Friday, 29 November 2019

"वक़्त" (WAQT)


वक़्त कब किसका हुआ है ,
आज तेरा तो कल मेरा भी आएगा।।

माना रात काली घनी गहरी है मगर,
इस रात के बाद रौशन सवेरा भी आएगा।।

आज किसी और का नाम है तो क्या,
कल ज़ुबाँ पर लोगों के नाम मेरा भी आएगा।।

इस सफर में छाव देखकर रुकना मत,
मंज़िलों पर फिर नाम मेरा भी आएगा।।

जो छोड़ गए बीच राह उन्हें याद मत कर,
जब होश आएगा तो ख़्याल मेरा भी आएगा।।

जो जैसा लिख रहा है लिखने दे गौर ना कर,
एक दिन लिखा सामने सबके फिर मेरा भी आएगा।।

आज लिख रहा है तू बनके ज़ुबाँ आवाम-ए-दिल की ,
किसी कहानी में तो "चौहान" ज़िक्र मेरा भी आएगा।।

किस बात की हैरत और किस बात की फिक्र "चौहान",
सब उनकी नज़र में है, उसकी तहरीर से सबके लिए लिखा जाएगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 27 November 2019

"कसूर" ( KASOOR)


एक रात की कहानी थी इश्क़ की बरसातें थी,
एक मुरझाए फूल को मैंने सूखने से बचा लिया।।

सुरूर था मुहोब्बत का ,इश्क़ के नशे में चूर थे हम,
एक दरिया शराब का मैंने आँखो से बहा दिया।।

ख्वाइशें थी दिल की उसकी सोहबत में रहना,
इस आरज़ू में कितने ग़मो को सीने से लगा लिया।।

क्या कुछ तो नही किया मैंने एक उसकी ख़ातिर,
उसके ख़्वाबों के ख़ातिर खुद के ख़्वाबों को जला दिया।।

हर पत्थर को पत्थर समझ ठोकर नही मारी"चौहान",
कसूर इतना था खुदा समझ माथे से लगा लिया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 26 November 2019

"कहानी इश्क़ की" (KAHANI ISHQ KI)


थी मुहोब्बत की कहानी इतनी "चौहान",
कोई हमें ना मिला हम किसी के हो गए।।

रात बहुत थी तन्हा मुसाफ़िर थे हम,
चाँद ना मिला हम जुगनुओं के हो गए।।

बड़ी ख़्वाईश थी उस गुलिस्तां में समाने की,
फूल तो ना मिले हम खुशबुओं के हो गए।।

बड़े बेसबर थे कोई हमारे हम किसी के लिए,
कोई चौंखट पर आया मेरे हम उसी के हो गए।।

बड़ी चाहत थी मंज़िलों को पाने की हमें,
साथ चले नही वो हम किसी की मंज़िल हो गए।।

अब क्या लिखुँ इस कहानी का अंज़ाम "चौहान",
किसी की कहानी पुरी करके हम अधूरे हो गए।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 23 November 2019

"रात भर" (RAAT BHAR)



तुझे किस बात का गम है,
क्यों तू भी मुझसा हो रहा,
मेरी तो गुज़रती थी रातें रो रोकर,
तू किस गम में रात भर रो रहा है।।

क्यों अपनी हदों को तोड़ आया है,
किसके ख़ातिर सब छोड़ आया है,
खुद से ही तोड़कर नाता आज तू,
बता मुझे किसका हो रहा है।।

तेरी नज़रों में वो खुदा सही,
उसकी नज़रों में इश्क़ गुनाह सही,
जिसे तू सुनना चाहता है हाल दिल का,
देख वो तो चैन से सो रहा है।।

इस मुहोब्बत के दलदल से कैसे निकल पायेगा,
क्या हुआ इश्क़ आफ़ताब है शाम होते ढल जाएगा,
देखा करेगा जोड़ कर खुद से कहानियाँ मेरी,
पूछेगा "चौहान" बरसो पहले लिखा अब कैसे हो रहा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 22 November 2019

"नादानी" (NADANI)


