ख़ुद को ख़ुद से हार के बैठा हूँ तेरे इश्क़ में ,
सफ़र आख़री है ये मेरा तुम तक आने का !!
बहा के बैठा हूँ समुंदर अश्क़ों का तेरे इश्क़ में ,
वक़्त आख़री है ये मेरा अश्क़ बहाने का !!
बना के बैठा हूँ नासूर ज़ख़्मों को तेरे इश्क़ में ,
ग़म आख़री है ये तेरा दिल से लगाने का !!
बह निकले है जज़्बात बन के अलफ़ाज़ मेरी कलम से तेरे इश्क़ में,
"चौहान" आख़री है ये फ़साना लिखने लिखाने का !!
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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