Friday, 23 June 2017

"जीता भी तो कितना" (JEETA BHI TO KITNA)

जीता भी तो कितना जीता ज़िन्दगी तेरे बिन,
साँसों को तो रुक जाना ही था।।

ढूंढता भी तो कितना मरहम दिल के ज़ख़्मो का,
नासूर तो इन्हें एक दिन बन ही जाना था।।

छोड़ के तो एक दिन यूँ भी चले जाना था तुम्हे मुझे,
मुक्कदर , लकीरों, तकदीरों का तो बहाना ही था।।

किसे पता था के वक़्त इतना बदल जायेगा "चौहान",
वो कहेंगे झूठे तुम थे सच्चा तो सारा जमाना ही था।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


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