जानता हूँ तू चुप है ख़ामोश है,
कुछ खास नही कहती,
हाँ सच ये भी नही की,
मैं हर वक़्त सच लिखता हूँ,
पर तु मेरे अच्छे बुरे हर वक़्त में शामिल है,
किसे खबर है मैं क्यों और क्या लिखता हूँ,
कभी तुझे आसमाँ की परी बताता हूँ,
कभी खुदा तो कभी पत्थर,
पर एक बात है जो तू गौर नही करती,
के हर लफ्ज़ में मैं तुझे अपना लिखता हूँ,
तेरी मुहोब्बत का फ़क़ीर हूँ,
लकीरों का मोहताज़ नही,
हाँ, सच है अपनी तहरीर से ,
खुद अपनी तकदीर लिखता हूँ,
लगाम लफ़्ज़ों पर कैसे लगाऊँ,
जज़्बात है मेरे दिल के ,
माना चुभती है तुझे बाते मेरी,
पर ज़रा सोच क्यों अपने दिल को दुखा,
मैं ये ख़्यालात लिखता हूँ,
तू मुहोब्बत है मेरी,
गिला, शिकवा, शिकायत, मुहोब्बत, चाहत,
सब तुझसे ही होंगी,
कैसे कहुँ तेरे बिन ये कहानी अभी बाकी है,
माना लिखता है "चौहान" हाल-ए-दिल,
सच है पर अच्छा है थोड़ी नादानी अभी बाकी है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 20 November 2019

"तेरे पास" ( TERE PAAS)


पूछता हूँ रोज़ सवाल एक इस दिल से,
टूट कर भी छूटती आस क्यों नही,
क्यों बार बार टूट रहा है तू इस कदर,
क्यों दिल के सहरा को दरिया की प्यास नही,
क्यों नाउम्मीद नही होता जब की,
ये तू भी जानता है उसके आने की कोई आस नही,
क्यों इन ज़ख़्मो को नासूर बनाने पर तुला है,
तू खुद मरहम है इनका मरहम किसी के पास नही,
जानता है इस रास्ते का मुक़ाम मौत है,
वो हमसफर बनकर तेरे साथ नही,
तू जज़्बात बता रहा था ,
उसे कहानियां लग रही थी,
ऐसे पत्थरों को क्या पूजना,
जिसे तेरे दर्द का एहसास नही,
तूने लिख लिख किताबें काली कर दी,
लाश ही तो है तेरे अल्फ़ाज़,
हिलाकर देख इनमें अब बाकी साँस नही,
इंतज़ार की भी हद होती है "चौहान",
अलग नही हो पाती मिट्टी में मिली राख कही ,
हक़ीक़त तू भी जानता है तेरा दिल भी,
गर है जवाब तो फिर बता मुझे,
वो तेरा है तो फिर तेरे पास क्यों नही??
तेरे पास क्यों नहीं??


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 18 November 2019

"वजह" (WAJAH)



कहाँ औक़ात थी कुछ लिखने की,
कुछ अपनो ने ,कुछ गैरों ने,
कुछ जमाने ने अपना रंग दिखा दिया।।

कोई होता तो शिकायत भी कर लेते,
कोई था नही तो ग़मो को सीने से लगा लिया।।

रौनकें लग जाती थी वहाँ जहाँ होता था मैं,
कुछ वजह थी जो खुद को श्मशान बना लिया।।

एक अँधेरी रात के सिवा अब बाकी भी क्या था,
तन्हाई ही तन्हाई थी चाँद तारों को दोस्त बना लिया।।

कभी किसी को आज़मा कर नही देखा,
मुझे देखो सारे ज़माने ने आज़मा लिया।।

बात इबादत की ही तो थी मुहोब्बत में ,
मैंने तो पत्थरों पर भी सिर झुका लिया।।

ज़िंदगी के इस जुए के खेल में जब सब हार गया,
आखिर में दाव मैंने खुद को ही लगा दिया।।

कोई समझना चाहता तो समझता भी आखिर,
क्यों किसी एक के लिए राकिब जमाना बना लिया।।

तेरी बंदानवाज़ी से भी खुश हूँ मौला,
तेरा दिया मैंने हँसकर माथे से लगा लिया।।

कुछ हालातों ने कुछ जज़्बातों ने जँझोड़ दिया,
यही वजह है "चौहान" ने कलम को सीने से लगा लिया।।

बड़ी नुमाइशें लगती है यहाँ मुहोब्बत में जज़्बातों की,
देखा ना गया तो खुद को जिंदा दफना लिया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 15 November 2019

"मैं ऐसा था नही" ( MAIN AISA THA NHI)


पत्ते सूखे नही थे ,टहनी ,जड़े भी मज़बूत थी,
मैं गिरा नही मुझे वक़्त से पहले काटा गया है।।

कोई तराजू तोल नही था मेरे लिए रिश्तों का,
मुझे रिश्तों का वास्ता दे रिश्तों में बाँटा गया है।।

ऐसा नही है के बस काँटे ही रहे हो दामन में मेरे,
साज़िश थी फूलों को छोड़ काटों को छाँटा गया है।।

अब कहाँ किससे फरियाद करूँ बेगुनाही की अपनी,
मुझे हर चौंखट से फटकारा , दुत्कारा, डाँटा गया है।।

दिखा कर रौशनी मुझे पल भर को बेहिसाब "चौहान",
अंधेरे के इस काले जाल में मेरी रूह को आँटा गया है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 14 November 2019

