Tuesday, 22 December 2020

"मैं और तुम" (MAIN AUR TUM)

 


कभी आ तू मुझसे मिल सही,
कभी आ मैं तुझे खुद से मिलाऊँ।।

एक हकीकत से रूबरू है तू,
एक हक़ीक़त तुझे मैं बताऊँ।।

कब क्या करूँ के तुझे यकीन हो मुझपर,
कहाँ दस्तख़त कर तुझे यकीन दिलाऊँ।।

किस तरीके से समझाऊँ तुझे मैं,
किस बहाने से तुझसे मैं मिलने आऊँ।।

तेरा मेरा कोई रिश्ता भी ना रहा,
किस हक से तुझे मैं अपना बताऊँ।।

कोई मंज़िल हो तो बतला मुझे भी,
या मैं इन रास्तों का होकर मर जाऊँ।।

तू मेरे बगैर भी खुश है "चौहान",
मैं खुशियाँ किस दर से माँग कर लाऊँ।।

इस आईने पर दरारे बहुत है ,
इसमें तुझे चहरा कैसे दिखाऊँ।।

सुना है इस कि मंज़िल मौत है,
तुम कहो तो ये भी मैं कर जाऊँ।।

कब तक तेरी नज़्म पढ़ती रहूँगी,
कब तक खुद को खुद समझाऊँ।।

तू आ एक दफा कोई वजह तो दे,
यूँ कैसे मैं तुझसे बिछड़ जाऊँ।।

अब तो वो झगड़ा भी नही है,
जिसका बहाना लेकर ही रूठ जाऊँ।।

आँखों का सागर सुख गया है,
इन आँखों को कब तक मैं बहाऊँ।।

तू तो मेरे हाल में जीता था ना कभी,
अब बता मैं हाल अपना किसे बताऊँ।।

एक नज़्म और लिखना अपने इश्क़ पर,
मेरी कब्र पर आकर सुनाना जब मैं मर जाऊँ।।

तू अक्सर कहाँ करता था मुझे ज़िन्दगी अपनी,
जी करता है इसे हक़ीक़त मान कर सवँर जाऊँ।।

लोग तेरी लिखी किताबें पढ़ते है "चौहान",
मेरा मन है मैं तुझे पढ़ते-पढ़ते ही मर जाऊँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 15 December 2020

"एक कहानी" (EK KAHANI)


एक कहानी,एक शुरुआत
फिर मेरी कलम, फिर सब बर्बाद।।

इश्क़ के पिंजरे में थे कैद हम तुम,
अब तुम भी आज़ाद, हम भी आज़ाद।।

ये जो तुमने हमने लिखा एक दूसरे के लिए,
सब युही जाया हो जाएगा आज के बाद।।

मैं मिलने तुमसे आऊँगा एक रोज़ फिर,
इस दुनिया से परे फिर एक वक्त के बाद।।

हर नज़्म हर राग से वाकिफ़ है यूँ तो हम,
अब कहाँ निकल पाएगी बंद पड़े साज़ो से आवाज़।।

किसी के हाथों में था मुक्कदस मुक्कदर मेरा,
किसे खबर थी छूट जाएँगे यूँ हाथो से हाथ।।

कुछ ऐसा अंज़ाम हुआ हस्ती का मेरी "चौहान",
मेरे अपने भी ना चल पाए दो कदम मेरे जनाज़े के साथ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


 

Tuesday, 8 December 2020

"फिर तुम" (PHIR TUM)

 

 

फिर तुम कब मिलने आओगे,
कब बहारों को संग लाओगे।।

ये चहरे की उदासी छोड़ कर,
फिर कब दिल से मुस्कुराओगे।।

कब तक रहोगे यूँ गुमसुम,
हाल-ए-दिल फिर कब सुनाओगे।।

दिल की ज़मी एक अरसे से बंजर है,
बारिश इश्क़ की कब बरसाओगे।।

मैंने तो सजा ली हाथों पर मेहंदी,
मेरे नाम की मेहंदी तुम कब लगाओगे।।

आज जा तो रहे हो छोड़ कर,
वादा करो तुम फिर लौट आओगे।।

मैं तुम्हारी खामोशी भी जानता हूँ,
तुम मेरी आवाज कब सुन पाओगे।।

मैं हर नज़र में देखता हूँ तुम्हें,
तुम कब मुझे नज़रो में बसाओगे।।

मैं एक गीत लिखकर जा रहा हूँ,
तुम कब अपने होंठों से गुनगुनाओगे।।

जमाने ने शायर बना दिया तेरे "चौहान" को,
तुम कब मेरी नज़्मों में रूह डालने आओगे।।

एक किताब लिखकर जा रहा हूँ तेरे ख़ातिर,
पढ़ोगे या उसे भी सीने से लगाकर सो जाओगे।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 1 December 2020

"क्यूँ" (KYU)

 


सवेरा है एक नया पर सब धुँवा-धुँवा सा क्यूँ है,
ज़िंदगी तेरा हर खेल अब जुआ-जुआ सा क्यूँ है।।

मंज़िलें एक है इस सफर पर सबकी तो फिर,
हर किसी का रास्ता यहाँ जुदा-जुदा सा क्यूँ है।।

आज मेरे अपने ही मेरे लिखाफ़ दुश्मनों की सफ़ में है,
उनके दिल मे मेरे लिए जज़्बात ज़रा -ज़रा सा क्यूँ है।।

बड़ी मेहनत से सींचा था मैंने गुलिस्तां ख़्वाबों का,
आज इस गुलिस्तां का हर फूल मरा-मरा सा क्यूँ है।।

आग बुझाने में मेरे घर की कोई आगे नही आया तो फिर,
दिलासा देने वालों का ये हाथ जला-जला सा क्यूँ है।।

सब कहते है कि मेरी कलम बयाँ हक़ीक़त करती है,
आज मेरी कलम का हर लफ्ज़ फिर डरा -डरा सा क्यूँ है।।

ना कोई निशान है उस ज़ख़्म का ना कोई दर्द है अब,
फिर मेरे इस दिल का हरेक घाव हरा-हरा सा क्यूँ है ।।

हर तरह का इश्क़ कागज़ पर उतारा है तूने "चौहान",
फिर क्यूँ इस दिल में कहीं कुछ खला- खला सा क्यूँ है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



Friday, 23 October 2020

"कुछ भी तो नही " (KUCH BHI TO NHI)


अब इन तस्वीरों में आखिर क्या ढूंढ रहे हो,
अब वो हँसी, वो खुशी, कुछ भी तो नही है।।

आँखो के नीचे काले गहरे निशान आ गए ,
आँखो में अश्क़ों के सिवा, कुछ भी तो नही है।।

हाँ ये सच है हम कल महफ़िल में मुस्कुरा रहे थे,
सब गम बतला रहे थे बस और कुछ भी तो नही है।।

सब एक दूसरे से उम्मीद में है कि कोई दवा मिले,
पर इश्क़ में ज़ख्मो की दवा, कुछ भी तो नही है।।

ऐसा सफर है जिसकी मंज़िल सोच के सुकून मिलता है,
इन रास्तों में रास्तों के सिवा मिला कुछ भी तो नही है।।

खुद से शिकायतें है हम खुद को कोस कर सो जाते है,
यहाँ तन्हाई के सिवा अब तक मिला कुछ भी तो नही है।।

बात लिखने की है तो बस लिख देता हूँ "चौहान",
बाकी मुझे गिला शिकवा किसी से कुछ भी तो नही है।।

ज़िंदगी ज़िंदगी के सिवा मुझसे छीन भी क्या लेगी,
ज़िंदगी में ज़िंदगी से कभी मिला कुछ भी तो नही है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
 

Thursday, 15 October 2020

"चाहत" (CHAHAT)


