Wednesday, 16 August 2017

"रंग चाहत के " (RANG CHAHAT KE)


कुछ तुम बदले ,कुछ हम बदले ,
वो रंग ना बदले अपनी चाहत के ,
कुछ वक़्त बदला दस्तूर बदला ,
पल बेचैनी के न बदले राहत में ,
शिकवे भी है तुमसे शिकायत भी,
माना अब भी है तुमसे वही चाहत भी ,
देखे तुमसे बहुत इस जहाँ में ,
बस वो ढंग ना बदले हमपे इनायत के,
ढलती गयी शाम और ढलते गए हम ,
फिर उस रात अकेला था चाँद और अकेले थे हम,
लिखते रहे फिर उठा के कलम अपने जज़्बात ,
क्यों ना बदले "चौहान" एहसास तेरी चाहत के ,

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की जुबां 

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