Friday, 30 June 2017

"मुलाक़ात " ( MULAKAT)

शाम ढलती है तेरी बाँहों में ढलते -ढलते रात हो जाए ,
आ ऐसी एक बार फिर तेरी मेरी मुलाक़ात हो जाएँ ।

खबर ना हो मुझे मेरी , ना खबर तुझे फिर तेरी रहे ,
आ एक दूजे में फिर कुछ ऐसे हम दोनों खो जाएँ।।

तेरे बिन ना मेरे दिन कटें , ना मेरे बिन गुज़रें तेरी रातें,
आ एक दूजे में फिर कुछ इस कदर मुलतवी हो जाएँ।

ज़िक्र तेरा हो मेरी हर बात पर , हक़ मेरा रहे तेरी रूह-ए-क़ायनात पर,
कुछ ऐसे फिर तेरे मेरे यें इश्क़-ए-जज़्बात हो जाएँ।।

मेरा कलमा हो ये किताबी आँखें तेरी , तू मेरा परवरदिगार हो जाए ,
इश्क़ में नमाज़ें अत्ता करूँ बस इसलिए के "चौहान" तू मेरा राज़दार  हो जाये ।।

आ ऐसी एक बार फिर तेरी मेरी मुलाक़ात हो जाएँ ।
आ ऐसी एक बार फिर तेरी मेरी मुलाक़ात हो जाएँ ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

"नज़र तू आती है " ( NAZAR TU AATI HAI)

हर कहीं नज़र मुझे अब तू आती है ,
जो सांस लूँ तो तेरी खुशबू आती है ।

बिन तेरे बेचैन रहूँ , बेकरारी अब किस से कहूं ,
जो सोचूं पल भर को भी , ख्यालों में बस तू आती है ।।

इसे इश्क़ कहूं या मेरा दीवानापन कुछ समझ नहीं आता ,
देखूं जो परछाई अपनी तो नज़र तू आती है ।

ये ख्यालों की जुंबिश है या किस्मत की हेरा-फेरी ,
अब ज़िंदगी में ज़िंदगी से ज़्यादा ज़रूरी नज़र तू आती है ।।

पल भर भी जीना मुमकिन नहीं लगता अब बिन तेरे ,
"चौहान" को तो हर नज़म हर अल्फ़ाज़ों में नज़र तू आती है।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

"अज़नबी" ( AZNABI)

आ एक बार फिर अजनबी हो जाएँ ,
भूल कर एक दूसरे को कहीं खो जाएँ ...

ना कभी तुम मिलना हमें दोबारा ,
ना कभी हम मिलेंगे तुम्हे कहीं ,
आ इस तन्हाई से दूर कहीं चैन से सो जाएँ,
आ एक बार फिर अजनबी हो जाएँ ।।

ना तुम रोना कभी हमें याद करके ,
ना हम रोयेंगे तुम्हे याद करके ,
आ एक दूजे से कुछ इस कदर मुलतवी हो जाएँ,
आ एक बार फिर अजनबी हो जाएँ ।।

ना तुम देखना कभी हमें ,
ना हम नज़र आएंगे कभी तुम्हे ,
"चौहान" आ कुछ इस कदर पर्दानशीं हो जाएँ,
आ एक बार फिर अजनबी हो जाएँ ।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

Thursday, 29 June 2017

"मुहोब्बत एक कहानी " (MUHOBAT EK KAHANI)

हार गया हार के भी क्या हारा ,
इश्क़ था जान तो वैसे भी जानी थी ।

बात जज़्बातों की थी ज़रूरतों की नहीं ,
तेरी खुशियों की ज़िद्द तो हमने भी ठानी थी ।।

रूह तो कब की मिल गयी थी तुझसे ,
एक ज़िंदगी ही थी जो बेगानी थी ।

क्या लिखना और क्या सुनाना हाल-ए-दिल उनको "चौहान",
जिनके लिए महोब्बत बस चंद लफ़्ज़ों की कहानी थी ।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की जुबां 

"इम्तिहान" (IMTIHAAN)

बड़ा बेसबर था इश्क़ में , इम्तिहान मेरे सबर का था ,
कैसे मिल जाती मंज़िल कोई और ,जुनून दिल में  तेरी बसर का था।

देखता रहा ज़िंदगी में किस्मत की उथल-पथल को ,
अरमान तो बस इस दिल में तेरी रहगुज़र का था ।।

