माना ज़िंदगी के सफर में साथ चलता है काफ़िला
पर इश्क़ में मुक़्क़मल वो साथ कहाँ मिलते है ।।
माना मिले है चंद लम्हात साथ उनके जीने के ,
पर उम्र भर जो थामे वो हाथ कहाँ मिलते है ।।
सफर भी होता है और यहाँ हमसफ़र भी ,
मंज़िल और हमसफ़र कहाँ एक साथ मिलते है ।।
ख़ुशी कम है तो गम हज़ारों है यहाँ ,
ताह उम्र प्यार भरे वो जज़्बात कहाँ मिलते है ।।
माना लकीरें हज़ार है हाथों में "चौहान",
पर जिनमें तुम मिल जाओ वो हाथ कहाँ मिलते है ।।
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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