Thursday, 30 April 2020

"अपने या बेगाने" (APNE YA BEGANE)


ये जो तुझे कहते है "मैं तुझे मेरे अपनो से ज़्यादा अपना मानता हूँ",
इनकी बातों में मत आ मैं ऐसे लोगो को बख़ूबी पहचानता हूँ।।

हाँ तेरे बूरे वक़्त में ये तेरे पास तेरा हमदर्द बनकर आ जाते है,
कभी देखना रिश्तों को किनारे करके ऐसे हालात तेरे ये खुद बनाते है।।

तेरे पास रहकर ये चाहे तेरी ही ज़ुबाँ में बातें किया करते है,
इतने शरीफ़ भी नही जैसा ये शराफ़त का चौला पहन कर आते है।।

गलत कहते है कि बातें बता दिया करो दिल का बोझ हल्का हो जाएगा,
ये बात बात पर ज़ख्म कुरेदते है तेरे जो तुझे मरहम नज़र आते है।।

जानता हूँ तुझे बुरा लगता है मेरा यूँ बार बार तुम्हे रोकना टोकना,
क्या सही करते है जो ये तुझे फूल तो दिखाते है काटों का नही बताते है।।

एक रोज़ जब सब भूल कर "चौहान" से अलग हो जाओगे तुम ,
बताना कब्र पर मेरी आकर ,क्या ये हकीकत में तुझे आईना दिखाते है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 28 April 2020

"इल्ज़ाम" (ILZAAM)


जज़्बात कहाँ लिख पाता हूँ मैं,
दिल की बात कहाँ लिख पाता हूँ मैं,
मैं तो खुद जुंझ रहा हूँ ज़िंदगी मौत के बीच,
सच कहाँ तुमने हालात कहाँ लिख पाता हूँ मैं,
जैसी मुहोब्बत थी है हाँ वैसी तो नही दिखता,
क्या सच क्या झूठ मालूम नही मुझे,
बस ये जानता हूँ गुनहगार हूँ मैं,
पर तुझपे कोई इल्ज़ामात नही लगाता,
फर्क नही पड़ता अब फर्क पड़ता है या नही,
मैं तो आज भी तुझे खुद से अलग नही बताता,
मिलना ना मिलना तो मर्ज़ी है खुदा की,
मुहोब्बत की लाश कंधों पे उठाये फिरता हूँ,
थोड़ा मगरूर हूँ तभी कहीं नही दफ़नाता,
मेरी जगह खुद को लाकर देख,
जीते जी ज़िंदगी को मौत बनाकर देख,
चहरे पर नकाब है हँसी का,
"चौहान" अपने हालात नही दिखता,
माना तेरा कहना ठीक है मैं सच नही लिखता,
ये भी सच है तू मुहोब्बत है मेरी,
मैं तुझपर कोई इल्ज़ामात नही लगाता,
तेरी भी मजबूरियां समझता हूँ मैं,
तभी आजकल इश्क़ नही लिखता लिखाता,
अब आबाद हूँ बर्बाद खुदा जाने,
तेरे लिए रोज़ पल पल मरता हूँ,
एक तेरी ख़ातिर नाम कभी तेरा ज़ुबाँ पर नही लाता।।
सच बस इतना है,
मुहोब्बत में तुझपर "चौहान" कोई,
इल्ज़ाम नहीं लगता।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 26 April 2020

"किरदार" (KIRDAAR)


इश्क़-ए-अदालत में मुझको एक तरफ़दार चाहिए,
उसकी इस कहानी में कोई एक किरदार चाहिए।।

चल वक़्त ना दे उसके संग ताह उम्र का मगर,
मेरी दिल-ए-सल्तनत का वही हक़दार चाहिए।।

भले ही दो पल की रौशनी दे तो आँखो को मेरी,
पर हर लम्हे में मुझे बस उसका दीदार चाहिए।।

वो मेरा नही इस जन्म तो ना सही मेरे खुदा,
पर मेरे जाने से ना टूटे ऐसा किरदार चाहिए।।

यूँ तो मुझे कोई खरीद ना सके इश्क़-ए-बाज़ार में ,
जो खरीद के अनमोल करदे ऐसा खरीददार चाहिए।।