लाख दफा सिर झुकाया मंदिर में , सज़दा मस्जिद में किया तेरे लिए ,
हर दफा इस दिल की चौंखट में बैठ इंतज़ार किया तेरे लिए ,
डूबना ही था आखिर कब तक संभालता खुद को ,
जो मेरे दिल का महल उजड़ गया वो इश्क़ में तेरी बेपरवाही का बवंडर था ,
बड़ा बेसबर था इश्क़ में , इम्तिहान मेरे सबर का था ।।

बात कहाँ दो जिस्मों की थी ,ये मुहोब्बत तो तेरी रूह तेरी सादगी से थी ,
कैसे जीता तेरे बिन "चौहान " , ये ज़िंदगी तो तेरी ज़िंदगी से थी ,
जो खुदा अपनी तहरीर से लिखना भूल गया वो मेरा फूटा मुक्कदर था ,
बड़ा बेसबर था इश्क़ में , इम्तिहान मेरे सबर का था ।।

बड़ा बेसबर था इश्क़ में , इम्तिहान मेरे सबर का था ,
कैसे मिल जाती मंज़िल कोई और ,जुनून  दिल में तेरी बसर का था।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की जुबां



Wednesday, 28 June 2017

" खुदगर्ज़ " (KHUDGARZ)

खुदगर्ज़ हूँ वहां जहाँ बात तेरी आती है ,
ताल्लुक नहीं रख पाता खुद से जब याद तेरी आती है।

सच है ये भी की बात मुकदर की तो है मैं खुदा तो नहीं ,
मुहोब्बत की लड़ाई यहाँ दुनिया से ज़्यादा अपनों से लड़ी जाती है।।

रोक नहीं पाता अपनी अपनी आँखों का ये समुन्दर ,
तेरी यादों की सुनामी मुझे हर रात तबाह कर जाती है।

मिट जाने दे हो जाने दे राख आज "चौहान" को ,
सुना है सच्ची मुहोबत यहाँ पुरानी किताबों में बंद पायी जाती है।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की जुबां 

" अंज़ाम मुहोब्बत का " ( ANZAAM MUHOBAT KA)

एक अंज़ाम लिख दे आज मेरी मुहोब्बत का ,
यूँ इंतज़ार में चलती साँसों का बोझ अब उठाया नहीं जाता ।

कोई हाल सुना दे जाके उसे मेरी बेबसी का ,
यूँ हँस हँस के अब दिल का दर्द छुपाया नहीं जाता ।।

मत बना किसी बेगाने को मेरा अपना ,
इन रिश्तों का क़र्ज़ मुझसे अब चुकाया नहीं जाता ।

थम जाने दे साँसें मिट जाने दे फ़साने ,
"चौहान" भर के लहू कलम में शब्द भर भी अब चलाया  नहीं जाता ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

" वज़ूद " (WAZOOD)

आँखों में ठहरा हुआ ख्वाब हो तुम ,
दिल में पनपता हुआ एक अरमान हो तुम।

कैसे दूर कर दूँ भला खुद को तुमसे ,
मेरा वजूद मेरी पहचान हो तुम ।।

तराशा है खुदा ने संगमरमर की मूरत सा तुम्हे ,
मुहोबत में ताज़महल सा एक पैगाम हो तुम ।

ज़ुल्फ़ों में सिमटी है एक काली घनी रात तुम्हारे ,
लबों पर सुर्ख लाली मानो सूरज की लालिमा लिए शाम हो तुम।।

किस मंदिर किस मस्जिद किस दर से मांगू मैं तुम्हे ,
मेरे लिए तो मेरा परवरदिगार मेरा भगवान् हो तुम ।

लोग कहते है तो कहते रहे काफ़िर मुझे " चौहान ",
मेरे लिए तो मेरी मंज़िल मेरा मुकाम हो तुम ।।

कैसे दूर कर दूँ भला तुमको खुद से ,
मेरा वजूद मेरी पहचान हो तुम ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की जुबां


Tuesday, 27 June 2017

" काफ़ी है " ( KAFI HAI)