दिल को तेरी चाहत आज भी है,
तुझको पाने की हसरत आज भी है।।

कुछ इस कदर मुहोब्बत है तुझसे,
इन नींदों को शिकायत मुझसे आज भी है।।

दूर रहना भी अब गवारा नही,
तेरे संग की आदत मुझको आज भी है।।

झुकता है सिर आज भी मंदिर मज़ारों पे,
तुझसे ये इश्क़-ए-इबादत आज भी है।।

अब लिख के भी दिल को आराम नही,
"चौहान" में थोड़ी लियाकत आज भी है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
 

Friday, 9 October 2020

"तुम कब तक" (TUM KAB TAK)


 

कब तक झूठ को सच मान कर जियोगे,
कब तक इस राह में भटकते रहोगे,
मैं तो कब का हो गया बेवफ़ा तुमसे,
तुम कब तक मुझसे प्यार करते रहोगे,
मैं तो मंज़िल पाकर भी राहों में हूँ,
तुम कब तक यूँ मेरे पीछे आओगे,
मैं तो खुद किसी और का हो गया,
तुम मुझे कब तक अपना बनाओगे,
ज़ुर्म मेरा था तो सज़ा भी मेरी है,
मेरी ग़लती को कब तक तुम अपना बताओगे,
मैं अकेला ठीक हूँ इस बेमौसम बरसात में,
तुम नाज़ुक हो झुलस जाओगे,
हर बार तो भरोसा तोड़ा है मैंने तुम्हारा,
तुम कब तक यूँ आँखे बंद कर भरोसा करोगे,
अभी भी वक़्त है लौट जाओ इस राह से,
इस राह पर मैं अकेला ही ठीक हूँ,
हर वक़्त हर राह पर मेरे साथ क्या करोगे,
अब वक़्त आ गया बर्बादी का मेरी,
क्यों मेरी ख़ातिर तुम खुद को बर्बाद करोगी,
एक नया सवेरा है सामने तेरे,
एक नई उम्मीद है,
इस राह से मुड़ जाना वापिस ,
क्यूँ मुझे तुम इस ज़िन्दगी से आज़ाद नही करोगी,
मेरा तुम्हारा साथ यही तक ही तो था,
अब ये साँसे ये कलम अब सब थम रहा है,
तुम कब तक "चौहान" से मुहोब्बत करोगी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 6 October 2020

"शायर का हाल" ( SHAYAR KA HAAL)



एक सोच, एक सवाल,
कुछ रंजिशें कुछ मलाल,
यही है क्यूँ हर शायर का हाल।।

एक तस्वीर अधूरी सी,
कुछ ख़्वाब, कुछ ख़्याल,
यही है क्यूँ हर शायर का हाल।।

कुछ लिखा कुछ छोड़ दिया,
कुछ अपना कुछ दिल का हाल,
यही है क्यूँ हर शायर का हाल।।

कुछ घिरा, कुछ छँट गया,
काली रात तन्हाई का जाल,
यही है क्यूँ हर शायर का हाल।।

लबों की हँसी, आँखो की नमी,
एक ज़िंदगी वो भी बेहाल,
यही है क्यूँ हर शायर का हाल।।

कुछ छूट गए कुछ रह गए,
बंद कमरे खाली मकान,
यही है क्यूँ हर शायर का हाल।।

तूने भी क्या पाया "चौहान",
दिल-ए-ज़मी को बना श्मशान,
यही है क्यूँ हर शायर का हाल।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
 

Saturday, 3 October 2020

"आये जो तू" (AAYE JO TU)


कभी आये जो तू तो बताऊँ,
हाल मेरा क्या है,
जिसका बस एक जवाब है तू,
वो सवाल क्या है,
आलम कुछ ऐसा है आजकल,
एक बस्ती विरान सी नज़र आती है,
उसमे एक घर मशान सा है,
चहरे पर नक़ाब है हँसी का खुशी का,
जो पूरा हो नही सकता अब चाहकर भी,
वो अरमान क्या है,
कुछ लिखा है कुछ अभी बाकी है,
अब जो मिल गया वही काफी है,
जो अब तलक नही लिख पाया,
"चौहान" वो जज़्बात क्या है
कभी आये जो तू तो बताऊँ...

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
 

Thursday, 1 October 2020

"तुम बता देना"

 


बता देना मुझे ,

वैसे ये हर बार की कहानी है ,

बता देना ,

कब सड़कों पर उतरना है,

कब रोष में पुतले फूंकने है,

कब मोमबत्तियां मशाल जलानी है,

कब दोष देना है कपड़ो को,

कब तक ये पाबंदियाँ लगानी है,

कब तक इल्ज़ाम लगाना है दुसरो पर,

कब तक ये दरिंदगी छुपानी है,

बता देना मुझे,

कब तक यूँ अकेले नही घूमना है,

डरना है अकेले में,

बाहर घर से अकेले नही निकलना है,

कब तक ये भेड़िये शरेआम रहेंगें,

कब तक हम यूँ बेज़ुबान रहंगे,

कब चलानी है कलम "चौहान" को,

कब तक इस मुद्दे पर आवाज उठानी है,

कब तक ये असमते युहीं लुटती रहेंगी,

कब तक बेटियाँ युहीं घुटती रहेंगी,

कब तक यूँ लिख कर कोशिश करनी है,

क्या बदल पाएगी सोच जमाने की,

चलो तुम बता देना,

कब ये कहानी फिर दोहरानी है।।


शुभम् सिंह चौहान,

मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Monday, 21 September 2020

"दूरियाँ" (DOORIYAAN)



मैं सवालों में जी लूंगा,

तू जवाबों में जी,

जो ख़्याल हकीकत बना,

उन ख्यालों में जी,

ख़्वाईश भी क्या कुछ नही थी,

बस एक तेरी चाहत के सिवा,

मैं मर गया हूँ चल,

अब तू तेरी चाहतों में जी,

तू मेरी मैं तेरी आदत थे कभी,

तूने आदत ही बदल ली "चौहान",

चल अब तू तेरी आदतों में जी।।

मजबूरियाँ थी या मजबूरियाँ हो गयी,

दूरियाँ थी नही जो दूरियाँ हो गयी,

मैं तेरे बिन तू मेरे बिन,

चल खुश रह ,अब दुरियों में जी।।


शुभम् सिंह चौहान

मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
 

Thursday, 17 September 2020

"इंतज़ार"(INTZAAR)



इंतज़ार मुझे भी रहेगा उस वक़्त का, उस लम्हात का,

तुझे झगड़ा ही सही पर एक मुलाक़ात का, 

अभी वक़्त और हालातों से मज़बूर हूँ,

रूह से नही ज़िस्म से ही दूर हूँ,

आज भी तेरे हालातों में खुद को जीता हूँ,

आज भी इंतज़ार में हूँ घूँट सब्र के पीता हूँ,

नाराज़गी गिले शिकवे सब दूर कर लेना फिर,

कहीं ना जा सकूँ इतना मज़बूर कर लेना फिर,

आज भी तेरी हँसी के लिए सबकुछ करने को तैयार हूँ,

तेरी खुशियों के लिए मरने को तैयार हूं ,

मत लाया कर यूँ आँखो में आँसू,

अब सहा नही जाएगा,

पास आकर जी भर के रो लेना,

इन मोतियों को थामने हाथ मेरा ही आएगा,

तू कहे या ना कहे मैं सब जानता हूँ,

एक रात तूने मजबूरियां बताई थी "चौहान" को,

मैं अब तलक अपनी कही बात मानता हूँ,

ये इश्क़ मेरी साँसों में रवा है,

मैं युहीं ना मिटने दूँगा,

फिर कभी आऊँगा तेरा होकर,

तेरी बात सुनने, तेरा हमसफ़र बनकर,

फिर वो वक़्त युहीं न गुज़रने दूँगा।।

मेरी हर साँस मुहोब्बत है तेरी,

मैं खुद को युहीं न मरने दूँगा।।


शुभम् सिंह चौहान

मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
 

Sunday, 13 September 2020

"ख़त तेरे" (KHAT TERE)


