अंदाज़ अब भी वही है , तेरी बातों का ..
सिमटे हुए सहमे हुए उन जज़्बातों का ..
वो चेहरे के नूर का , इश्क़ के सुरूर का ,
तेरे अश्क़ों से भीगी हुई उन तन्हा रातों का..
दिल में उठते हर एक सवाल का , जहन में आते तेरे ख्याल का,
किसी बक्से में बंद पड़ी उन इश्क़ की सौगातों का ..
खुद से ज़्यादा मेरी फ़िक्र का , बातों में मेरे ज़िक्र का ,
चोरी छुपे होती थी जो रोज़ उन मुलाक़ातों का ..
तुझसे मिलने की बेकरारी का , इश्क़ की चढ़ती खुमारी का ,
"चौहान" की ख्वाईश बन कर रह गई उन बेरंग चाहतों का ..
अंदाज़ आज भी वही है ....
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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