Saturday, 28 September 2019

"मिल भी गए" (MIL BHI GYE)


अब हम मिल भी गए तो क्या होगा,
अब वो पहले वाली बात नही है।।

इश्क़ आज भी है तुझसे कल भी रहेगा,
पर अब वो पहले वाले ख़्यालात नही है।।

समझा लिया है अपने नादान दिल को,
अब पहले वाले हमारे हालात नही है।।

क्यों अश्क़ बहाऊँ अब तुझे पाने की खातिर,
हम पत्थरो में अब कोई जज़्बात नही है।।

दोस्ती कर ली है अब तन्हाई से हमनें,
अब किसी के साथ मे वो बात नही है।।

हाँ तू सोच ले अब फर्क नही पड़ता मुझे,
पर अब तू भी वो रूह-ए-कायनात नही है।।

मर जाना ही बेहतर था "चौहान" सो मर गए,
तेरे शहर में सच्ची मुहोब्बत की बिसात नही है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 27 September 2019

"हालात" (HAALAAT)


मत आ लौट के यहाँ हालात अच्छे नही है,
लोग भी अब पहले जितने सच्चे नही है।।

जो पहले हुआ करते थे अब वैसे साथ नही है,
बड़े बूढो में भी अब तज़ुर्बे वाली बात नही है।।

अब किसी के दिल मे कोई भाव उपकार नही है,
जो पहले मिलते थे यहाँ अब वो संस्कार नही है।।

बच्चो में भी कोई खास तहज़ीब, लियाक़त नही है,
चहरे पर नक़ाब है अब किसी मे शराफत नही है।।

बुराई की हुकूमत है कहीं दिखती अच्छाई नही है,
लाश कांधे है इंसानियत की अभी दफनाई नही है।।

देवी कहकर पूजते है पर नारी का सम्मान नही है,
सब बने फिरते हैवान है बचा कोई इंसान नही है।।

जिस्मों के भूखे है अब वो सच्चा प्यार नही है,
पैसों के रिश्ते है भाई-भाई वाला व्यवहार नही है।।

कला का भी अब मिलता कोई मोल नही है,
लफ्ज़ो का भी कब कोई तराज़ू तोल नही है।।

माँ बाप का भी अब उतना सम्मान नही है,
नरभक्ष लोग है अब यहाँ भगवान नही है।।

अब बातों में "चौहान" पहले जैसी सीख नही है,
मत आ लौट के यहाँ अब हालात ठीक नही है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 23 September 2019

"शिक्षा कहाँ है" (SHIKSHA KAHAN HAI)


शिक्षा कहाँ मिल रही है इस दौर में,
बस एक गौरखधंधा चल रहा है।।

होड़ लगी है बस पैसा कमाने की,
कोई बताएगा शिक्षा स्तर कहाँ बढ़ रहा है।।

किताबे बढ़ गयी है ज्ञान खो गया है,
नन्हीं सी उम्र में वो कितना वजन ढो रहा है।।

अगर ट्यूशन और कोचिंग में पढ़ाई है,
तो फिर स्कूलों में क्या हो रहा है।।

रेस लगी है हर चीज़ में आगे आने की,
नही देखते बच्चे का बचपन खो रहा है।।

विज्ञान की तररकी में कैद है सब,
पार्क मैदान सब सुनसान हो रहा है।।

हर चीज़ में आगे लाने की कोशिश में,
भविष्य छोड़ो वर्तमान भी खो रहा है।।

नही समझ आती ये कैसा विकास है,
सुकून मिट रहा है बचपन खो रहा है।।

हालात देख अब तो हँसी आती है "चौहान",
जमाना खुद अपनी कब्र खोद कर सो रहा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 22 September 2019

"पागल शायर" (PAGAL SHAYAR)


एक चेहरा देखा था एक रोज़ ,
मासुम, शरारत भरा,
नज़रों से नज़र मिली थी इस कदर,
सारा आलम गुमशुदा था,
वो था तो बेगाना कोई,
पर एक नज़र में अपना अपना सा लगा था,
बड़ी मशक्कत के साथ,
उनसे कुछ बात हुई,
पहली और आखिरी वो मुलाकात हुई,
उसके भी दिल मे अरमान थे,
मेरे भी दिल मे इश्क़ के तूफ़ान थे,
बस एक रात का ही वो फसाना था,
सुबहा दोनों को अलग हो जाना था,
ख्वाईशें दिल की थी उम्रभर साथ रहने की,
पर दोनों के पास अपना एक बहाना था,
सुबहा अखबार के एक टुकड़े पर लिखी,
उसके हाथों में एक बात रह गयी,
अधूरे इश्क़ की फिर अधूरी मुलाकात रह गयी,
बस फिर वो इस जहन में याद बनकर रह गयी,
ये मेरी मुहोब्बत की कहानी उस रात भर की थी,
"चौहान" वो मुलाकात बस लम्हात भर की थी,
अब हाथ मे कलम है , अल्फ़ाज़ों से याराने है,
अब तो पागल शायर है, कहाँ हम दीवाने है,
जो कहते है मुहोब्बत मिल जाती है,
छोड़ो, सब झूठे फ़साने हैं।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 20 September 2019

