बड़ा बेसबर था इश्क़ में , इम्तिहान मेरे सबर का था ,
कैसे मिल जाती मंज़िल कोई और ,जुनून दिल में तेरी बसर का था।
देखता रहा ज़िंदगी में किस्मत की उथल-पथल को ,
अरमान तो बस इस दिल में तेरी रहगुज़र का था ।।
लाख दफा सिर झुकाया मंदिर में , सज़दा मस्जिद में किया तेरे लिए ,
हर दफा इस दिल की चौंखट में बैठ इंतज़ार किया तेरे लिए ,
डूबना ही था आखिर कब तक संभालता खुद को ,
जो मेरे दिल का महल उजड़ गया वो इश्क़ में तेरी बेपरवाही का बवंडर था ,
बड़ा बेसबर था इश्क़ में , इम्तिहान मेरे सबर का था ।।
बात कहाँ दो जिस्मों की थी ,ये मुहोब्बत तो तेरी रूह तेरी सादगी से थी ,
कैसे जीता तेरे बिन "चौहान " , ये ज़िंदगी तो तेरी ज़िंदगी से थी ,
जो खुदा अपनी तहरीर से लिखना भूल गया वो मेरा फूटा मुक्कदर था ,
बड़ा बेसबर था इश्क़ में , इम्तिहान मेरे सबर का था ।।
बड़ा बेसबर था इश्क़ में , इम्तिहान मेरे सबर का था ,
कैसे मिल जाती मंज़िल कोई और ,जुनून दिल में तेरी बसर का था।।
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां
कैसे मिल जाती मंज़िल कोई और ,जुनून दिल में तेरी बसर का था।
देखता रहा ज़िंदगी में किस्मत की उथल-पथल को ,
अरमान तो बस इस दिल में तेरी रहगुज़र का था ।।
लाख दफा सिर झुकाया मंदिर में , सज़दा मस्जिद में किया तेरे लिए ,
हर दफा इस दिल की चौंखट में बैठ इंतज़ार किया तेरे लिए ,
डूबना ही था आखिर कब तक संभालता खुद को ,
जो मेरे दिल का महल उजड़ गया वो इश्क़ में तेरी बेपरवाही का बवंडर था ,
बड़ा बेसबर था इश्क़ में , इम्तिहान मेरे सबर का था ।।
बात कहाँ दो जिस्मों की थी ,ये मुहोब्बत तो तेरी रूह तेरी सादगी से थी ,
कैसे जीता तेरे बिन "चौहान " , ये ज़िंदगी तो तेरी ज़िंदगी से थी ,
जो खुदा अपनी तहरीर से लिखना भूल गया वो मेरा फूटा मुक्कदर था ,
बड़ा बेसबर था इश्क़ में , इम्तिहान मेरे सबर का था ।।
बड़ा बेसबर था इश्क़ में , इम्तिहान मेरे सबर का था ,
कैसे मिल जाती मंज़िल कोई और ,जुनून दिल में तेरी बसर का था।।
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां
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