दर्द-ए-दिल की दवा मिले ना मिले,
दर्द दिल को मिले तो काफी है ।

बात अगर वो करें या ना करें ,
होंठ उनके हिल जाएं तो काफी है ।।

आशिक़ी उनकी आँखों से बहे या ना बहे ,
हमें देख नज़रें भी झुक जाए तो काफी है ।

इज़हार-ए-मुहोब्बत वो हमसे करे या ना करें ,
ऐतबार सिर्फ हम हीं पर करे तो काफी है ।।

 माना हमसे मिलने कि उनकी हसरत हो या ना हो ,
खवाबों में ही मिलने आ जाएँ तो काफी है ।

हमें अपने दिल में बसाये या न बसाएं ,
हमारे दिल में अपना घर बना ले तो काफी है ।।

वो हमें हरपल याद करें या न करें ,
उनके नाम की हिज़कियाँ ही आ जाए तो काफी है ।

सुनहरी शाम हमारे नाम करे या न करें ,
यादों भरी रात दे जाए तो काफी है ।।

कोई गम नहीं तुम ज़िंदगी के सफर में संग चलो ना चलो ,
ना मरने वाली आरज़ू बन "चौहान" के दिल में बस जाओ काफी है ।।


शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ 

Monday, 26 June 2017

" रिश्ता महोब्बत का " ( RISHTA MUHOBAT KA)

ये रिश्ते आम नहीं होते , माना इनके कुछ नाम नहीं होते ,
ये एक ऐसा  सफर है ज़िंदगी का ,जिसमें हासिल  मुक़ाम नहीं होते ।

माना के मिलकर भी नहीं मिल पाती मुहोब्बत इस फरेब  की दुनिया  में ,
क्योंकि   आजकल  सच्ची  मुहब्बत  करने  वाले  तमाम  नहीं होते ।।

कौन समझाए  दुनिया वालों  को की मुहोब्बत मारे नहीं मरती ,
जो मरती तो मंदिरों में आज राधा- श्याम  नहीं होते ।

माना के नहीं  होती  मुहोब्बत पूरी  आज इस कलयुग  में ,
क्योंकि आजकल कहीं  राधा नहीं होती तो कहीं श्याम नहीं होते ।।

ढलती है  मेहखानो में शाम  इश्क़ के मरीज़ों   की ,
वैद्य ,हक़ीम, दवाखानों में इस रोग के आराम नहीं होते।

मिल जाती है सच्ची मोहब्बत जिन्हें यहां "चौहान" ,
वो बस भगवान ही होते हैं यहां इंसान नहीं होते ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां !!













"थोड़ी सी चाहत " (THORI SI CHAHAT)


एक अरमान लिए बैठा हुं दिल में तुझे लेकर ,
थोड़ी सी चाहत मेरे लिए तू भी करले ।

बड़े नसीब से मिलते हैं मुक्कदर यहाँ ,
मुझे पाने की हसरत कभी तू भी करले ।।

ख्वाइशें नहीं हैं मेरी कुछ ज़्यादा तुमसे इस ज़िंदगी में,
हदों में रहकर ही सही थोड़ी मुहोब्बत तू भी करले ।

मंज़िलों की परवाह मत कर संग हुँ तेरे हर सफर में,
मुझे हमसफ़र बना के चलने की हसरत तू भी करले।।

लग ना पायेगा मोल चाहत का इस इश्क़ के बाजार में ,
मुहोब्बत में मुहोब्बत से बिक जाने की ज़ुर्रत तू भी करले।

पूजा है तुझे खुदा बना हर घड़ी " चौहान " ने ,
आज मुझे पाने को इबादत थोड़ी तू भी करले ।।

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ  

Saturday, 24 June 2017

WAADE

Tere wade juthe tut gye ,
hathon se hath ab chhut gye ,
jo sapne dekhae the sath tere,
kiye the hathon main le k hath mere,
ab kya kru unn baaton ka ,
tere jhoothen unn wadon ka ..
tu mujhse jo dur gyi..
wo kaanch se bikhar k toot gye...
lauta de kahin se shaam wo ,
pila de tere ishq ka jaam wo ,
sab khali khali sa lagta h ,
kyu mna k hmako khud ruth gye ..
likhna b ab to mumkin nhi ,
na kat'ti raate'n dhalta din nhi,
"chauhan" ishq k sagar main ,
hum aa manzil pr doob gye ...