बंद अलमारी में,पुरानी किताब में,मिले ख़त तेरे,

आलम क्या बताऊँ ,मैं कुछ कर नही पाया।।


हाथों ही हाथों में रह गए,खत तेरे दिए वो सारे,

क्या बताऊँ,ना मैं पढ़ पाया, ना ही जला पाया।।


एक ज्वालामुखी सा फुट गया यादों का तेरी,

मेरी आँखों का समुंदर ,जिसे बुझा भी ना पाया।।


उसी दौर में लेकर जा रहे थे, जिससे निकला भी न था,

कत्ल तो पहले ही थे, बस कभी दफ़न कर ना पाया।।


क्या लिखुँ कैसे गुज़री है रातें ,तन्हाई में तेरी याद लेकर,

बहुत कोशिश की "चौहान", कभी लिख ही ना पाया।।


शुभम् सिंह चौहान

मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
 

Wednesday, 9 September 2020

"एक तरफा इश्क़" (EK TARFA ISHQ)


 

अब झूठ को सच लिखना क्यूँ है,

जैसे है नही हम वैसा दिखना क्यूँ है,

बड़ी यादें संभाल कर रखी है यूँ तो,

पर उन यादों में हमे जलना क्यूँ है,

तेरे अपने रास्ते है तेरी मंज़िल के,

तन्हा है ठीक है कोई साथ नही,

पर मंज़िलों को हमें बदलना क्यूँ है,

मैं जैसा हूँ क्या वो काफी नही है,

तेरे रंग में हमें ढलना क्यूँ है,

मुहोब्बत है तो फिर यकीन कर,

यकीन नही तो चाहे लाख आज़मा,

कोई अनदेखी तस्वीर ना बना , 

यूँ पानी पर तहरीर ना चला, 

जो तेरा है वो तेरा रहेगा , 

बावस्ता किसी को अपना ना बना , 

जो जा रहा है उसको जाने दे "चौहान", 

खाली हाथ तेरे है तो भी क्या, 

यूँ हर किसी के आगे हाथ ना फैला,

एक अरसे से तलाश में हूँ खुद की,

एक लाश दफ़न है मुझमे लापता,

अब होश-ओं-हवास कहाँ हमें,

खुद में ही मगन, खुद से ही जुदा,

ये किताबों के काले पन्ने रिहाई है मेरी,

यही सबूत इश्क़ के यही गवाह,

एक नाम छुपा कर रख लिया खुद में,

वो मेरा नही तो चल ना सही,

कोई जाकर पूछो हाल उसका,

क्या हो पाया है वो मुझसे जुदा,

एक खुशबू से महक उठता हूँ रोज़ युहीं,

मेरी कब्र पर रह गया शायद दुपट्टा उसी का,

मरकर भी कहाँ खत्म हुआ "चौहान",

किस्सा मेरे एक तरफा इश्क़ का।।


शुभम् सिंह चौहान

मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 7 September 2020

"मुर्दा शायर" (MURDAA SHAYAR)



ये जहाँ इतना अच्छा नही है,
तुम जिसमें आना चाहते हो,
अभी उम्र भी है और काम भी,
क्यूँ इश्क़ के सागर में डूब जाना चाहते हो,
ये एक माया जाल ही तो है,
तुम क्यूँ इसमें फँस जाना चाहते हो,
अभी सब नया नया है तो अच्छा भी लगेगा,
क्यूँ इस रौशनी में रौशनी गवाना चाहते हो,
ये जो आज सावन की बारिश भा रही है तुम्हे,
ये कल तुम्हे झुलसा भी देंगी,
क्यूँ इस आग में खुद को जलाना चाहते हो,
ये हिदायतें भी है और मशवरा भी "चौहान",
जिसका अंज़ाम मौत के सिवा कुछ नही,
तुम क्यूँ उन रास्तों पर जाना चाहते हो,
जब तक टहनियों पर है तब तलक खुशबू है,
क्यूँ इस फूल को तोड़ कर मुरझाना चाहते हो,
ये रातें जागने के लिए नही है,
इनकी आगोश में सो जाय करो,
क्यूँ इन रातों को अश्क़ों से भिगोना चाहते हो,
इश्क़ के दर्द में आराम नही मिलता,
कल कभी ऐसा मंज़र हो जाये,
ढूंढते फ़िरो मारे मारे तुम मरहम इसका,
कहीं फिर ये ज़ख़्म नासूर ना हो जाये,
मैं खुद इस राह में आकर पछता रहा हूँ,
कभी ये भी हँसता खेलता आँगन था,
जिसे आज मैं ख्वाबों का श्मशान बता रहा हूँ,
ये चार दिवारी घर थी जिसमें अरमान पलते थे,
आज इस घर को खँडहर बता रहा हूँ,
नही चाहता कोई मौत को गले लगा ले मेरी तरह,
नही चाहता कोई ज़िंदगी से कायर हो जाये,
ये कलम ताज़ा रखती है ज़ख्मों को जज़्बातों को,
नही चाहता कोई टूट के बिखर जाए मेरी तरहा,
नही चाहता कहीं एक और मुर्दा शायर हो जाये।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 2 September 2020

"हौंसला" (HAUNSLA)


 

चल माना मंज़िले नही, रास्ते है ,नसीब में,
इतना हौसला दे के उम्रभर इन रास्तों के हो जाऊं।।

चल माना नही है खुशियों का उजाला मेरी ख़ातिर,
इतना हौसला दे के ग़मो के अंधेरे में ही खो जाऊँ।।

बस एक उसकी जिंदगी रौशन करके रख खुदा,
फिर चाहे बदले में मैं नज़र-ए-आतिश हो जाऊँ।।

वक़्त कब किसकी राह देखता है "चौहान",
इतना हौसला दे के मैं उम्रभर राह उसकी देख पाऊँ।।

सुना है चट्टानों से टकराकर मुड़ जाती है लहरें वापिस,
चट्टान ही बना दे एक पल को सही उसे छू तो पाऊँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 28 August 2020

"मैं और मेरे कुछ दोस्त" (MAIN AUR MERE KUCH DOST)

 










मैं और मेरे कुछ दोस्त अब बस बातें किया करते है,
साथ कुछ पल पहले की तरह बिताने की,
कहीं दूर सब एक साथ घूम के आने की ,
फुर्सत से मिलकर वक़्त साथ बिताने की,
मैं और मेरे कुछ दोस्त अब बस बाते किया करते है।।

वो बीते पुराने बचपन के दिन,
वो फुर्सत के लम्हे, वो मस्ती भरे दिन,
अब हम केवल तन्हा बैठकर यादों में जिया करते है,
मैं और मेरे कुछ दोस्त अब बस बातें किया करते है।।

हर कोई अब मशरूफ़ अपने कामों में है,
कुछ परेशानियों में तो कुछ नये इंतज़ामों में है,
पर सब बेख़र है एक बात से ,
आज सब एक दूसरे के इल्ज़ामों में है,
सब एक दूसरे कि अब बस राहे तका करते है,
मैं और मेरे कुछ दोस्त, अब बस बातें किया करते है।।

यूँ जज़्बातों से कागज़ कुरेद कर क्या होगा"चौहान",
ये जज़्बाती अल्फ़ाज़ भी तो तन्हाई में पढ़ा करते है,
मैं और मेरे दोस्त अब सिर्फ बातें किया करते है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 25 August 2020

"लौट के ना आया " (LAUT KE NA AAYA)

 

