Friday, 26 June 2020

"तुझसे क़ीमती"(TUJHSE KEEMTI)



कुछ लम्हात की बात थी और वो गुज़रा हुआ वक़्त याद आ गया,
कहीं एक घर और ना तबाह हो जाए, मैं बीच राह से आ गया।।

फिर वहीं बातें फिर वही तकरार होने का डर था इस दिल मे,
कुछ टूट के बिखरता उस से पहले मैं सब दिल मे दबा के आ गया।।

एक खो दिया एक को खोना नही चाहता किसी भी कीमत पर,
एक जज़्बातों की दीवार थी दरमियां मैं आज गिरा के आ गया।।

मंज़िले इतनी भी ज़रूरी नही थी के हमसाया ही ना मिले,
इश्क़ का तूफ़ान था मैं दिल के सहरा में दबा के आ गया।।

वो फिर कोई भी हो "चौहान" तुझसे जरूरी तो नही,
इस मशान में आज मैं खुद को जला के आ गया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 22 June 2020

"एक रात की कहानी" (EK RAAT KI KAHANI)


क्यूँ पूछते हो मुझसे तुम मेरा हाल ,
मैं कहाँ तुम्हे सब सच सच बताऊँगा,
मेरा हद से ज़्यादा यकीन भी मत करना,
वक़्त आने पर तुम्हारे काम ना आऊँगा।।

हाँ, घटाए काली है,बादल भी छाए है,
ये मत सोचना के मैं बरस जाऊँगा,
हवाओं सा हूँ मेरा ऐतबार ना करना,
किसे खबर कब कहाँ रुख बदल जाऊँगा।।

हाँ, मुहोब्बत रास नही आती अब मुझे,
किसी को इस दिल की दहलीज तक ना लाऊँगा,
वक़्त की बंदिशो में कैद नही ये सफर मेरा,
जब जहाँ मेरा दिल करेगा मैं ठहर जाऊँगा।।

एक रात कहानी मेरी तुमको बताऊँगा,
फिर आगे उसके कुछ कह ना पाऊँगा,
ज़िक्र होगा बस उसका फिर कलम से मेरी,
लिखूँगा उसे और पूरा करते करते मर जाऊँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 20 June 2020

"तुम मेरे नही"(TUM MERE NHI)


मैं जानता हूँ तुझे आज भी मेरा नही होना,
अश्क़ों से भीगा मेरा ये पहरान नही धोना।।

कोई कमी तो बता जो मुझमें बाकी रह गयी,
क्यों मुझे इस सागर में खुद को है डुबोना।।

दिल अपनी ज़िद्द पर है तू अपनी ज़िद्द पर,
एक मैं हूँ जिसे अब किसी का नही होना।।

मुझसे गर रौशन होती है जिंदगी किसी की तो बेशक,
जला दो "चौहान" को मुझे यूँ बेज़ार नही होना।।

तेरा इंतज़ार ही तो है कुछ लम्हे साल अब उम्रभर ही सही,
अब मौत ही अच्छी है मुझे ज़िंदगी का नही होना।।

मैं अगले जन्म फिर आऊँगा लिखने कहानी इश्क़ की,
इस बार जो हुआ सो हुआ उस बार आखिर में तुम मेरे ही होना।।

फिर छोड़ देगा "चौहान" फ़साने मुहोब्बत के लिखने,
जब मिलो इस बार सीने से लिपट कर मत रोना।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 18 June 2020

"वक़्त" ( WAQT)


अभी थोड़ा वक्त ख़राब है,
ये क़िस्मत ख़राब थोड़ी है।।

सबके आगे हाथ फैलाऊँ,
हालात इतने ख़राब थोड़ी है।।

आग लगी है तो बुझ जाएगी,
ये जंगल की आग थोड़ी है।।

सब लिबाज़ का दिखावा है,
ये खानदानी अमीर थोड़ी है।।

मेरे हक़ की रोटी मेरे नसीब में है,
हम किसी राह के फ़क़ीर थोड़ी है।।

अभी उम्र भी बहुत है और काम का जुनून भी,
मेरी कला किसी के बाप की ज़ागीर थोड़ी है।।

ये लकीरें मेरे हाथ की किसी के हाथ मे नही,
जो मनचाहे बदल दे ऐसे कोई पीर थोड़ी है।।

बात मंज़िल तक जाने की है राह कई है,
हम किसी एक राह के राहगीर थोड़ी है।।

नुमाइंदे फ़िराक में है नुमाईश की हमारी,
अनमोल है,कोई राह में बिकती तस्वीर थोड़ी है।।

बेज़ुबान है मगर सब बोल देती है ये "चौहान" ,
जो पैसों में बिक जाए ऐसी तहरीर थोड़ी है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 14 June 2020

"आख़िरी राह" "AAKHIRI RAAH"