वो जो लाखों राज़ समेटे हो खुद में कोई बात नही,
पर जो मेरे हर राज़ जान जाए ऐसा राज़दार चाहिए।।

किस किस को हाल सुनाऊँ तन्हा दिल का "चौहान",
जो बिन बोले समझ जाएं ऐसा कलाकार चाहिए।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Friday, 24 April 2020

"हमें कहाँ तज़ुर्बा है" ( HAME KAHAN TAZURBA HAI)


रूठों को फिर से मनाने का,
किसी को अपना बनाने का,
हमें कहाँ तज़ुर्बा है।।

किसी के साथ चलते जाने का,
किसी को हमसफ़र बनाने का ,
हमें कहाँ तज़ुर्बा है।।

खामोशियाँ भी सही नही है मगर,
खामोशी को आवाज़ बनाने का,
हमें कहाँ तज़ुर्बा है।।

ज़ख्म जिसने दिए हमने लिए,
अब ज़ख्मो पर मरहम लगाने का,
हमें कहाँ तज़ुर्बा है।।

मैं एक काली घनी रात सा हूँ,
यूँ तारों सा जगमगाने का,
हमें कहाँ तज़ुर्बा है।।

इश्क़ मुश्क अपने बस की बात नही,
इश्क़ में हद से गुज़र जाने का ,
हमें कहाँ तज़ुर्बा है।।

तेरे दिल का हाल तू जाने,
ये हाल लिखने लिखाने का,
हमें कहाँ तज़ुर्बा है।।

दिल करता है तो लिख देता हूँ,
यूँ शायर बन जाने का "चौहान"
हमें कहाँ तज़ुर्बा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wednesday, 22 April 2020

"ये लोग" (YE LOG)


ना जाने कितने नक़ाब चहरे पर लगाते है लोग,
ये कैसा भरोसा के बार बार आजमाते है लोग।।

मतलब से बात करते है ये अपनापन दिखाकर,
जरूरत के वक़्त ना जाने कहाँ चले जाते है लोग।।

राज़ सब जान लेते है ये चंद बातें अपनी बताकर,
हमराज़ बनके लोगों में फिर मज़ाक बनाते है लोग ।।

भूख प्यास कहाँ नज़र आती है किसी की इन्हें,
दो रोटी खिला दस अखबारों में छपवाते है लोग।।

कहाँ अब कोई मरहम बनेगा यहाँ किसी का,
दूसरों के जख्मों पर नमक ही लगाते है लोग।।

वो जमाने और थे कला का मोल कलाकार का था,
अब तो "चौहान" दूसरों के हक का खाते है लोग।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 20 April 2020

"लिखता हूँ" (LIKHTA HOON)


वो "जान"लिखती है, मैं "चौहान" लिखता हूँ,
वो छुपा कर रखती है जज़्बात अपने,
मैं पागल उसको शरेआम लिखता हूँ,
वो मेरे रास्ते भी जानती है मंज़िले भी,
वो मेरे ख़्वाब लिखती है, मैं उसको मुकाम लिखता हूँ,
किसे ख़बर के ये शायरी है या ज़रिया बातों का,
वो एक शाम लिखती है, मैं अपनी जान लिखता हूँ,
हर कोई आज बेताब है सुनने को इश्क़-ए-दास्तां,
लोग मेरा नाम पूछते है,मैं उसे अपनी पहचान लिखता हूँ ,
हाँ, थोड़ा मुँहफट, थोड़ा बदतमीज़ लिखती है खुद को,
सबसे अलग है वो मैं उसे अपना अभिमान लिखता हूँ ,
उसकी खुशबू से महकती है साँसें मेरी,
वो मुझे फूल लिखती है ,मैं उसे गुलिस्ताँ लिखता हूँ,
कहना भी चाहती है और कुछ कहती भी नही है,
मेरे जीने की वजह है वो,उसको अपना ईमान लिखता हूँ,
क्या करना जाकर इन मंदिर, मस्जिद, मज़ारों, में,
मैं उसको अपना पीर-ओ-मुर्शद ,अल्लाह , भगवान लिखता हूँ,
तू मिला ना मिला खुदा उससे तेरी मर्ज़ी,
मैं तो हर जन्म अपने उसके नाम लिखता हूँ,
एक दर्द झलकता है आजकल बातों में उसकी,
मैं अपनी हर ख़ुशी आज उसके नाम लिखता हूँ ,
वो मुहोब्बत क्या जिसमे अफसोस हो ना मिलने का,
रूहानी इश्क है रग रग में अपनी मैं उसका नाम लिखता हूँ ,
उसकी ख़ुशी उसी हँसी सब मायने रखती है,
बस चला तो "चौहान" कदमों में उसके,
ये धरती, चाँद सितारे,ये आसमाँ लिखता हूँ,
इश्क़ में कुछ यूँ मतलबी हो गए है हम,
लोग बिस्मिल्लाह लिखते है ,मैं उसका नाम लिखता हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 18 April 2020