कैसी है वो तेरी नई दुनिया,
नया शहर, नया घर,
ऐसा क्या रास आ गया वहाँ,
जो तू अब तलक लौट के ना आया...
जानता है परिंदे उड़ते है दिनभर आसमाँ में,
पर रात होते ही अपने आह्लने मे लौट आते है,
चल माना तू परिंद जात ही सही,
पर इतना तो बता वो आहलना कहाँ बना आया...
रुक तो मौसम भी बदलते है कई दफा,
पर ऐसा कौन सा मौसम है जो लौट कर ना आया,
कोई नाराज़गी है तो रख बेशक,
पर ऐसा कौन है बता जो बिन बात,
नया बसेरा बना आया...
आजा हाल यहाँ का बताता हूँ,
कौन कैसा है तेरे बिन सब दिखता हूँ,
कोई तुझे याद कर रो लेता है,
कोई तुझे याद कर खामोशी से सह लेता है,
कुछ ने भुला दिया तुझे मर्ज़ी खुदा की समझ,
कोई तेरी तस्वीरों से बात कर मन बहला लेता है,
हाँ संभाल तो लेगा हर कोई तेरे बिन भी,
पर इतना आसान कहाँ है,
जो हर राज़ बोलकर बता देता था,
आज वो "चौहान" भी कहाँ है,
इतना पत्थरदिल तो नही था तु,
क्या किसी के हाल पर तरस ना आया,
ऐसा क्या रास आ गया वहाँ,
जो तू अब तलक लौट के ना आया...

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 20 August 2020

"वाकिफ़" (WAQIF)

 


अभी मेरे हाल से ,
वाकिफ़ नही हो तुम,
इन मुस्कानों के जाल से,
नज़र के सवाल से ,
वाकिफ़ नही हो तुम..

जो दिख गया वो बिक गया,
जो छिप वो रह गया,
चिंगारी खुशियों की बुझ गयी,
जली ग़मो की मिशाल से,
वाकिफ़ नही हो तुम...

कोई सुनता तो कह सुनाता,
पास बैठाता सीने से लगाता,
इस महफ़िल की तन्हाई से,
उस रुसवाई के मलाल से,
वाकिफ़ नही हो तुम..

लिखना बहुत कुछ बाकी है,
अभी इतना ही काफी है,
"चौहान" दर्द के अल्फ़ाज़ से,
खामोशी की आवाज़ से,
इस कलम में कमाल से,
वाकिफ़ नही हो तुम..

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 7 August 2020

"काश कहीं" (KAASH KAHIN)

 

काश कहीं ऐसा होता,
सब कुछ नही मगर,
कुछ तो मेरे हाथों में होता,
बदल देता मैं भी आखिर,
कुछ पन्ने वक़्त की किताब के,
कुछ संजो के रखता,
कुछ जला के राख कर देता,
कुछ खुशियाँ डाल देता झोली में तेरी,
कुछ गम तेरे अपने नाम कर लेता,
काश कहीं ऐसा होता,
काश के समझ पाता,
खेल तकदीरों का,
नसीबों का हाथों की लकीरों का,
अपने हिस्से के कुछ लम्हे निकाल लेता,
और चुपके से कहीं तेरे दामन में डाल देता,
क्या कुछ तो नही था मेरे ख़ातिर तू,
उठता कलम फिर "चौहान",
ये हसीन सुबह तेरे,
और ये काली अंधेरी रात,
नाम खुद के लिख लेता,
काश कहीं ऐसा होता।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 2 August 2020

"राखी" (RAAKHI)



भाई के हाथों की शान है राखी,
बहनो का गुरुर और मान है राखी,
हर दिल का अरमान है राखी,
एक रिश्ते की पहचान है राखी,
प्रेम और रक्षा का प्रमाण है राखी,
हर कलाई पर चमकता प्यार है राखी,
भाई बहन के प्यार का त्योहार है राखी,
हर चहरे पर खुशियों की पहचान है राखी,
हाथों पर बंधा हुआ विश्वास है राखी,
बहनों की भाई से एक आस है राखी,
कच्चे धागे से बँधी उम्मीद है राखी,
सदियों से चलती आई एक रीत है राखी,
क्या कहे "चौहान" की क्या है राखी,
हर एक नज़र में उठता सम्मान है राखी,
हर भाई के हाथों पर पहचान है राखी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 31 July 2020

"एक शायर" (EK SHAYAR)


कोई पूछे तो तुम मेरा नाम बताना,
मुहोब्बत लिखना मेरा काम बताना।।

जिसमें तुमपर ना कोई दाग लगे,
ऐसे ही कुछ मेरे इल्ज़ाम बताना।।

कहानी अगर पूछे कोई इश्क़ की अपनी,
मुझे ज़मी खुद को आसमान बताना।।

वो जो उठने से पहले ही दब गए,
वो ज़िंदा दफन अरमान बताना।।

पूछेंगे सब की कैसा है ये इश्क़ का शहर,
सबको कहना भूले से भी यहाँ मत आना।।

कही सपने, अरमान, ख्वाइशें दफन है यहाँ,
इस शहर को तुम शमशान मत बताना।।

जितनी ग़ज़ल लिखी "चौहान" ने "जान" के लिए,
उनकी तस्वीर बना फिर दीवारों पर मत सजाना।।

एक नज़्म लिख तो जाऊँगा तेरी ख़ातिर मगर,
जवाबों की तलाश में मेरी कब्र तक मत आना।।

कोई पूछे कि हर वक़्त ये उदासी, तन्हाई क्यूँ है,
"एक शायर को दिल दिया था" कहकर मुकर जाना।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 28 July 2020

"सवाल" (SAWAAL)



सवाल नज़र का नज़रो से ही बताने दो,
इशारों को इशारे रहने दो ज़ुबाँ तक ना आने दो।।

कुछ बातें है जो तेरे मेरे दरमियां रहने दे,
पहलियों को पहलियों में ही सुलझाने दो ।।

अब क्या बताऊँ की क्या राज़ है जिंदगी मेरी,
राज़ को अब बस एक राज़ ही रह जाने दो ।।

ना जाने क्या क्या ज़ुबाँ बोलता है ज़माना,
अपने राह पर रहो जमाने को बोलते जाने दो।।

क्या हुआ गर लहरे टकराकर मुड़ रही है किनारो से,
सुनामी बनकर भी आयेंगी एक रोज़ वक़्त तो आने दो।।

वो जो इश्क़ किताबों में अधूरा रह गया "चौहान",
अब गड़े मुर्दे ना उखाड़ उन्हें दफन रह जाने दो।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 24 July 2020

"हो नही सकता" (HO NHI SAKTA)



अब कागज़ पर नही कलम से पानी पर लिखना है,
बिना पँख इस आसमाँ की ऊंचाइयों में उडना है,
नंगे पैर अब जलते-सुलगते अंगारो पर चलना है,
नापना है अब इस गहरे सागर की गहराई को,
जो हो नही सकता "चौहान"अब वही तो करना है।।
वो दूर से मिलते नज़र आते है अम्बर और ज़मी,
आज उनको हकीकत में एक करना है,
ये हवायें जो छू कर गुज़र रही है मुझे यहाँ,
आज इनको अपनी आगोश में करना है,
फिसल जाता है ये रेत बारहां मुट्ठी से मेरी,
आज इसको बंद मुट्ठी में करना है,
अब नही रुकना इन राहों में इतना आगे आकर,
अब वक्त को वक़्त से पीछे करना है,
नही जानता कौन कितने पानी मे है यहाँ "चौहान",
आज खुद को खुद से बेहतर करना है,
मिट्टी पे मिट्टी हर कोई लिख देगा,
आज पानी पर पानी लिखना है,
जो हो नही सकता "चौहान"अब वही तो करना है।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 22 July 2020

"अलिफ़-लैला" (ALIF-LAILA)



