लाखों मंज़र देखे इश्क़ के ,
अब वो पहले वाली बात कहाँ ,
अब वो इश्क़ के जज़्बात कहाँ ,
ना मौसम वो सावन के अब ,
वो प्यार भरी बरसात कहाँ ,
चले थे जिनको थाम कर ,
हाथों में अब वो हाथ कहाँ,
बन के चले थे जो हमसफ़र ,
अब वो हमारे साथ कहाँ ,
टूट के सब बिखर गए ,
वो कांच से जज़्बात यहाँ ,
तेरे संग थी जो गुज़री मेरी ,
अब वो प्यारी रात कहाँ ,
लफ़्ज़ों की ख़ामोशी पढ़ "चौहान",
तेरी कलम की यहाँ औक़ात ही क्या,
लाखों मंज़र देखे इश्क़ के ,
अब वो पहले वाली बात कहाँ ,
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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