"हैरत"(HAIRAT)


कोई हैरत ना करना तुम,
मैं अगर अब लिखना छोड़ दूँ तो।।

तुम युहीं हँसते मुस्कुराते रहना,
मैं अगर अब हँसना छोड़ भी दूँ तो।।

तुम युहीं खुद का ख़्याल रखना,
मैं अगर अब खुद की फिक्र छोड़ दूँ तो।।

तुम युहीं नींदों से यारी रखना,
मैं अगर अब ख़्वाबों में आना छोड़ दूँ तो।।

तुम इस मुहोब्बत से मुकर जाना,
मैं अगर अब हाल-ए-दिल बताना छोड़ दूँ तो।।

तुम सबसे युहीं अपनापन जताना,
मैं अगर अब सबसे नाते तोड़ दूँ तो।।

तुम खुद को खुद ही संभाले रखना,
मैं अगर अब जीना ही छोड़ दूँ तो।।

दो फूल हाथों में ले मेरी कब्र पर मत आना,
मैं अगर अब ये दुनिया ही छोड़ दूँ तो।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम -दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 13 March 2020

"दादा-पौता" (DADA - POTA)


मैंने बड़े करीब से देखा है उसे,
हालातों का सामना करते हुए,
मेरी खुशियों की खातिर लड़ते हुए,
मेरी एक मुस्कान की ख़ातिर,
ज़मी आसमाँ एक करते हुए,
हाँ उस वक़्त नादान था मैं,
अपने पराये के फर्क से अनजान था मैं,
पर बात एक भी भुला नही हूँ मैं,
वो काँधे पर बैठ कर घूमाना,
वो पाँव के झूले पर झूलाना,
वो पास बैठा कर पढ़ाना,
वो हर एक बात को समझाना,
वो पुरानी कहानी किस्से सुनना,
अब तलक भुला नही हूँ मैं,
वो मेरा स्कूल जाने से कतराना,
वो जिद्द करके बाल ना कटवाना,
वो तेरा मुझे साईकिल दिलवाना,
वो सुबह सवेरे घूम कर आना,
अब तलक भुला नही हूँ मैं,
प्यार परिवार तो अब भी है,
पर एक तेरी कमी नज़र आती है,
जहाँ बैठा करता था तूँ,
आज वो बैठक भी बंद नज़र आती है,
वो दीवार पर तस्वीर पर हार देख,
आज भी आँखे नम हो जाती है,
ज़रूरत बहुत है पर तुझसा अब सलाहकार नही है,
वक़्त से पहले समझा दे ऐसा तजुर्बेकार नही है,
मायने हर रिश्ते के अपने-अपने है "चौहान",
पर दादा-पौते वाला प्यार नही है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 10 March 2020

"फ़ायदा" (FAYADA)


मैं गुनहगार कहूँ तो किसे कहूँ बर्बादी का अपनी,
कुछ साज़िश अपनो की थी, कुछ फायदा बेगाने उठा गए।।

मैं जलता दीया था एक रात तो निकाल ही देता उनकी रौशनाई में,
पर वो हवाओं को ईशारा कर गए और खुली खिड़कियों का बहाना बना गए।।

उसनें ख़त भी लिखा था एक रोज़ मेरी मुहोब्बत के जवाब में,
जवाब में तो इक़रार था पर वो ख़त किसी और के हाथों में थमा गए।।

हमें पहले ही ख़बर थी के शहद में वो ज़हर मिला कर लाये है ,
वो सोचते है कि हम उनकी बातों के छलावे में आ गये।।

एक रोज़ पढ़ने बैठे वो सारे फ़साने मेरी कलम से लिखे हुए,
मेरी कब्र पर आए और बोले "चौहान" तुम तो दुनिया को किस्से झूठे सुना के आ गए।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 7 March 2020

"ज़िंदगी तेरा कर्ज़" (ZINDAGI TERA KARZ)


किस बात का जश्न किस बात की खुशी,
इस राह पे मैं अपनो का गुनहगार हो गया।।

उठा फ़ायदा मेरी बेबसी का आज फिर,
ज़िंदगी इस साल भी मैं तेरा कर्ज़दार हो गया।।

वो कौन लोग थे जिनकी जान हुआ करते थे हम,
कहाँ है अब वो जिन्हें पाकर मैं ख़ुशगवार हो गया।।

ये कैसी ख़लिश है मुझमें जो मिटती ही नही,
क्या है जिसका मैं मंज़िल पर आके तलबदार हो गया।।

कठपुतली ही तो बना रखा है ज़िंदगी तूने ,
हाँ सच तेरी चोंट खाकर ये पत्थर एक आकार हो गया।।

खुद को खुद से मिला लेता हूँ शायरी के बहाने,
दुनिया कहती है "चौहान" गीतकार हो गया।।

वो जो बात बात पर मेरा अपना होने का दावा करते थे ,
कोई उन्हें भी इतल्लाह कर दो मैं बेकार हो गया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 6 March 2020

"मीरा" (MEERA)


