Saturday, 29 February 2020

"मैं अकेला" (MAIN AKELA)


मैं अकेला तो नही जिसे मुहोब्बत हुई है यहाँ,
कुछ तो एहसास तुम्हारे दिल में भी आते होंगें।।

मैं अकेला तो नही जो मंदिर मज़ारों में सिर झुका आया,
कहीं किसी दरख़्त पर धागे मन्नत के तूने भी बाँधे होंगे।।

मैं अकेला तो नही जो जुदाई में पल पल मरता रहा,
कुछ लम्हात दर्द-ए-जुदाई में तूने भी काटे होंगे।।

अकेला मैं ही तो नही जो यादों के सहारे ज़िंदा हूँ,
कुछ बीते पल मेरे साथ के अतीत से तूने भी छाँटे होंगे।।

मैं अकेला तो नही जो इश्क़ में बर्बाद हुआ,
कुछ घाटे तो इश्क़ में तेरे हिस्से भी आते होंगे।।

ये जो बिन बतलाए चले आते है आँसू आँखो में मेरी,
ये जरूर तेरे आँखों के सागर से मेरी आँखों मे आते होंगे।।

फर्क सिर्फ इतना है मैं बयां कर देता हूँ तुम छुपा लेते हो,
वरना दूर जाने के ख़्वाब नींदे तेरी भी उड़ा जाते होंगे।।

छोड़ के जमाने की रीत तेरे सीने से लग रो जाऊँ,
ऐसे ख़्याल मेरे लिए तेरे दिल मे भी तो आते होंगे।।

एक सवाल घर कर गया है दिल मे अब जाकर पूछुंगा खुदा से ,
जिसे लिखा किस्मत में उसकी वो इश्क़ में हदों से गुज़र जाते होंगे।।

एक क़िताब लिखकर जा रहा है तेरे ख़ातिर "चौहान",
उम्मीद है मेरे अल्फ़ाज़ तुझे मेरा एहसास तो कराते होंगे।।

माना इजाज़त नही देती आज बंदिशें जमाने की तुझे,
पर तेरे कदम मेरी कब्र तक तूझे खीँच तो लाते होंगे।।

माना अब आना मुमकिन नही तेरी दुनिया मे लौटकर,
घर,आँगन,चौंखट,दरवाजे तेरे दिल के मुझे बुलाते तो होंगे।।

अब तलक सँभाल कर रखें है क्या तूने वो तोहफे मेरे,
छुप कर अकेले में मेरी याद में उसे सीने से तो लगते होंगे।।

वो जो कभी हवा से उड़कर मेरे चेहरे को ढक लिया करते थे,
फिर मेरी तलाश में दुपट्टे तेरे मेरी कब्र की तरफ उड़कर तो आते होंगे।।

एक बात बता कर चले जाना तुम कब्र पे मेरी आकर,
मेरी तस्वीर को सीने से लगा तुम अश्क़ तो बहाते होंगे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 26 February 2020

"मेरी माँ" (MERI MAA)


इश्क़ करूँगा तुझसे बेइंतहा,
पर आज भी मेरा पहला इश्क़ मेरी माँ है।।

जी तो नही सकता तुम दोनों के बिना,
पर फिर भी उसकी रज़ा में मेरी रज़ा है।।

रूठता है तो रुठ जाए वो भगवान भी,
मेरे लिये तो मेरा भगवान मेरी माँ है।।

वो पूरे तो नही कर सकती ख़्वाब मेरे,
पर रोज़ पूछती है बता तेरी रज़ा क्या है।।

मैं जो भी हूँ जैसा भी हूँ दुवाएँ है उसकी,
माँ-बाप से बढ़कर दुनिया मे है ही क्या है।।

ये उसकी दुवाओं अरदासों का असर है,
वरना मेरी किस्मतों में लिखा ही क्या है।।

ये जो इश्क़ के लिए माँ को भूल जाते है,
कभी देखना किस्मत में फिर बचा क्या है।।

मुहोब्बत में मंज़िले कब किसे मिली है "चौहान",
बंदिशों से निकल माँ भी तेरी है इश्क़ भी तेरा है।।

इश्क़ कर "चौहान" पर कोई उम्मीद मत रख,
उम्मीद पूरी होने पर चाहतों को मरते देखा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 24 February 2020