BY:Shubham singh chauhan
Meri kalam -Dil ki zubaa'n


Friday, 23 June 2017

TUM NA HO

Kal raat ek khyal bhi aisa na tha,
ki jismain tum na ho...
kiye lakho'n sawal iss chote se dil ne ,
ek bhi swal aisa na tha jismain tum na ho ...
bunta gya chadar khyalo'n ki raat bhar ,
dekhta rahan apne halat ishq main ek nazar,
koi bhi aisa jahan main khyalat na tha jismin tun na ho ..
Milna bichardna to Baat Mukkadar ki h ,
Gin'nt raha aasmaa'n Dekhta raha taaro'n ko ,
Na dikhao aisa ek bar b wo chand jismain tum na ho ...
Likhta Raha apne hi Hatho'n apni barbadi ka falsafa ,
"Chauhan" "Meri kalam " se wo "Dil ki zubaa'n",
Na hua koi fasana aisa baya'n jismain jikar tera na ho ...

BY : Shubham Singh Chauhan
Meri Kalam - Dil Ki Zubaa'n

"जीता भी तो कितना" (JEETA BHI TO KITNA)

जीता भी तो कितना जीता ज़िन्दगी तेरे बिन,
साँसों को तो रुक जाना ही था।।

ढूंढता भी तो कितना मरहम दिल के ज़ख़्मो का,
नासूर तो इन्हें एक दिन बन ही जाना था।।

छोड़ के तो एक दिन यूँ भी चले जाना था तुम्हे मुझे,
मुक्कदर , लकीरों, तकदीरों का तो बहाना ही था।।

किसे पता था के वक़्त इतना बदल जायेगा "चौहान",
वो कहेंगे झूठे तुम थे सच्चा तो सारा जमाना ही था।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


"अगर"(AGAR)

ना ये दर्द होते, ना ये गम होते,
अगर मेरी ज़िंदगी मे आये ना तुम होते।।

ना रोती ये आँखे ना तरसती तेरी एक झलक को,
अगर कभी तुमसे हमने नैन ना लड़ाए होते।।

ना सुलगता ये दिल का आँगन, ना होता तन्हाई का आलम,
अगर कभी तेरे संग सावन ना बिताए होते।।

ना होते ये जज़्बात, ना होते ये ख़्यालात,
अगर तेरा इश्क़ मैं खुद को ना लुटाए होते।।

ना बनाता कभी "चौहान" "मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ",
अगर चोट तेरे इश्क़ में इस कदर ना खाएं होते।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 22 June 2017

"आदत"(AADAT)

दर्द मिटता नही, ज़ख़्म भरता नही,
आदत ऐसी लगी तेरी, तुझबिन दिल धड़कता नही।।

चैन ना क़रार है ,अब दिल की तन्हा महफ़िल है,
कैसे जियूँ तुझबिन एक पल भी जीना मुश्किल है,
पल पल सदियों से ये तन्हा वक़्त भी अब गुज़रता नही,
दर्द मिटता नही........

तुझे भुला दूँ वो जज़्बात कहाँ से लाऊँ,
तेरा ज़िक्र ना हो जिसमें वो बात कहां से लाऊँ,
आँखो से चहरा तेरा "चौहान" एक पल भी हटता नही,
दर्द मिटता नही ......


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"एक सवेरा" (EK SWERA)

एक सवेरा फिर काली रात,
चंद लम्हे और तेरा साथ,
हर मौसम पतझड़ पर एक बरसात,
एक पल को सही हाथों में तेरा हाथ,
तेरे दर्द-ओ-गम में तेरा साथ,
छोटा हो सफर पर तु चले साथ, 
दे मेरे दामन में तेरे दर्दों की सौंगात,
उम्रभर खामोशी पर तेरा ज़िक्र तेरी बात,
माँगा ही क्या था "चौहान",
पलभर की ज़िंदगी पल भर का साथ,
तेरे बिन, क्या ज़िंदगी, क्या मैं, क्या मेरे हालात।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 21 June 2017

"चल अलविदा"(Chal Alwida)

चल अलविदा!!

अब कभी ये रात नही होगी,
रात भर अश्क़ों की बरसात नही होगी,
लो छोड़ दी आज हमने ज़िन्दगी अपनी,
अब कभी हमारी तुम्हारी मुलाकात नही होगी,

चल अलविदा!!

अब कोई अरमान नही होगा,
दिल मे तेरी यादों का तूफान नही होगा,
लो हार गया मैं और जीत गए तुम,
अब ज़िंदगी मे कोई और इम्तिहान नही होगा।।

चल अलविदा!!