अलिफ़ लैला की कहानी ,
जैसे मैं जहाज़ी सिंदबाद ।।

कई राज समेटे खुद में जैसे,
कोई तिलस्मी क़िताब ।।

ये मेरे ख़्वाबों का शहर,
जैसे सल्तनत बगदाद।।

मेरे हाथों की लकीर जैसे,
हो अलादीन का चिराग।।

कुछ ख्वाईशें ऐसी रही जैसे,
नूरानी चहरे पर हिज़ाब।।

शायरों की बस्ती में "चौहान",
जैसे किसी रुख़ पर नक़ाब।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 19 July 2020

"रास्ते" (RAASTE)



 
क्या हुआ अगर फासले ही फासले मिले,
रास्ते तो हमको भी तुम्हारे जैसे ही मिले।।

क्या हुआ अगर सावन की बारिश ना आयी,
हमको भी राहो में मौसम पतझड़ के मिले।।

महकता गुलाब था उसके गुलिस्तां का मैं,
मुझे तोड़ने वाले हाथ मेरे अपनो के मिले।।

कहाँ कोई ख़्वाब आकर बस जाता आँखों मे मेरी,
इन आँखों मे तो हमेशा गहरे समुन्दर ही मिले।।

बड़ी मुहोब्बत से गले से लगाया था उसने हमें,
पीठ में खंज़र घोपने वाले हाथ उसके ही मिले।।

वो जिसकी साँसे चलती थी नाम पर हमारे,
आज वो गैरो की आगोश में लिपटे हुए मिले।।

हाँ गुलाब ही तो थे वो "चौहान" इस बगिया के,
वो अलग बात है हमारे हिस्से में कांटे ही मिले।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 14 July 2020

"मेरी ज़िंदगी" (MERI ZINDAGI)



एक तेरे बाद क्यूँ यूँ बर्बाद सी हो गयी है जिंदगी,
किसी पुरानी बंद किताब सी हो गयी है जिंदगी।।

हर रात नए ख़्वाब सँजोते थे तेरे संग जीने के,
बस नाम तेरा ही लिखा दिल के हर कोने पे,
आज तन्हा काली रात सी हो गयी है जिंदगी,
किसी पुरानी बंद किताब सी हो गयी है जिंदगी।।

सदियों से लिखते आ रहे है जिंदगी के पन्नों पर,
कोई मरहम ना असर करे अब मेरे इन ज़ख्मो पर,
किसी पुराने फ़टे लिबाज़ सी हो गयी है जिंदगी,
किसी पुरानी बंद क़िताब सी हो गयी है जिंदगी।।

कोई राह नज़र आये तो चला भी जाऊँ,
यूँ मर मर कर कितना जीता जाऊँ,
अमावस में ग्रहण लगे महताब सी हो गयी है ज़िंदगी।।
किसी पुरानी बंद किताब सी हो गयी है जिंदगी।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 13 July 2020

"रोक लेते" ( ROK LETE)


सुनते कभी तेरी शिकायतों को,
दूर करते सभी शिकवे गिले,
ना होती ये दूरियाँ , ना ग़मो के काफिले,
जाते जाते मुड़ के देख लेते,
रोक लेते वही एक बार कहकर तो देखते।।

आँखो में नमी थी पर तुम देख ना पाए,
रोते रहे रात भर अश्क़ थम ना पाए,
देखना गवारा नही था तो ना सही,
एक बार चलते कदम ही रोक लेते,
रोक लेते वही एक बार कहकर तो देखते।।

ये रास्ते मुझे आज भी तुम तक ले जाते है,
ये होंठ तेरे ही गीत गुनगुनाते है,
चाहे कुछ भी हमारी खताओं की सज़ा दी लेते,
रोक लेते वही एक बार कहकर तो देखते।।

हम आज भी उन्हीं राहों पर घूमते है,
ख्यालों-मसक्कत में तुझे ही ढूंढते है,
"चौहान" को सपनो में ही आकर कह देते,
रोक लेते वही एक बार कहकर तो देखते।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Saturday, 11 July 2020

"तज़ुर्बा -ए-ज़िन्दगी-3" (TAZURBA-E-ZINDAGI-3)



ये जो रियासतें बना रखी है तुमने इश्क़ में, ख़्याल रखो,
कोई मिला के उन्हें साम्राज्य तुम्हारा ना उजाड़ दे।।

माना हुक़ूमते है तुम्हारी पर थोड़ा प्रजा का भी ख़्याल करो,
वक़्त से पहले कहीं राज्यभार से ये प्रजा ही ना लताड़ दे।।

यकीन कर पर इतना भी नही के सच को देख अनदेखा कर दो,
ये खेल सियासती है कहीं छूरा पीठ में अपने ही ना मार दे।।

तुम शातिर ,बलवान,होशियार ,पर ये घमंड किस बात का,
वक़्त पर कही इस दौड़ में तुम्हे लँगड़े ना पछाड़ दे।।

उड़ान ऊँची रख पर इतनी के ज़मी नज़र आती रहे,
हालातों के बिगड जाने पर पैर आसमाँ नही तलाशते।।

तू जैसा है ठीक है किसी को देख कर मत बदल,
टूट जाने पर तो भगवान भी मंदिर में नही रखे जाते।।

जो रंग भरे तसवीर में तेरी उनको सँजो के रख,
कुछ के हिस्से में "चौहान" ये रंग भी नही आते।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 7 July 2020

"राज़ कोई" (RAAZ KOI)


ना जाने "चौहान"दुनिया क्या क्या पढ़ लेती है,
तेरी कलम से ज़्यादा राज़ तेरी आँखें लिए बैठी है।।

ये कोई उम्र का तज़ुर्बा तो नही है फिर क्यूँ हर बार,
तेरी कलम लोगो की दिल की बात कह देती है।।

क्या ऐसी ख़लिश है तुझमे जो अब तलक भरी नही,
हर वक़्त तेरी आँखे है कि किसी की तलाश में रहती है।।

सुख गया वो दरख़्त पर कमज़ोर नही पड़ा अब तलक, 
टहनी है पतझड़ में भी हरे होने की उम्मीद में रहती है।।

रोज़ सोचता हूँ के अब बंद कर दूंगा लिखना मुहोब्बत "चौहान"
ये कलम है के मेरी हर वक़्त इश्क़ के नशे में चूर रहती है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 5 July 2020

"अब थक गया" (AB THAK GYA)



अब थक गया हूँ तुझे ढूंढते-ढूंढते,
कभी किसी राह में मिल जा अनजाने से।।

फिर शिकायतें भी कर लेना जी भर के,
एक बार फिर सीने से लगा किसी बहाने से।।

कहाँ सजदे करूँ कहाँ मन्नतें माँगू तेरे लिए,
क्या अब नही आएगा तू मेरे बुलाने से।।

ये आँखों के आँसू क्यूँ नज़र ना आते तुझे,
फिर रिश्ते टूट जाते है क्या मर जाने से।।

तूने ही तो कहाँ था अच्छा लगता है तुझे,
मुझसे यूँ बार बार मिलने आने से।।

अब मैं भी तुझसा हो जाऊँ क्या "चौहान",
क्या पा लिया मैंने भी लिखने लिखाने से।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 1 July 2020

"बद्तमीज़ कलमकार" (BATMEEZ KALAMKAAR)



हम पहले ही उन ख्यालो से निकल नही पा रहे,
तुम हमसे यूँ बार बार एक वही बात मत किया करो।।


बड़े कमज़ोर है, मिट्टी के ये आशियाने हमारे साहब!!,
हमसे यूँ बार - बार बरसात की बात मत किया करो।।


हम खुश है हमारी इस छोटी बस्ती, छोटे मकानों में ही,
महलों के ख्वाब दिखा हमारी ज़मीने मत लिया करो।।


