Tuesday, 30 October 2018

"अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने" (AB MUHOBBAT CHORD DI HAMNE)


काफ़िर हो गया हूँ, रास्तों से मुहोब्बत करली,
मंज़िल तक जाने की आस छोड़ दी हमने,
हाँ , अब फर्क नही पड़ता तुमसे तेरी बातों से,
अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने।।

सोता कल भी नही था सोता आज भी नही हूँ,
पर जागने की वजह पुरानी छोड़ दी हमने,
चाँद, तारे, तन्हाई, रुसवाई, अब फर्क नही पड़ता,
अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने।।

फिक्र कल भी थी फिक्र तो आज भी है हमें,
पर फिक्र खुद की अब छोड़ दी हमने,
हम मरे ,जिये, मिले, ना मिले, अब फर्क नही पड़ता,
अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने।।

रास्ते अलग चाहते थे तो लो अब अलग ही सही,
अब ज़रुरत हमसफ़र की छोड़ दी हमने,
फूल ,पत्थर, धूप, छाँव, अब फर्क नही पड़ता,
अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने।।


जब तलक जो भी लिखा सब जज़्बात थे मेरे,
कहानी लफ़्ज़ों में पिरोनी छोड़ दी हमने,
खून, स्याही, पानी, आसुँ, अब फ़र्क नही पड़ता,
अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने।।

कलमा पढ़े गीता पढ़े या आयात पढ़े वो कुरान की,
बंदगी इंसानों की अब छोड़ दी हमने,
इबादत, सज़दे, दुआ, दवा ,अब फर्क नही पड़ता "चौहान",
अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 27 October 2018

"पापा की परी" (PAPA KI PARI)


सच कहूँ मै वो हूँ जो माँ की कोख से ज़माने से लड़ी हूँ,
कलंक हूँ या लक्ष्मी नही पता पर मैं पापा की परी हूँ।।

काट दिए पँख अरमानों के मेरे ज़माने ने मगर,
पापा की बाँह थाम मैं हर तूफानों से लड़ी हूँ।।

तुलसी आँगन की हूँ या हूँ दाग किसी चुनर की,
गुरुर बन मेरे पापा का सिर पर ताज़ सी सजी हूँ मैं।।

माना समझ नही आता मुझे स्कूली क़िताबों का ज्ञान,
असूलों पर चलकर पापा के मैं ज़माने को पढ़ी हूँ ।।

कई किरदारों को निभाते आयी हूँ मैं अब तलक,
हर एक मुसीबतों से मैं हर वक्त डटकर लड़ी हूँ।।

माँ बनकर पाला भी है,तो पत्नी बनकर संभाला भी है,
बेटी बन प्यार भी किया है तो बहन बनकर लड़ी हूँ।।

चिता अरमानो की जलाई है, राख सपनो की बनाई है,
झूठी दुनिया के रिवाज़ो में ना जाने कितनी बार मरी हूँ।।

सच तो दिखता ही कहाँ है "चौहान" सोच के अंधो को,
नावरातों में कंजक, कोख में मरने वाली पापा की परी हूँ।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 24 October 2018

"वो फिर लौट के ना आया" (WO PHIR LAUT KE NAA AAYA)


कुछ राज़ दफ़न हो गए ,आंखों से अपनी बहने ना दिया,
वो फिर लौट के ना आया , दिल मे जिसने रहने ना दिया ।।

ख़्वाईश तो बहुत थी गम उनके चुरा कर खुशियाँ सारी देने की,
कमबख्त ऐसा था ज़ख़्म दिया और ज़ख़्म सहने भी ना दिया।।

इस जिस्म में मेरे रूह सा साँसों को हवाओं सा लाज़मी था वो  ,
इस कदर मिले के जान भी ना ली और जीने भी ना दिया।।

माना के टूट के बिखर गई माला आज मेरे ख़्वाब-ए-मुहोब्बत की,
ऐसा मोती था वो माला का मेरी जिसे जुदा खुद से कभी होने ना दिया।।