कृष्ण राधा की कहानी हर कोई जानता है,
कोई अब मीरा की दास्ताँ सुनाये तो जानूँ।।

माना नाम जुड़ता है कृष्ण संग राधा का,
कोई मीरा सी मुहोब्बत करके दिखाए तो जानूँ।।

कोई तुम्हारा और तुम उसके ये तो आम बात है,
जो मिल ना सके कोई उसका होकर दिखाए तो जानूँ।।

यूँ दिन रात बातें करके तो इश्क़ कोई भी करले,
बिन बातों के जज़्बात ज़िंदा रख के दिखाए तो जानूँ।।

हाल पूछ कर तो हर कोई चला जाता है "चौहान",
कोई तेरे हाल में खुद को डूबा कर दिखाए तो जानूँ।।

जिसे मिला उनका मुकम्मल हो खत्म हो गया,
कोई अधूरा होकर भी क़ामिल होकर दिखाए तो जानूँ।।

यूँ जिस्मों के मेल में तो मुहोब्बत भी कहाँ जरूरी है,
कोई रूह से रूह का होकर दिखाए तो जानूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 4 March 2020

"मैं थक गया हूँ" (MAIN THAK GYA HOON)


मैं थक गया हूँ, सबको अहसास कराते-कराते,
किसकी क्या अहमियत है ये उनको बताते-बताते।।

हर किसी को आज बस दीखवी जज़्बात चाहिए,
टूट रहे है रिश्ते सभी आज हकीकत समझाते-समझाते।।

मैं जैसा बाहर हूँ ठीक वैसा ही अंदर भी हूँ,
नहीं बदलता खुद को जमाने को दिखाते - दिखाते।।

शायद नही हूँ मैं वैसा जैसा सब बनाना चाहते है,
दूर निकल रहा है हर कोई मेरे करीब आते-आते।।

हर किसी को अब बस मेरी लिखावटों में आना है,
ऊब गए है सब मुझसे अब शायद मिलते-मिलाते।।

हर कोई बनावटी होता जा रहा है इस दुनिया में,
मैं थक गया हूँ अब महफिलों में मुस्कुराते-मुस्कुराते।।

तू क्या था क्या है मेरे खातिर अब नही बता सकता,
मैं हार गया हूँ तुझे ये यकीन अब दिलाते-दिलाते।।

आ सकता है तो एक नज़र तू भी देख ले हाल मेरा,
मेरी आवाज़ें बंद हो रही है तेरा नाम चिल्लाते-चिल्लाते।।

मैं लिख भी दूँगा तुझे "चौहान" कलम से अपनी,
अश्क़ ना रुकेंगे तेरे फिर खुद को पढ़ते-पढ़ाते।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 2 March 2020

"कुछ पास कुछ दूर" (KUCH PAAS KUCH DUR)


ना दर्द लिखूँगा, ना आराम लिखूँगा,
एक रोज़ खुद को मैं तेरे नाम लिखूँगा।।

क्या सफ़ा है हाथों में उसके,
माँ के आँचल का आराम लिखूँगा।।

एक शक्श है जो मुझसे हारकर भी जीत जाता है,
पूछेगा कोई तो मैं बस पापा तुम्हारा नाम लिखूँगा।।

जिसकी खुशी के लिए लड़ खुदा से भी सकता हूँ,
ये खुशियों की सौंगात मेरी बहन के नाम लिखूँगा।।

कैसे बन जाती है ज़िंदगी मुहोब्बत,
चुपके से मैं फिर तेरा नाम लिखूँगा।।

लड़ाई ,झगडा ,प्यार ,मुहोब्बत, बचपन, जवानी,
अगर बात आ ही गयी है तो मैं तेरा नाम लिखूँगा।।

एक याद ने मुझे संभाल रखा है अब तलक,
तुझपर दोस्ती में दुरियों का इल्जाम लिखूँगा।।

लिखनी पड़ी अगर कभी खुद पर किताब,
हर पन्ने पर बस एक तेरा नाम लिखूँगा।।

पूछा अगर किसी ने मुझसे दोस्ती का मुक़ाम,
अपनी कलम से "चौहान" तेरा नाम लिखूँगा।।

बड़ा अजीज है तू मेरे खातिर क्या बताऊँ तुझे,
अपनो की बात अगर आयी तो पहले तेरा नाम लिखूँगा।।

बहुत कुछ गवाया है इस ज़िंदगी मे मैंने मगर,
कुछ माँगने को दे खुदा तो मैं तेरा नाम लिखूँगा।।

अब पहले जैसे नही है तालुकात हमारे तुम्हारे,
बेफ़िक्र रह तेरी दोस्ती में धोखे वाली बात नहीं लिखूँगा।।

मुहोब्बत तुझसे बेपनाह है और बेपनाह रहेगी,
तुझे लिखूँगा हर लफ्ज़ में पर तेरा नाम ना लिखूँगा।।

किसी ज़ागीर से कम नही मेरी ख़ातिर ये नाम,
मेरी पहचान में हर जन्म "चौहान" लिखूँगा।।

कुछ और शक्श है जो अहम है मेरी ख़ातिर,
वक़्त मिला तो एक क़िताब उनके नाम लिखूँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...