Wednesday, 29 November 2017

"अब तलक " (AB TALAK)


सिलसिला तुझे चाहने का , अब तलक जारी है ,
यूँ पल पल अश्क़ बहाने का , अब तलक जारी है !!

सिमटी है कई यादें आज भी उन चाँद तारों में,
इन आसुओं का लबों पे रुक जाना , अब तलक जारी है !!

क्या जो डूब गयी कश्ती हमारी आ के किनारे पर ,
जज़्बा साहिल की चाह में तूफानों से टकराने का , अब तलक जारी है !!

किसको तलाश है अब सहरा में गुलिस्तां की ,
तन्हाई में तेरी यादों का सताना अब तलक जारी है !!

कर भी क्या लेंगे "चौहान" लिख कर "मेरी कलम - दिल की जुबां",
पर क्यूँ तेरा अश्क़ों को लफ़ज़ बनाना अब तलक जारी है!!

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां

Friday, 24 November 2017

"रोग इश्क़ का "(ROG ISHQ KA)


रोग पुराना है ये तुम मत लगाना ,
दर्द जाना पहचाना है ये तुम मत लगाना,
हर एक दिल का फ़साना है ये तुम मत लगाना ,
ये तो सदियों पुराना है इसे तुम मत लगाना,
रिश्ता बेगाना है ये तुम मत लगाना,
इस मर्ज़ की ना कोई दवा है ,
ये दिल आशिक़ाना तुम मत लगाना ,
मैंने तो चढ़ा लिया लाल रंग ख़ुद पर ,
ये रंग इश्क़ का "चौहान" तुम मत लगाना...
कहता है ये शायर दीवाना ,
मैं तो संभल ना पाया कश्ती इश्क़ की,
 इस दरिया में कहीं तुम भी भटक ना जाना .......

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां

Friday, 17 November 2017

"अच्छा लगता है " (ACCHA LAGTA HAI)


तेरा रूठना भी अच्छा लगता है,
तेरा मानना भी अच्छा लगता है ,
क्या चीज़ है ये मुहोबत समझ नहीं आती,
तेरा हँसना भी अच्छा लगता है ,
तेरा रुलाना भी अच्छा लगता है ...
फ़िक्र तुझे भी होती है मेरी ,
तेरा ना जता के भी वो जताना अच्छा लगता है..
क्या करना उस मंज़िल का जिसमें तुम ना हो,
"चौहान " तुम तक आके ठहर जाना अच्छा लगता है ..

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

Friday, 3 November 2017

"रंग" (RANG)


रंग ख्यालों के है तो रंग है जज़्बात के,
रंग तेरी उल्फ़तों के रंग मेरे हालात के,
रंग तेरे इश्क़ में गुज़रे दिन रात के ,
रंग बदले नहीं आज भी वो शाम की मुलाकात के...
रंग तारों भरी तन्हा रात के ,
रंग आँखों से कही उन बात के ,
रंग अपनी कहानी की शुरुआत के ,
रंग बदले नहीं तेरे इश्क़ की सौगात के....
रंग आँखों में छिपे समुन्दर के ,
रंग दिलों में उठते बवंडर के,
रंग तेरे इश्क़ से पाक उस मंदिर के,
रंग बदले नहीं तेरे मेरे मुक्क़दर के ...
रंग मेरे गीतों में तेरे दिल की आवाज़ के,
रंग जज़्बात बयां करते उस साज़ के,
रंग तेरे इश्क़ के आसमा में उड़ते हुए परवाज़ के ,
रंग बदले नहीं "चौहान" तेरे इश्क़ के अंदाज़ के .....

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां

Wednesday, 1 November 2017

"फिर कहाँ " (PHIR KAHAN)



सुखे पत्ते टूट के शाखों से फिर कहाँ जुड़ेंगे,
बिछड़ गए जो एक बार हम तो फिर दोबारा कहाँ मिलेंगे ...

आ गई जो दरार तेरे उस मन के दर्पण में,
तु बता कहाँ फिर चहरे एक साथ दिखेंगे ..

टूट ही गये अगर धागे वो कच्चे तेरे इश्क़ के ,
तु बता कहाँ फिर वो बिना गांठों के जुड़ सकेंगे ...

चलते रहे अगर उम्र भर भी इन रास्तों पर यूँ अकेले,
तू बता अगर ना हो कोई मंज़िल तो कहाँ तक हम चल सकेंगे ..

अगर ना ही रहे कोई तालुकात मेरे दिल के मेरी कलम से,
तू बता "चौहान" कहाँ हम "मेरी कलम" से " दिल की जुबां" लिख सकेंगे...

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की जुबां

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...