Wednesday, 5 July 2017

"दीदार -ए- हसरत " (DEDAAR - E - HASRAT)


तामाम इंतज़ाम किये थे हमने चकाचोंध के ,
इंतज़ार था बस उनके एक दफ़ा आने का ।।

आँखों से आंसू छलक आये थे उनके बस एक दिदार को ,
एक अरमान था चाँद उनके लिए आँगन में सजाने का।।

ना जाने कितने ख़्वाब सँजो रखे थे उनसे मिलने की तलब में ,
आज भी ज़ज़्बा था उसकी खातिर दुनियाँ से लड़ जाने का।।

वो रात भी पूरी मदहोश थी आज दिदार -ए -हसरत के लिए ,
मिट रहा था बहाना धीरे -धीरे तन्हा जिए जाने का ।।

बेताब थी मेरे दिल की बंज़र ज़मी बरसों की प्यास बुझाने को ,
एक अरसे बाद लगा था मौसम फिर से सावन आने का ।।

लगता है कबूल करली आज दुआ उस खुदा उस भगवान ने ,
"चौहान " आज फिर मिलने वाला है मौका प्यार में मिट जाने का ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

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