Tuesday, 26 February 2019

"एक किताब-2" (EK KITAB-2)


दिल मे एक किताब छुपा कर रखी है,
अच्छी बुरी सब याद छुपा कर रखी है।।

कुछ बता भी दी है जमाने को कहानियों में,
कुछ है जो आज भी राज़ बना कर रखी है।।

बचपन में जलाई थी लौ कुछ सपनों की,
हक़ीक़त बनाने को दिल मे आग जला रखी है।।

जो पत्थर मारे थे क़िस्मत ने गिराने को मुझे,
उन्ही पत्थरों की देखो मैंने ढाल बना रखी है।।

कुछ पा लिया कुछ खो दिया हमेशा के लिए,
वक़्त की मारी चोट सीने से लगा कर रखी है ।।

हारा तो आज भी नही हूँ ज़रा रास्ते बदले है,
मंज़िल पर तो आज भी नज़र टिका रखी है।।

किसी रोज़ कर ही लूंगा हासिल खुद को "चौहान",
राख़ अरमानों को कर माथे पर लगा रखी है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Sunday, 24 February 2019

"बरसों बाद" (BARSON BAAD)


आज बरसों बाद मेरी उससे मुलाकात हुई,
नज़रों-नज़रों में ही हमारी बहुत सी बात हुई।।

कुछ सवाल थे जिनका वो जवाब जानना चाहती थी,
हाँ बोली नही कुछ पर मेरा हाल जानना चाहती थी।।

नज़र ही नज़र में एक दूसरे को गले लगा बैठे थे,
कुछ पल को आस पास सब कुछ भुला बैठे थे।।

शायद आज वो अपने अतीत पर पछता रही थी,
शायद उससे वो कसमें, वादे, बातें याद आ रही थी।।

बड़े वफादार थे आंसू वो जिसको रोक कर रखा था,
मेरी तरहा उसने भी हँसी का नकाब ओढ़ रखा था।।

शायद वो भी उसी दौर में कहीं खो गयी थी,
ऐसा लगा इन लम्हों में मेरी फिर हो गयी थी।।

मुझसे दूर होकर आज वो भी पछता रही थी,
ऐसा लगा जैसे आज भी वो अपने पास बुला रही थी।।

कभी सोचा था उसने भी के इश्क़ में ऐसा मोड़ आएगा,
जिसे ज़िंदगी समझा नाता वहीं एक दिन तो जाएगा।।

फ़िर समझौता कर हालातों से हम अलविदा कह गए,
इश्क़-ए-बारिश में भीग कर "चौहान" सूखे ही रह गए।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम -दिल की ज़ुबाँ।।




Friday, 22 February 2019

"बात तो वही है" (BAAT TO WAHI HAI)


दिन से रात है ,रात से दिन वही है,
बदला तो खुद को पर हालात तो वही है।।

कभी उनसे होती थीआज तस्वीरों से,
एक तरफा ही सही पर बात तो वही है।।

कभी साथ वो थी आज तन्हाई है,
आंखें नम तो क्या रात तो वही है।।

गर कर ही लिया इरादा इश्क़ के अंजाम का,
फिर मिट्टी मिले या कफ़न बात तो वही है।।

जब कभी समझ ही नही पाए जज़्बात तुम मेरे,
स्याही से लिखूं या फिर खून से बात तो वही है।।

दीदार-ए-हसरत जब क़ब्र तक ले आई "चौहान",
मिलने हिज़ाब में आये या बेहिज़ाब बात तो वही है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 20 February 2019

"एक वक्त था" (EK WAQT THA)


जानती हो अब वो लहरें किनारे तक नही आती ,
एक वक्त था जब वो पैरों की भीगा कर जाती थी।।

अब तो शाम भी ना जाने कब ढल जाती है ,
एक वक्त था जो मुलाकात को ओर हसीन कर जाती थी।।

जानती हो अब तो वो रास्ते भी सुनसान नज़र आते है,
एक वक्त था जिनपर चलकर तो मंज़िल नही भाती थी।।

अब कहाँ वो खुशबू है इस ज़िस्म में तेरे ज़िस्म की,
एक वक्त था जब वो खुशबू साँसों को महकती थी।।

ढूंढती रहना अब तुम खुद को मेरी इन् कविताओं में,
एक वक्त था जब "चौहान" के ख्यालों से भी दूर जा ना पाती थी ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 15 February 2019

"इंसाफ़" (INSAAF)