वो खुद राह से भटक गया,
राह दूसरों को दिखाते-दिखाते।।

खुद को ही जला बैठा आज,
आग दूसरों की बुझाते-बुझाते।।

आज खुद गलती कर गया क्यूँ,
दुसरो को समझते- समझाते।।

खुद ही दूर कर गया खुद को,
सपनों को करीब लाते- लाते।।

मैं खुद बेज़ुबान हो गया आज,
नाम तेरा चिल्लाते- चिल्लाते।।

खुद ही रिश्ते तोड़ गया सब ,
रिश्तों को निभाते-निभाते।।

एक ज़िंदगी तमाशा बन गयी मेरी,
ख्वाबो को हकीकत बनाते-बनाते।।

मैं खुद मुश्किलों से हार गया आज,
जमाने को हौसला दिलाते - दिलाते।।

नाव ज़िंदगी की आख़िर डूब गई,
लहरों का साथ निभाते-निभाते।।

ना जाने कब ये गहरी नींद आ गयी,
तुझको बाहों में अपनी सुलाते-सुलाते।।

मिट्टी भी देखो आज रो पड़ी "चौहान",
मुझको अपनी आगोश में लाते-लाते।।

कागज़ भीग गया स्याही सुख गयी,
मेरी कलम को ज़ुबाँ दिल की बनाते बनाते।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 12 June 2020

"कभी आ"(KABHI AA )


ये मंज़र है या हादसा है कोई,
क्यूँ मैं भूले से भी ना भुलता हूँ,
कुछ ऐसा हाल हो गया है मेरा तेरे बिन,
आग ठंडक दे रही है बारिश में झुलसता हूँ,
रिश्ता खून का नही मेरा अपना तो क्या,
हक़ीक़त ना बना पर मेरा सपना तो था,
क्यूँ रोज़ रात खुद को मार कर सोता हूँ,
तुझे सदा नही सुनती क्या मेरी,
मैं रोज़ तुझे पुकार कर रोता हूँ,
क्या अब कभी मुश्किलों में काम ना आयेगा,
मैं रुठ गया तू अब भी नही मनाएगा क्या,
तेरा शहर कब मुझे अब अपना सा लगेगा,
जो बीत गया वो कब सपना सा लगेगा,
कब तू फिर से मेरा इंतज़ार करेगा,
कब मेरी ख़ातिर तू अपना वक़्त बेकार करेगा,
कब तू फिर कहानियों में अपनी बात बताएगा,
कब तू आकर मुझे सीने से लगाएगा,
तुझे तो खबर भी नही के मेरा हाल क्या है,
एक बार पूछ तो सही मुझसे,
मुझे तुझसे शिकायतें मलाल क्या है,
कभी आ तुझे दिखाऊँ ,
नक़ाब हँसी का ओढ़ कैसा दिखता है,
तन्हाई में टूट के कैसे बिखरता हूँ,
आज भी तेरी गली से जब गुज़रता हूँ,
थोड़ा ठहरता हूँ ,तेरे घर की तरफ देख कर,
तुझे याद करता हूँ आँखों मे आँसू लिए,
खामोशी से "चौहान" अपने घर को निकल पड़ता हूँ।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 10 June 2020

"दूर" (DOOR)


यकीनन मर रहे है तेरे बिन लम्हा-लम्हा,
तेरी यादों से तो अब दूर ही अच्छे है।।

नींदों से भी कोई वास्ता नही अब हमारा,
तेरे ख़्वाबों से तो अब दूर ही अच्छे है।।

अब सवाल मेरे कोई मायने नही रखते,
तेरे जवाबों से तो अब दूर ही अच्छे है।।

कहीं मुकम्मल है तो फिर कहीं अधूरी,
इन किताबी कहानियों से दूर ही अच्छे है।।

अब जब हम इन रास्तों के ही हो गए है,
इश्क़-ए-मंज़िल से तो अब दूर ही अच्छे है।।

अब कोई वास्ता नही तेरी गलियों से हमारा,
तेरे शहर से तो अब हम दूर ही अच्छे है।।

हम जैसे भी है ठीक है यूँ फिक्र ना करो तुम,
मरहमों से तो अब ये ज़ख्म नासूर अच्छे है।।

कही मशहूर तो कहीं बदनाम यही है "चौहान",
इन शायरों के खेल से तो हम दूर ही अच्छे है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 9 June 2020

"एक रोज़" (EK ROZ)


