Tuesday, 28 August 2018

"तुम मत बदलना" (TUM MAT BADALNA)


हवाएँ रुख बदलेंगी तुम मत बदलना,
रहगुज़र ज़िन्दगी की है ज़रा संभालना।।

याद रहना तुम सावन की बारिश की तरहा,
बेमौसम बारिश की तरह तुम मत बरसना।।

माना उम्मीदें हज़ार है आज तुझे इश्क़ में उनसे,
इश्क़ करना बेपनाह पर हद से मत गुज़रना।।

बहुत मसक्कत से पहुचे हो इन ऊंचाइयों पर,
झरने की  तरहां यूँ पल भर में मत बिखरना।।

राख बना खुद को मिटा डाला जिसने तेरी खातिर,
क्या था तेरा "चौहान" में फिर तुम खुद ही परखना।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।





Saturday, 25 August 2018

"मेरी बहन - मेरी जान" (MERI BEHAN -MERI JAAN)


मेरे आँगन की तुलसी है तू तो मेरे घर की लक्ष्मी है,
हर भाई के हाथों पर तो तू राखी की पहचान है।।

चुलबुली सी है नटखट भी है वो हम मेरी शान है,
माना कभी कह नही पता पर मेरी बहन मेरी जान है।।

सताता हूँ तो मनाता भी हूँ, रुलाता हूँ तो हँसता भी हूँ,
छोटी है और प्यारी है हाँ मेरा वो मेरा अभिमान है।।

पापा की फटकार से बचाती है कभी छोटी बात से चिढ़ जाती है,
ज़िद्दी तो है वो अपनी चीजों को लेकर पर वो मेरा एकलौता जहान है।।

यूँ तो चिल्लाना उसे सुनाई नही देता कभी मेरा ,पर खामोशी पढ़ जाती है,
दोस्त बन साथ निभाती है कभी वो, मेरा वो गुमान है।।

कभी गलती कर मेरी पीठ पीछे छुप जाती है, कभी अपनी गलती मेरे सिर कर जाती है,
दिखने में तो प्यारी सी है वो ,पर सच कहूं तो बड़ी शैतान है।।

अपनी खुशियों का शहर मुझमे देखती है, हक भी जताती है कभी डर से ना कहती है,
तेरी खुशियों की खातिर तो "चौहान" की जान भी कुर्बान है।।

हर वक़्त तेरे संग खड़ा हूँ मैं,मेरे सिर का तू ताज़  है,
माना कभी कह नही पता पर मेरी बहन मेरी जान है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 21 August 2018

"कोई तो है" (KOI TO HAI)


डगमगा तो आज भी रहे होंगे कदम उनके,
कोई तो है जो थाम कर हाथ उनका चल रहा है।।

जज़बातों से अपने अब भी हो रही होगी बहस,
कोई तो है जो अब ख्वाइशों पर हावी हो रहा है ।।

ये चाँद अब अकेला नज़र ना आता होगा रात को,
कोई तो है जिसकी बाहों वो हमें भूल कर सो रहा है।।

अब उस पर  ज़ख्मों का भी असर ना रहा होगा,
कोई तो है  जो उसके लिए मरहम सा हो रहा है।।

आज दूरियां युहीं तो नही बढ़ रही "चौहान",
कोई तो है जो तेरी कमी पूरी कर रहा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 18 August 2018

"ख़त"(KHAT)


कभी हिम्मत ना हुई भेजने की तुम्हें,
ख़त तो रोज़ लिखे थे मैंने तेरे लिए।।

देख ही लेते एक दफा आंखें खोलकर ज़रा,
चोंखट पर थी खुशियां कबसे सवेरे लिए।।

चाँद तारे तो ना ला सके कभी हम इश्क़ में,
रात जुगनुओं से आशियाँ सजाया था तेरे लिए।।

क्या हुआ तुम दिन बन गए और मैं काली अंधेरी रात,
कोशिश तो बहुत की मैंने शाम सा वस्ल होने के लिए।।

मुहोब्बत की आग लगा तुम तो कर गए किनारा हमसे,
एक अरसे जलाया है खुद को राख बनाने के लिए।।

तुझ पत्थर को ना पिंघला पाया कभी "चौहान",
शिद्दत देख तो खुदा खुद ज़मी पर आ गया मुझे लेने के लिए।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।



Tuesday, 14 August 2018

"आज का हिंदुस्तान" (AAJ KA HINDUSTAN)