हुकूमत तुम्हारी तुम रखो,
ना तुम्हारा तख्तो-ताज चाहिए,
कुछ मिट्टी हो गए मिट्टी के लिए,
उनके लिए इंसाफ चाहिए,
आज शहादत पर अश्क़,फूल नही,
खून के बदले खून का रिवाज चाहिए,
ताह उम्र का कर्ज है सबपर आज,
ना कोई रिवायत, ना लिहाज़ चाहिए,
टूटने दो बेड़ियाँ शराफत की आज,
इन परिंदों को परवाज़ चाहिए,
'गर बिछती है तो बिछ जाने दो लाशें,
एक नई जंग का आगाज़ चाहिए,
अहिंसा की नही हिंसा की जरूरत है,
हर एक दिल मे इंकलाब चाहिए,
मिटा दो वजूद वतन-परस्तों का,
हर कतरे लहू का इंसाफ चाहिए,
"चौहान" ये धरती माँ है अपनी,
इसके आँचल पर ना कोई दाग चाहिए,
झूलते है तो आज भी झुल जाए फाँसी,
पर हर एक घर मे भगत सिंह, आज़ाद चाहिए।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 13 February 2019

"ऐसी हो तुम" (AISI HO TUM)





जैसी मेरे ख्यालों में तस्वीर नज़र आती थी,
हाँ हक़ीक़त में भी कुछ ऐसी ही हो तुम।।

वो घनघोर घटाओं जैसी काली घनी ज़ुल्फ़ें,
चहरे का नूर मानो आफ़ताब की चमक हो तुम।।

ना जाने कितने राज़ कैद है आँखों मे तेरी,
किसी शायर की लिखी ग़ज़ल हो तुम।।

क़बूल हर सज़दे हो रहे है एक झलक से तेरी,
नाम इबादत है तेरी और उस खुदा सी हो तुम।।

बड़ी फुर्सत से तराशा है उस खुदा ने तुम्हें,
ख़ुदा की बरसाई मुझपर रहमत हो तुम।।

कैसे भुला दे हम एक पल भी तुम्हें,
मेरे जिस्म में रूह सी ज़रूरत हो तुम।।

जिसे देख खुदा भी खुद पर नाज़ करे,
हाँ खूबसूरत से भी खूबसूरत हो तुम।।

क्या बताये "चौहान" के कैसी हो तुम,
मुहोब्बत को भी मुहोब्बत हो जाये ऐसी हो तुम।।



शुभम् सिंह चौहान

मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Monday, 11 February 2019

एक लड़की (Ek LADKI)


वो कभी हक़ीक़त में तो कभी ख्वाबों में रहती है,
एक लड़की है जो मेरे सवालों के जवाबों में रहती है।।

थोड़ी चुलबुल है शरारती है हाँ थोड़ी नादान भी है,
कितना समझता हूँ उसे इस बात से अनजान भी है।।

उसके चेहरे की हँसी मेरे चेहरे पर मुस्कान लाती है,
बेखबर है उसकी उदासियां उदास मुझे कर जाती है।।

रिश्ता क्या है उससे मेरा कभी  समझ ही नही पाया,
दोस्त से बढ़कर है पर हद से अपनी निकल ना पाया।।

यूँ तो बातें ना जाने कितनी उससे कह जाता हूँं,
अपने ही जज़बातों का मज़ाक बना चुप रह जाता हूँ।।

चाहता हूँ कि कभी तो वो थोड़ा  खुद से समझ जाएं,
डरता हूँ कहीं उसकी खुशी गम में ना बदल जाए।।

हाँ कभी कभी उसे उलझन मेरी बातों से हो जाती है,
मज़बूरी पता है शायद तभी खुद को रोक जाती है।।

कब समझेगी उसके हर एहसास में खुद को जीता हूँ,
खामोशी से अपने जज़्बात कागज़ पर लिख लेता हूँ।।

फिर भी वो मेरे जज़्बात मेरा हाल जानना चाहती है,
बेवजह वो भी सवालों के जवाब जानना चाहती है।।

डर लगता है "चौहान" जज़बातों को लफ़्ज़ों में ना पीरों दूँ,
आज हमराज़ हूँ उसका कल आगे बढ़ दोस्ती भी ना खो दूँ।।

कहना तो बहुत कुछ है पर शायद उस हक से कह नही सकता,
रिश्तों की समझ नही पर पल भी तेरे बिना रह नही सकता।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 9 February 2019

"वो लौट आएगी" (WO LAUT AAYEGI)


पागल दिल ज़िद्द लिए बैठा है कि वो लौट आएगी,
टूटा है पर उम्मीद लिए बैठा है कि वो लौट आएगी।।

