जितना हिंदुओं ने सींचा है अपने रक्त से ,
उतना खून यहाँ मुस्लिम सिख ईसाइयों ने बहाया है ,
सच कहा है किसी के बाप का नही हिंदुस्तान,
इसे इंसानियत की एकता ने बनाया है।।
माता कहकर पूजा भी है इसकी धरती को हमनें,
ध्वज के आगे शीश हम सबने अपना झुकाया है,
जो मिट जाते है इस देश की आन बान शान पर ,
कभी उनसे पूछो उन्हें शहीदी का धर्म क्या बताया है ।।
सियासत के बाटों में पीस रहे है आज दो धर्म यहाँ,
क्या फर्क पड़ता है राम मंदिर बने या बाबरी मस्जिद,
जहां इंसानियत है वहां तो देखा है मैने की आज तक,
क्रिसमस का जश्न भी दीवाली, ईद जितना मनाया है।।
मार दिया है हमने खुद को इस बनावटी दुनिया पीछे,
एक हरिश्चंद्र अपना सब कुछ दान करके भी चुप था,
एक आज का दौर है के है ये दिखावे का भारत,
किसी को खाना खिलाया तो वो भी बढ़-चढ़ के दिखाया है।।
अरे यूँ तो कोई फर्क नही पड़ता किसी को कोई जिए कोई मरे,
अपने अधिकारों के लिए भी इंतज़ार है कोई और आके लड़े,
लूट जाती है इज़्ज़त कहीं छुपकर तो कहीं शरेआम,
मोमबत्ती जला दो दिन कहते है हमने भी लड़ के दिखाया है।।
नानक, पीर, साईं,राम, सबका यहां बसेरा था,
नदियाँ भी माता थी ,सोने की चिड़ियाँ देश मेरा था,
हैवानियत की क्या बात कहूँ हाल देख का ,
बताने से तो आज अखबार भी कतराया है।।
कैसे ना करुँ ज़िक्र तेरा अपनी बेज़ुबान कलम से मैं,
ख़ामोश फांसी के तख्ते पर कोहराम तेरी शहादत ने मचाया है,
वो हिन्दुस्तान कोई और था भगत सिंह, ध्वज जिसपर
आजादी का तेरी शहादत ने लहराया है।।
छोड़ "चौहान" बातें सच्ची है कहीं कड़वी ना लग जाये,
सियासती अंधे है लोग यहां कहीं तुझसे ना लड़ जाए,
सोच की गुलामी में कैद है ये जिस्म से आज़ाद लोग,
सोचते है 15-अगस्त-1947 को देश में इन्कलाब आया है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।