जब गहनों से तू सजी थी अश्क़ों और गमो से हम ,
लबों की ख़ामोशी में आँखों से बोल उठे थे हम ,
जिस रात हमारी मुहोब्बत के वो ख्वाब मुक्कमल ना हो सके ,
उस रात ना चैन से सो सके , ना जी भर के रो सके हम।।
यादों में तेरी जब हम मशरूफ थे इस कदर ,
जेहन-ओ-जान को ना थी किसी की खबर ,
लम्हा लम्हा जब इस रूह को खो चुके थे हम ,
उस रात ना चैन से सो सके , ना जी भर के रो सके हम।।
जब मान कर चले थे तुझको ज़िंदगी का हमसफ़र ,
थाम के तेरा हाथ जब चले थे यूँ बेखबर ,
तेरे जाने से अपना मुक़ाम अपनी मंज़िल खो चुके थे हम
उस रात ना चैन से सो सके , ना जी भर के रो सके हम।।
लिखते भी तो क्या लिखते जब तेरा सहारा ना था ,
माँगा था जिसे दुआओं में "चौहान" वो हमारा ना था ,
दिल की जुबां बन आज बयां कर रही है मेरी कलम ,
उस रात ना चैन से सो सके , ना जी भर के रो सके हम।।
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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