जितना हिंदुओं ने सींचा है अपने रक्त से ,
उतना खून यहाँ मुस्लिम सिख ईसाइयों ने बहाया है ,
सच कहा है किसी के बाप का नही हिंदुस्तान,
इसे इंसानियत की एकता ने बनाया है।।

माता कहकर पूजा भी है इसकी धरती को हमनें,
ध्वज के आगे शीश हम सबने अपना झुकाया है,
जो मिट जाते है इस देश की आन बान शान पर ,
कभी उनसे पूछो उन्हें शहीदी का धर्म क्या बताया है ।।

सियासत के बाटों में पीस रहे है आज दो धर्म यहाँ,
क्या फर्क पड़ता है राम मंदिर बने या बाबरी मस्जिद,
जहां इंसानियत है वहां तो देखा है मैने की आज तक,
क्रिसमस का जश्न भी दीवाली, ईद जितना मनाया है।।

मार दिया है हमने खुद को इस बनावटी दुनिया पीछे,
एक हरिश्चंद्र अपना सब कुछ दान करके भी चुप था,
एक आज का दौर है के है ये दिखावे का भारत,
किसी को खाना खिलाया तो वो भी बढ़-चढ़ के दिखाया है।।

अरे यूँ तो कोई फर्क नही पड़ता किसी को कोई जिए कोई मरे,
अपने अधिकारों के लिए भी इंतज़ार है कोई और आके लड़े,
लूट जाती है इज़्ज़त कहीं छुपकर तो कहीं शरेआम,
मोमबत्ती जला दो दिन कहते है हमने भी लड़ के दिखाया है।।

नानक, पीर, साईं,राम, सबका यहां  बसेरा था,
नदियाँ भी माता थी ,सोने की चिड़ियाँ देश मेरा था,
हैवानियत की क्या बात कहूँ हाल देख का ,
बताने से तो आज अखबार भी कतराया है।।

कैसे ना करुँ ज़िक्र तेरा अपनी बेज़ुबान कलम से मैं,
ख़ामोश फांसी के तख्ते पर कोहराम तेरी शहादत ने मचाया है,
वो हिन्दुस्तान कोई और था भगत सिंह, ध्वज जिसपर
आजादी का तेरी शहादत ने लहराया है।।

छोड़ "चौहान" बातें सच्ची है कहीं कड़वी ना लग जाये,
सियासती अंधे है लोग यहां कहीं तुझसे ना लड़ जाए,
सोच की गुलामी में कैद है ये जिस्म से आज़ाद लोग,
सोचते है 15-अगस्त-1947 को देश में इन्कलाब आया है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 12 August 2018

"राज़ कोई" (RAAZ KOI)


गर बयाँ कर दिया हाल-ए-दिल कलम से तूने अपनी,
तो क्या है जो इन आंखों में छुपा रखा है।।

क्या ऐसा है जो लिपट गया है तुझे चंदन समझ कर,
किस खुशबू को तूने अपनी साँसों में बसा रखा है।।

कैसी ये तेरी खामोशी है के ख़ामोश होके भी ख़ामोश नही होती,
कौन है वो अब तलक जिसे नज़रों से ज़माने की बचा के रखा है।।

कैसी रहगुज़र है फिर यहाँ 'गर वीरान है वो तेरे दिल शहर,
कौन है वो जिसने तेरे दिल के आशियाने में कोहराम मचा रखा है।।

'गर आसमान का होता तो फिर नज़र आता यहां सबको,
कोई तस्वीर है चाँद की ये जिसको तुमने दीवारों पर लगा रखा है।।

ना होता दर्द कोई तो फिर कब का छोड़ देता लिखना "चौहान",
कोई तो है जिसके खातिर खुद को तूने मिटी में मिला रखा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 8 August 2018

"माँ नही होती" (MAA NHI HOTI)


अब लोरी नही गाता कोई ये आंखें रात भर नही सोती,
कैसी होती है ज़िन्दगी उनकी जिनकी माँ नही होती।।

सुनी है चोंखट मेरे घर की ,मेरे आने की अब किसी को फिक्र नही होती,
खुले दरवाज़े आज बंद मिलते है,राह देखती दरवाज़े पर अब माँ नही होती।।

हाल भी अब मेरा कोई नही पूछता, माथे का पसीना दुप्पटे से कोई नही पोंछता,
कोई नही रखता हाथ मेरे सिर पर, किसी को मेरी परेशानियों की भनक नही होती।।

पापा की डाँट से भी कोई नही बचता,चुपके से मेरे हाथ मे पैसे कोई नही दबाता,
नींद से तो माना पहले भी अनबन थी ,पर अब सिर रखने को कोई गोद नही होती।।