"इश्क़ के मुसाफ़िर" (ISHQ KE MUSAFIR)


इन काली तन्हा रातों में हम क्यूँ जागे रहते है,
जलने को परवानों से, हम क्यूँ आगे रहते है।।

ऐसा क्या है इस इश्क़ में, जो दीवाना करता है,
इश्क़ के दरिया में रोज़,लाखों आशिक़ मरते है।।

एक चहरे की तलाश में क्यूँ दर-ब-दर भटकते है,
एक नाम को ही ना जाने क्यूँ दिन रात ये रटते है।।

नींदों वाले ख़्वाब तो दुनिया देखती है "चौहान",
खुली आँखो में ही ना जाने कितने ख़्वाब पलते है।।

ना जाने कैसा रोग है,ना दवा कही, ना कहीं आराम है,
अंज़ाम पता है मौत है फिर भी, हँसकर गले ये लगते है।।

कहीं बातें समझ ना आती लिखी हुई किताबों की इनको ,
इश्क़ में तो देखो साहब ये लबो की ख़ामोशी भी पढ़ते है।।

कुछ कह गए, कुछ चुप रहे,कुछ मिल गए, कुछ राख हुए,
मरकर भी जो ज़िंदा है ,यहाँ फिर वही शायरी करते है।।

एक सोच में ही ज़िंदा है वो, जो हँस-हँस कर बाते करते है,
लिख के दर्द किताबों में यहाँ,फिर बैरागी बनके फिरते है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Thursday, 16 April 2020

"जज़्बात" (JAZBAAT)


चल आज तुझसे भी बात कर लेता हूँ,
जैसी कभी हुई नही वैसी मुलाक़ात कर लेता हूँ मैं,
हर रोज़ एक झुठ तुझसे कह देता हूँ मैं,
तुझे सुला कर रात भर रो लेता हूँ मैं,
ऐसा नही के मैं तुझे अपना नही मानता,
तुझे यूँ हँसता हुआ देखना चाहता हूँ मैं,
बस इसलिए अपने ग़मो को खुद में समेट लेता हूँ मैं,
तुझपर गुस्सा भी अब दिखाने लगा हूँ मैं,
हाँ, अब ज़िंदगी पर तरस खाने लगा हूँ मैं,
मुहोब्बत ही कहाँ तेरी इबादत करता हूँ मैं,
एक का साथ हरा करता है,
एक से दूरी मुझे मुरझा रही है,
तेरे लिए जीना भी चाहता हूँ,
एक कि याद में मर रहा हूँ मैं,
हाँ, कभी कभी बात नही कर रहा तुझसे,
जैसे कई दिनों से इबादत नही कर रहा हूँ मैं,
तुझसे नाराज़गी नही है कोई मेरी,
इस तन्हाई में खुद से ही लड़ रहा हूँ मैं,
एक ज्वालामुखी सा दहक रहा है मुझमें,
ना जाने क्यूँ इस आग में झुलस रहा हूँ मैं,
एक तेरा भी गुनहगार ही हूँ मैं यहाँ,
जो तुझसे ऐसे बर्ताव कर रहा हूँ मैं,
नही निकला जा रहा इन रास्तों पर भी,
हर अनजान चहरे से अब डर रहा हूँ मैं...।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