"हैरत" ( HAIRAT)


इन रास्तों पर इतना आगे आकर भी,
मंज़िल ना मिली तो ,हैरत होगी।।

खुद को तुझमे मिलकर भी तुझे,
कुछ समझाना पड़ा, तो हैरत होगी।।

रिश्ता ये अब तलक विश्वास पर कायम है,
अब ये भी तुझे विश्वास दिलाना पड़ा , तो हैरत होगी।।

एक राह तो बता जहाँ तुझे अकेला छोड़ गया,
रूह को अपना वजूद बताना पड़ा, तो हैरत होगी।।

जब मेरे हर हाल से वाकिफ़ हो तुम,
वहाँ मुझे अपना हाल बताना पडा तो हैरत होगी।।

वो वक़्त और थे की जज़्बात बोलकर बताते थे,
अब बातें भी समझ ना आई तो हैरत होगी।।

चल माना मैंने इबादत मेरी बेगैरत ही सही,
तुझे इबादत भी नज़र ना आई तो "चौहान" हैरत होगी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Tuesday, 12 November 2019

"तेरी मेरी कहानी" (TERI MERI KAHANI)


तेरी मेरी कहानी,
क्या यूँ ही रह जायेगी,
आधी, अधूरी ,अनकही ,अनसुनी,
क्या यूँ ही रह जायेगी,
तेरी मेरी कहानी।।

वो ख़्वाब जो मिलकर देखे थे,
सच्चे थे सब झूठे तो नही थे,
क्या माला उन ख्वाबों की,
युहीं टूट के बिखर जाएगी
तेरी मेरी कहानी ,
क्या यूँ ही रह जायेगी।।

हम धरती और आसमाँ तो नही,
जिनका कभी होता मिलन ही नही,
क्या रेल की पटरियों की तरह ,
ज़िंदगी युहीं फ़ासलों में बीत जाएगी,
तेरी मेरी कहानी ,
क्या यूँ ही रह जायेगी।।

माना लिख देता हूँ जज़्बात हज़ार,
तकदीर लिखुँ अपनी मैं खुदा तो नही,
क्या हर कहानियों की तरह "चौहान",
ये कहानी भी किताबों में दफन हो जाएगी,
तेरी मेरी कहानी ,
क्या यूँ ही रह जायेगी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 11 November 2019

"EK PAL" (एक पल)


दे उम्र भर का अंधेरा बस एक पल को सवेरा कर दे,
दे ज़िंदगी दो लम्हात की उन लम्हो में तुझे मेरा कर दे।।

नही ख्वाइशें मेरी तेरे आसमाँ के रोशन चाँद सितारों की ,
जुगनुओं से ही मेरे दिल-ए-शहर का दूर अँधेरा कर दे।।

नही ख्वाइशें मुझे खुदा तेरे किसी बड़े तख़्तो-ताज की,
कर सकता है तो उसके दिल-ए-मकाँ में मेरा बसेरा कर दे।।

फिर चाहे तन्हाइयों से वास्ते रख मेरे उम्र भर के लिए,
बस एक बार उसकी महफ़िलों में नाम मेरा कर दे।।

सुना है अधूरे नही रहते वो किस्से जिन्हें तू लिखता है,
मेरी भी मुहोब्बत का किस्सा कलम से तेरी पूरा कर दे।।

मैं नही कहता तू वजूद रख "चौहान" का आफताब की तरह,
उसको रौशनाता रहूँ खुद को जला अंधेरे में मुझको दीया ही करदे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 9 November 2019

"बाकी है" (BAAKI HAI)


एक पल को ठहर जा,
अभी कुछ बात बाकी है।।

नज़र भर देख तो लूँ तुझे,
अभी ये मुलाकात बाकी है।।

ये रात गुज़र जाने दे ज़रा,
अभी मेरे कुछ ख़्वाब बाकी है।।

ज़िंदगी वही है जो तेरे संग है,
अभी जीने कुछ लम्हात बाकी है।।

पत्ते टूटे है तो कल नए भी आएंगे,
अभी दरख्तों पर शाख बाकी है।।

अभी दरिया ही तो बना हूँ कतरे कतरे से,
सागर में मिलने की अभी मेरी प्यास बाकी है।।

किसी बहाने से तू नज़र आता रहे,
बस ऐसे पलों की आस बाकी है।।

रोती रही मेरी कलम रात भर "चौहान" ,
अभी लिखना कुछ हिसाब बाकी है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 6 November 2019

"एक क़िस्सा" (EK KISSA)


तेरी कहानी में मेरे नाम एक किस्सा आया,
खुशी थी के तेरे ग़मो में मेरा हिस्सा आया।।