"ख़बर" ( KHABAR)


किसे खबर थी के ये ज़िंदगी अब यूँ ठहर जाएगी,
मंज़िल सामने पाकर भी मंज़िले दूर नज़र आएंगी।।

कर के अंधेरा आज मेरे दिल की नगरी में फिर वो,
रौशन वो अपनी ख़्वाईशो का शहर कर जाएगी।।

अंदाज़ अलग था उसका ज़ख़्मो पर मरहम लगाने का,
क्या पता था पतझड़ में पत्तों से हाल पूछने आएगी।।

बड़े गहरे है घाव वक़्त के भरने में ही नही आते,
किसे ख़बर थी ज़िंदगी अब ये रंग भी दिखलाएगी।।

सब कुछ तो मेरा ज़िंदगी ने छीन ही लिया मुझसे,
अब क्या ये ज़िंदगी मेरी ज़िंदगी लेकर जाएगी।।

बहुत सुना है "चौहान" के मौत हकीकत है सबकी,
बड़ा बेसबर हूँ कब आकर मुझे गले से लगाएगी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।




Saturday, 22 February 2020

"तेरा शहर - मेरा शहर"


सुन आज मुझे तेरा शहर बुला रहा है,
जो गालियाँ बरसों पहले छोड़ आया था,
कोई उन गलियों में वापिस ले जा रहा है,
वो बचपन , वो लड़कपन,
आज सब याद आ रहा है,
एक घर था हँसता खेलता,
आज वो वीरान नज़र आ रहा है,
सुन आज मुझे ....
दिल के सागर में जज़्बातों के उफान है,
थोड़ी झिझक भी है,
खुद पर काबू भी ना हो पा रहा है,
मिट्टी की खुशबू, राह की रहगुज़र,
ऐसा लग रहा है,
कोई जवानी से बचपन मे ले जा रहा है,
सुन आज मुझे ...
कुछ रिश्ते नाते, यारों की यारी,
बार बार एक गली से गुजरना,
देखना एक सूरत प्यारी,
जाने-अनजाने सही ,
ज़िंदगी मे नया मोड़ आ रहा है,
सुन आज मुझे...
ज़िंदगी की किताब में माना,
"चौहान" एक पन्ना बाकी है,
थोड़ी इज़ाज़त दे दे खुदा,
अभी वो गाँव देखना बाकी है ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 20 February 2020

"महादेव-कैलाशी" (MAHADEVA - KAILASHI)


किसी मीरा , राधा का कृष्ण नही बनना मुझे,
मैं बैरागी ठीक हूँ रंग दुनिया के नही रँगना मुझे।।

मुहोब्बत वो जो तुम्हारे हर रंग,रूप को स्वीकार करे,
जैसा पार्वती को महादेव, महादेव की सती के लिए।।

वो जो जल-थल शिला-धरा हर चीज़ में शामिल है,
कुछ ऐसे तू वास करे मुझमें मेरा रोम रोम कैलाश हो जाए।।

भूत पिशाचों की टोलियां है देवों का है देव तू,
पीकर विष का प्याला महादेव,सबके तुमने कष्ट हरे।।

कोई मंदिर में पूजता तुझे और कोई बैठा मशान में,
वो मत्यु जाल से निकल गया जिसका नाम तेरी ज़ुबान पे।।

तु अघोरी,तु अविनाशी,तू बैरागी, तू कैलाशी,
तन पे भस्मी , नाग गले मे, जटा में गंगा, चाँद मुकुट सजाए।।

ये देखो  शिवरात्री की में रात्रि में  नंदी गणों के सँग मिलके,
झूमे नाचे एक हाथ त्रिशूल उठा, एक हाथ से डमरु बजाए।।

एक तेरे रंग में खुद को रँगा के, तन पे धूणी भस्म लगा के,
तेरे मिलन की आश में भोले "चौहान" तेरा शिव नाम की रट लगाए।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 19 February 2020

"नही" (NHI)