अब कोई नही पूछता मुझसे सपने मेरे, अब बेमतलब के मेरे लिए दुआए नही होती,
कोई नही रखता रोज़े उपवास मेरे ख़ातिर, मेरे दर्द में अब कोई आंखें नही रोती।।

सोच कर ही डर लगता है "चौहान",जिनके सिर पर ममता की चादर नही होती,
मेरी माँ को पास मेरे रहने दे ताह उम्र खुदा, हर किसी की चाहत दौलत शोहरत नही होती।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।




Monday, 6 August 2018

"मेरी कहानी-मेरा सच" (MERI KAHANI - MERA SACH)


हाँ यूँ तो बहुत दूर आया हूँ मैं,
कुछ रिश्ते करके चकनाचूर आया हूँ मैं ,
ख़्वाबों की चमक ने अंधा कर दिया मुझे,
खुद से थोड़ा होके मग़रूर आया हुँ मैं,
कही किसी का आँचल छोड़ आया ,
कही वो बचपन का आंगन छोड़ आया,
कहीं छोड़ आया फिक्र किसी की आंखों में
कहीं दिल किसी का तोड़ आया हूँ मैं,
हाँ यूँ तो बहुत दूर से आया हूँ मैं....

यूँ तो पहले छोटी छोटी बात पर भी अड़ा हूँ मैं,
क्या कहूँ ख़्वाबों की चाहत में नींद से भी लड़ा हूँ मैं,
समझौता करना तो किसी ने सिखाया ही नही,
घर आने की ख़्वाईश में घर से हो दूर चला हूँ मैं,
हाँ उम्र से पहले हालातों ने बड़ा कर दिया,
गिरने के डर ने आज इन ऊँचाई पर खड़ा कर दिया,
किसी का कर्ज कभी उतार ही नही पाया मैं,
किसी का बन के आज गुरुर आया हूँ मैं,
हाँ यूँ तो बहुत दूर आया हूँ मैं....

रिश्ते बनाये ही नही यहां रिश्ते संभाले भी है मैंने,
दिल को दिलासा दे कुछ वहम भी पाले है मैंने,
ज़िक्र नही करता ज़ुबाँ और कलम से कभी उनका,
जो सोचते है उनसे मतलब अपने निकाले है मैंने,
सलीका जीने का नही बदला अब तलक मैंने,
ज़ख़्मो को अपने बना के नासूर आया हुँ मैं,
दीये बुझ गए है पर टूटे नही मेरे जुनून के,
इन दियों में भरने "चौहान" नूर आया हूँ मैं,
हाँ यूँ तो बहुत दूर आया हूँ मैं ...

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 1 August 2018

"ख़्वाब मेरी माँ के" (KHAWAB MERI MAA KE)


जो आंखें रात भर फिक्र में मेरी सोई नही ,
उनमे सुकून की नींदे भर देना ,
ज़्यादा कुछ नही मांगता तुझसे मेरे खुदा,
छोटे-छोटे ख़्वाब हैं मेरी माँ के वो पूरे कर देना।।

जिन हाथों ने पाला है दर्द मेरा हर एक संभाला है,
आज सारे दुख दर्द उसके मुझे दे,
दामन में उसके खुशियां भर देना,
ज़्यादा कुछ नही मांगता तुझसे मेरे खुदा,
छोटे- छोटे ख़्वाब हैं मेरी माँ के वो पूरे कर देना।।

अपने आँचल में जिसने मुझे सुलाया है , भूख मारकर खुद की अपना निवाला मुझे खिलाया है,
उसकी राहों में बारिश फूलों की कर देना,
ज़्यादा कुछ नही मांगता तुझसे मेरे खुदा,
छोटे- छोटे ख़्वाब हैं मेरी माँ के वो पूरे कर देना।।

जिसने आदमी से मुझे इंसान बनाया है , जीने का जिसने सलीका सिखाया है,
उसका सिर ना झुके कभी कुछ ऐसा कर देना,
ज़्यादा कुछ नही मांगता तुझसे मेरे खुदा,
छोटे- छोटे ख़्वाब हैं मेरी माँ के वो पूरे कर देना।।

जो ममता का सार है , हर दर्द में निकलती पुकार है,
स्वरूप भगवान का जो "चौहान" के लिए,
मेरा जीवन अर्पण उसके चरणों मे कर देना,
ज़्यादा कुछ नही मांगता तुझसे मेरे खुदा,
छोटे- छोटे ख़्वाब हैं मेरी माँ के वो पूरे कर देना।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।





"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...