"हिस्सेदारी" (HISSEDARI)


सोया तो मैं भी नही हूँ उन रातों में,
जो राते तूने जाग कर गुज़री है।।

कभी महसूस ना होने दिया किसी को,
अश्कों से अपनी भी पुरानी यारी है।।

अकेले जज़्बात तेरे दिल मे ही तो नही,
इस मुहोब्बत में मेरी भी हिस्सेदारी है।।

जो मुझे तुझमे ढूंढती है पागलों की तरह,
वो तेरे ख़ातिर मेरे इश्क़ की ख़ुमारी है।।

मत आज़माया करो बात बात पर रिश्तों को तुम,
आज़माइश में लोगो मे रिश्तों में जान तक हारी है।।

एक अलग सी मुहोब्बत हो गयी है कलम से मेरी,
दर्दों को बयाँ करते लफ्ज़ो में अजब सी बेक़रारी है।।

चलते चलते दो कदम गिर क्या गया जमाने वालो,
"चौहान" ने चलना सीखा है मत समझो हिम्मत हारी है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 18 September 2019

"कितनी मुहोब्बते" (KITNI MUHOBBATEN)


कोई तराज़ू होता तो तोल के दिखता,
लफ्जों से बयां होता तो बोल के बताता,
मैं राज़ दिल के सारे तुझको सुनता,
कितनी मुहोब्बते तुमसे है तुम्हे आज मैं बताता।।

तेरा पास आना ,मुझमे सामना,
पल भर को ये दूरी सताना,
आज भी ज़िंदा है आँखो में मेरी,
थोड़ा वक्त देते तो हक़ीक़त बनाता,
कितनी मुहोब्बते तुमसे है तुम्हे आज मैं बताता।।

चाँद तारे मैं ला ना सका पर,
आसमाँ जुगनुओं से सजाया तेरा,
जहाँ जहाँ तेरे कदम पड़े वो राह,
हमने फूलों से सजाया तेरा,
सब कुछ तो तेरा था तू कभी हक तो जताता,
कितनी मुहोब्बते तुमसे है तुम्हे आज मैं बताता।।

लफ्ज़ काग़ज़ों पर धुँधला गए है,
बादल तनहाईयो के छा गए है,
मैं फ़क़त लौट के भी चला आता,
वो कब्र पर आ एक आवाज़ तो लगता ,
कितनी मुहोब्बते तुमसे है तुम्हे आज मैं बताता।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 14 September 2019

"हाथों में हाथ" (HATHOON ME HATH)


थाम कभी हाथ मेरे , बैठ मेरे पहलू में,
बीत जाने दे इस शाम को ,यूँ हाथो में हाथ धरे।।

आने दे कुछ ख्यालों को ,जहन में मुझको लेकर,
होने दे अब कुछ तो प्यार के वो पौधे हरे।।

रात की तन्हाई में मुझे साथ रखना तू,
देखेगा सारा जहाँ उस चाँद को तेरे क़दमो में गिरे।।

छाने दे तस्सवुर प्यार का इस रात में,
होने दे मदहोशी उन प्यालों से जो तेरी आँखों से भरे।।

इस हाथ को थाम कर यूँ छोड़ना नही,
तेरे बिन होंगे "चौहान" के रास्ते गमों से भरे।।

मेरी कलम से बयां मेरे दिल की वो ज़ुबाँ नही,
जो तुझे खुदा तो माने पर सजदा ना करे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 12 September 2019

"वैसी ही तो हो तुम" (VAISI HI TO HO TUM)


जैसी दादी नानी कहानियों में सुनाती थी,
हाँ सच मे वैसी ही तो हो तुम।।
जो रोज़ रात मेरे ख़्वाबों में आती थी,
हाँ सच मे वैसी ही तो हो तुम।।

चाँद की चाँदनी, आफताब की चमक,
राग की रागनी, सुरो की गमक,
जो हर शाम ललाट लिए आती थी,
हाँ सच मे वैसी ही तो हो तुम।।

परियों की शहज़ादी कहुँ, या कोई हूर,
जो उतरी हो आसमान से,
जो हर सावन घटा बन बरस जाती थी,
हाँ सच मे वैसी ही तो हो तुम।।

वो पहाड़ो से गिरती नदी हो,
पेड़ो से लिपटी बेल या कोई खिलती हुई कली ,
जिसे देख ये क़ुदरत भी शर्माती थी,
हाँ सच मे वैसी ही तो हो तुम।।

मेरी कहानी का अंजाम हो,
मेरे रास्तों का मुकाम हो,
जो मेरे जिस्म में रूह सी समा जाती थी,
हाँ सच मे वैसी ही तो हो तुम।।

मेरे ख्यालों की परवाज़ हो,
जो मेरे गीतों की आवाज़ हो,
जिसे देख "चौहान" पलभर को सांसे थम जाती थी,
हाँ सच मे वैसी ही तो हो तुम।।