छोटी छोटी बातों में ही ख़ुशी ढूंढ लेते है ज़िंदगी की ,
बड़ी खुशियों के ये झूठे वादे हमसे ना किया करो।।


हम गरीबों का क्या है अगर हम मर भी गए तो,
आप बड़े लोग हो साहब,ज़िंदगी चैन से जिया करो।।


हुकूमत आपकी है जो दिल आये आप वो किया करो,
निशाना साधने को सहारा हमारे कंधों का ना लिया करो।।


ग़रीबो की ज़िंदगी का कोई मोल थोड़ी होता है साहब,
हम मरे चाहे जिये आप तो बस सियासत किया करो।।


थोड़ी बदतमीज़ है कलम चौहान की "हक़ीक़त" लिखती है,
मुझसे यूँ झूठी कामियाबी के किस्से लिखने की उम्मीद ना किया करो।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 26 June 2020

"तुझसे क़ीमती"(TUJHSE KEEMTI)



कुछ लम्हात की बात थी और वो गुज़रा हुआ वक़्त याद आ गया,
कहीं एक घर और ना तबाह हो जाए, मैं बीच राह से आ गया।।

फिर वहीं बातें फिर वही तकरार होने का डर था इस दिल मे,
कुछ टूट के बिखरता उस से पहले मैं सब दिल मे दबा के आ गया।।

एक खो दिया एक को खोना नही चाहता किसी भी कीमत पर,
एक जज़्बातों की दीवार थी दरमियां मैं आज गिरा के आ गया।।

मंज़िले इतनी भी ज़रूरी नही थी के हमसाया ही ना मिले,
इश्क़ का तूफ़ान था मैं दिल के सहरा में दबा के आ गया।।

वो फिर कोई भी हो "चौहान" तुझसे जरूरी तो नही,
इस मशान में आज मैं खुद को जला के आ गया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 22 June 2020

"एक रात की कहानी" (EK RAAT KI KAHANI)


क्यूँ पूछते हो मुझसे तुम मेरा हाल ,
मैं कहाँ तुम्हे सब सच सच बताऊँगा,
मेरा हद से ज़्यादा यकीन भी मत करना,
वक़्त आने पर तुम्हारे काम ना आऊँगा।।

हाँ, घटाए काली है,बादल भी छाए है,
ये मत सोचना के मैं बरस जाऊँगा,
हवाओं सा हूँ मेरा ऐतबार ना करना,
किसे खबर कब कहाँ रुख बदल जाऊँगा।।

हाँ, मुहोब्बत रास नही आती अब मुझे,
किसी को इस दिल की दहलीज तक ना लाऊँगा,
वक़्त की बंदिशो में कैद नही ये सफर मेरा,
जब जहाँ मेरा दिल करेगा मैं ठहर जाऊँगा।।

एक रात कहानी मेरी तुमको बताऊँगा,
फिर आगे उसके कुछ कह ना पाऊँगा,
ज़िक्र होगा बस उसका फिर कलम से मेरी,
लिखूँगा उसे और पूरा करते करते मर जाऊँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 20 June 2020

"तुम मेरे नही"(TUM MERE NHI)


मैं जानता हूँ तुझे आज भी मेरा नही होना,
अश्क़ों से भीगा मेरा ये पहरान नही धोना।।

कोई कमी तो बता जो मुझमें बाकी रह गयी,
क्यों मुझे इस सागर में खुद को है डुबोना।।

दिल अपनी ज़िद्द पर है तू अपनी ज़िद्द पर,
एक मैं हूँ जिसे अब किसी का नही होना।।

मुझसे गर रौशन होती है जिंदगी किसी की तो बेशक,
जला दो "चौहान" को मुझे यूँ बेज़ार नही होना।।

तेरा इंतज़ार ही तो है कुछ लम्हे साल अब उम्रभर ही सही,
अब मौत ही अच्छी है मुझे ज़िंदगी का नही होना।।

मैं अगले जन्म फिर आऊँगा लिखने कहानी इश्क़ की,
इस बार जो हुआ सो हुआ उस बार आखिर में तुम मेरे ही होना।।

फिर छोड़ देगा "चौहान" फ़साने मुहोब्बत के लिखने,
जब मिलो इस बार सीने से लिपट कर मत रोना।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 18 June 2020

"वक़्त" ( WAQT)


अभी थोड़ा वक्त ख़राब है,
ये क़िस्मत ख़राब थोड़ी है।।

सबके आगे हाथ फैलाऊँ,
हालात इतने ख़राब थोड़ी है।।

आग लगी है तो बुझ जाएगी,
ये जंगल की आग थोड़ी है।।

सब लिबाज़ का दिखावा है,
ये खानदानी अमीर थोड़ी है।।

मेरे हक़ की रोटी मेरे नसीब में है,
हम किसी राह के फ़क़ीर थोड़ी है।।

अभी उम्र भी बहुत है और काम का जुनून भी,
मेरी कला किसी के बाप की ज़ागीर थोड़ी है।।

ये लकीरें मेरे हाथ की किसी के हाथ मे नही,
जो मनचाहे बदल दे ऐसे कोई पीर थोड़ी है।।

बात मंज़िल तक जाने की है राह कई है,
हम किसी एक राह के राहगीर थोड़ी है।।

नुमाइंदे फ़िराक में है नुमाईश की हमारी,
अनमोल है,कोई राह में बिकती तस्वीर थोड़ी है।।

बेज़ुबान है मगर सब बोल देती है ये "चौहान" ,
जो पैसों में बिक जाए ऐसी तहरीर थोड़ी है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 14 June 2020

"आख़िरी राह" "AAKHIRI RAAH"


वो खुद राह से भटक गया,
राह दूसरों को दिखाते-दिखाते।।

खुद को ही जला बैठा आज,
आग दूसरों की बुझाते-बुझाते।।

आज खुद गलती कर गया क्यूँ,
दुसरो को समझते- समझाते।।

खुद ही दूर कर गया खुद को,
सपनों को करीब लाते- लाते।।

मैं खुद बेज़ुबान हो गया आज,
नाम तेरा चिल्लाते- चिल्लाते।।

खुद ही रिश्ते तोड़ गया सब ,
रिश्तों को निभाते-निभाते।।

एक ज़िंदगी तमाशा बन गयी मेरी,
ख्वाबो को हकीकत बनाते-बनाते।।

मैं खुद मुश्किलों से हार गया आज,
जमाने को हौसला दिलाते - दिलाते।।

नाव ज़िंदगी की आख़िर डूब गई,
लहरों का साथ निभाते-निभाते।।

ना जाने कब ये गहरी नींद आ गयी,
तुझको बाहों में अपनी सुलाते-सुलाते।।

मिट्टी भी देखो आज रो पड़ी "चौहान",
मुझको अपनी आगोश में लाते-लाते।।

कागज़ भीग गया स्याही सुख गयी,
मेरी कलम को ज़ुबाँ दिल की बनाते बनाते।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 12 June 2020

"कभी आ"(KABHI AA )