बार बार आजकल देखता हूँ हाथ की लकीरें अपनी,
कहता है तकदीर लिए बैठा है कि वो लौट आएगी।।

चिंगारी तो अब भी बाकी होगी दिल में मेरे इश्क़ की,
भड़कने दो ज़रा दहकने दो यकीनन वो लौट आएगी।।

फिर तेरे सहारे की ज़रूरत होगी उसे तन्हाई में,
माथे को चूम सीने से लगा लेना जब वो लौट आएगी।।

शिकायतें भी होंगी उसे तो कई शिक़वे भी होंगे तुम्हे,
ख़ामोशी से सब भुला देना जब वो लौट आएगी।।

यकीन इस कदर पक्का हो चला मेरे दिल का "चौहान",
पानी पर पानी से लिख नाम कहता है वो लौट आएगी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 5 February 2019

"खोया है" (KHOYA HAI)


तुझे नही मैंने खुद को खोया है,
रोया है, मेरी रूह ,मेरा दिल ही नहीं,
अपने कर्म पर तो ये वक़्त भी रोया है,
तुझे नही मैंने खुद को खोया है।।

कुछ की यादों में बरकरार है तू,
कुछ ने भुला दिया है तुझे,
वो आज भी बेसुध पड़े है,
जिन्होंने तेरे आने का अरमां सँजोया है।।

कुछ अपने मन को समझाकर बैठे है,
कुछ साग़र आँखों का बहाकर बैठे है,
कुछ तेरी तस्वीर से बातें कर लेते है,
कोई तेरा पहरान अपने जिस्म से लगाकर सोया है।।

कुछ के लिए तू वक़्त की तरह निकल गया है,
कुछ के लिए तू शाम की तरह ढल गया है,
नकाब ओढ़ कर रखा है हँसी का चेहरे पर,
कोई है जो तेरी याद में दिन रात बेवक़्त रोया है।।

तेरी जगह तो कोई ले ही ना पाया,
दोस्त अपना तेरे जैसा किसी को कह ही ना पाया,
तुझे तो आज अभी मांग लूँ खुदा से मैं पर,
जहाँ गया है तू वहां से कोई लौट ही ना पाया है।।

सिर्फ लिखकर बयाँ कर दूं,
ऐसा कोई फसाना नही था,
तेरे जिस्म के साथ राख हो जाये,
ऐसा हमारा याराना नही था,
मज़बूर हूँ वक़्त और हालातों के आगे,
सच है "चौहान" ने इस जिस्म से रूह को खोया है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Saturday, 2 February 2019

अधूरी कहानी (ADHURI KAHANI)


लिखूंगा कभी,अभी बहुत कहानियाँ अधूरी है,
ख़ामोश तो हूँ पर ये  सब भी बताना ज़रूरी है।।

ज़रूरी है आज खुद को खुद में जिंदा रखना,
अपने वजूद का एहसास दिलाना भी ज़रूरी है।।

रोक नही पाता कभी कभी शैलाब आंखों का,
सुना कुछ ज़ख़्मों को नासूर बनाना भी ज़रूरी है।।

यूँही नही लिखा जाता हाथों की लकीरों में नाम,
किसी का ख्वाबों से हकीकत में आना भी ज़रूरी है।।

ज़रूरी तो नही के सब कुछ हासिल हो हमें,
किसी की खातिर खुद को मिटाना भी ज़रूरी है।।

सभी ख्वाईशें पूरी नही हो पाती "चौहान" यहाँ,
कुछ अरमानों को राख बनाना भी ज़रूरी है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Friday, 1 February 2019

"तेरे जैसा यार" (TERE JAISA YAAR)


माँ बाप भाई बहन हर रिश्ते का तुझसे प्यार पाया है,
फक्र होता है मुझे खुदपर के मैंने तुझसा यार पाया है।।

माना वक़्त बदला है हर वक़्त यूँ मौसम की तरहा ,
हर वक़्त तुझे साथ अपने एक ढाल की तरह पाया है।।

वो शरारतें भी याद है मुझे जो कभी तेरे संग की थी,
वो मासूमियत भी जिसका फायदा तूने कई दफा उठाया है।।

खुद से ज़्यादा भरोसा भी किया है मैंने तुझपर तेरी बातों पर,
ये भी सच है तूने दोस्ती को अपनी जान से बढ़कर निभाया है।।

माना आज वो हरदिन हमारी मुलाकात नही होती,
पर जरूरत के वक़्त तुझे हमेशा आगे ही पाया है।।

नापते होंगे लोग दौलत के पैमाने से मेरी कामियाबी को,
नही जानते "चौहान" ने खुदा के जैसा यार कमाया है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...