बस एक अतीत बनकर ही रह गया वो बंद क़िताबों में "चौहान",
जो ना कभी तेरा हुआ ना तुझे किसी का कभी होने दिया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Thursday, 18 October 2018

"रावण" (RAVANN)


हाँ मुझे राम नही रावण बनना है,
अहम की ख़ातिर मुझे भी मरना है।।

पूजा भी करनी है तो जाप मुझे भी करना है,
हदों में रहकर थोड़ा पाप मुझे भी करना है।।

हाँ गुमान नही करना मुझे कामियाबी पर मेरी,
आन की ख़ातिर तो मंज़ूर भगवान से भी लड़ना है।।

अटल रहना है मुझे इरादों पर अपने ,
वक़्त पड़े तो तांडव फिर मुझे भी करना है।।

जाना नही है वापिस मुड़कर अंज़ाम अपना देखकर,
मरना है तो फिर अपने इरादों पर डंटकर मरना है।।

एक सोच बनकर उतर जाना है जहन में लोगो के,
फिर एक रिवाज़ सा बनकर मुझे हर साल जलना है।।

बुरा हूँ या बुरा नही ये सोच लोगों की है मेरे लिए,
अधर्मी अहंकारी सही पर "रावण" सा ज्ञानी भी बनना है।।

अच्छे बुरे का फ़र्क हो तो कोई भी पहचान ले "चौहान",
मुश्किल तो इस दौर में बुरे से बुरे में फर्क करना है।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 15 October 2018

"एक बात - एक राज़" (EK BAAT - EK RAAZ)


हाँ हर बात में कहीं एक बात छुपा कर रखता हूँ,
चहरे की हँसी से अपने हालात छुपा कर रखता हूँ।।

कभी आँखों से आंसू बन बहने ना दिया मैंने,
तेरे दिए घाव कुछ ऐसे सीने से लगा कर रखता हूँ।।

क्या हुआ गर टूट के बिखर गई माला मेरे सपनों की,
मोती तेरी यादों के सीने से लगाकर रखता  हुँ।।

क्या हुआ गर ज़िन्दगी रात काली है अमावस की,
दिल के आंगन में अरमानो की लौ जला के रखता हूँ।।

क्या पता कल ये हवाएँ मेरे हक में हो या ना हो,
मुठ्ठी भर सही जेब मे आसमान छुपा कर रखता हूँ।।

राज़ है एक अनकहा कानों में बालियाँ भी मेरे,
सच है नाम में किसी का नाम छुपा कर रखता हूँ।।

ये जो हर वक़्त खिला-खिला सा नज़र आता है "चौहान",
सच कहूँ इस दिल में भी एक शमशान छुपा कर रखता हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 10 October 2018

"माँ सब जानती है" (MAA SAB JANTI HAI)


खूबियाँ भी जानती है खामियां भी,
हँसी भी पहचानती है उदासियाँ भी,
बिन बोले समझ जाती है मेरे दिल का हाल,
माँ मेरी सब जानती है।।

वो रातों को ना सोना,
मेरा छुपछुप कर रोना,
चालाकियां भी समझती है ,
मासूमियत भी पहचानती है,
बिन बोले समझ जाती है मेरे दिल का हाल,
माँ मेरी सब जानती है।।

शरारतें भी जानती है मेरी शराफ़त भी,
बदतमीजियां भी , मेरी लियाक़त भी,
मेरे ख़्वाबों में जीती है खुद को,
हकीक़त भी पहचानती है,
बिन बोले समझ जाती है मेरे दिल का हाल,
माँ मेरी सब जानती है।।

यूँ तो भोली है थोड़ी अनपढ़ भी है,
पर ज़िन्दगी की किताब पढ़ाती है,
सिखाती है मुझे सलीका जीने का,
ज़माने के आव-भाव सब पहचानती है,
बिन बोले समझ जाती है मेरे दिल का हाल,
माँ मेरी सब जानती है।।