Tuesday, 14 April 2020

"एक रोज़" (EK ROZ)


मेरी रूह बनकर शामिल तू है जिस्म में,
जब निकलेगी रूह तो जिस्म छोड़ दूँगा।।

मेरी आती जाती हर एक साँस है तेरे नाम,
तेरे बिन मैं साँसों की माला भी तोड़ दूँगा।।

जब जुदा हो जाऊँगा खुद से,तेरे इश्क़ से,
मैं उस रोज ये सब लिखना भी छोड़ दूँगा।।

ये फ़ासले मंज़ूर है मुझे जो दुनिया ने दिये है,
फ़ासले जो तूने बढ़ाये मैं दुनिया ही छोड़ दूँगा।।

ये जिस्म पास नही हमारे पर रूह तो एक ही है,
नामुमकिन है कि तेरे हाल में जीना छोड़ दूँगा।।

ये दुनिया कोई आईना नही जो हक़ीक़त बताए,
बात इश्क़ पर आयी तो ये आईना भी तोड़ दूँगा।।

मेरा वजूद तब तक है यहाँ जब तक तुझसे जुड़ा हूँ,
तुझसे टूटा तो फिर ये दुनिया के रिश्ते भी तोड़ दूँगा।।

थोड़ा ज़िद्दी, नासमझ है "चौहान" इश्क़ की नगरी में,
लिखकर फैसले अपने फिर ये कलम भी तोड़ दूँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Sunday, 12 April 2020

"एक दौर" ( EK DAUR)


एक दौर था कि घर में दरवाजे ही नही होते थे,
एक दौर है हम खुद को ही क़ैद करके सोते है।।

एक दौर था दर्द दूसरों के देख भी रो देते थे,
एक दौर है अपने ज़ख्मो पर भी ना रोते है।।

एक दौर था की सब्र था जो मिल गया उसमें,
एक दौर है सब पाकर भी निराश ही होते है।।

एक दौर था की हर रिश्ते की अहमियत थी,
एक दौर है कि रोज़ किसी को मारकर सोते है।।

एक दौर था की कच्चे घरों में भी सुकून मिलता था,
एक दौर है आलिशान बंगलों में भी बेचैनी होते है।।

एक दौर था कि खाना भी माँ पे पास बैठ खाते थे,
एक दौर है कि माँ बेटों के आशियाने भी अलग होते है।।

जब वक़्त था तब कदर ना कि हमनें इस वक़्त की,
आज उस वक़्त को याद कर "चौहान" बेवक़्त रोते है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 9 April 2020

"अब" (AB)


हर रास्ते में नया रास्ता मिल रहा है,
मंज़िलें दूर हो रही है फासला मिल रहा है।।

हर किसी ने बोला था कि मंज़िल नही इस राह की,
थोड़ी आगे चला तो अब काफिला मिल रहा है।।

राह में बहुत पत्थर भी मिले और काँटे भी,
अब रास्ता खिला-खिला सा मिल रहा है।।

बड़े अनजान थे हम अजनबी शहर में तेरे,
अब सब कुछ मुझसे मिला-मिला सा लग रहा है।।

कोई होता तो जान भी जाता मेरी मुस्कान का राज़,
पूछता मुझे क्यों ये तकिया गीला-गीला सा लग रहा है।।

अब आएगा तो वो पूछेगा ज़रूर "चौहान",
रौनकें कहाँ है क्यों सब फीका-फीका सा लग रहा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Tuesday, 7 April 2020

"तलाश" (TALAASH)


मैं खुद की ही तलाश में दर-ब-दर भटकता हूँ,
ये कैसे ख़्वाब है जिनके लिए दिन-रात जगता हूँ।।

कुछ तो ऐसा है जो अभी इतनी जल्द होना नही था,
ये जिस्मानी लिबास क्यूँ अब तक साथ लिए फिरता हूँ।।

क्यूँ अब मंज़िलों पर आकर भी मुझे आराम नही,
ये कैसी तन्हाई है जो अब भी साथ लिए फिरता हूँ।।

तुझे खो तो मैं कब का चुका हूँ इस दुनिया में,
फिर क्यूँ आज भी तुझसे जुदाई से डरता हूँ।।