तू नही जानता तू क्या था मेरे लिए,
यही बता दे मुझे खो के तूने क्या पाया।।

तेरे हर एक सवालो के जवाब थे मेरे पास मगर,
कोई अपना होता तो समझ जाता मैं क्यों ना दे पाया।।

बड़ा खुदा बना कर पूजता रहा मैं तुझे,
आँख खुली तो आज सामने पत्थर नज़र आया।।

सब दरख़्त काट पर फेंक दिए उसने,
आज धूप लगी तो पेड़ो की तलाश में नज़र आया।।

मैं क्यों कहुँ के अपने फैसले पर एक नज़र सोच ज़रा,
मैं गलत था जो तेरे पास पलभर को लौट आया।।

ये तो हर सच्ची मुहोब्बत का अंजाम है "चौहान"यहाँ पर,
जो कल फ़साना आज हकीकत कल कागज़ों पर उतर आया।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ ।।

Monday, 4 November 2019

"लिखना छोड़ दे" (LIKHNA CHORD DE)


तू "चौहान" अब लिखना छोड़ दे,
ख्वाइशों को ,अरमानो को,
जज़बातों को , हालतों को,
लफ़्ज़ों की डोर में पिरोना छोड़ दे,
बहुत लिखे है फ़साने दिल के,
अब दिल की बातों को बताना छोड़ दे,
क्या फर्क पड़ता है तेरे दमन में दाग है या नही,
जमाने का दामन अपना दिखाना छोड़ दे,
कही सुनी बातों पर यूँ गौर ना किया कर,
लोगों की बातों में अब तू आना छोड़ दे,
तू किन से आस लगाए बैठा है मरहम की,
ज़ख़्मो पर नमक लगते है यहाँ लोग ,
दूसरों को हाल अपना बताना छोड़ दे,
महज़ एक ज़रूरत ही तो बनकर रह गया है,
अब मतलबी लोगों के काम आना छोड़ दे,
वो कहाँ तेरा अपना था जो छोड़ कर चला गया,
तू भी बेगानों से अपना पेश आना छोड़ दे,
मरने के बाद "चौहान" कहाँ कोई अपना है,
तू भी तेरे ख़्वाबों की कब्र पर आना जाना छोड़ दे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 2 November 2019

"फैसला" (FAISLA)


बड़ी गहराइयों से जानता हूँ तुझे,
तू यूँ छोड़ जाने वाला तो नही था।।

बड़े गलत फैसले थे जिसके भी थे,
यकिनन ये फैसला तेरा तो नही था।।

किन मजबूरियों में घिरा जो दूर हुआ,
इतना हौसला यार तुझमे तो नही था।।

तेरे मेरे दरमियाँ कहाँ कोई दीवार थी,
सब तो मालूम था हमे छुपा कुछ नही था।।

बिन बताए चला गया तू बेगानों की तरहा,
देख इतना बड़ा रुतबा तो तेरा नही था।।

ना जाने कैसे राह में थक कर बैठ गया तु,
मंज़िल से पहले तो तू रुकने वाला नही था।।

बस एक यही रास्ता रह गया तुझसे बात करने का,
वरना "चौहान" कभी तुझे लिखने वाला तो नही था।।

कोई जड़े ही काट कर ले गया मेरी वरना,
सबको पता था ये दरख़्त गिरने वाला तो नही था।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 1 November 2019

"प्यार के रंग" (PYAR KE RANG)


मैं इसे कहुँ तो फिर क्या कहूँ,
मुझे तो ये मुहोब्बत नज़र आती है।।

पर ये भी तो सच है जमाने मे ,
मुहोब्बत तो दोनों तरफ से की जाती है।।

जिसमे फिक्र होती है एक दूजे के हाल की,
मिलने की हर पल बेकरारियाँ तड़पाती है।।

फिर ये कैसी मुहोब्बत है मेरी मेरे खुदा,
उसे मेरी कभी याद तक ना आती है।।

अपना सब कुछ तो लुटा बैठा हूँ उसके लिए,
क्यों उसे मेरी ये मुहोब्बत नज़र ना आती है।।

बड़े रंग देखे है दुनिया मे मुहोब्बत के मैंने,
कोई मिलता है तो कोई मिल के बिछड़ जाता है।।

इसमें ना कोई आस है ना कोई खोने का डर,
बड़ी सच्ची है ये एक तरफा मुहोब्बत कही जाती है।।

ठीक उस फकीर के जैसा हाल है मेरा इश्क़ में,
दिन राते दिदार के लिए इबादत में निकल जाती है।।

मैं भूल भी जाऊँ उसको "चौहान" तो गम नही,
ये कलम है मेरी जो हर लफ्ज़ में उसको लिख जाती है।।

माना इन रास्तों की कोई मंज़िल नही मगर,
हक़ीकत है के सच्चे इश्क़ में उम्मीद नही की जाती है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...