मैं हालात लफ़्ज़ों में पिरो दूँगा,
तुम पढ़ के रो जाओगे,
हम तुम्हारे नही हुए तो कोई बात नही,
तुम तो किसी के हो ही जाओगे,
तेरी और मेरी रात में बस फर्क इतना है,
हम सोए रहेंगे ख़ामोश कब्र में,
तुम किसी और कि बाहों में सो जाओगे।।
हम मुरझा जायेंगे किसी टूटे फूल की तरह,
तुम अबके सावन में फिर खिल खिला जाओगे,
कोई तुम्हे क्यूँ ना पसँद करे आखिर,
ताज़महल सी हो तुम,रात में और चमक जाओगे,
मैं कोई चंदन का पेड़ तो नही हूँ,
के तुम आओगे और मुझे लिपट जाओगे,
मैं इत्र सा पर अब वो खुशबू नही है,
ज़ाहिर है कहाँ मुझसे अब तुम बदन महकाओगे,
लड़ोगे, झगड़ोगे, मुझसे हर रोज़ तुम,
फिर कोई बेतुका बहाना लेकर छोड़ जाओगे,
कोई मेरी कब्र पर फूल सजायेगा उस दिन,
और तुम बेख़बर फूलों की सेज पर सो जाओगे।।
कभी ज़िक्र आया किसी कहानी में तो याद कर लोगे,
लोग नज़्म अनदेखा करते है "चौहान" की ,
तुम मेरी कब्र के सामने से गुज़र,मुझे अनदेखा कर जाओगे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 6 June 2020

"ज़िंदगी" ( ZINDAGI)


कुछ सवाल कुछ जवाब,
कुछ हक़ीक़त कुछ ख़्वाब,
समझते समझते निकल गयी,
ये जिंदगी सहाब!!

पेट की भूख, कुछ जरूरतें,
रोटी,कपड़ा और मकान,
कमाते-कमाते निकल गयी,
ये जिंदगी साहाब!!

कहीं काटे कही फूल कही पत्थर,
एक ख़्वाब, एक मंज़िल, ये रहगुजर,
पास आते-आते निकल गयी,
ये ज़िंदगी साहाब!!

कुछ अपने, कुछ पराये,
कुछ नामी तो कुछ बेनाम,
निभाते-निभाते निकल गयी,
ये ज़िंदगी साहाब!!

कहीं उम्र का तज़ुर्बा, कही सोच की कमी,
कही बदतमीजियां कही लियाक़त,
यही सुनते-सुनाते निकल गयी,
ये ज़िंदगी साहाब!!

कही मेहनत, कही तक़दीर,
कभी राज़ा तो कभी फ़क़ीर,
किन-किन हालातों से निकल गयी,
ये जिंदगी साहाब!!

कहीं मजबूरी, कही ज़िम्मेदारी,
कही कामियाबी कही नाकारी,
बस तोहमतों में ही निकल गयी,
ये ज़िंदगी साहाब!!

ना मैं कभी समझा पाया,
कभी तुम समझ पाए,
बस शिकायतों में निकल गयी
ये ज़िंदगी साहाब!!

लिखे क़लम से सब एक कागज़ पर,
"चौहान" ने तेरे सवालों के जवाब,
यूँ लिखते-लिखाते निकल गयी,
ये ज़िंदगी साहाब!!


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 3 June 2020

"ख़ामोश कलाकार" (KHAMOSH KALAAKAR)


पहले गा कर सुनाती थी जो आवाज़ें ,
आज आवाज़ उनकी सुन कौन रहा है।।

ख़ामोश पड़ी है आवाज़ साज़ो की अब,
अब साज़ो की तड़पन सुन कौन रहा है।।

अब वो हाथ तस्वीरों में रंग कैसे भरे ,
अब उस तस्वीर को देख कौन रहा है।।

पैरों की थिरकन भी अब थम ही गयी है,
घुँघरुओं की धड़कन सुन कौन रहा है।।

कलम भी अब लिखना छोड़ गई"चौहान",
अब शायरों का मन पढ़ कौन रहा है।।

अब नाटक भी कितनी हक़ीक़त बताएगा,
असलियत नाटककारों की देख कौन रहा है।।

सियासी बाशिंदे हाल सबका पूछ रहे है मगर,
कलाकारों के हालात आज पूछ कौन रहा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 1 June 2020

"आख़िरी रात" (AAKHIRI RAAT)



सफर की आखिरी रात है कुछ बात हो जाये,
और बात इतनी हो के बस इंतहा हो जाये।।

अब यहाँ से रास्ते अलग है हमारे तुम्हारे,
कुछ ऐसी करामात हो, रास्ते जुदा ना हो पाए।।

मंज़िले अलग है अगर अब हमारी-तुम्हारी ,
हम रास्तों पर रहे और मंज़िले खो जाये।।

अगर सब जान लेना ही अंत है रिश्तों का तो,
चल एक बार फिर से हम अज़नबी हो जाये।।

फिर तुम पूछना मेरे बारे में वो बातें सभी,
और फिर जान-पहचान में ये उम्र पूरी हो जाये।।

मैं फिर पढ़ कर सुनाऊँ तुझे कविताएं मेरी,
और फिर तू मेरे कांधे पर सिर रख कर सो जाएं।।

फिर वादा करले हम एक दूसरे से वो इश्क़ का,
आ एक दूसरे में फिर हम मुलतवी हो जाये।।

मेरी साँसे भी रुक जाए साथ तेरे "चौहान",
जमाना किस्से हमारे हमें पढ़ के सुनाए।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...