सब कुछ लुटा दूँ तुम पर,
अभी चाहत इतनी तो नही ,
हर दुआ क़बूल हो जाये ,
अभी इबादत इतनी तो नही,
वो जो चाक पर चढक़र कोई आकर ले ले,
हाँ सच मैं वो मिट्टी भी तो नही,
बुरा हूँ किसी की ज़िंदगी तो नही,
जरूरी हो सकते है पर एक हद तक,
जिस्म में रूह इतना लाज़मी तो नही,
इश्क़ करता होगा कोई मुझसे भी,
पर हमपर जान लुटा दे इतना तो नही,
यकीन रख पर हद से ज़्यादा नही,
मैं गलती ना करूँ , यार मैं खुदा तो नही,
हाँ,कोई ना कोई वजह होती है लिखने की,
मैं बेवज़ह लिखता हूँ ये गुनाह तो नही,
मैं क्या हूँ ?? कैसा हूँ?? कौन हूँ?? क्यूँ लिखता हूँ??
मत पूछ,
मैं अब बार बार तुम्हे लिखकर यही समझाता रहूँ,
नही!! मैं इतना भला भी नही।।
कुछ तो है जो ये लोग कहानियाँ सुनाते है अपनी,
वरना कलम उठे और हाल-ए-दिल बयाँ कर दे,
"चौहान" ग़ालिब का सगा तो नही।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



Monday, 17 February 2020

"मेरी कलम " (MERI KALAM)



हाँ, मुझे इल्म नही है इस बात का,
कब कहाँ अब लिखना क्या है,
कोई है बड़ा सौदागर इस बाजार का,
जज़्बात, हालात, ख़्वाब ,हक़ीक़त,
बता इनमें से यहाँ बिकना क्या है,
तुम जो बोलोगे ले आऊँगा इस बाजार में,
अच्छे ,बुरे ,सच,झूठ ,हर तरह के अल्फ़ाज़ है,
कोई बताये यहाँ नुमाइशों मे रखना क्या है,
सच लिखुँ , इतना तो मैं भी सच्चा नही हूँ,
जज़्बात लिखुँ, लिखने में इतना भी अच्छा नही हूँ,
हालात तो ज़ख्म है अब नासूर हो गए है,
सुना है तेरी इन शायरों की बस्ती में,
झूठ फरेब लिखने वाले मशहूर हो गए है,
कुछ लिखुँ के तुम्हे कोई सीख मिले,
इतना तो मैं भी सीख पाया नही हुँ,
एक दर्द का सैलाब लिए बैठा हूँ अपने भीतर,
पर जो जमाने को महसूस हो "चौहान",
ऐसा कुछ तो अभी लिख पाया नही हूँ,
अब तो मुहोब्बत भी लिखनी छोड़ दी है,
अब मंदिर मज़ारों के सामने से गुज़र जाता हूँ,
हाँ, प्रार्थना ,इबादत करनी भी छोड़ दी है,
एक और शक्श है मेरे अंदर,
जिसे कभी किसी के सामने ना लाता हुँ,
रोज़ रात मिलता हूँ उस से अकेले में,
उसका दर्द सुनता हूँ उसे बारहां समझाता हूँ,
यूँ कब तक किसी की याद में मरता रहेगा,
हक़ीक़त देख ,कब तक इस आग में झुलसता रहेगा,
कभी प्यार से तो कभी डाँट-फटकार से,
हर रोज़ मैं उसको समझता हूँ,
उसको कहता हूँ के देख,
आज एक भीड़ आयी है मेरा हाल जानने,
पूछने मेरी कहानी, मेरा दर्द बाँटने,
पर एक वो शक्श नही आया,
जिसे सीने से लगा अपना हाल बताना चाहता हूँ,
कहना चाहता हूँ के देख,
अब और नही होता ये ढोंग हँसी का, खुशी का,
आ तेरे सीने से लगकर रोना चाहता हूँ,
फिर हक़ीक़त में जी भर के मुस्कुराना चाहता हूँ,
बताना चाहता हूँ फिर जमाने को,
जो मैं हूँ हक़ीक़त में वही लिखता हूँ,
तुम मिले मुस्कुराए ,मैं मिला मुस्कुराया,
सब झूठ है "चौहान", मेरी कविता पढ़ ,फिर देख,
मैं कैसा हूँ और जमाने मे कैसा दिखता हूँ,
ये जो रोज़ पूछते हो मुझसे सवाल इतने,
सब समझ आ जायेगा कि मैं बेगाना होकर,
कैसे तुम्हारा दर्द समझता हूँ, कैसे मैं लिखता हूँ,
मेरी कहानी अब एक अंज़ाम माँगती है,
दो पल की सही तेरे साथ एक सुनहरी शाम माँगती है,
मौत दस्तक दे रही है, ज़िंदगी राह में अड़ी है,
अब और कुछ नही लिखना "चौहान",
मेरी कलम !! अब मुझसे इजाज़त माँगती है।।
अब मुझसे इज़ाजत माँगती है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 15 February 2020

