मैं खुद नही जानता,
मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।।
जवाब तो बात दूर की है,
ये भी तो एक सवाल ही है,
मैं तुझसे क्या सवाल करूँ।।
गहराई कौन जान सकता है,
इन आँखों मे बहते सागर की,
कितना रोऊँ जो इन्हें खाली करूँ।।
ये भी तो एक गिला है मुझे,
मेरी ज़िंदगी तक बेरंग है,
तेरी तस्वीर में रंग क्या भरूँ।।
हर रोज़ एक नयी कोशिश, फिर वही बात,
हर नज़्म अधूरी रह गई "चौहान",
मैं तेरे नाम पर किताबें क्या भरूँ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।