ये मंज़र है या हादसा है कोई,
क्यूँ मैं भूले से भी ना भुलता हूँ,
कुछ ऐसा हाल हो गया है मेरा तेरे बिन,
आग ठंडक दे रही है बारिश में झुलसता हूँ,
रिश्ता खून का नही मेरा अपना तो क्या,
हक़ीक़त ना बना पर मेरा सपना तो था,
क्यूँ रोज़ रात खुद को मार कर सोता हूँ,
तुझे सदा नही सुनती क्या मेरी,
मैं रोज़ तुझे पुकार कर रोता हूँ,
क्या अब कभी मुश्किलों में काम ना आयेगा,
मैं रुठ गया तू अब भी नही मनाएगा क्या,
तेरा शहर कब मुझे अब अपना सा लगेगा,
जो बीत गया वो कब सपना सा लगेगा,
कब तू फिर से मेरा इंतज़ार करेगा,
कब मेरी ख़ातिर तू अपना वक़्त बेकार करेगा,
कब तू फिर कहानियों में अपनी बात बताएगा,
कब तू आकर मुझे सीने से लगाएगा,
तुझे तो खबर भी नही के मेरा हाल क्या है,
एक बार पूछ तो सही मुझसे,
मुझे तुझसे शिकायतें मलाल क्या है,
कभी आ तुझे दिखाऊँ ,
नक़ाब हँसी का ओढ़ कैसा दिखता है,
तन्हाई में टूट के कैसे बिखरता हूँ,
आज भी तेरी गली से जब गुज़रता हूँ,
थोड़ा ठहरता हूँ ,तेरे घर की तरफ देख कर,
तुझे याद करता हूँ आँखों मे आँसू लिए,
खामोशी से "चौहान" अपने घर को निकल पड़ता हूँ।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 10 June 2020

"दूर" (DOOR)


यकीनन मर रहे है तेरे बिन लम्हा-लम्हा,
तेरी यादों से तो अब दूर ही अच्छे है।।

नींदों से भी कोई वास्ता नही अब हमारा,
तेरे ख़्वाबों से तो अब दूर ही अच्छे है।।

अब सवाल मेरे कोई मायने नही रखते,
तेरे जवाबों से तो अब दूर ही अच्छे है।।

कहीं मुकम्मल है तो फिर कहीं अधूरी,
इन किताबी कहानियों से दूर ही अच्छे है।।

अब जब हम इन रास्तों के ही हो गए है,
इश्क़-ए-मंज़िल से तो अब दूर ही अच्छे है।।

अब कोई वास्ता नही तेरी गलियों से हमारा,
तेरे शहर से तो अब हम दूर ही अच्छे है।।

हम जैसे भी है ठीक है यूँ फिक्र ना करो तुम,
मरहमों से तो अब ये ज़ख्म नासूर अच्छे है।।

कही मशहूर तो कहीं बदनाम यही है "चौहान",
इन शायरों के खेल से तो हम दूर ही अच्छे है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 9 June 2020

"एक रोज़" (EK ROZ)


मैं हालात लफ़्ज़ों में पिरो दूँगा,
तुम पढ़ के रो जाओगे,
हम तुम्हारे नही हुए तो कोई बात नही,
तुम तो किसी के हो ही जाओगे,
तेरी और मेरी रात में बस फर्क इतना है,
हम सोए रहेंगे ख़ामोश कब्र में,
तुम किसी और कि बाहों में सो जाओगे।।
हम मुरझा जायेंगे किसी टूटे फूल की तरह,
तुम अबके सावन में फिर खिल खिला जाओगे,
कोई तुम्हे क्यूँ ना पसँद करे आखिर,
ताज़महल सी हो तुम,रात में और चमक जाओगे,
मैं कोई चंदन का पेड़ तो नही हूँ,
के तुम आओगे और मुझे लिपट जाओगे,
मैं इत्र सा पर अब वो खुशबू नही है,
ज़ाहिर है कहाँ मुझसे अब तुम बदन महकाओगे,
लड़ोगे, झगड़ोगे, मुझसे हर रोज़ तुम,
फिर कोई बेतुका बहाना लेकर छोड़ जाओगे,
कोई मेरी कब्र पर फूल सजायेगा उस दिन,
और तुम बेख़बर फूलों की सेज पर सो जाओगे।।
कभी ज़िक्र आया किसी कहानी में तो याद कर लोगे,
लोग नज़्म अनदेखा करते है "चौहान" की ,
तुम मेरी कब्र के सामने से गुज़र,मुझे अनदेखा कर जाओगे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 6 June 2020

"ज़िंदगी" ( ZINDAGI)


कुछ सवाल कुछ जवाब,
कुछ हक़ीक़त कुछ ख़्वाब,
समझते समझते निकल गयी,
ये जिंदगी सहाब!!

पेट की भूख, कुछ जरूरतें,
रोटी,कपड़ा और मकान,
कमाते-कमाते निकल गयी,
ये जिंदगी साहाब!!

कहीं काटे कही फूल कही पत्थर,
एक ख़्वाब, एक मंज़िल, ये रहगुजर,
पास आते-आते निकल गयी,
ये ज़िंदगी साहाब!!

कुछ अपने, कुछ पराये,
कुछ नामी तो कुछ बेनाम,
निभाते-निभाते निकल गयी,
ये ज़िंदगी साहाब!!

कहीं उम्र का तज़ुर्बा, कही सोच की कमी,
कही बदतमीजियां कही लियाक़त,
यही सुनते-सुनाते निकल गयी,
ये ज़िंदगी साहाब!!

कही मेहनत, कही तक़दीर,
कभी राज़ा तो कभी फ़क़ीर,
किन-किन हालातों से निकल गयी,
ये जिंदगी साहाब!!

कहीं मजबूरी, कही ज़िम्मेदारी,
कही कामियाबी कही नाकारी,
बस तोहमतों में ही निकल गयी,
ये ज़िंदगी साहाब!!

ना मैं कभी समझा पाया,
कभी तुम समझ पाए,
बस शिकायतों में निकल गयी
ये ज़िंदगी साहाब!!

लिखे क़लम से सब एक कागज़ पर,
"चौहान" ने तेरे सवालों के जवाब,
यूँ लिखते-लिखाते निकल गयी,
ये ज़िंदगी साहाब!!


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 3 June 2020

"ख़ामोश कलाकार" (KHAMOSH KALAAKAR)


पहले गा कर सुनाती थी जो आवाज़ें ,
आज आवाज़ उनकी सुन कौन रहा है।।

ख़ामोश पड़ी है आवाज़ साज़ो की अब,
अब साज़ो की तड़पन सुन कौन रहा है।।

अब वो हाथ तस्वीरों में रंग कैसे भरे ,
अब उस तस्वीर को देख कौन रहा है।।

पैरों की थिरकन भी अब थम ही गयी है,
घुँघरुओं की धड़कन सुन कौन रहा है।।

कलम भी अब लिखना छोड़ गई"चौहान",
अब शायरों का मन पढ़ कौन रहा है।।

अब नाटक भी कितनी हक़ीक़त बताएगा,
असलियत नाटककारों की देख कौन रहा है।।

सियासी बाशिंदे हाल सबका पूछ रहे है मगर,
कलाकारों के हालात आज पूछ कौन रहा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 1 June 2020

"आख़िरी रात" (AAKHIRI RAAT)



सफर की आखिरी रात है कुछ बात हो जाये,
और बात इतनी हो के बस इंतहा हो जाये।।

अब यहाँ से रास्ते अलग है हमारे तुम्हारे,
कुछ ऐसी करामात हो, रास्ते जुदा ना हो पाए।।

मंज़िले अलग है अगर अब हमारी-तुम्हारी ,
हम रास्तों पर रहे और मंज़िले खो जाये।।

अगर सब जान लेना ही अंत है रिश्तों का तो,
चल एक बार फिर से हम अज़नबी हो जाये।।

फिर तुम पूछना मेरे बारे में वो बातें सभी,
और फिर जान-पहचान में ये उम्र पूरी हो जाये।।

मैं फिर पढ़ कर सुनाऊँ तुझे कविताएं मेरी,
और फिर तू मेरे कांधे पर सिर रख कर सो जाएं।।

फिर वादा करले हम एक दूसरे से वो इश्क़ का,
आ एक दूसरे में फिर हम मुलतवी हो जाये।।

मेरी साँसे भी रुक जाए साथ तेरे "चौहान",
जमाना किस्से हमारे हमें पढ़ के सुनाए।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 31 May 2020

"क्यूँ" (KYU)


