एक नज़र भर देखना था तुझे, पल भर का भी अब सबर नहीं होता,
अपना हाल किस से कहूँ दर्द-ए-दिल पर किसी का असर नहीं होता ।।लिखा था अश्क़ों की श्याहीं से दिल के कौरे कागज़ पर ,
नाम जिसका हमने उम्र भर काश लिखा वो मेरे मुक़्क़दर में होता ।।
ढल जाते शाम की तरह तेरी बाँहों की आगोश में ,
अगर किसी मरहम का असर तेरे दिए ज़ख्मों पर होता ।।
मुक़ाम मेरा भी था इश्क़ में हम भी निकले थे किसी राह पर
साथ अगर देता तू बनके हमसफ़र आज "चौहान" काफ़िर ना होता ।।
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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