तूने सहारा ना दिया लो डूब गया मैं,
अकेली ज़िन्दगी को जीते जीते ऊब गया है,
तुमको बनाते बनाते ज़िन्दगी अपनी,
देख खुद अपनी ज़िंदगी से रूठ गया मैं।।

चल अलविदा!!

अब कोई तुम्हे ना हरपल सताएगा,
अब कोई तुम्हें ना पल पल याद आएगा,
ले लगा लिया मौत को गले मैने अपने,
अब "चौहान" कभी ख्वाबों में भी नज़र न आएगा।।

चल अलविदा!!

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 19 June 2017

"क़रार कहाँ" (KARAR KAHAN)

जब सामने ना हो तुम,
तो आँखो में करार कहाँ।।

जब ज़िक्र ना हो तेरा,
तो बातों में करार कहाँ।।

जब ख़्वाबो में ना हो तुम,
तो नींद में करार कहाँ।।

जब जज़बातों में नाहो तुम,
तो इश्क़ में करार कहाँ।।

जब मरहम ही ना बनो तूम,
तो ज़ख़्मो में करार कहाँ।।

जब "चौहान" तेरे अल्फ़ाज़ ही नही मेरे नाम,
तो फिर "मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ" कहाँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 18 June 2017

"एक किस्सा" (Ek Kissa )

एक किस्सा बयाँ करूँगा ,
इश्क़ में हालातों का,
गुज़री तन्हा रातों का,
एक किस्सा बयाँ करूँगा ।।

तन्हा काली रातों का,
पल पल सताती तेरी यादों का,
जो होती थी कभी उन हसीन मुलाक़ातों का,
एक किस्सा बयाँ करूँगा ।।

खत में लिखे जज़्बातों का,
रात भर की जो उन बातों का,
तुझे लेकर जहन में उठते जज़बातों का,
एक किस्सा बयाँ करूँगा ।।

इश्क़ में मिली बेवफाईयों का,
पल पल बढ़ती रुसवाइयों का,
"चौहान" से की जो बेपरवाहियोँ का,
एक किस्सा बयाँ करूँगा ,

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"कोई असर"(KOI ASAR)

कोई असर मुहोब्बत का मुझपर भी होने दे,
कुछपल तेरी यादों में मुझको भी रोने दे।।

ये जज़्बात नही बदलेंगे कभी आज़मा के देख लेना,
दर्द तेरे दिए ज़ख़्मो का दिल पर भी होने दे।।

कतरा कतरा बह जाएगा ये समुंदर आखों का,
कोई बीज मुहोब्बत का इस दिल मे भी होने दे।।

क्या होगा गर छोड़ भी जाओगे तुम कभी,
मुहोब्बत में "चौहान" दिल को शमशान राख मुझे भी होने दे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 16 June 2017

"तुम ना हो "(TUM NA HO)

कल रात  एक ख़्याल भी ऐसा नही था ,
 जिसमे तुम ना हो।।
किये लाखों सवाल इस छोटे से दिल ने,
एक सवाल भी ऐसा ना था ,
जिसमे तुम ना हो।।
देखता रहा अपने हालात इश्क़ मे एक नज़र,
कोई भी ऐसा ज़हन में ख़्यालात ना था,
जिसमे तुम ना हो।।
मिलना बिछड़ना तो बात मुक्कदर की है
गिनता रहा तारे देखता रहा आसमाँ,
एक बार भी ना दिखा वो चाँद ,
जिसमे तुम ना हो।।
लिखता रहा अपने हाथों अपनी बर्बादी का फलसफा,
"चौहान" फिर "मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ"
ना ऐसा हुआ कोई फसाना बयाँ,
जिसमे ज़िक्र तेरा ना हो या,
जिसमे तुम ना हो।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 15 June 2017

"कोशिश तुझे भुलाने की" (KOSHISH TUJHE BHULANE KI)

इस साल तुझे हम याद नही रखेंगें,
कोशिशें तुझे भुलाने की बार बार रखेंगे।।

फिर तुम इसे हमारी नफ़रत समझो या बेपरवाही,
अपने जहन में तुम्हारे ख़्यालात नही रखेंगे।।