"मुलाक़ात" (MULAQAT)


अनजाने से ही सही, मुलाक़ात तो हुई,
खामोशी से ही सही, खैर बात तो हुई।।

एक अरसे से बैठे थे चौंखट पर उनकी,
देर से ही सही हमपर ख़ैरात तो हुई।।

दिल की ज़मी सुख कर बंजर हो गयी थी,
मुद्दतों बाद ही सही सहारा में बरसात तो हुई।।

दिए जलते थे बुझ जाते थे नींद की तलाश में,
उम्रभर के लिए सही पर शुक्र है रात तो हुई।।

मेरी हर एक कहानी में ज़िक्र उसका आया है,
नफरतों में सही उनके लबो से मेरी बात तो हुई।।

कब्र पर आई और मुझसे लिपट कर रोई भी,
"चौहान" मरकर ही सही मुलाकात तो हुई।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 13 February 2020

"मैं और चाँद" ( MAIN AUR CHAND)


सितारों की महफ़िल थी, खुशियों का मेला था,
ज़मी पर मै औऱ आसमाँ में चाँद अकेला था।।

वो भी थोड़ा गुमसुम सा था ,मैं भी थोड़ा उदास था,
उसके भी जज़्बातों से किसी ने जमकर खेला था ।।

निगाहों में मायूसी थी उसके मेरे लबों पर ख़ामोशी थी,
कहानी जानी पहचानी थी इश्क़ का झमेला था।।

उसके दिल मे चुभन थी, मेरे दिल मे तड़पन थी,
उसे अमावस ने तो मुझे किसी की यादों ने घेरा था।।

तलाश में वो भी था किसी की तलाश में मैं भी था,
मंज़िले नही थी दोनों की इन रास्तों पर बसेरा था।।

मैं किसी की फिक्र में था वो किसी के जिक्र में था,
इश्क़-ए-राह में कब्रिस्तान टूटे ख्वाबों का मिला था।।

एक दाग लिए फिरता था वो मैं सौ दाग लिए फिरता था,
उसे शाप मिला था और मेरा मेरी वफ़ाओं का सिला था।।

वो भी किसी का ख्वाब था मैं भी किसी का ख्वाब था,
हश्र पता था "चौहान" मैं अपनी मौत से खुद गले मिला था।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 10 February 2020

"बेमौसम" (BEMAUSAM)



कोई जुगत कोई जतन है तो मुझे भी बता खुदा,
देख यहाँ बेमौसम मुहोब्बत के फूल मुरझा रहे है।।

ये सलामत नही अंदर से टूट के बिखर चुके है
जो बेइंतहा मुस्कुराते हुए तुम्हे नज़र आ रहे है।।

कभी आकर तू ही कोई दवा दारू कर मौला,
ये वक़्त के मरहम तो ज़ख्मो को नासूर बना रहे है।।

जीते जी तो कोई हो ना सका मेरा मेरे हाल का,
ये कौन लोग है जो मेरी कब्र पर अश्क़ बहा रहे है।।

एक अरसे बात वापिस लौटा कोई अपना ना मिला,
ये कौन लोग है जो मुझे उनका अपना बता रहे है।।

कभी मुलाकात नसीब ना हो पाई उनसे हमारी,
कबके मर जाते पता होता वो मेरी कब्र पर आ रहे है।।

कौन तेरे दिल का हाल लिखेगा "चौहान" इस बस्ती में,
यहाँ सब तेरी दर्द-ए-कहानी का लुफ़्त उठा रहे है।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 8 February 2020

"अधूरी कहानियाँ" (ADHURI KAHANIYAAN)