हक़ीक़त कुछ और है ,वो नही है जो सबको नज़र आती है,
टूट जाते है रिश्ते, दो दिन बात ना हो तो बातें बढ़ जाती है।।

कोई पास रहकर भी पास नही होता,ना कोई दूर होकर भी दूर,
दूरिया खुद ढूंढ लेते है, जब नजदीकियां हद से ज़्यादा बढ़ जाती है।।

बात किसी को देखने ना देखने की नही है दिल मे उतर जाने की है,
वरना नज़रो का क्या है अच्छी बुरी हर अनदेखी चीज़ पर ठहर जाती है।।

मैं लिखता रहूँ तुम पढ़ते रहो ये लिखे फ़साने मेरे,पर होगा क्या,
शायरी तो वो है "चौहान" जो लबों से उतर के लबों पे ठहर जाती है।।

कोई पार कर गया है इस राह को तो एक दफा आकर मुझसे मिले,
मैं भी तो देखूँ ये गली मुहोब्बत की आखिर में कहाँ तक जाती है।।

ख्वाइशें जिस्म की करो तो लाखों मंज़िले है इस तन्हा सफर में ,
रूह की ख्वाइशें की ज़िंदगी क्यों मंज़िलो की चाह में गुज़र जाती है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 28 May 2020

"इंसानियत ज़िंदा है" (INSAANIYAT ZINDA HAI)



यहाँ जब हर कोई एक दूसरे पर तोहमतें लगा रहा है,
एक शक्श मैंने देखा जो अँधेरे में रास्ता दिखा रहा है।।

ये ना किसी सियासत में है ना किसी दल का प्रमुख,
फिल्मों का खलनायक,नायक के काम कर दिखा रहा है।।

वो पैसे लेकर भी उनको घरों तक ना पहुँचा सके,
एक शक्श बिना पैसे लिए सबको घर पहुँचा रहा है।।

तुम्हारे दानराशि का उपयोग आंकड़ों में सिमट गया,
फर्क नियत का है जो बिना दान काम किया जा रहा है।।

सब सियासी खेल है अनुमति मिलना या ना मिलना,
काम इंसानियत का सियासतों को तमाचे लगा रहा है।।

पैसा इतना तो नही लगता के तुम्हे सोचना पड़ जाए,
एक विलन का काम देख रोता गरीब मुस्कुरा रहा है।।

कोई तो है "चौहान" जिसका ज़मीर ज़िंदा है यहाँ आज भी,
तभी आज "सोनू सूद" में गरीबों को भगवान नज़र आ रहा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 26 May 2020

"पूछा करो तुम " (PUCHHA KRO TUM)



क्या ख़बर कब किसकी नज़र लग जाए,
मुझसे मेरे ये ख़्वाब ना पूछा करो तुम।।

मैं जिसपर हूँ उस राह की मंज़िल नही कोई,
मुझ काफिर की जात ना पूछा करो तुम।।

किसी की मुहोब्बत ने ज़िंदा रखा है मुझे,
मुझ फ़क़ीर के हालात ना पूछा करो तुम।।

ना जाने कब ये आँखे बेक़ाबू हो जाये,
मुझसे मेरे जज़्बात ना पूछा करो तुम।।

बड़ा सुकून मिलता था आगोश में उसकी,
मुझसे वो इश्क़-ए-रात ना पूछा करो तुम।।

मेरी कलम देती है आजकल परिचय मेरा,
मुझसे मेरी औक़ात ना पूछा करो तुम।।

लिखने पर आया तो जला के ख़ाक कर दूँगा,
"चौहान" कलम की बिसात ना पूछा करो तुम।।

कलाकार हूँ अपनी कला में ही जीता हूँ,
मुझसे यूँ मेरा ईमान ना पूछा करो तुम।।

मैं राम को भी मानता हूँ राहीम को भी,
मुझसे मेरा भगवान ना पूछा करो तुम।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 24 May 2020

"क्यूँ??" (KYU??)


अब कहाँ काली तुम अपनी ये रात करते हो,
हम तो सो जाते है तुम्हारा इंतज़ार करते करते,
तुम ये रात भर फिर किस से बात करते हो??

ना जाने किन ख्यालो के गुम रहने लगे हो,
हमारी याद आती तो तुम बात कर लेते,
वो कौन है जिसे तुम आजकल याद करते रहते हो??

क्यूँ अब वो पहले की तरह जज़्बात नही है,
माना मिलने आ जाते हो साल में एक दफ़ा,
ये मिलना कैसा की आते ही जाने की बात करते हो??

इश्क़ दोनों ने किया था कोई सौदा तो नही,
हम किसी पिज़रें में कैद कोई पँछी तो नही,
के दिल बहला लिया और अब आज़ाद करते हो।।

अब प्यार से ज़्यादा तो गुस्सा आने लगा है तुम्हे,
कहीं साथ किसी और का तो नही भाने लगा है तुम्हे,
क्यों अब बातें कम और गलतियाँ ज़्यादा याद रखते हो??

अगर साथ मंज़ूर नही हमारा तो लौट जाएंगे हम,
अंज़ाम मौत है तो ये भी कर गुज़र जाएंगे हम,
क्यूँ इन पाक रिश्तों को तार-तार करते हो??

क्यूँ ये जिंदगी तुम्हे अब भाती नही है,
क्यूँ ये खुशियाँ तुम्हे नज़र आती नही है,
क्यूँ हर कलाम में कब्र और मशानो की बात करते हो??

कहाँ गया वो जो इश्क़ मुक्कमल लिखता था,
आजकल देखा मैंने लिखना भी तुम्हारा"चौहान"
बस मिलकर बिछड़ जाने की बात करते हो??

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 21 May 2020

"बचपन" ( BACHPAN)


कितना अच्छा था ,
कितना प्यारा था,
मेरा बचपन।।
माँ झूला झुलाती थी,
लौरी गा के सुलाती थी,
सबकी आँखों का तारा था मैं,
शरारतें भी बहुत करता था मैं,
पापा की डाँट से बचा,माँ
आँचल में छुपाती थी,
बेफिक्री में था वो मेरा जीवन,
कुछ ऐसा था मेरा बचपन।।

रोता था जब माँ स्कूल छोड़ के जाती थी,
खिलौनों के लालच दे मन मेरा बहलाती थी,
रो पड़ता था फिर जब माँ याद आती थी,
खेलता था जहाँ याद आता है वो आँगन,
कुछ ऐसा था मेरा बचपन।।

रात को दादा दादी परियों की कहानी सुनाते थे,
सबका मैं खिलौना था, जो माँगू वो लाते थे,
वो ज़िंदगी तो हसीन नज़र आती थी,
खुशियों और बेफ़िक्री में था मेरा जीवन,
कुछ ऐसा था मेरा बचपन।।

किसी भी बात की ना कोई फ़िक्र सताती थी,
आज ज़िंदगी बोझ सी लगती है,
माथे पर सिकन हरपल रहती है,
एक अनजानी सी फ़िक्र सताती है,
कुछ लम्हात खुदा हँसी के ला दे,
हो सकता है तो फिर से बचपन लौटा दे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 19 May 2020

"इश्क़ का सफर" (ISHQ KA SAFAR)


इश्क़ हसीन मुलाकातों का सफर,
उधर तू बेसबर, इधर मैं बेसबर।।

काटों से भरी मुश्किल ये डगर,
उधर तू बेखबर, इधर मैं बेखबर।।

दो पल के हमराही है हम,
फिर ना जाने तू किधर, मैं किधर।।

कहाँ कहाँ से होकर गुज़री है,
तेरी मेरी ज़िंदगी की रहगुज़र।।

कुछ ख़्वाब आरज़ू दफ़न हो गयी,
श्मशान बन गया दिल का शहर।।

अब तक कलम हाथ मे है "चौहान",
कुछ ऐसा था मुहोब्बत का असर।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...