टूटती है तो टूट के बिखर जाएं माला मेरे सपनों की,
पर तुझसे जुड़े अब कोई भी ख़्वाब नही रखेंगे।।

ले आएंगे चहरे पर मुस्कान भले झूठी क्यों ना हो,
ओर तेरी यादों की उदासी अब अपने साथ नही रखेंगे।।

लाख बहाती रहे ये आँखे पानी परवाह नही,
अश्क़ पोछने को तेरा दिया रूमाल नही रखेंगे।।

जीना चाहती थी तुम मेरे बिन आज जी लो जी भर के,
हम भी पास तेरे प्यार की कोई सौंगात नही रखेंगें।।

ढूंढ लेंगे कोई और लिखने की वजह या लिखना छोड़ देंगे,
"चौहान" तेरे प्यार में कभी अब ऐसे हालात नही रखेंगे।।

नही कर पाए अगर अमल अपनी इन बातों परतों कोई बात नही,
फिर अगले साल हम जहन में कुछ ऐसे हालात रखेंगे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


"तुमसा ना मिला" (TUMSA NAA MILA)

अकेला इस लिए नही हूँ कि मुझे तुम नही मिले,
अकेला इसलिए हूँ मुझे कोई साथ तुमसा ना मिला।।

वापिस इसलिए नही मुड़ा के मंज़िल को मैं पा नही सकता,
लौटा तो इसलिए के सफर ने हमसफ़र तुमसा ना मिला।।

जानना चाहती हो कि क्यों कह ना सके ये लब कुछ,
खामोश इसलिए हूँ सुनने वाला कोई तुमसा ना मिला।।

कौन सुनता कहानी इस अदालत में वफ़ा-ए-इश्क़ की,
बताते भी तो कैसे कोई तरफ़दार तुमसा ना मिला।।

और किस से पूछते वजहा दूर जाने की या इश में बेईमानी की,
"चौहान" मौत को गले लगा जीने वाला खुद्दार तुमसा ना मिला।।

मिले होंगे लाखों इस दुनिया की भीड़ में तुम्हे भी हमे भी,
पर कोई हदों से गुज़र प्यार करने वाला तुमसा ना मिला।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Wednesday, 14 June 2017

"जुदा" (judaa)

कैसे करेगी जुदा, मैं तेरी साँसों में शामिल हूँ,
बहता हूँ तेरे जिस्म में बनके लहू, तेरी रग रग से वाकिफ़ हूँ।।

परेशानियाँ है मुझसे तुझे लाखों सही,
देख गौर से तेरा सुकून भी मैं ही हूँ,
माना कभी लेना नही चाहती तेरी ज़ुबाँ मेरा नाम,
कैसे रखेगी खामोशियाँ मैं हर खामोशी में शामिल हूँ।।

माना पास नही आज रहती है मुझसे दूर दूर,
कब तक रहेगी अलग मैं तेरी कस्ती का साहिल हूँ,
नही मुहोब्बत मुझसे ना सही कोई गिला नही,
तुझे पल पल होते एहसास में शामिल हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"तुमसे मुहोब्बत करेगा कौन"(Tumse Muhobbat karega kon )

रात मेरी यादों में बीत जाएंगी,
आंखे तेरी अश्क़ों से भीग जाएंगी,
ना कोई होगा जब पूछने वाला हाल तेरा,
फिर तेरे दर्दों का मरहम बनेगा कौन??
कभी पूछा है सवाल तुमने अपने इस दिल से,
तेरे दामन को खुशियों से फिर भरेगा कौन??
अगर मैं ना रहा तो तुमसे यूँ मुहोब्बत करेगा कौन??
कौन देगा साथ जब ये तन्हाई तुम्हे सताएंगी,
किसको सुनोगी हाल जब ख़ामोशी मेरी तड़पायेगी,
हाथों में हाथ थाम के तेरे संग संग चलेगा कौन??
तुझे पाने को पल पल रब से फ़रियाद करेगा कौन??
कौन करेगा तेरा यूँ इंतजार अपनी ताह उम्र,
इस फ़रेब की दुनिया मे तुझे खुदा बना,
तेरी इबादत करेगा कौन??
कभी पूछा है सवाल तुमने अपने इस दिल से,
तेरे दामन को खुशियों से फिर भरेगा कौन??
अगर मैं ना रहा तो तुमसे यूँ मुहोब्बत करेगा कौन??

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...