Friday, 28 August 2020

"मैं और मेरे कुछ दोस्त" (MAIN AUR MERE KUCH DOST)

 










मैं और मेरे कुछ दोस्त अब बस बातें किया करते है,
साथ कुछ पल पहले की तरह बिताने की,
कहीं दूर सब एक साथ घूम के आने की ,
फुर्सत से मिलकर वक़्त साथ बिताने की,
मैं और मेरे कुछ दोस्त अब बस बाते किया करते है।।

वो बीते पुराने बचपन के दिन,
वो फुर्सत के लम्हे, वो मस्ती भरे दिन,
अब हम केवल तन्हा बैठकर यादों में जिया करते है,
मैं और मेरे कुछ दोस्त अब बस बातें किया करते है।।

हर कोई अब मशरूफ़ अपने कामों में है,
कुछ परेशानियों में तो कुछ नये इंतज़ामों में है,
पर सब बेख़र है एक बात से ,
आज सब एक दूसरे के इल्ज़ामों में है,
सब एक दूसरे कि अब बस राहे तका करते है,
मैं और मेरे कुछ दोस्त, अब बस बातें किया करते है।।

यूँ जज़्बातों से कागज़ कुरेद कर क्या होगा"चौहान",
ये जज़्बाती अल्फ़ाज़ भी तो तन्हाई में पढ़ा करते है,
मैं और मेरे दोस्त अब सिर्फ बातें किया करते है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 25 August 2020

"लौट के ना आया " (LAUT KE NA AAYA)

 

कैसी है वो तेरी नई दुनिया,
नया शहर, नया घर,
ऐसा क्या रास आ गया वहाँ,
जो तू अब तलक लौट के ना आया...
जानता है परिंदे उड़ते है दिनभर आसमाँ में,
पर रात होते ही अपने आह्लने मे लौट आते है,
चल माना तू परिंद जात ही सही,
पर इतना तो बता वो आहलना कहाँ बना आया...
रुक तो मौसम भी बदलते है कई दफा,
पर ऐसा कौन सा मौसम है जो लौट कर ना आया,
कोई नाराज़गी है तो रख बेशक,
पर ऐसा कौन है बता जो बिन बात,
नया बसेरा बना आया...
आजा हाल यहाँ का बताता हूँ,
कौन कैसा है तेरे बिन सब दिखता हूँ,
कोई तुझे याद कर रो लेता है,
कोई तुझे याद कर खामोशी से सह लेता है,
कुछ ने भुला दिया तुझे मर्ज़ी खुदा की समझ,
कोई तेरी तस्वीरों से बात कर मन बहला लेता है,
हाँ संभाल तो लेगा हर कोई तेरे बिन भी,
पर इतना आसान कहाँ है,
जो हर राज़ बोलकर बता देता था,
आज वो "चौहान" भी कहाँ है,
इतना पत्थरदिल तो नही था तु,
क्या किसी के हाल पर तरस ना आया,
ऐसा क्या रास आ गया वहाँ,
जो तू अब तलक लौट के ना आया...

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 20 August 2020

"वाकिफ़" (WAQIF)

 


अभी मेरे हाल से ,
वाकिफ़ नही हो तुम,
इन मुस्कानों के जाल से,
नज़र के सवाल से ,
वाकिफ़ नही हो तुम..

जो दिख गया वो बिक गया,
जो छिप वो रह गया,
चिंगारी खुशियों की बुझ गयी,
जली ग़मो की मिशाल से,
वाकिफ़ नही हो तुम...

कोई सुनता तो कह सुनाता,
पास बैठाता सीने से लगाता,
इस महफ़िल की तन्हाई से,
उस रुसवाई के मलाल से,
वाकिफ़ नही हो तुम..

लिखना बहुत कुछ बाकी है,
अभी इतना ही काफी है,
"चौहान" दर्द के अल्फ़ाज़ से,
खामोशी की आवाज़ से,
इस कलम में कमाल से,
वाकिफ़ नही हो तुम..

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 7 August 2020

"काश कहीं" (KAASH KAHIN)

 

काश कहीं ऐसा होता,
सब कुछ नही मगर,
कुछ तो मेरे हाथों में होता,
बदल देता मैं भी आखिर,
कुछ पन्ने वक़्त की किताब के,
कुछ संजो के रखता,
कुछ जला के राख कर देता,
कुछ खुशियाँ डाल देता झोली में तेरी,
कुछ गम तेरे अपने नाम कर लेता,
काश कहीं ऐसा होता,
काश के समझ पाता,
खेल तकदीरों का,
नसीबों का हाथों की लकीरों का,
अपने हिस्से के कुछ लम्हे निकाल लेता,
और चुपके से कहीं तेरे दामन में डाल देता,
क्या कुछ तो नही था मेरे ख़ातिर तू,
उठता कलम फिर "चौहान",
ये हसीन सुबह तेरे,
और ये काली अंधेरी रात,
नाम खुद के लिख लेता,
काश कहीं ऐसा होता।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 2 August 2020

"राखी" (RAAKHI)



भाई के हाथों की शान है राखी,
बहनो का गुरुर और मान है राखी,
हर दिल का अरमान है राखी,
एक रिश्ते की पहचान है राखी,
प्रेम और रक्षा का प्रमाण है राखी,
हर कलाई पर चमकता प्यार है राखी,
भाई बहन के प्यार का त्योहार है राखी,
हर चहरे पर खुशियों की पहचान है राखी,
हाथों पर बंधा हुआ विश्वास है राखी,
बहनों की भाई से एक आस है राखी,
कच्चे धागे से बँधी उम्मीद है राखी,
सदियों से चलती आई एक रीत है राखी,
क्या कहे "चौहान" की क्या है राखी,
हर एक नज़र में उठता सम्मान है राखी,
हर भाई के हाथों पर पहचान है राखी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...