कहानियाँ अब अधूरी है तो अधूरी रहने दो,
रिश्ते मज़बूरी है तो इनमें दूरी रहने दो।।

क्या फर्क पड़ता है तेरे मन का है या नही,
खुदा के फैसलों पर दिल से मंजूरी रहने दो।।

तेरा था ही कब वो जो इन हालातों में छोड़ गया,
माना इश्क़ है पर इश्क़ में थोड़ी मगरूरी रहने दो।।

क्या फर्क पड़ता है तुम यहाँ अच्छे हो या बुरे,
ये इश्क़ का बाज़ार है इसमें बस मशहूरी रहने दो।।

वो चाँद तब तलक ही अच्छा है जब तलक दूर है,
इस धरती आसमाँ में बस यूँ दूरी ही रहने दो।।

कहाँ दिल का हाल बयाँ होता है लफ्ज़ो में "चौहान",
इन लिखावटों में दिल की जी हज़ूरी रहने दो।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 7 February 2020

"दुनिया" (DUNIYA)


काश अपनी एक अलग दुनिया बना पाता,
इश्क़ करने वालों को मिला पाता।।

वो जो मुहोब्बत में खुद को लुटा के बैठे है,
उनको इस राह में मंज़िल तक ला पाता।।

मैं खुदा तो नही के तक़दीर लिखुँ ,
बस ज़िंदगी को ज़िंदगी बना पाता।।

जो किस्से अधूरे रह गए इश्क़ में,
उनको फिर मैं मुक्कमल कर पाता।।

जहाँ इश्क़ पीर-ओ-मुर्शद होता,
जहाँ मुहोब्बत को जात बनाता।।

आज बंद किताबों में मर रही है मुहोब्बत,
काश मुहोब्बत को हकीकत बना पाता।।

ये जो शरेआम बदनाम हो रही है,
मुहोब्बत को इबादत का दर्ज़ा दिलाता।।

फिर शौक से लिखता कहानी अपनी "चौहान",
जिसे खुदा बनाया उसका नाम भी बताता।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 4 February 2020

"एहसास" (EHSAAS)


ख़ामोश हूँ पर अनजान नही मुझे सबका एहसास है,
कौन कितना साथ है मेरे और कौन कितना पास है।।

जो खुद को सागर बनाये बैठे है मुझ दरिया के आगे,
कौन कितना गहरा है और किसकी कितनी प्यास है।।

पहरान पूराना ही सही पर मेरी हक़ीक़त बयां करता है,
सबकी हक़ीक़त जानता हूं चाहे कैसा भी लिबास है।

चंद मीठी बातें बोलकर यूँ खुद को मेरा हमराज़ ना समझ,
सबका पता है कौन साथ है और कौन मेरे ख़िलाफ़ है।।

एक वक्त पर तो रास्ते भी ठहर जाते है मंज़िलों पर आकर,
बेईमान "चौहान" ना जाने तेरे वजूद को किसकी तलाश है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 1 February 2020

"जज़्बात" (JAZBAAT)


एक रात जी भर के रोना चाहता हूँ,
तेरी गोद में सिर रख कर माँ सोना चाहता हूँ।।

अब यूँ बिखर-बिखर कर जीना बर्दाश्त नही होता,
अब आज़ाद इस दुनिया से होना चाहता हूँ।।

एक एक मंज़र आंखों में घर कर गया है,
ख़्वाब सारे जला कर राख होना चाहता हूँ।।

बहुत ऐतबार कर लिया जमाने पर मैंने,
अब मैं भी मेरे सपनों का गुनहगार होना चाहता हूँ।।

हर किसी ने तो पीठ में खंज़र घोपा है मेरे,
खुदगर्ज़ मैं भी आज उनकी तरह होना चाहता हूँ।।

हर वक़्त तो साथ खड़ा था मैं सबके ,
अब मैं भी वक़्त आने पर मुकर जाना चाहता हूँ।।

सब झूठे है ये रिश्ते नाते आज के दौर में,
मेरे अपनो की तरह मैं भी फायदा उठाना चाहता हूँ।।

बहुत कुछ बात है जो मेरे साथ दफन हो जायेंगी,
एक दफा आ "चौहान" तुझे सब बताना चाहता हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...