दिल मे एक किताब छुपा कर रखी है,
अच्छी बुरी सब याद छुपा कर रखी है।।
कुछ बता भी दी है जमाने को कहानियों में,
कुछ है जो आज भी राज़ बना कर रखी है।।
बचपन में जलाई थी लौ कुछ सपनों की,
हक़ीक़त बनाने को दिल मे आग जला रखी है।।
जो पत्थर मारे थे क़िस्मत ने गिराने को मुझे,
उन्ही पत्थरों की देखो मैंने ढाल बना रखी है।।
कुछ पा लिया कुछ खो दिया हमेशा के लिए,
वक़्त की मारी चोट सीने से लगा कर रखी है ।।
हारा तो आज भी नही हूँ ज़रा रास्ते बदले है,
मंज़िल पर तो आज भी नज़र टिका रखी है।।
किसी रोज़ कर ही लूंगा हासिल खुद को "चौहान",
राख़ अरमानों को कर माथे पर लगा रखी है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।









