Monday, 19 June 2017

"क़रार कहाँ" (KARAR KAHAN)

जब सामने ना हो तुम,
तो आँखो में करार कहाँ।।

जब ज़िक्र ना हो तेरा,
तो बातों में करार कहाँ।।

जब ख़्वाबो में ना हो तुम,
तो नींद में करार कहाँ।।

जब जज़बातों में नाहो तुम,
तो इश्क़ में करार कहाँ।।

जब मरहम ही ना बनो तूम,
तो ज़ख़्मो में करार कहाँ।।

जब "चौहान" तेरे अल्फ़ाज़ ही नही मेरे नाम,
तो फिर "मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ" कहाँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

No comments:

Post a Comment

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...