कुछ हालात भी समझ नही आते अब तो मुझे,
अब अंधेरो से नही मैं इस रौशनी से डरता हूँ।।

सोचा था के लिख के बयाँ कर दूँ मैं जज़्बात अपने,
अश्क़ नही रुकते जब जब हाथ मे कलम पकड़ता हूँ।।

और किन पैमानों पर नापू "चौहान" मुहोब्बत अपनी,
तेरी कब्र पर रोज़ नाम अपना लिख के गुज़रता हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Monday, 6 April 2020

"वक़्त" (WAQT)


एक जैसा रहा ही कब है ये वक्त,
आज दुख है,तो कल सुख भी आएगा।।

माना आज मुश्किलें हज़ार है तो क्या,
एक वक्त पर,ये वक़्त भी बीत जाएगा।।

मौत तो सिर्फ कोई एक वजह, एक बहाना ढूंढती है,
कहाँ लिखा है जो आया है,वो लौटकर ना जाएगा।।

ये कर्म हमारे ही है, जो गिरफ्त में है आज खुद के ही,
हमेशा से तो कहते आये है, जो होगा देखा जाएगा।।

सब बराबर है उसकी चौंखट पर, ये समझा रहा है वो,
तू चाँद तक चला गया तो क्या, भगवान बन जाएगा।।

ये जो मज़हब के नाम पर, लोगो को राह से भटकाते है,
दो ग़ज़ ज़मी के सिवा, हिस्से में कुछ भी ना आएगा।।

ये वक़्त की मार है ,ये कौम, मज़हब, धर्म,जात, कुछ नही देखती,
मत सोचना के इस आग की जहद में, घर तुम्हारा ना आएगा।।

माना पाबंदियां है, घर मे रहने की और कोई काम नही है,
तुझे भाया ना आशियाँ तेरा, तो फिर तुझे क्या भाएगा।।

ये वो वक़्त है,जो अपनो को देने के लिए तरसता था तू,
हँसी खुशी जी ले, कल कहाँ तू किसी को ये वक़्त दे पाएगा।।

गम में भी खुशी ढूंढ लेना, ये तो आदत है मेरी "चौहान",
आज ये पल जी ले अपनो के साथ ,कल जो होगा देखा जायेगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Saturday, 4 April 2020

"उम्मीद" (UMEED)


एक ज़ख्म, एक नासूर, एक दर्द, बाकी है,
क्हाँ इल्म था तूफां का,सोचा था बस रात बाकी है।।

वो आया ,मिला और बस चला गया ,
हम बेखबर सोचते रहे ,मुलाकात बाकी है।।

बड़ी शिद्दत से सिर झुकाए बैठा रहा,
उम्मीद थी पत्थरो की करामात बाक़ी है।।

सोचा था के इस बार गले लगेगा वो हमसे,
कहाँ पता था के हमपर इल्ज़ामात बाकी है।।

बड़ी कोशिशें की हमनें रोकने की उसे,
किसी ने झुठला दिया की एक आस बाकी है।।

आज मेरी कब्र की मिट्टी खोद रहे है वो,
इस उम्मीद में "चौहान" के साँस बाकी है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Thursday, 2 April 2020

"मुहोब्बत" ( MOHABBAT)


ना जाने कैसे महबूब से दिल लगा बैठे है,
खुद अपनी मुहोब्बत को मज़ाक बना बैठे है।।

कागज़ पर उतरे थे हमनें अरमान लफ़्ज़ों में,
आज अपने हाथों से उनको राख बना बैठे है।।

बड़ी रौनकें थी मेरे दिल की इस बस्ती में,
आज उस बस्ती को हम श्मशान बना बैठे है।।

महफिलों की शान हुआ करते थे कभी हम भी,
ये अलग बात है, तन्हाइयों को पहचान बना बैठे है।।

मुहोब्बत भी नही इबादत भी की है हमनें उसकी,
हाँ सच है पत्थरों को हम भगवान बना बैठे है।।

गलती ये नही "चौहान" की मुहोब्बत तुमसे हुई ,
गलती ये है कि एक शायर को जान बना बैठे है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...