मेरी बेफिक्री का नाटक भी करती है कभी कभी,
एक उमदा अदाकार भी है,
थोड़ी भी सिकन नही लाती माथे पर अपने,
क्या कहूँ कलाकार भी है,
दिन रात रब से मेरी कामियाबी का मुकाम मांगती है,
बिन बोले समझ जाती है मेरे दिल का हाल,
माँ मेरी सब जानती है।।

सच कहूँ आज कल मंदिर मज़ारों में कम जाता हूँ,
मुसीबतों में साथ हरदम अपनी माँ को पाता हूँ,
बोल नही पता कभी "चौहान" पर ये भी सच है,
रब से उसकी खुशियाँ उसका आराम मांगता हूँ,
मेरी रूह तो ताह उम्र उसे अपने पास मांगती है,
बिन बोले समझ जाती है मेरे दिल का हाल,
माँ मेरी सब जानती है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम -दिल की ज़ुबाँ।।




Friday, 5 October 2018

"इश्क़ क्या है" (ISHQ KYA HAI)


पूछा था एक रोज़ उसने मुझे,की इश्क़ क्या है,
वक़्त भी दिया था सोचने का की ये इश्क़ क्या है।।

जवाब तो कई थे मेरे पास ,उस वक़्त भी तेरी बातों के,
सोचा वक़्त आएगा तो बताऊँगा हकीक़त में इश्क़ क्या है।।

तेरा-मेरा रिश्ता इश्क़ है तो सब झूठ-फरेब है बेकार है,
मेरा ना होकर भी मेरा होना हकीकत में ये इश्क़ है।।

चंद मीठी बातें कर दिल बहला देना इश्क़ है तो बेकार है,
तेरे हर हाल में खुद को जीना हकीकत में ये इश्क़ है।।

जिस्मो का मिल जाना,मिलने की चाहत रखने प्यार नही है,
ज़िस्म में रूह बन कर उतर जाने हकीक़त में ये इश्क़ है।।

किसी को दिखाकर या जताकर फिक्र करना इश्क़ नही है,
किसी के लिए नाता नींदो से टूट जाने हकीकत में ये इश्क़ है।।

जरूरी नही के नाम राधा-मोहन् सा जुड़े तो इश्क़ है,
किसी से मीरा सा दिल लगाना हकीक़त में ये इश्क़ है।।

किसी को पाने की चाहत करना भी इश्क़ नही है,
किसी के लिए खुद को खो देना हकीक़त में ये इश्क़ है।।

जो लिखा अभी तक मैंने तेरे लिए वो इश्क़ नही है,
जो मैं कभी लिख ही ना पाया हकीक़त में वो इश्क़ है।।

नही कहता "चौहान" के किसी को खुदा बनाना इश्क़ है,
उस खुदा की इबादत में मिट जाना हकीक़त में ये इश्क़ है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Monday, 1 October 2018

"तेरा नाम" (TERA NAAM)


आ मेरी क़िस्मतों में तेरा नाम लिखूँ,
कुछ ऐसा मुहोब्बत-ए-पैग़ाम लिखूँ,
ना वो वीरानियाँ ना तन्हाईयां हो दरमियाँ,
तेरे नाम एक ऐसी हसीन शाम  लिखूँ।।

लिखूँ वो खामोश जज़्बात दिल के ,
लिखूँ वो किस्से इश्क़-ए-महफ़िल के ,
थोड़ी शिकायतें हो थोड़ी मुहोब्बत भी,
आ एक ऐसी तेरी-मेरी मुलाकात लिखूँ।।

आ इन आंखों में कुछ राज़ लिखूँ,
आ इन गीतों के अल्फ़ाज़ लिखूँ,
मिलकर फिर बिछड़ ना सके कभी हम,
आ ऐसी कुछ खुदा-ए-करामात लिखूँ।।

लिखूँ दिल मे धड़कन सा तुझे,
लिखूँ मौसम-ए-सावन सा तुझे,
कैदकर के रख लूं कहीं खुद में "चौहान",
आ इस जिस्म में तुझे जान सा लिखूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।




"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...