Friday, 14 July 2017

"मेरा क्या कसूर " (MERA KYA KASOOR)


मेरा क्या कसूर अगर याद तेरी आयी ,
खामोश लबों पर बस एक बात तेरी आयी,
पलकों पर आकर ठहर गए आँसू,
अब के सावन भी तेरा आया और बरसात भी तेरी आयी।।

बेदखल कर दिया हमने ज़िंदगी को ज़िंदगी से ,
जब छोड़ के गए थे तुम साथ मेरा ,
एक दफा मुड़के देखा तक नहीं तूने मुझे ,
क्यों तुझे फिर मेरी तड़प भी नज़र ना आयी।।

कहाँ है मंज़िल कोन सा है रास्ता कुछ याद नहीं ,
मिटा दिया वो सफर भी जहाँ हमसफ़र बनके तू साथ नहीं ,
वीरानियाँ है अब इस दिल के आँगन में "चौहान",
वो गयी ऐसे वक़्त की तरह के फिर कभी लौट के ना आयी।।

मेरा क्या कसूर अगर याद तेरी आयी ,
खामोश लबों पर बस एक बात तेरी आयी,
पलकों पर आकर ठहर गए आँसू,
अब के सावन भी तेरा आया और बरसात भी तेरी आयी।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ


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