जिस जज़्बात को कागज़ तक ना ला सका,
जिस ख्वाब को हकीकत ना बना सका,
जो इश्क़ में नूर-ए-खुदा कही जाती थी,
हाँ सच मे वैसी ही तो हो तुम।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 11 September 2019

"लफ्ज़ो में लिपटी" (LAFZON ME LIPTI)


ये चंद लफ्ज़ो में लिपटी हुई बातें है,
पढ़ सके तो तू मेरी आँखों मे पढले।।

ज़िन्दगी के हर सफर में मैं साथ हूँ तेरे,
चाहे रास्ते आसान मुश्किल कैसे भी निकले।।

नही डगमगाने देंगे कदम दो पल को भी तेरे,
यकीन कर ये हाथ थाम कर तो देखले।।

जोगी बना फिरता हूँ तेरे इश्क़ में मैं,
तेरे दिल के किसी कोने में ही रखले।।

माना मेरा प्यार तेरी चाहतों के काबिल नही,
पर आज के दौर की जरूरत समझ ही रखले।।

तेरे लिए मर मिटने की जो तलब है,
इसे प्यार नही तो बस हिफाज़त समझ ले।।

नही बदलता "चौहान" लोगों को देख अपने इरादे,
चाहे इससे फिर तू ज़िद्द या फिर हिमाक़त समझ ले।।

मेरी कलम से लिखा हर लफ्ज़ गवाह है मेरी तन्हाई का,
तुझबिन कैसे जीत हूँ इससे रात खुद ढलकर देख ले।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 7 September 2019

"मैं वही हूँ" (MAIN WAHI HUN)


माना आज शिकायतें बहुत है तुम्हे मुझसे पर,
मैं वही हूँ जिसकी हर बात अच्छी लगती थी तुम्हे।।

माना आज अच्छा नही लगता तुम्हे साथ मेरा पर,
मैं वही हूँ जिससे मिलने की बेताबियाँ रहती थी तुम्हे।।

आज चिढ़ सी जाती हो तुम ज़रा से छूने से मेरे ,
मैं वही हूँ जिसकी बाहों में नीँद सुकून की आती थी तुम्हे।।

आज मेरे रूठने,चले जाने से कोई फर्क नही पड़ता तुम्हे,
पर मैं वही हूँ जिसकी दूरी पल पल रुलाती थी तुम्हे।।

आज मुहोब्बत में मिट्टी हुआ तो कैसी मुहोब्बत "चौहान",
मैं वही हूँ जो जिस्म में रूहानियत सी नज़र आती थी तुम्हे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 5 September 2019

"कैसे कह दूँ" (KAISE KEH DUN)


पत्थर था राह का,
तराश के मूरत किया,
अपनी कला से मुझे,
एक नया रूप दिया,
रास्ते दिखाए जो यहाँ तक आया,
कैसे कह दूँ तुमने मेरे लिये,
कुछ नही किया....
क्या हुआ जो अब हर ,
रास्तों में साथ नही,
क्या हुआ जो अगर अब,
होती रोज़ बात नही,
आपका दिया हौसला था,
"चौहान" इन अंगारों पर,
अकेले चल दिया,
आज जो भी हूँ, जहाँ भी हूँ,
जो रुतबा ,मुकाम है,
सब आपकी बदौलत है,
कैसे कह दूँ तुमने मेरे लिये,
कुछ नही किया....

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 4 September 2019

"जज़्बात और नही" (JAZBAAT AUR NHI)


ये कहानी जज़्बात क्या लिखने लगा,
लोग अपना हमराज़ बनाने लगे है।।

पिरो दूँ उनके दर्द को लफ्ज़ो में मैं ,
इस उम्मीद से हर राज़ बताने लगे है।।

बड़े रंग देख रहा हूँ आजकल इश्क़ के,
हैरत है सच्ची मुहोब्बत दफनाने लगे है।।

अय्याशियों को फिर इश्क़ का नाम देते है,
तोहमत फिर एक दूसरे पर लगाने लगे है।।

कोई किसी के इंतज़ार में मर जाता है,
कही दोस्त दोस्ती का फायदा उठाने लगे है।।

भरोसा तोड़ कर भरोसे की उम्मीद करते है,
असली चहरे अब सबके नज़र आने लगे है।।

कसमे वादे तो आज भी वही पुराने है,
बस मुहोब्बत जिस्मो से निभाने लगे है।।

चंद लफ्ज़ क्या लिख बैठा "चौहान",
जामने वाले तुझे शायर बताने लगे है।।

तेरा लिखा कभी तेरे काम तो ना आया,
ख़्यालात तेरे लोगों के काम आने लगे है।।

पूछते है मुझसे फिर इश्क़-ए-कहानी मेरी,
खैर छोड़ो, हम कौन सा बताने लगे है।।

अब ज़िंदगी मिले या फिर मौत इन रास्तों पर,
आज इन हालतों में खुद को आजमाने लगे है।।

कर लिया है गिरफ्त में अश्क़ बहाती कलम को,
हाँ ,"चौहान" अब लफ्ज़ो को जिंदा दफ़नाने लगे है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...